Category: International

  • नेपाल में बाढ़ के बाद राहत अभियान तेज, अमेरिका ने 50 लाख डॉलर से ज्यादा की मदद दी, मृतकों की पहचान में FBI जुटी

    नेपाल में बाढ़ के बाद राहत अभियान तेज, अमेरिका ने 50 लाख डॉलर से ज्यादा की मदद दी, मृतकों की पहचान में FBI जुटी


    वॉशिंगटन। नेपाल में बाढ़ की तबाही के बाद राहत के साथ-साथ मृतकों की पहचान का काम भी चुनौती बना हुआ है। इस मुश्किल घड़ी में अमेरिका ने नेपाल के राहत अभियान में अपनी मदद बढ़ा दी है। अमेरिकी विदेश विभाग ने नेपाल पुलिस को फोरेंसिक जांच के लिए 10 लाख डॉलर की अतिरिक्त सहायता मंजूर की है। इस राशि से डीएनए किट और दूसरी जरूरी फोरेंसिक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। अमेरिका की ओर से नेपाल को अब तक मानवीय, स्वास्थ्य और फोरेंसिक सहायता के रूप में 50 लाख डॉलर से ज्यादा दिए जा चुके हैं।

    आपदा के बाद राहत सामग्री उन इलाकों तक पहुंचाना भी बड़ी चुनौती है, जहां बाढ़ के कारण संपर्क टूट गया है। अमेरिका ने इसके लिए भोजन से लेकर परिवहन और लॉजिस्टिक्स तक की व्यवस्था में सहयोग दिया है।

    10 हजार परिवारों को तीन महीने तक भोजन

    विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के जरिए अमेरिका ने 30 लाख डॉलर की मदद उपलब्ध कराई है। इस सहायता से बाढ़ प्रभावित 10,000 परिवारों को तीन महीने तक आपातकालीन खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी।

    दूरदराज और संपर्कविहीन इलाकों में राहत पहुंचाने के लिए हवाई और जमीनी परिवहन का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्रभावित लोगों तक मानवीय सहायता की सप्लाई बनाए रखना है।

    घर उजड़े तो अमेरिका ने भेजी जरूरी सामग्री

    कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (CRS) के माध्यम से 6,85,000 डॉलर की सहायता दी गई है। इससे प्रभावित परिवारों को भोजन, अस्थायी आश्रय, साफ पानी, स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़ी मदद दी जा रही है। राहत सामग्री में कंबल, प्लास्टिक शीटिंग, टेंट, सोलर लाइट और डिग्निटी किट शामिल हैं।

    बाढ़ प्रभावित बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ‘चाइल्ड फ्रेंडली’ स्थान भी बनाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें आपदा के बाद सुरक्षित माहौल मिल सके।

    स्वास्थ्य और पोषण पर भी फोकस

    स्वास्थ्य सेवाओं को बनाए रखने के लिए झपीगो (Jhpiego), एफएचआई-360 और यूनिसेफ के जरिए 3,65,000 डॉलर की सहायता दी गई है। यह राशि स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता संबंधी जरूरतों पर खर्च की जा रही है।

    DNA से होगी शवों की पहचान

    बाढ़ में जान गंवाने वाले लोगों की पहचान के लिए अमेरिका ने फोरेंसिक विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराई है। FBI के विशेषज्ञ नेपाल पुलिस के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। डीएनए समेत दूसरी फोरेंसिक तकनीकों के जरिए पीड़ितों की पहचान की जा रही है।

    इसका एक अहम उद्देश्य उन अमेरिकी नागरिकों के परिजनों को भी जानकारी उपलब्ध कराना है, जो आपदा के बाद अपने परिवार के सदस्यों के बारे में जानकारी का इंतजार कर रहे हैं।

    खोज-बचाव के लिए अमेरिकी सेना ने दिया उपकरण

    नेपाल के नेतृत्व में चल रहे खोज, बचाव और राहत अभियानों में अमेरिकी सेना भी संसाधनों के साथ सहयोग कर रही है। सेना ने 5,000 विशेष आपदा पीड़ित रिकवरी सामग्री, 500 फर्स्ट एड किट, स्ट्रेचर और फ्रंट-एंड लोडर उपलब्ध कराए हैं।

    जमीन पर चार सदस्यीय अमेरिकी सैन्य सिविल अफेयर्स टीम भी मौजूद है। यह टीम मानवीय सहायता और आपदा राहत से जुड़ी परियोजनाओं में सहयोग कर रही है।

    अमेरिका ने संकेत दिया है कि नेपाल में हालात और राहत की जरूरत का आकलन करते हुए आगे भी सहायता बढ़ाई जा सकती है। प्रभावित क्षेत्रों में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

  • सऊदी अरब में हूतियों का बड़ा हमला: शरूराह के सैन्य ठिकाने पर बरसाए मिसाइल-ड्रोन

    सऊदी अरब में हूतियों का बड़ा हमला: शरूराह के सैन्य ठिकाने पर बरसाए मिसाइल-ड्रोन


    नई दिल्ली। मिडिल-ईस्ट में तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के शरूराह में एक सैन्य ठिकाने पर मिसाइल और ड्रोन से बड़ा हमला करने का दावा किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याहिया सारी ने टेलीग्राम पर बयान जारी कर कहा कि हमले में सैन्य अड्डे के हथियार डिपो और कमांड-एंड-कंट्रोल रूम को निशाना बनाया गया।

    याहिया सारी के मुताबिक, हमले में बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन इस्तेमाल किए गए और सभी निर्धारित लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। उन्होंने इसे यमन के खिलाफ सऊदी अरब की कथित लगातार आक्रामक कार्रवाई का जवाब बताया। हूती प्रवक्ता ने चेतावनी दी कि यदि सऊदी हमले जारी रहते हैं तो आने वाले दिनों में सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    जीजान में प्रोजेक्टाइल गिरने से दो घायल

    हूती हमले से नुकसान की पुष्टि सऊदी अरब की नागरिक सुरक्षा ने भी की है। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, यमन की ओर से दागा गया एक प्रोजेक्टाइल जीजान में गिरा, जिससे दो लोग घायल हुए हैं।

    प्रोजेक्टाइल गिरने से एक स्थानीय मस्जिद, कई रिहायशी इमारतों और कुछ वाहनों को भी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, शरूराह के सैन्य ठिकाने पर हुए कथित हमले में कितना नुकसान हुआ, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

    मयून द्वीप पर कब्जे का भी दावा

    इससे पहले हूतियों ने लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में स्थित मयून द्वीप (पेरिम) पर कब्जा करने का दावा किया था। इसके बाद मोखा बंदरगाह शहर से जुड़े घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। हूतियों के मुताबिक, सऊदी अरब ने इसके जवाब में मोखा एयरपोर्ट पर कई हमले किए।

    हूतियों ने दावा किया था कि लाल सागर में तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही के लिहाज से अहम इस क्षेत्र पर नियंत्रण के जरिए वे और ईरान अमेरिका पर वैश्विक ऊर्जा कीमतें बढ़ाने का दबाव बनाना चाहते हैं।

    हालांकि, इन दावों और सैन्य ठिकाने को हुए नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बीच हूतियों और सऊदी अरब, दोनों पक्षों के बयानों को अलग-अलग स्रोतों से सत्यापित किया जाना बाकी है।

  • भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बढ़ी समीक्षा, बंदरगाह नीतियों और ब्रिक्स सम्मेलन में निमंत्रण नहीं मिलने पर BNP नाराज

    भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बढ़ी समीक्षा, बंदरगाह नीतियों और ब्रिक्स सम्मेलन में निमंत्रण नहीं मिलने पर BNP नाराज

    नई दिल्ली ।बांग्लादेश ने भारत के साथ हुए 101 समझौतों की समीक्षा शुरू कर दी है। सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP के मुख्य व्हिप नूरुल इस्लाम मोनी ने बताया कि सरकार इन सभी समझौतों की जांच कर रही है। उन्होंने संकेत दिया कि समीक्षा के बाद कुछ फैसलों का असर जल्द सामने आ सकता है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन समझौतों में बदलाव किया जाएगा और किन्हें समाप्त करने पर विचार होगा।

    नूरुल इस्लाम मोनी ने संसद सत्र समाप्त होने के बाद पत्रकारों से बातचीत में भारत के साथ हुए समझौतों को लेकर सरकार की स्थिति बताई। उन्होंने कहा कि भारत के साथ किए गए सभी 101 समझौतों की समीक्षा की जा रही है। जब उनसे पूछा गया कि क्या इनमें से कुछ समझौते खत्म किए जा सकते हैं, तो उन्होंने कहा कि इसका जवाब जल्द सामने आएगा। हालांकि, उन्होंने किसी विशेष समझौते का नाम नहीं बताया।

    BNP नेता के मुताबिक, सरकार पिछली सरकार के कार्यकाल में लिए गए उन फैसलों की भी दोबारा समीक्षा कर रही है, जिन्हें देश के हित में सही नहीं माना गया था। उनका कहना है कि सरकार देश के हित को सबसे ऊपर रखकर पुराने फैसलों पर विचार कर रही है। ऐसे समझौतों में बदलाव की संभावना जताई गई है, जिनसे बांग्लादेश को नुकसान होने का आकलन किया जा रहा है।

    भारत के साथ हुए समझौतों की समीक्षा के बीच बंदरगाहों से जुड़े पुराने फैसले भी चर्चा में हैं। नूरुल इस्लाम मोनी ने चट्टोग्राम और मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल से संबंधित नीतियों पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि पहले कुछ ऐसे नियम बनाए गए थे, जिनसे विदेशी जहाजों को अधिक फायदा मिला। उन्होंने कहा कि आगे होने वाले फैसलों में बांग्लादेश की जरूरतों और देश की संप्रभुता को सबसे अधिक महत्व दिया जाएगा।

    हालांकि, अभी तक सरकार की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 101 समझौतों में से किन पर सबसे पहले कार्रवाई की जाएगी। इसी तरह यह भी सामने नहीं आया है कि किन समझौतों को बदला या समाप्त किया जा सकता है। BNP नेता ने केवल इतना संकेत दिया है कि समीक्षा के बाद कुछ फैसले जल्द सामने आ सकते हैं।

    इस बीच ब्रिक्स सम्मेलन को लेकर भी BNP ने नाराजगी जताई है। नूरुल इस्लाम मोनी ने दिल्ली में हो रही बैठक में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित नहीं किए जाने पर असंतोष जाहिर किया। उन्होंने इसे बांग्लादेश जैसे स्वतंत्र देश के लिए निराशाजनक बताया।

    ब्रिक्स सम्मेलन में निमंत्रण नहीं मिलने के मुद्दे पर भी मोनी ने भारत की ओर इशारा करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की। इस तरह भारत के साथ 101 समझौतों की समीक्षा और ब्रिक्स सम्मेलन में निमंत्रण नहीं मिलने का मुद्दा बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक चर्चा में प्रमुखता से सामने आया है।

    फिलहाल समीक्षा की प्रक्रिया जारी है और किसी विशेष समझौते को बदलने या खत्म करने का आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। BNP नेता के अनुसार, आने वाले समय में सरकार के फैसलों से यह स्पष्ट हो सकता है कि भारत के साथ हुए समझौतों को लेकर बांग्लादेश की आगे की नीति किस दिशा में जाती है।

  • BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच तनाव के बीच जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए मिसाइल हमले को लेकर एक नया आरोप सामने आया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान को चीन से जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की हाई-क्वालिटी सैटेलाइट तस्वीरें मिली थीं। अधिकारियों के अनुसार, इन तस्वीरों से ईरान को सैन्य अड्डे और वहां मौजूद अमेरिकी सैनिकों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती थी।

    अमेरिकी अधिकारियों ने जॉर्डन में मौजूद मुवफ्फक सलती एयर बेस पर हुए हमले और चीन से मिली तस्वीरों के बीच संबंध होने की बात कही है। उनके अनुसार, ईरान ने इस सैन्य अड्डे की साफ और विस्तृत सैटेलाइट तस्वीरें हासिल की थीं। माना जा रहा है कि ऐसी तस्वीरों से बेस की स्थिति और वहां की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाना आसान हो सकता था।

    यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाकर किए गए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी, जबकि चार अन्य सैनिक घायल हुए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैनिकों के रहने वाली जगह पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया गया था। हमले के समय कई अमेरिकी सैनिक सो रहे थे।

    यह हमला 24 घंटे के भीतर सैन्य अड्डे पर हुए तीन मिसाइल हमलों में से एक था। अप्रैल में हुए सीजफायर के बाद यह पहली ऐसी घटना थी, जिसमें अमेरिकी सैनिकों की जान गई। इसी वजह से हमले से जुड़ी जानकारी के स्रोत और उससे संबंधित संभावित सहायता को लेकर अमेरिकी स्तर पर जांच और सवालों का सिलसिला जारी है।

    हालांकि, अमेरिका ने यह दावा नहीं किया है कि चीन की सरकार ने सीधे तौर पर ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने में मदद की थी। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन के सामने सैटेलाइट तस्वीरों से संबंधित सवाल उठाए थे। इसके जवाब में चीन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।

    चीन ने अमेरिका से अपने आरोपों के समर्थन में सबूत भी मांगे हैं। अमेरिका की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चीन की कौन-सी कंपनी या संस्था ने कथित तौर पर ये सैटेलाइट तस्वीरें ईरान को उपलब्ध कराई थीं। इसलिए तस्वीरों की आपूर्ति से जुड़े संस्थानों की पहचान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    अमेरिका इससे पहले भी ईरान को सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराने के आरोप में चीन की तीन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर चुका है। ऐसे में जॉर्डन के सैन्य अड्डे से जुड़ा नया आरोप दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव के बीच सामने आया है।

    पूरे मामले में मुख्य सवाल यह है कि जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें ईरान तक किस माध्यम से पहुंचीं और उनका इस्तेमाल किस तरह किया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने तस्वीरों और हमले के बीच संबंध की संभावना जताई है, जबकि चीन ने सीधे तौर पर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है।

    जॉर्डन में हुए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत और चार सैनिकों के घायल होने के बाद यह मामला अमेरिका के लिए सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है। वहीं, चीन पर लगे आरोपों से अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति भी बनी हुई है।

  • ‘भारत से दुनिया में जाए शांति का संदेश’, ईरानी राष्ट्रपति से भारतीय धर्मगुरुओं ने की मुलाकात

    ‘भारत से दुनिया में जाए शांति का संदेश’, ईरानी राष्ट्रपति से भारतीय धर्मगुरुओं ने की मुलाकात


    नई दिल्ली।
    भारत के विभिन्न धर्मगुरुओं ने शुक्रवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की। इस दौरान वैश्विक शांति, न्याय, मानवता और संवाद के जरिए विवादों के समाधान पर चर्चा हुई। मुलाकात के बाद अजमेर शरीफ दरगाह के गद्दीनशीन हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने कहा कि भारत की धरती से पूरी दुनिया के लिए शांति और भाईचारे का संदेश जाना चाहिए।

    हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के विभिन्न धर्मगुरु मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि सदियों से कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत की धरती से ‘सबके लिए प्यार और किसी से नफरत नहीं’ का संदेश दिया जाता रहा है। आज जब दुनिया के कई बड़े नेता भारत में एकत्र हुए हैं, तब इस संदेश का महत्व और बढ़ जाता है।

    उन्होंने कहा कि संदेश स्पष्ट है कि किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। अगर अन्याय होता है तो उसका जवाब दिया जाना चाहिए। भारत हमेशा न्याय, करुणा, दया और एकता जैसे मूल्यों पर विश्वास करता रहा है। पूरी दुनिया को एक परिवार मानते हुए सभी को मिलकर मानवता की सेवा करनी चाहिए।

    आचार्य लोकेश मुनि ने ईरान में शांति सम्मेलन का दिया प्रस्ताव

    जैन आध्यात्मिक गुरु आचार्य लोकेश मुनि ने बताया कि उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को ईरान में शांति सम्मेलन आयोजित करने का न्योता दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया की नजर इस समय भारत पर है और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच शांति के लिए पहल करने का यह महत्वपूर्ण अवसर है।

    आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि धर्मगुरुओं का स्पष्ट मानना है कि युद्ध, हिंसा और आतंक किसी भी समस्या का समाधान नहीं हैं। विवादों को बातचीत, संवाद और शांति के प्रयासों के जरिए हल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईरानी राष्ट्रपति ने शांति सम्मेलन के उनके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है।

    उन्होंने बताया कि जल्द ही एक मंच पर धर्मगुरुओं और दुनिया में शांति की इच्छा रखने वाली ताकतों को एकत्र किया जाएगा। इस मंच के जरिए बातचीत और संवाद के माध्यम से वैश्विक शांति की दिशा में प्रयास करने की योजना है।

    मीरवाइज उमर फारूक ने युद्ध खत्म करने की अपील की

    मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि बैठक में धर्मगुरुओं, कारोबारी प्रतिनिधियों और विद्वानों ने हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में सबसे बड़ा संदेश शांति का होना चाहिए। नई दिल्ली में ब्रिक्स की महत्वपूर्ण बैठक के दौरान दुनिया के बड़े नेताओं की मौजूदगी इस संदेश को और प्रभावी बनाती है।

    फारूक ने कहा कि स्थायी शांति तभी संभव है, जब न्याय सुनिश्चित हो। उन्होंने ईरान की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि अमेरिका की ओर से ईरान पर थोपा गया युद्ध गलत है। उन्होंने फलस्तीन और लेबनान के हालात का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं के कारण दुनिया में अराजकता की स्थिति पैदा हो रही है और इसका समाधान जरूरी है।

    उन्होंने बताया कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी मानवता को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है। उनके मुताबिक, अगर शांति की दिशा में आगे बढ़ना है तो इंसानियत को सबसे अधिक महत्व देना होगा। आज का समय बातचीत और कूटनीति का है, युद्ध का नहीं।

    ‘अब युद्ध खत्म करने का समय’

    मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि मानव मूल्यों में विश्वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को युद्ध के बजाय संवाद और कूटनीति की पैरवी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अब युद्ध खत्म करने और बातचीत को मौका देने का समय है। उनके मुताबिक, गंभीर वैश्विक संकट का समाधान निकालने का रास्ता बातचीत और समझौते की प्रक्रिया से ही निकल सकता है।

    भारत और ईरान के संबंधों का उल्लेख करते हुए फारूक ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में जहां भी ज्यादती और जुल्म हो रहा है, उसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। उन्होंने ईरान और फलस्तीन का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया की बड़ी ताकतों को मिलकर मजबूत संदेश देना चाहिए कि युद्ध समाप्त होना चाहिए और बातचीत एवं कूटनीति को अवसर दिया जाना चाहिए।

  • हूतियों की बढ़ती ताकत से सऊदी अरब चिंतित, अमेरिकी मदद की मांग के बीच ट्रंप ने सैन्य हमले से किया इनकार

    हूतियों की बढ़ती ताकत से सऊदी अरब चिंतित, अमेरिकी मदद की मांग के बीच ट्रंप ने सैन्य हमले से किया इनकार

    नई दिल्ली ।यमन में हूती लड़ाकों की बढ़ती ताकत और रणनीतिक इलाकों की ओर उनके बढ़ते प्रभाव ने सऊदी अरब की चिंता बढ़ा दी है। हालात को देखते हुए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन पर बातचीत की और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की। हालांकि, ट्रंप ने यमन में सीधे अमेरिकी हमले से इनकार कर दिया।

    हूतियों के मोचा शहर पर कब्जे और दक्षिण की ओर उनकी बढ़ती गतिविधियों के बीच सऊदी समर्थित यमनी बलों के पीछे हटने की खबर सामने आई है। इसी स्थिति के बीच सऊदी नेतृत्व ने अमेरिका से मदद की अपील की। बातचीत के दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस ने क्षेत्र में बिगड़ते हालात की जानकारी ट्रंप को दी और इसके बाद दोबारा संपर्क कर हूतियों के खिलाफ अमेरिकी स्ट्राइक की मांग रखी।

    ट्रंप ने यमन में संघर्ष बढ़ने को लेकर चिंता जताई, लेकिन हूती समूह के खिलाफ सीधे हमले के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अमेरिका ने हालांकि सऊदी अरब को हूतियों से संबंधित खुफिया जानकारी और टारगेटिंग डेटा उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है। बताया गया है कि करीब 200 अमेरिकी सैन्यकर्मी पहले से सऊदी अरब में गैर-गतिशील सहायता प्रदान कर रहे हैं।

    सऊदी अरब की चिंता का एक बड़ा कारण हूतियों का रणनीतिक समुद्री क्षेत्रों की ओर बढ़ना है। उनकी गतिविधियां बढ़ने से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास स्थिति और महत्वपूर्ण हो गई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए अहम माना जाता है और सऊदी अरब के तेल निर्यात से भी इसका सीधा संबंध है। हूतियों की बढ़ती गतिविधियों के बीच तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है।

    मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि ईरान पहले से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए समुद्री आवाजाही पर दबाव बना रहा है। ऐसे में बाब अल-मंदेब क्षेत्र में हूतियों का प्रभाव बढ़ने से अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों पर दबाव बढ़ने की आशंका सऊदी अरब के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

    मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर गुरुवार को सऊदी अरब पहुंचे। बताया गया कि उन्होंने क्षेत्र की स्थिति को लेकर तत्काल चर्चा के लिए अहम बैठकें कीं। हालांकि, वाशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास और व्हाइट हाउस की ओर से इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।

    अमेरिका फिलहाल हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से बचने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वाशिंगटन की प्राथमिकता लाल सागर में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और खुला रखना है। यमन के व्यापक संघर्ष से निपटने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय सहयोगियों पर छोड़ने की नीति पर जोर दिया जा रहा है।

    इसी वजह से सऊदी अरब की सैन्य हस्तक्षेप की मांग के बावजूद अमेरिका फिलहाल सीधे हमले के बजाय खुफिया जानकारी और सैन्य सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखने की कोशिश कर रहा है।

    यमन में हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है। यह शहर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर बताया गया है। मोखा पर पहले सऊदी समर्थित यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स का नियंत्रण था। दोनों पक्षों के बीच नौ दिनों से लड़ाई चल रही थी। मोखा पर कब्जे के बाद हूतियों की स्थिति और मजबूत हुई है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों को लेकर सऊदी अरब की चिंता बढ़ गई है।

  • ब्रिक्स समिट में भाग नहीं लेगा बांग्लादेश… PM तारिक रहमान को न्योता नहीं मिलने का दिया हवाला

    ब्रिक्स समिट में भाग नहीं लेगा बांग्लादेश… PM तारिक रहमान को न्योता नहीं मिलने का दिया हवाला


    ढाका।
    बांग्लादेश (Bangladesh) ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) के आउटरीच सेशन में प्रधानमंत्री तारिक रहमान (Prime Minister Tariq Rahman) के शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया है। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर इस बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था, बल्कि यह न्योता BIMSTEC के मौजूदा चेयर को दिया गया था।

    बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) ने गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत में साफ किया कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान के BRICS समिट में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री को आमंत्रित ही नहीं किया गया, तो सरकार की ओर से किसी प्रतिनिधि को भेजने की भी कोई वजह नहीं है।


    ‘हमारे PM को किसने बुलाया? BIMSTEC चेयर को न्योता मिला था’

    हुमायूं कबीर ने कहा, “हम कैसे जाएंगे? क्या बांग्लादेश सरकार से किसी को आमंत्रित किया गया है? हमारे प्रधानमंत्री को आमंत्रित नहीं किया गया था।” जब उनसे पूछा गया कि प्रधानमंत्री को न्योता दिए जाने की बात क्यों कही जा रही है, तो उन्होंने जवाब दिया, “आपको किसने बताया कि हमारे प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया गया था? BIMSTEC चेयर को आमंत्रित किया गया था। फिर आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं?”

    BRICS समिट का आउटरीच सेशन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होना है। इसमें सदस्य और साझेदार देशों के नेताओं के साथ आउटरीच के लिए आमंत्रित किए गए नेता भी शामिल होंगे।


    भारत ने क्या कहा था?

    भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में नई दिल्ली में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा था कि भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को BIMSTEC के मौजूदा चेयर के तौर पर 18वें BRICS समिट के आउटरीच सेशन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। जायसवाल ने यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री के लिए एक अलग द्विपक्षीय निमंत्रण फरवरी से ही मौजूद है।

    बांग्लादेश के विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि तारिक रहमान की भारत की पहली यात्रा बहुपक्षीय यात्रा नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश सरकार भारत के साथ प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय यात्रा की व्यवस्था करने पर काम कर रही है और इसके लिए उचित समय का इंतजार किया जा रहा है।


    भारत-बांग्लादेश रिश्तों में तनाव के बीच आया फैसला

    बांग्लादेश का यह फैसला ऐसे समय आया है जब नई दिल्ली और ढाका के रिश्तों में तनाव बना हुआ है। इसकी वजहों में भारत में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की मौजूदगी, उनके प्रत्यर्पण की मांग और पानी के बंटवारे से जुड़े समझौतों समेत कुछ अन्य लंबित मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा बांग्लादेश की चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी को भी दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संदर्भ में बताया गया है।

    फरवरी में भारत ने भेजे थे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला
    भारत ने 17 फरवरी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को बांग्लादेश भेजा था। वह 12 फरवरी के आम चुनाव के बाद तारिक रहमान की BNP सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे। ओम बिरला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से तारिक रहमान के लिए एक पत्र भी लेकर गए थे। इसमें प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बांग्लादेशी समकक्ष को बधाई दी थी और उन्हें पत्नी तथा बेटी के साथ भारत आने का निमंत्रण दिया था।

  • सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    नई दिल्ली । सऊदी अरब पर हूतियों के बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को बड़ी चेतावनी दी है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ने पिछले 24 घंटे के दौरान तेहरान तक यह संदेश पहुंचाया है कि वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए कहे। ईरान को यह मैसेज तब दिया गया है जब हूतियों ने बीते दिनों सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले किए थे।

    पाकिस्तान की इस दखल को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय से सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ अपने रिश्तों को संभालता रहा है। अब इस्लामाबाद को डर है कि हूती हमले अगर और बढ़े तो प्रॉक्सी जंग एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा संकट में बदल सकती है।

    ईरान बोला- हूतियों पर हमारा कंट्रोल नहीं

    एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान ने मंगलवार को तेहरान तक अपना संदेश पहुंचाया था। ईरान की तरफ से जवाब दिया गया कि ईरान हूतियों को कंट्रोल नहीं करता। हालांकि, दो ईरानी सूत्रों ने अलग दावा किया है। उनके मुताबिक, तेहरान ने पिछले हफ्ते हूतियों से सऊदी अरब पर हमले करने को कहा था।

    दावा है कि ईरान ने इसके लिए अतिरिक्त पैसा और हथियार देने का वादा भी किया था। साथ ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के कई कमांडर हमलों के तालमेल में मदद के लिए यमन पहुंचे थे।

    सऊदी की रक्षा में पाकिस्तान-तुर्की की तैयारी

    पाकिस्तान की चेतावनी का एक बड़ा कारण सऊदी अरब के साथ उसका डिफेंस पैक्ट भी है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहले ही कहा है कि अगर हमले सऊदी की जमीन तक फैलते हैं तो रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद के बीच ज्वाइंट सिक्योरिटी अरेंजमेंट सामने आ सकता है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अधिकारियों ने रियाद में पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाकात की है। तीनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी है कि उनकी सेनाएं यमन में दाखिल नहीं होंगी और किसी भी जवाबी कार्रवाई को सऊदी की जमीन से अंजाम दिया जाएगा।

  • न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    नई दिल्ली । खेती के लिए आमतौर पर खुली जमीन, धूप, पानी और सही मौसम की जरूरत होती है. लेकिन क्लाइमेट चेंज के दौर में यही चीजें किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं. कहीं सूखा फसल खराब कर देता है तो कहीं ज्यादा बारिश पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.

    चीन के वैज्ञानिक अब इसी समस्या का एक अलग रास्ता खोज रहे हैं. उनका आइडिया है कि खेती को जमीन के ऊपर करने के बजाय जमीन के नीचे ले जाया जाए. इसके लिए बंद हो चुकी कोयला खदानों का इस्तेमाल किया जा सकता है. खदानों में मौजूद बड़ी खाली जगह को एक तरह के हाईटेक फार्म में बदला जाएगा, जहां फसल के लिए जरूरी रोशनी, पानी, तापमान और हवा को इंसान अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकेगा. हालांकि, इसका मकसद सिर्फ अनाज उगाना नहीं, बल्कि भविष्य की स्पेस कॉलोनियों के लिए खेती की टेक्नोलॉजी तैयार करना भी है.

    अंधेरी खदान में आएगी नकली धूप

    जमीन के कई मीटर नीचे सूरज की रोशनी पहुंचना संभव नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पौधे बढ़ेंगे कैसे? वैज्ञानिकों के प्लान में इसका जवाब आर्टिफिशियल लाइटिंग है. इसका मतलब खदान के अंदर ऐसी लाइट लगाई जाएगी, जो पौधों को ग्रो करने के लिए जरूरी रोशनी देगी. इस काम में खदानों का पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर भी मदद कर सकता है. कई खदानों में पहले से पावर सप्लाई और वेंटिलेशन सिस्टम मौजूद हैं. इन्हें खेती की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने की संभावना देखी जा रही है. इसका मतलब बाहर चाहे रात हो या दिन, बारिश हो या तेज धूप, जमीन के नीचे मौजूद पौधों के लिए एक अलग ही मौसम तैयार किया जा सकेगा.

    गर्मी के लिए धरती की एनर्जी

    जमीन के अंदर एक और फायदा है. यहां का तापमान खुले मैदान की तरह लगातार तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होता. वैज्ञानिक इस स्थिर वातावरण का फायदा उठाने की योजना बना रहे हैं. इसके लिए जियोथर्मल एनर्जी यानी धरती के अंदर मौजूद गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे अंडरग्राउंड फार्म में पौधों के लिए जरूरी तापमान बनाए रखने में मदद मिलेगी. साथ ही पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैसों के एमिशन को घटाने की कोशिश भी की जा सकती है. इसका मतलब जिस खदान को कभी कोयला निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वही जगह आगे चलकर क्लीन एनर्जी और खेती के एक्सपेरिमेंट का सेंटर बन सकती है.

    जहरीले पानी को भी बनाया जाएगा यूजफुल

    कोयला खदानों में सिर्फ खाली जगह ही नहीं होती. वहां जमा पानी भी एक बड़ी समस्या बन सकता है. कई बार इस पानी में ऐसे केमिकल और हैवी मेटल्स पाए जा सकते हैं, जिन्हें सीधे खेती में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक इस समस्या के लिए पानी को साफ करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं. मेम्ब्रेन सेपरेशन जैसी टेक्नोलॉजी के जरिए पानी से नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को अलग करने की कोशिश होगी. इसके बाद साफ किए गए पानी का इस्तेमाल कुछ फसलों की सिंचाई में किया जा सकता है. चाय और रेपसीड जैसी फसलों का भी जिक्र किया गया है. हालांकि, कौन सी फसल जमीन के नीचे इस सिस्टम में सबसे अच्छी तरह उग सकती है, यह भी रिसर्च का हिस्सा होगा.

    असली मकसद खेती से कहीं बड़ा

    पहली नजर में लग सकता है कि चीन का यह पूरा प्लान सिर्फ जमीन की कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है. लेकिन वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इससे कहीं आगे की है. दरअसल, अंडरग्राउंड फार्म को एक तरह की एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग लैब के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है. यहां वैज्ञानिक देखेंगे कि बिना प्राकृतिक वातावरण के पौधों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है. रोशनी कितनी होनी चाहिए, पानी किस तरह इस्तेमाल किया जाए, हवा और तापमान कैसे कंट्रोल हों और कार्बन का पौधों पर क्या असर पड़े, इन सभी चीजों पर एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है.

    धरती के नीचे की खेती जाएगी अंतरिक्ष तक

    इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा स्पेस मिशन से जुड़ा है. भविष्य में अगर इंसान चांद या मंगल जैसे दूसरे ग्रहों पर लंबे समय तक रहना चाहता है तो वहां खुले खेत बनाना बेहद मुश्किल होगा. वहां न धरती जैसा वातावरण है, न आसानी से उपलब्ध पानी और न ही खेती के लिए सामान्य मौसम. ऐसे में जमीन के नीचे या पूरी तरह कंट्रोल किए गए एनवायरनमेंट में खाना उगाने की टेक्नोलॉजी बेहद काम आ सकती है. चीन के वैज्ञानिकों का यह एक्सपेरिमेंट इसी दिशा में एक टेस्टिंग ग्राउंड की तरह काम कर सकता है. आज जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बंद पड़ी कोयला खदान में किया जाएगा, कल उसी के किसी बेहतर वर्जन से दूसरे ग्रहों पर पौधे उगाने की कोशिश की जा सकती है.

    हजारों बंद खदानें बन सकती हैं नया फार्म

    चीन में पिछले कई सालों में बड़ी संख्या में कोयला खदानें बंद हुई हैं. एक दशक में करीब बारह हजार खदानें बंद की जा चुकी हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है. ऐसे में देश के पास जमीन के नीचे ऐसे कई बड़े इलाके मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल नए तरीके से किया जा सकता है. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में बंद खदानों में मौजूद विशाल खाली जगह अंडरग्राउंड एग्रीकल्चर के लिए इस्तेमाल हो सकती है. हालांकि, इसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे.

    आसान नहीं होगी जमीन के नीचे खेती

    अंडरग्राउंड फार्म का आइडिया सुनने में जितना शानदार लगता है, इसे असल में लागू करना उतना ही आसान नहीं होगा. आर्टिफिशियल लाइटिंग के लिए बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए. तापमान और हवा को कंट्रोल करने के लिए भी लगातार एनर्जी की जरूरत होगी. इसके अलावा खदानों की सेफ्टी, पानी की क्वालिटी और अंदर काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी अहम मुद्दे होंगे. इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने की खेती का तैयार मॉडल मानना जल्दबाजी होगी. वैज्ञानिक पहले यह समझना चाहते हैं कि बंद खदानों को किस तरह सुरक्षित और उपयोगी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में बदला जा सकता है.

    आज खदान, कल अंतरिक्ष का खेत

    चीन का यह प्रयोग खेती की पारंपरिक सोच को जरूर बदलने वाला है. जिस जगह कभी धरती के अंदर से कोयला निकाला जाता था, वहीं अब पौधों को उगाने की कोशिश की जा रही है. फिलहाल इसका सबसे बड़ा मकसद करोड़ों टन अनाज जमीन के नीचे पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम समझना है जिसमें इंसान प्राकृतिक मौसम पर निर्भर हुए बिना खाना उगा सके. अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इसका फायदा सिर्फ चीन की बंद खदानों तक सीमित नहीं रहेगा. क्लाइमेट चेंज से जूझती दुनिया से लेकर भविष्य में चांद और मंगल पर बनने वाली इंसानी बस्तियों तक, जमीन के नीचे खेती की यह टेक्नोलॉजी एक दिन बेहद काम की साबित हो सकती है.

  • सोने की कीमतों में उछाल फिर भी चीन नहीं रुका! अगस्त में खरीदा 20 टन से ज्यादा गोल्ड लगातार 22 महीने की खरीदारी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

    सोने की कीमतों में उछाल फिर भी चीन नहीं रुका! अगस्त में खरीदा 20 टन से ज्यादा गोल्ड लगातार 22 महीने की खरीदारी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता


    नई दिल्ली । चीन एक बार फिर अपने गोल्ड रिजर्व को लेकर पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और इसके बावजूद चीन ने सोने की खरीदारी रोकने के बजाय इसे और तेज कर दिया है। अगस्त 2026 में चीन के केंद्रीय बैंक ने अपने गोल्ड रिजर्व में 20 टन से ज्यादा सोना जोड़ा है। खास बात यह है कि चीन की यह खरीदारी लगातार 22वें महीने भी जारी रही है। यानी करीब दो साल से ड्रैगन लगातार अपने सोने के भंडार को बढ़ाने में जुटा है।

    चीन के इस कदम को सामान्य निवेश की तरह नहीं देखा जा रहा है क्योंकि सोने की कीमतों में तेजी के बावजूद उसकी खरीदारी जारी है। ताजा खरीदारी के बाद चीन का गोल्ड रिजर्व बढ़कर करीब 2387 टन हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार अगस्त में चीन के गोल्ड रिजर्व में जुलाई के मुकाबले करीब 650000 औंस की बढ़ोतरी हुई है। यह अक्टूबर 2023 के बाद किसी एक महीने में चीन की सबसे बड़ी सोने की खरीदारी बताई गई है। अक्टूबर 2023 में चीन के रिजर्व में करीब 740000 औंस का इजाफा हुआ था।

    चीन की लगातार जारी गोल्ड खरीदारी के पीछे उसकी लंबी अवधि की आर्थिक रणनीति को अहम वजह माना जा रहा है। चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा मजबूत और संतुलित बनाना चाहता है। इसके लिए वह केवल अमेरिकी डॉलर पर निर्भर रहने के बजाय सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों में भी अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगातार बदलते हालात के बीच सोने को एक सुरक्षित संपत्ति माना जाता है और चीन इसी वजह से अपने रिजर्व में इसकी मात्रा बढ़ाता दिखाई दे रहा है।

    चीन का यह कदम उसकी आर्थिक रणनीति का बड़ा हिस्सा माना जा सकता है। लगातार 22 महीने तक गोल्ड खरीदना बताता है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है बल्कि इसके पीछे लंबी अवधि की योजना काम कर रही है। चीन अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ ही वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहता है। सोने के बढ़ते भंडार से उसे विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने का मौका मिलता है और किसी एक मुद्रा या संपत्ति पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

    चीन की यह खरीदारी साल 2015 के बाद सबसे लंबे गोल्ड खरीदारी अभियान के रूप में भी सामने आई है। 22 महीने से लगातार जारी यह सिलसिला इस बात का संकेत है कि बीजिंग सोने को अपने आर्थिक सुरक्षा कवच के तौर पर देख रहा है। दुनिया में आर्थिक और भू राजनीतिक अनिश्चितता के बीच चीन का यह कदम अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में अगर चीन इसी रफ्तार से सोना खरीदता रहा तो उसके गोल्ड रिजर्व में और बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।