Category: International

  • नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें

    नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें



    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी विचारक माने जाने वाले Alexander Dugin के हालिया बयानों के बाद एक बार फिर “RIC (Russia–India–China)” और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हो गई है। डुगिन का दावा है कि पश्चिमी देशों का वैश्विक दबदबा घट रहा है और रूस व चीन इसके विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जबकि भारत की भूमिका भविष्य की वैश्विक संरचना में निर्णायक हो सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार अभी एक रणनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है, न कि कोई औपचारिक गठबंधन या तय वैश्विक व्यवस्था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले दो दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक तरफ United States अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर China आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही है। वहीं Russia पश्चिमी देशों के साथ टकराव के बीच अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अलग मानी जा रही है। India लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक व तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंध भी बनाए हुए है।

    इसी बीच चीन-रूस-भारत को मिलाकर RIC समूह की चर्चा जरूर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों देशों के बीच मौजूद सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग राष्ट्रीय हित इसे एक स्थायी गठबंधन बनने से रोकते हैं।

    विदेश नीति विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया किसी एक ध्रुव के बजाय “बहु-ध्रुवीय शक्ति संतुलन” की ओर बढ़ सकती है, लेकिन यह संतुलन किसी औपचारिक RIC ब्लॉक के रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग वैश्विक साझेदारियों के जाल के रूप में सामने आएगा।

    कुल मिलाकर, डुगिन का यह विचार वैश्विक राजनीति में एक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभी भी जटिल और बदलते शक्ति संतुलन पर आधारित है, जिसमें किसी एक गुट का पूर्ण वर्चस्व या RIC जैसा एकीकृत ब्लॉक फिलहाल व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।

  • ट्रंप बोले… इजराइल में मेरी लोकप्रियता की रेटिंग 99%…. दो साल बाद वहां जाकर लडूंगा PM चुनाव

    ट्रंप बोले… इजराइल में मेरी लोकप्रियता की रेटिंग 99%…. दो साल बाद वहां जाकर लडूंगा PM चुनाव


    वॉशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने मंगलवार को फिर एक ऐसा दावा किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय जगत में हलचल पैदा हो गई है। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने दावा किया कि इज़रायल (Israel) में उनकी लोकप्रियता 99 प्रतिशत है और मजाकिया अंदाज में कहा कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने के बाद (2028 में) वह वहां प्रधानमंत्री पद का चुनाव (Prime Minister’s post, election) लड़ सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें एक ताज़ा सर्वेक्षण में बेहद ऊंची रेटिंग मिली है। उन्होंने कहा, “तो शायद यह काम पूरा करने के बाद, मैं इज़रायल जाऊंगा और प्रधानमंत्री पद का चुनाव (Prime Minister’s post, election) लड़ूंगा। आज सुबह ही एक जनमत सर्वेक्षण आया है, जिसमें मेरी रेटिंग 99% है।”

    जब पत्रकारों ने उनसे ईरान पर संभावित हमले के बारे में पूछा, तो ट्रंप ने कहा कि इस्लामिक गणराज्य के साथ किसी समझौते पर पहुंचने की उन्हें “कोई जल्दी नहीं है।” उन्होंने कहा, “हमें होर्मुज समुद्री मार्ग को खोलना होगा, वह तुरंत खुल जाएगा, इसलिए हम इसे एक मौका देंगे। मुझे कोई जल्दी नहीं है। हर कोई कह रहा है, ‘ओह, मध्यावधि चुनाव आ रहे हैं।’ आदर्श रूप से, मैं चाहूंगा कि कम से कम लोग मारे जाएं, न कि बहुत ज़्यादा।”


    नेतन्याहू बहुत अच्छे इंसान

    पत्रकार लगातार ट्रंप से पूछते रहे कि उन्होंने इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से इस हमले के बारे में क्या कहा है? इस पर रिपब्लिकन नेता ने जवाब दिया, “वह बहुत अच्छे इंसान हैं; वह वही करेंगे जो मैं उनसे करवाना चाहूंगा। और वह एक बेहतरीन व्यक्ति हैं… यह मत भूलिए कि वह युद्धकालीन प्रधानमंत्री रह चुके हैं।” उन्होंने यह दावा भी किया कि इज़रायल में नेतन्याहू के साथ “सही बर्ताव नहीं किया जाता है। ट्रंप ने कल ही ईरान को एक नई चेतावनी जारी करते हुए कहा था कि “एक और बड़ा हमला” हो सकता है, क्योंकि दोनों देश एक स्थायी शांति समझौते की शर्तों को लेकर एक गंभीर गतिरोध पर पहुंच गए हैं।


    ट्रंप और नेतन्याहू पर 58 मिलियन डॉलर का इनाम?

    इस बीच, खबरों के अनुसार ईरान, ट्रंप और नेतन्याहू पर 58 मिलियन डॉलर का इनाम रखने पर विचार-विमर्श कर रहा है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के अध्यक्ष इब्राहिम अज़ीज़ी ने घोषणा की है कि यह समिति “इस्लामिक गणराज्य के सैन्य और सुरक्षा बलों द्वारा जवाबी कार्रवाई” नामक एक विधेयक तैयार कर रही है। ईरान वायर और द टेलीग्राफ यूके की रिपोर्टों के अनुसार, इस विधेयक के माध्यम से किसी भी ऐसे व्यक्ति या संस्था को 50 मिलियन यूरो (लगभग 58.23 मिलियन डॉलर) की राशि का भुगतान औपचारिक रूप से सुनिश्चित किया जाएगा, जो अमेरिका और इज़रायल के इन नेताओं की हत्या करेगा। ईरानी संसद 28 फरवरी को तेहरान पर हुए हमलों के लिए,जिनमें तत्कालीन सर्वोच्च नेता अली खामेनेई मारे गए थे,ट्रंप और नेतन्याहू की हत्या के लिए इनाम देने वाले एक बिल पर मतदान करने वाली है।

  • US में हजारों H-1B वीजा धारक मुश्किल में…. 60 दिन में दूसरी नौकरी नहीं मिली तो छोड़ना पड़ेगा अमेरिका

    US में हजारों H-1B वीजा धारक मुश्किल में…. 60 दिन में दूसरी नौकरी नहीं मिली तो छोड़ना पड़ेगा अमेरिका


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) की दिग्गज टेक कंपनियों मेटा (Meta), अमेज़न (Amazon) और ओरेकल (Oracle) में हाल ही में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी ने हजारों भारतीय टेक पेशेवरों (Indian Tech Professionals) को मुश्किल में डाल दिया है। नौकरी जाने के बाद अब H-1B वीज़ा धारक भारतीयों (H-1B Visa holding Indians.) के सामने केवल 60 दिनों का समय बचा है। इसी दौरान उन्हें नई नौकरी खोजनी होगी वरना उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। दरअसल, अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों के अनुसार, H-1B वीजा पर काम कर रहे किसी विदेशी कर्मचारी की नौकरी जाने के बाद उसे 60 दिनों का “ग्रेस पीरियड” मिलता है। इस दौरान अगर उसे कोई नया नियोक्ता नहीं मिलता जो उसके वीज़ा को स्पॉन्सर करे, तो उसे अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।

    अब इस संकट की वजह से वर्षों से अमेरिका में बसे कई भारतीय परिवारों के लिए स्थिति बेहद तनावपूर्ण हो गई है। उनके सामने अब नौकरी ढूंढ़ने से लेकर अपना घर बचाने, बच्चों की शिक्षा और अमेरिका में रहने के अधिकार पर भी खतरा मंडरा रहा है। कई भारतीयों के लिए, जिन्होंने वहाँ अपनी ज़िंदगी बनाने में सालों बिताए हैं, यह स्थिति बहुत भारी टेंशन लेकर आया है।


    अतिरिक्त कागजात की माँग

    इस बीच, कई छंटनीशुदा कर्मचारी अब कथित तौर पर अस्थायी रूप से B-2 विजिटर वीजा पर जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उन्हें अमेरिका में छह महीने तक रहने की अनुमति मिल सकती है। लेकिन इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में मौजूदा इमिग्रेशन माहौल को देखते हुए, यह रास्ता भी अब और ज़्यादा मुश्किल होता जा रहा है। इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इमिग्रेशन अधिकारी अब B-2 विजिटर वीजा ची चाहत रखने वालों से अतिरिक्त कागज़ात की माँग कर रहे हैं और छंटनीशुदा H-1B कर्मचारियों के वीज़ा आवेदन ज़्यादा संख्या में खारिज कर रहे हैं।


    भारतीयों पर सबसे बड़ा असर

    अमेरिका स्थित इमिग्रेशन वकील राजीव खन्ना के मुताबिक, हाल के महीनों में B-1/B-2 स्टेटस परिवर्तन से जुड़े मामलों में अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग और अस्वीकृति नोटिस तेजी से बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि उनके करियर में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। H-1B वीजा कार्यक्रम में भारतीयों की भागीदारी सबसे अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में मंजूर की गई 4,06,348 H-1B याचिकाओं में से 2,83,772 केवल भारतीयों की थीं। 2026 में अब तक 144 टेक कंपनियों में 1,10,000 से अधिक कर्मचारी अपनी नौकरी खो चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारतीयों की है।

    मुश्किलें और बढ़ती चुनौतियां
    पारिवारिक और आर्थिक संकट: कई भारतीय पिछले एक दशक से अमेरिका में रह रहे हैं और ग्रीन कार्ड के लंबे इंतजार (backlog) में फंसे हैं। उनके बच्चे वहां पैदा हुए हैं और उनके ऊपर होम लोन जैसी बड़ी वित्तीय जिम्मेदारियां हैं।

    वीजा नियमों में सख्ती: समय बढ़ाने के लिए कई कर्मचारी अस्थायी रूप से B-2 (विजिटर) वीजा में स्विच करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब प्रशासन इसमें भी अधिक कागजी कार्रवाई और ‘सबूतों की मांग’ (RFE) कर रहा है।


    विकल्प की तलाश

    इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि अब वीजा मंजूरी मिलना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। ऐसे में अब नए विकल्पों की तलाश हो रही है। कई भारतीय अब कनाडा और यूरोप को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। इसके अलावा, कुछ लोग F-1 (छात्र वीजा) या O-1 (असाधारण क्षमता वाले व्यक्तियों के लिए वीजा) जैसे अन्य मार्गों पर भी विचार कर रहे हैं। बता दें कि मेटा जैसी कंपनियां अब अपनी संरचना को ‘फ्लैट’ करने और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर ध्यान केंद्रित करने के लिए छंटनी का सहारा ले रही हैं, जिससे आने वाले दिनों में टेक सेक्टर में काम करने वाले भारतीयों की चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

  • रूस ने शुरू किया परमाणु हमले का महाअभ्यास, 65 हजार सैनिक और 140 फाइटर जेट शामिल; यूक्रेन ने जताई कड़ी आपत्ति

    रूस ने शुरू किया परमाणु हमले का महाअभ्यास, 65 हजार सैनिक और 140 फाइटर जेट शामिल; यूक्रेन ने जताई कड़ी आपत्ति



    नई दिल्ली। व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस ने बेलारूस के साथ मिलकर एक बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास शुरू किया है, जिसे परमाणु तैयारी से जुड़ा अभ्यास बताया जा रहा है। इस अभ्यास में लगभग 65 हजार सैनिक, 140 फाइटर जेट, 200 रॉकेट लॉन्चर और कई युद्धपोतों को शामिल किया गया है।

    यह अभ्यास रूस और बेलारूस की संयुक्त सैन्य क्षमता को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है, जिसमें टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों की तैनाती और उनके संचालन का भी अभ्यास शामिल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस अभ्यास में इस्कंदर मिसाइल सिस्टम और अन्य परमाणु क्षमता वाले हथियारों का भी परीक्षण किया जा रहा है।

    अभ्यास में क्या-क्या शामिल?
    रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस सैन्य अभ्यास में भारी संख्या में सैन्य उपकरण शामिल किए गए हैं, जिनमें मिसाइल सिस्टम, फाइटर जेट, युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हैं। इस अभ्यास का उद्देश्य सैनिकों को परमाणु और रणनीतिक युद्ध परिस्थितियों के लिए तैयार करना बताया गया है।

    यूक्रेन की तीखी प्रतिक्रिया
    Ukraine ने रूस के इस कदम की कड़ी निंदा की है। यूक्रेन का कहना है कि बेलारूस में परमाणु हथियारों की तैनाती और इस तरह का अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

    यूक्रेन ने इसे परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है।

    बढ़ता रूस-नाटो तनाव
    विशेषज्ञों के अनुसार, यह अभ्यास ऐसे समय पर हो रहा है जब रूस और पश्चिमी देशों के बीच पहले से ही यूक्रेन युद्ध को लेकर तनाव चरम पर है। रूस इसे अपनी सुरक्षा जरूरत बता रहा है, जबकि नाटो और यूक्रेन इसे उकसाने वाली कार्रवाई मान रहे हैं।

    इस सैन्य अभ्यास ने एक बार फिर यूरोप में बड़े युद्ध के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है, हालांकि अभी किसी भी पक्ष ने सीधे टकराव की बात नहीं कही है।

  • अमेरिकी F-35 को हमने मार गिराया’, ईरान का बड़ा दावा; अमेरिका को दी नई चेतावनी

    अमेरिकी F-35 को हमने मार गिराया’, ईरान का बड़ा दावा; अमेरिका को दी नई चेतावनी


    नई दिल्ली। Abbas Araghchi ने दावा किया है कि ईरान की सेना ने युद्ध के दौरान अमेरिका के अत्याधुनिक Lockheed Martin F-35 Lightning II लड़ाकू विमान को मार गिराया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने वाला ईरान दुनिया का पहला देश बन गया है।

    तेहरान में दिए गए बयान में अराघची ने अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान के साथ संघर्ष में कई सैन्य विमानों के नुकसान को स्वीकार किया है। ईरानी विदेश मंत्री ने इसे तेहरान के पुराने दावों की पुष्टि बताया और कहा कि युद्ध में ईरान की सैन्य क्षमता दुनिया के सामने आ चुकी है।

    अमेरिकी रिपोर्ट में क्या कहा गया?
    13 मई को प्रकाशित अमेरिकी कांग्रेस की संस्था Congressional Research Service (CRS) की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के साथ संघर्ष के दौरान अमेरिका के करीब 42 सैन्य विमान नष्ट हुए या क्षतिग्रस्त हुए। रिपोर्ट में कहा गया कि वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है क्योंकि कई जानकारियां अब भी गोपनीय हैं।

    रिपोर्ट में स्ट्राइक ईगल फाइटर जेट और स्पेशल ऑपरेशन एयरक्राफ्ट को नुकसान पहुंचने का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि अमेरिकी रक्षा विभाग ने अब तक आधिकारिक तौर पर F-35 गिराए जाने की पुष्टि नहीं की है।

    ईरान ने दी नई चेतावनी
    अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि ईरान की सेना ने आधुनिक अमेरिकी तकनीक को चुनौती दी है। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि अगर दोबारा युद्ध शुरू हुआ तो दुनिया “और बड़े सरप्राइज” देखेगी।

    ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ में बढ़ा तनाव
    रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ “Operation Epic Fury” नाम से 40 दिनों तक संयुक्त हवाई अभियान चलाया था। यह अभियान 28 फरवरी 2026 से शुरू हुआ था।

    सीआरएस ने अपनी रिपोर्ट अमेरिकी रक्षा विभाग, अमेरिकी सेंट्रल कमांड और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार की है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान अभियान पर अमेरिका का सैन्य खर्च बढ़कर 29 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दावा किया है कि ईरानी सेना ने युद्ध के दौरान अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को मार गिराया। अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में भी ईरान संघर्ष में अमेरिकी सैन्य विमानों के नुकसान का जिक्र किया गया है, जिससे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ गया है।
    हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के दावों और अमेरिकी रिपोर्ट के बीच अब भी कई तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। इसके बावजूद इस बयान ने मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ा दिया है।

  • मोदी-मेलोनी मुलाकात का असर? भारत की चेतावनी के बाद क्या पाकिस्तान को हथियार बेचना रोकेगा इटली

    मोदी-मेलोनी मुलाकात का असर? भारत की चेतावनी के बाद क्या पाकिस्तान को हथियार बेचना रोकेगा इटली




    नई दिल्ली। रोम में प्रधानमंत्री Narendra Modi और इटली की पीएम Giorgia Meloni की मुलाकात के बाद भारत-इटली रक्षा संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। दोनों देशों ने अपने रिश्तों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा देने की बात कही है। इसी बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इटली अब पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई सीमित करेगा या उस पर रोक लगाएगा।

    भारत ने हाल के महीनों में इटली के सामने अपनी सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से रखा है। रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने अपने इतालवी समकक्ष Guido Crosetto से साफ कहा था कि पाकिस्तान को दी जाने वाली उन्नत रक्षा तकनीक भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। भारत ने यह भी दोहराया कि पाकिस्तान लंबे समय से सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देता रहा है, इसलिए संवेदनशील सैन्य तकनीक उसके हाथों तक नहीं पहुंचनी चाहिए।

    सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के बीच हुई रक्षा वार्ता में भारत ने पाकिस्तान को इटली द्वारा की गई पूर्व हथियार आपूर्ति का मुद्दा भी उठाया। भारत ने खासतौर पर नौसेना प्रणालियों, हेलीकॉप्टर, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और रडार तकनीक को लेकर चिंता जताई। इसके जवाब में इतालवी अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि भारत को मिलने वाली अत्याधुनिक रक्षा तकनीक किसी तीसरे देश के साथ साझा नहीं की जाएगी।

    दरअसल पाकिस्तान और इटली के बीच रक्षा कारोबार काफी पुराना और मजबूत रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार चीन के बाद इटली पाकिस्तान को हथियार देने वाले बड़े देशों में शामिल रहा है। पाकिस्तान अपनी सेना के आधुनिकीकरण के लिए इटली से नौसैनिक उपकरण, रडार, सैन्य हेलीकॉप्टर, आर्टिलरी सिस्टम और गोला-बारूद खरीदता रहा है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2018 में इटली ने पाकिस्तान को करीब 762 मिलियन डॉलर के रक्षा निर्यात की मंजूरी दी थी। वहीं हालिया आंकड़ों में इटली से पाकिस्तान को हथियार और सैन्य उपकरणों के निर्यात का आंकड़ा 541 मिलियन डॉलर से ज्यादा बताया गया है। पाकिस्तानी सेना में इतालवी हथियारों और उपकरणों का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है, जिसमें Beretta 92FS पिस्तौल भी शामिल है।

    अब स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि इटली की बड़ी रक्षा कंपनी Leonardo भारत में रक्षा और नौसेना परियोजनाओं में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि भविष्य की रक्षा साझेदारी तभी मजबूत होगी, जब इटली भारत की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी के इटली दौरे को इसी नजरिए से बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत-इटली रक्षा सहयोग और गहरा हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान को हथियार सप्लाई का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा बना रहेगा।

  • कैलिफोर्निया मस्जिद हमला: कट्टरपंथी युवकों ने बरसाईं गोलियां, 3 की मौत; 140 बच्चों की जान बची

    कैलिफोर्निया मस्जिद हमला: कट्टरपंथी युवकों ने बरसाईं गोलियां, 3 की मौत; 140 बच्चों की जान बची



    नई दिल्ली। अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में स्थित एक मस्जिद पर हुए भीषण हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हमले में तीन लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जबकि दो किशोर हमलावरों ने बाद में खुद को भी गोली मार ली। जांच एजेंसियों के अनुसार दोनों हमलावर ऑनलाइन कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और श्वेत वर्चस्ववादी सोच का समर्थन करते थे। अधिकारियों का कहना है कि यह हमला अमेरिका में बढ़ती धार्मिक घृणा और चरमपंथी हिंसा का गंभीर उदाहरण है।

    पुलिस ने हमलावरों की पहचान 17 वर्षीय केन क्लार्क और 18 वर्षीय कैलेब वाजक्वेज के रूप में की है। जांच में सामने आया कि दोनों पहली बार इंटरनेट के जरिए मिले थे और बाद में एक-दूसरे के संपर्क में आए। एफबीआई के सैन डिएगो प्रमुख एजेंट मार्क रेमिली ने बताया कि दोनों युवकों ने ऑनलाइन मंचों पर कट्टरपंथी विचार अपनाए थे। उनके दस्तावेजों और लेखों में मुसलमानों, यहूदियों, अश्वेत समुदाय, महिलाओं और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के खिलाफ घृणित टिप्पणियां मिली हैं। दोनों ने श्वेत वर्चस्ववादी विचारधारा का समर्थन करते हुए यह दावा किया था कि श्वेत लोगों का अस्तित्व खतरे में है।

    जांच एजेंसियों के मुताबिक हमलावरों ने खुद को न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च मस्जिद हमले के आरोपी ब्रेंटन टैरेंट का “बेटा” बताया था। 2019 में क्राइस्टचर्च की मस्जिदों पर हुए हमले में 51 लोगों की मौत हुई थी। अधिकारियों को हमलावरों के पास से नाजी प्रतीक, चरमपंथी साहित्य और कई ऑनलाइन घोषणापत्र भी मिले हैं। एक हमलावर ने अपने लेखों में मानसिक तनाव और महिलाओं द्वारा अस्वीकार किए जाने की बातें भी लिखी थीं।

    हमले के दौरान मस्जिद के सुरक्षा गार्ड अमीन अब्दुल्ला ने बहादुरी दिखाते हुए हमलावरों का सामना किया। अधिकारियों के अनुसार अब्दुल्ला ने हमलावरों को मस्जिद के अंदर मौजूद बच्चों तक पहुंचने से रोकने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। मस्जिद परिसर में मौजूद करीब 140 स्कूली बच्चों को सुरक्षित बचा लिया गया। इमाम ताहा हस्सान ने बताया कि अमीन अब्दुल्ला ने गोलीबारी के बीच रेडियो पर लॉकडाउन की घोषणा की और हमलावरों को रोकने की कोशिश करते रहे। घायल होने के बावजूद उन्होंने जवाबी फायरिंग जारी रखी, जिससे हमलावरों को पीछे हटना पड़ा। बाद में हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी।

    पुलिस प्रमुख स्कॉट वाहल ने बताया कि हमलावर मस्जिद के अंदर घुसने में सफल हो गए थे और उन्होंने खाली कमरों की तलाशी भी ली। इसके बाद पार्किंग क्षेत्र में उन्होंने मंसूर काजिहा और नादिर अवाद को गोली मार दी। अधिकारियों का कहना है कि इन लोगों ने भी हमलावरों का ध्यान अपनी ओर खींचकर अन्य लोगों की जान बचाने में मदद की।

    घटना के बाद जांच एजेंसियों ने दोनों हमलावरों के घरों की तलाशी ली, जहां से कम से कम 30 बंदूकें, भारी मात्रा में गोला-बारूद और एक क्रॉसबो बरामद किया गया। अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या हमलावर किसी बड़े हमले की योजना बना रहे थे।

    यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका में मुस्लिम और यहूदी समुदायों के खिलाफ घृणा अपराधों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बाद धार्मिक तनाव और अधिक बढ़ गया है। सैन डिएगो के इस्लामिक सेंटर के इमाम ताहा हस्सान ने कहा कि मस्जिद को पहले भी धमकियां और नफरत भरे संदेश मिलते रहे हैं, लेकिन इस तरह के हिंसक हमले की कभी कल्पना नहीं की गई थी।

    अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां अब इस मामले को घरेलू आतंकवाद और ऑनलाइन कट्टरपंथ से जोड़कर जांच कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर फैल रही नफरत और चरमपंथी प्रचार सामग्री युवाओं को तेजी से प्रभावित कर रही है, जो समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

  • World Updates: पेरू में 5.8 तीव्रता का भूकंप, 27 घायल; कैलिफोर्निया में जंगल की आग और सूडान-लेबनान में हिंसा से बढ़ी चिंता

    World Updates: पेरू में 5.8 तीव्रता का भूकंप, 27 घायल; कैलिफोर्निया में जंगल की आग और सूडान-लेबनान में हिंसा से बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। दुनियाभर में प्राकृतिक आपदाओं और हिंसक संघर्षों ने चिंता बढ़ा दी है। पेरू में भूकंप, अमेरिका के कैलिफोर्निया में जंगल की आग, सूडान में ड्रोन हमला और दक्षिणी लेबनान पर इजरायली हवाई हमलों जैसी घटनाओं ने कई देशों को प्रभावित किया है। प्रशासनिक एजेंसियां राहत और बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं, जबकि हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।

    पेरू के दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में मंगलवार देर रात 5.8 तीव्रता का भूकंप आया, जिससे कई इमारतों को नुकसान पहुंचा और 27 लोग घायल हो गए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार भूकंप का केंद्र इका क्षेत्र के पाम्पा डी टेट शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर था और इसकी गहराई 56.5 किलोमीटर दर्ज की गई। भूकंप के बाद प्रभावित इलाकों में अफरा-तफरी मच गई। कई इमारतों में दरारें आ गईं और कुछ ढांचे आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। राहत की बात यह रही कि अब तक किसी के मारे जाने की खबर सामने नहीं आई है। पेरू के रक्षा मंत्री अमादेव फ्लोर्स ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और सैन लुइस गोंजागा यूनिवर्सिटी समेत अन्य क्षतिग्रस्त भवनों का निरीक्षण किया। प्रशासन राहत, मरम्मत और बचाव कार्यों में जुटा हुआ है। पेरू प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में स्थित है, जहां ज्वालामुखियों और फॉल्ट लाइनों की वजह से अक्सर भूकंप आते रहते हैं।

    उधर अमेरिका के दक्षिणी कैलिफोर्निया में जंगल की आग ने भारी तबाही मचाई है। तेज हवाओं की वजह से लगी आग तेजी से फैलती चली गई, जिसके बाद 17 हजार से अधिक लोगों को अपने घर छोड़ने के आदेश दिए गए। यह आग लॉस एंजिल्स से लगभग 48 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम स्थित सिमी वैली के पहाड़ी इलाकों में शुरू हुई। वेंटुरा काउंटी अग्निशमन विभाग के अनुसार आग ने पांच वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को जलाकर राख कर दिया और कम से कम एक घर पूरी तरह नष्ट हो गया। दमकल विभाग के प्रवक्ता एंड्रयू डाउड ने बताया कि शुरुआत में 48 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार की हवाओं ने आग को और भड़काया, लेकिन रात में हवा धीमी पड़ने से राहत कार्यों में मदद मिली। प्रशासन ने कई इलाकों में अभी भी निकासी आदेश जारी रखे हैं।

    इसी बीच दमकलकर्मी दक्षिणी कैलिफोर्निया तट के पास स्थित सांता रोजा द्वीप पर लगी भीषण आग से भी जूझ रहे हैं। यहां करीब 59 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आग फैल चुकी है। आग में एक केबिन और उपकरण शेड जलकर नष्ट हो गए हैं, जबकि राष्ट्रीय उद्यान सेवा के 11 कर्मचारियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है।

    अफ्रीकी देश सूडान में भी हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। पश्चिमी कोरडोफान प्रांत के घुबायश कस्बे में मंगलवार को एक व्यस्त बाजार पर ड्रोन हमला किया गया, जिसमें 28 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। स्थानीय मानवाधिकार संगठन ‘इमरजेंसी लॉयर्स’ ने दावा किया कि हमला सूडानी सेना की ओर से किया गया। संगठन के मुताबिक हमला उस समय हुआ जब बाजार में बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद थे। हालांकि सूडानी सेना ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने नागरिकों को निशाना नहीं बनाया। सेना के अधिकारियों के अनुसार ड्रोन हमले में रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) के लड़ाकू वाहनों को निशाना बनाया गया था। सूडान में अप्रैल 2023 से सेना और आरएसएफ के बीच भीषण संघर्ष जारी है, जिसने देश को गृहयुद्ध जैसी स्थिति में धकेल दिया है।

    वहीं दक्षिणी लेबनान पर इजरायल के हवाई हमलों में कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मृतकों में चार महिलाएं और तीन बच्चे भी शामिल हैं। यह हमला इजरायल और हिजबुल्ला के बीच जारी तनाव के बीच हुआ है। अमेरिका की मध्यस्थता से युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच लगभग रोज हमले जारी हैं। लगातार हो रहे हमलों ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है।

    अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में भी एक दर्दनाक हादसा सामने आया। मिडटाउन मैनहट्टन में एक महिला खुले गड्ढे में गिर गई, जिससे उसकी मौत हो गई। पुलिस के अनुसार 56 वर्षीय महिला अपनी कार पार्क करने के बाद बाहर निकल रही थी, तभी वह सड़क पर मरम्मत के लिए बनाए गए खुले गड्ढे में गिर गई। बाद में दमकलकर्मियों ने उसे बाहर निकाला, लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बिजली कंपनी कॉन एडिसन ने बताया कि शुरुआती जांच में पता चला है कि महिला के गिरने से कुछ मिनट पहले एक भारी ट्रक गुजरने के कारण गड्ढे का ढक्कन हट गया था।

    दुनियाभर में एक साथ सामने आई इन घटनाओं ने सुरक्षा, प्राकृतिक आपदाओं और युद्ध जैसे मुद्दों को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। कई देशों में प्रशासन राहत एवं बचाव कार्यों में जुटा है, जबकि प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित रखने के प्रयास लगातार जारी हैं।

  • रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा प्रदर्शन करते हुए बेलारूस के साथ संयुक्त परमाणु सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। तीन दिन तक चलने वाले इस महाअभ्यास में रूस ने 65 हजार सैनिकों, 140 लड़ाकू विमानों, 200 मिसाइल लॉन्चरों, 73 युद्धपोतों और 13 पनडुब्बियों को उतारा है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार इस अभ्यास में करीब 7800 प्रकार के हथियार और सैन्य उपकरण शामिल किए गए हैं। यह सैन्य अभ्यास 19 मई से शुरू होकर 21 मई तक चलेगा और इसे यूक्रेन तथा नाटो देशों के लिए एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।

    रूस ने यह अभ्यास ऐसे समय पर शुरू किया है जब यूक्रेन लगातार रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन हमले तेज कर रहा है। यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे होने वाले हैं और इस दौरान कई बार रूस अपने परमाणु हथियारों और मिसाइलों का प्रदर्शन कर चुका है। इस बार रूस ने परमाणु हमला करने में सक्षम मिसाइल प्रणालियों को भी अभ्यास में शामिल किया है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो जारी किया जिसमें सैनिक मोबाइल इस्कंदर-एम मिसाइल सिस्टम को लॉन्च साइट तक ले जाते नजर आए। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी मारक क्षमता करीब 500 किलोमीटर बताई जाती है।

    रूसी सेना बेलारूस में तैनात टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन के इस्तेमाल का अभ्यास भी कर रही है। हाल ही में रूस ने बेलारूस में ओरेशनिक मिसाइल प्रणाली भी तैनात की है, जो परमाणु हमला करने में सक्षम मानी जाती है। बेलारूस की सीमा कई नाटो देशों से लगती है, इसलिए इस तैनाती को यूरोप के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। रूस का कहना है कि नाटो देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और यूक्रेन को मिल रहे पश्चिमी समर्थन से उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

    यह अभ्यास ऐसे समय पर हो रहा है जब रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin चीन के दौरे पर हैं। इस दौरान रूस और चीन के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। माना जा रहा है कि रूस वैश्विक स्तर पर यह संदेश देना चाहता है कि वह पश्चिमी दबाव के बावजूद पीछे हटने वाला नहीं है।

    रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते के समाप्त होने के बाद यह पहला बड़ा परमाणु अभ्यास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है। नाटो देशों ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यूरोप में सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    उधर यूक्रेन ने रूस और बेलारूस के इस संयुक्त अभ्यास की कड़ी आलोचना की है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बेलारूस में परमाणु हथियारों की तैनाती और संयुक्त अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। यूक्रेन ने आरोप लगाया कि रूस और बेलारूस परमाणु अप्रसार संधि का उल्लंघन कर रहे हैं। यूक्रेन ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के कदम पूरे यूरोप को अस्थिर कर सकते हैं।

    रूस और नाटो देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस परमाणु अभ्यास ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि यूक्रेन युद्ध जल्द नहीं रुका तो आने वाले समय में यूरोप में सैन्य टकराव का खतरा और गहरा सकता है।

  • पश्चिमी मीडिया भारत को अब भी ‘सपेरों का देश’ क्यों दिखाता है? जानिए विवादों की पूरी कहानी

    पश्चिमी मीडिया भारत को अब भी ‘सपेरों का देश’ क्यों दिखाता है? जानिए विवादों की पूरी कहानी



    नई दिल्ली। नॉर्वे के अखबार Aftenposten में प्रधानमंत्री Narendra Modi को ‘सपेरे’ के रूप में दिखाने वाले कार्टून ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर पश्चिमी मीडिया भारत को पुराने रूढ़िवादी नजरिए से क्यों देखता है। भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, IT और स्टार्टअप सेक्टर में अग्रणी है, फिर भी कई पश्चिमी कार्टून और मीडिया चित्रण भारत को गरीबी, अंधविश्वास, भीड़भाड़ और सांप-सपेरों की छवि तक सीमित कर देते हैं।


    औपनिवेशिक सोच की विरासत
    विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी जड़ें औपनिवेशिक दौर में हैं। 19वीं और 20वीं सदी में ब्रिटिश मीडिया और पत्रिकाएं भारत को पिछड़ा, रहस्यमयी और असभ्य दिखाकर अपने शासन को “सभ्यता मिशन” साबित करने की कोशिश करती थीं। उस समय भारतीयों को अक्सर सपेरों, फकीरों या अंधविश्वासी लोगों के रूप में दिखाया जाता था। यही छवि लंबे समय तक पश्चिमी समाज की सामूहिक सोच का हिस्सा बनी रही।

    आर्थिक प्रगति के बावजूद पुरानी छवि
    भारत आज दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारतीय मूल के कई लोग वैश्विक कंपनियों के CEO हैं और IT सेक्टर में भारत की मजबूत पहचान है। इसके बावजूद पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग अब भी भारत को विरोधाभासों वाले देश के रूप में पेश करता है—जहां तकनीकी विकास के साथ गरीबी और अव्यवस्था भी दिखाई जाती है। आलोचकों का कहना है कि कई बार व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नस्लीय रूढ़ियों को दोहराया जाता है।

    हाल के विवादित कार्टून
    2024 में अमेरिका के एक वेब कॉमिक ने बाल्टीमोर पुल हादसे के बाद भारतीय क्रू को नस्लवादी तरीके से चित्रित किया।

    2023 में जर्मन पत्रिका Der Spiegel ने भारत और चीन की तुलना वाले कार्टून में भारतीय ट्रेन को भीड़भाड़ और अव्यवस्थित रूप में दिखाया।

    2022 में स्पेनिश अखबार La Vanguardia ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर रिपोर्ट में सपेरे का चित्र इस्तेमाल किया।

    2014 में The New York Times को भारत विरोधी माने गए कार्टून पर माफी मांगनी पड़ी थी।

    क्या यह सिर्फ व्यंग्य है या नस्लवाद?
    पश्चिमी देशों में राजनीतिक कार्टूनों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब किसी देश या समुदाय को बार-बार एक ही रूढ़ छवि में दिखाया जाए, तो इसे सांस्कृतिक पूर्वाग्रह और नस्लवादी सोच भी माना जाता है। भारतीय आलोचकों का कहना है कि यदि इसी तरह के चित्रण किसी पश्चिमी समुदाय के लिए किए जाते, तो उन्हें तुरंत नस्लवादी माना जाता।

    बदलती वैश्विक ताकत से असहजता?
    कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत के तेजी से उभरने से पश्चिमी देशों के एक वर्ग में असहजता भी दिखाई देती है। भारत अब वैश्विक राजनीति, तकनीक, अंतरिक्ष और अर्थव्यवस्था में प्रभाव बढ़ा रहा है। ऐसे में पुराने प्रतीकों के जरिए भारत को “एक्सोटिक” या “पिछड़ा” दिखाने की कोशिश कहीं न कहीं मानसिक श्रेष्ठता बनाए रखने का तरीका भी मानी जाती है।

    भारत की वास्तविक तस्वीर आज बेहद विविध और आधुनिक है। यहां अंतरिक्ष मिशन भी हैं, डिजिटल क्रांति भी और दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भी। लेकिन पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा अब भी पुराने औपनिवेशिक नजरिए से बाहर नहीं निकल पाया है। यही वजह है कि समय-समय पर ऐसे कार्टून और टिप्पणियां विवाद का कारण बनती रहती हैं।