Category: International

  • 'सेल बोस्टन 2026' में भारत की दमदार मौजूदगी, आईएनएस सुदर्शिनी ने समुद्री विरासत और सांस्कृतिक पहचान का किया भव्य प्रदर्शन

    'सेल बोस्टन 2026' में भारत की दमदार मौजूदगी, आईएनएस सुदर्शिनी ने समुद्री विरासत और सांस्कृतिक पहचान का किया भव्य प्रदर्शन

    नई दिल्ली । अमेरिका के ऐतिहासिक शहर बोस्टन में आयोजित प्रतिष्ठित ‘सेल बोस्टन 2026’ समारोह के दौरान भारतीय नौसेना ने अपनी समुद्री परंपरा, अनुशासन और सांस्कृतिक विरासत का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। भारतीय नौसेना के पाल पोत आईएनएस सुदर्शिनी के चालक दल और प्रशिक्षुओं ने शहर की प्रमुख सड़कों पर आयोजित क्रू एवं कैडेट सिटी परेड में हिस्सा लिया। उनकी अनुशासित कदमताल और तिरंगे के साथ प्रस्तुत मार्च ने स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ विभिन्न देशों से आए प्रतिभागियों का भी ध्यान आकर्षित किया।

    ‘सेल बोस्टन 2026’ दुनिया के प्रमुख समुद्री आयोजनों में से एक माना जाता है, जिसमें 20 से अधिक देशों के 60 से ज्यादा पारंपरिक और विशाल नौकायन पोत भाग ले रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा आईएनएस सुदर्शिनी अपनी विशिष्ट पहचान और ऐतिहासिक महत्व के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। परेड के दौरान भारतीय दल ने अनुशासन, पेशेवर दक्षता और सांस्कृतिक विविधता का ऐसा परिचय दिया, जिसकी व्यापक सराहना की गई।

    भारतीय नौसेना के इस अभियान का उद्देश्य केवल समुद्री उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध नौवहन परंपराओं, समुद्री इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना भी है। आईएनएस सुदर्शिनी के माध्यम से भारत दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि उसकी समुद्री परंपरा हजारों वर्षों पुरानी होने के साथ आज भी उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत है। परेड में भारतीय तिरंगे की मौजूदगी और नौसैनिकों का आत्मविश्वासपूर्ण प्रदर्शन भारत की वैश्विक पहचान को और मजबूत करता नजर आया।

    रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय समुद्री आयोजनों में भागीदारी से भारत और अमेरिका के बीच समुद्री सहयोग को नई मजबूती मिलती है। साथ ही यह भी संदेश जाता है कि समुद्र केवल व्यापार, परिवहन और सुरक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद और मित्रता का भी महत्वपूर्ण सेतु है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से नौसेनाओं के बीच सहयोग, अनुभवों का आदान-प्रदान और पारस्परिक विश्वास भी बढ़ता है।

    बोस्टन पहुंचने से पहले आईएनएस सुदर्शिनी ने न्यूयॉर्क में आयोजित ‘सेल फोर्थ 250’ समारोह में भी भाग लिया था, जहां भारतीय दल ने अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके बाद पोत बोस्टन पहुंचा और यहां भी भारत की समुद्री परंपरा तथा सांस्कृतिक पहचान का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व किया। विभिन्न देशों के पारंपरिक नौकायन पोतों के बीच भारतीय पोत की मौजूदगी ने वैश्विक मंच पर भारत की ऐतिहासिक समुद्री विरासत को नई पहचान दिलाई।

    आईएनएस सुदर्शिनी वर्तमान में ‘लोकायन 2026’ वैश्विक समुद्री अभियान के तहत विभिन्न देशों के बंदरगाहों का दौरा कर रहा है। इस अभियान का उद्देश्य भारत की समुद्री विरासत, नौवहन परंपराओं और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के संदेश को विश्व समुदाय तक पहुंचाना है। भारतीय नौसेना का यह ऐतिहासिक पाल पोत प्रशिक्षण, समुद्री जागरूकता और अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बोस्टन में इसकी भागीदारी ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारत अपनी समृद्ध समुद्री विरासत, सांस्कृतिक मूल्यों और वैश्विक साझेदारी की भावना के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

  • अमेरिकी नाकाबंदी को मात देने की तैयारी में ईरान, ‘शैडो फ्लीट’ से तेल टैंकर निकालने की रणनीति

    अमेरिकी नाकाबंदी को मात देने की तैयारी में ईरान, ‘शैडो फ्लीट’ से तेल टैंकर निकालने की रणनीति


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। सीजफायर समझौते के खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच टकराव तेज हो गया है। ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी है, वहीं ईरान इस नाकाबंदी को चकमा देने के लिए अपने गुप्त जहाजी बेड़े यानी ‘शैडो फ्लीट’ का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य पर निगरानी और दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने उत्तरी अरब सागर में दो एयरक्राफ्ट कैरियर, 1,000 से ज्यादा नौसैनिकों और कम से कम 19 युद्धपोतों को तैनात किया है। इसके जवाब में ईरान से जुड़े कई तेल टैंकर अपनी पहचान छिपाकर समुद्री रास्तों से निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

    23 जहाजों का गुप्त नेटवर्क सक्रिय
    समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान से जुड़े कम से कम 23 जहाज सक्रिय हैं। ये जहाज अपने ट्रैकिंग सिस्टम को बंद या उसमें बदलाव कर ‘डार्क फ्लीट’ या ‘शैडो फ्लीट’ की तरह काम कर रहे हैं। इन जहाजों का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचते हुए तेल और अन्य सामान की आवाजाही के लिए किया जा रहा है।

    दूसरे देशों के झंडे और पहचान छिपाने की रणनीति
    समुद्री खुफिया कंपनी विंडवर्ड के मुताबिक, ईरान से जुड़े जहाज अमेरिकी नौसेना की निगरानी से बचने के लिए कई तरह के तरीके अपना रहे हैं। इनमें दूसरे देशों के झंडों का इस्तेमाल, ट्रांसपोंडर बंद करना और जहाज की वास्तविक पहचान छिपाने जैसी तकनीकें शामिल हैं। इस तरह ये जहाज अपनी गतिविधियों को छिपाकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

    ईरान पहले भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए ऐसे गुप्त जहाजी नेटवर्क का इस्तेमाल करता रहा है। प्रतिबंधों के बावजूद वह एक जटिल शिपिंग नेटवर्क के जरिए कच्चे तेल का निर्यात करता रहा है, जिसमें चीन उसका प्रमुख खरीदार रहा है।

    जून में 5 करोड़ बैरल तेल निर्यात का दावा
    ‘टैंकरट्रैकर्स’ के आंकड़ों के मुताबिक, तमाम प्रतिबंधों और निगरानी के बावजूद ईरान ने जून महीने में करीब 5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया।

    रिपोर्ट के अनुसार, 23 जहाजों में से 10 टैंकर इस समय कच्चे तेल या अन्य सामान से लदे हुए हैं, जबकि 13 जहाज नए माल की लोडिंग का इंतजार कर रहे हैं। इसके अलावा सात प्रतिबंधित VLCC (बहुत बड़े कच्चे तेल के टैंकर) हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद हैं। ये टैंकर ईरानी तेल से भरे हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की तलाश में हैं।

    पहले भी नाकाबंदी के बावजूद जारी रहा तेल निर्यात
    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका पहले भी ईरान के तेल निर्यात को रोकने के लिए कई कदम उठा चुका है। इन प्रयासों से ईरानी तेल निर्यात में गिरावट जरूर आई, लेकिन इसे पूरी तरह बंद नहीं किया जा सका। हालांकि, पिछली पाबंदियों का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। देश में महंगाई बढ़ी और आर्थिक दबाव भी काफी बढ़ गया था। अब नजर इस बात पर है कि अमेरिका की कड़ी निगरानी के बीच ईरान का शैडो फ्लीट अपनी रणनीति में कितना सफल हो पाता है।

    ईरान का दावा- तेल निर्यात सामान्य
    इस बीच ईरान के तेल मंत्री मोहसिन पाकनेजाद ने दावा किया है कि अमेरिका की ओर से 60 दिनों की प्रतिबंध छूट खत्म किए जाने के बाद भी देश का कच्चे तेल का निर्यात सामान्य रूप से जारी है। उन्होंने कहा कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने अमेरिकी प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने के लिए पहले से ही मजबूत व्यवस्था तैयार कर रखी है।

    पाकनेजाद ने अमेरिकी फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि वॉशिंगटन ने अपने वादों का उल्लंघन किया है। उन्होंने इसे इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (MoU) की धारा 10 के खिलाफ बताया, जिसमें 60 दिनों की छूट का प्रावधान शामिल था।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी लेखिका ई. जीन कैरोल (American writer E. Jean Carroll) को डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) से करीब 56 लाख 30 हजार डॉलर (लगभग 5.63 मिलियन डॉलर) मिल गए हैं. यह पैसा उन्हें 2023 में एक जूरी के फैसले के बाद मिला है, जिसमें ट्रंप को कैरोल का यौन उत्पीड़न करने और उन्हें बदनाम करने का दोषी ठहराया गया था।

    अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक यह रकम सोमवार को कैरोल की लॉ फर्म को भेज दी गई. यह फैसला ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद लिया गया. जज लुईस कैप्लान (Judge Lewis Kaplan) ने पांच दिन पहले ही इस भुगतान को मंजूरी दी थी। यह रकम मूल रूप से 5 मिलियन डॉलर के सिविल वर्डिक्ट और उस पर लगे ब्याज को मिलाकर बनी है. यह पहली बार है जब ट्रंप को कैरोल को कोई भुगतान करने पर मजबूर होना पड़ा है।

    पिछले सात साल में कैरोल कुल 88.3 मिलियन डॉलर के सिविल फैसले ट्रंप के खिलाफ जीत चुकी हैं. यह मामला 1996 के आसपास न्यूयॉर्क के बर्गडॉर्फ गुडमैन डिपार्टमेंट स्टोर की एक ड्रेसिंग रूम में हुई कथित घटना से जुड़ा है, जिसे ट्रंप ने हमेशा नकारा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप कैरोल के आरोपों को झूठा बताते रहे हैं. उनका कहना है कि वे कैरोल को जानते तक नहीं और कैरोल ने अपनी किताब बेचने के लिए यह कहानी गढ़ी है. पिछले महीने अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने 5 मिलियन डॉलर के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रंप की कानूनी टीम ने मंगलवार को फिर कहा कि यह पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है।

    इससे पहले ट्रंप के वकील ने अदालत से भुगतान रोकने की मांग की थी. वकील का कहना था कि अगर कैरोल यह पैसा दान कर देती हैं, जैसा उन्होंने पहले कहा था, तो यह रकम वापस मिलनी मुश्किल हो जाएगी. हालांकि कैरोल ने बाद में भरोसा दिलाया कि वे इस पैसे को अपने रिटायरमेंट के लिए एक ब्याज वाले खाते में रखेंगी।

  • कनाड़ा में भीषण गर्मी ने लोग बेहाल…. टोरंटो में तापमान ने तोड़ा 31 साल का रिकॉर्ड

    कनाड़ा में भीषण गर्मी ने लोग बेहाल…. टोरंटो में तापमान ने तोड़ा 31 साल का रिकॉर्ड


    टोरंटो।
    कनाडा (Canada) के कई हिस्सों में इस समय भीषण गर्मी (Scorching heat) का दौर जारी है, तेज गर्मी और उमस ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. टोरंटो (Toronto) समेत दक्षिणी ओंटारियो (Southern Ontario) के कई शहरों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड (Old Records) तोड़ दिए. टोरंटो के डाउनटाउन इलाके में मंगलवार को तापमान 37.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो जुलाई के इस समय के लिए 31 साल पुराने रिकॉर्ड से भी ज्यादा रहा।

    एनवायरनमेंट कनाडा के मुताबिक, इससे पहले 14 जुलाई को टोरंटो पियर्सन एयरपोर्ट पर सबसे ज्यादा तापमान 1995 में दर्ज किया गया था, जब पारा 36.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा था. इस बार तापमान उस स्तर को पार कर गया. हालांकि, तेज उमस के कारण लोगों को गर्मी 40 से 45 डिग्री सेल्सियस जैसी महसूस हुई।


    कई प्रांतों में हीट वॉर्निंग जारी

    भीषण गर्मी के चलते ओंटारियो के ज्यादातर हिस्सों में हीट वॉर्निंग जारी की गई. इसके अलावा मैनिटोबा, सस्केचेवान, अल्बर्टा और नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज के कई इलाकों में भी गर्मी और खराब हवा की गुणवत्ता को लेकर अलर्ट जारी किए गए. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका में बने एक बड़े हाई प्रेशर सिस्टम की वजह से कनाडा के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंचा है. इस सिस्टम ने अमेरिका के ऊपरी मैदानी इलाकों से लेकर ग्रेट लेक्स क्षेत्र और क्यूबेक तक गर्म हवा का प्रभाव बढ़ाया है.


    हीटवेव के साथ एयर क्वालिटी की चिंता

    गर्मी के बीच पश्चिमी कनाडा में जंगलों की आग का धुआं भी लोगों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है. थंडर बे के आसपास के क्षेत्रों में जंगलों की आग से उठने वाला धुआं हवा के साथ पहुंच रहा है, जिससे कुछ जगहों पर एयर क्वालिटी खराब दर्ज की गई.

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गर्मी और प्रदूषित हवा का एक साथ असर स्वास्थ्य के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है. खासतौर पर बुजुर्गों, बच्चों और सांस संबंधी समस्याओं वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है.

    नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज के डॉक्टरों ने लोगों से अपील की है कि वे नियमित रूप से एयर क्वालिटी इंडेक्स चेक करें. धुएं वाले दिनों में N95 मास्क पहनने की सलाह दी गई है, क्योंकि यह हवा में मौजूद बारीक कणों को रोकने में ज्यादा प्रभावी होता है.


    क्यूबेक में तूफान और टॉरनेडो का अलर्ट

    जहां एक ओर देश का बड़ा हिस्सा गर्मी से जूझ रहा है, वहीं पूर्वी कनाडा में मौसम का अलग रूप देखने को मिला. क्यूबेक और न्यू ब्रंसविक में तेज तूफान की चेतावनी जारी की गई. मॉन्ट्रियल से क्यूबेक सिटी के बीच के इलाकों में कुछ समय के लिए टॉरनेडो वॉच भी जारी की गई थी.


    कूलिंग सेंटर और सार्वजनिक सुविधाएं शुरू

    गर्मी से राहत देने के लिए ओटावा समेत कई शहरों ने कूलिंग सेंटर और सार्वजनिक पूल खोल दिए हैं. कुछ व्यवसायों ने भी कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए अस्थायी रूप से काम बंद करने का फैसला किया है. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले दिनों में भी कई इलाकों में गर्मी और उमस का असर बना रह सकता है. लोगों को मौसम के अलर्ट पर नजर रखने और तेज गर्मी के दौरान सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

  • US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित

    US ने ईरान पर लगाया सात कारोबारी जहाजों पर हमले का आरोप, भारतीय नाविक भी प्रभावित


    वॉशिंगटन।
    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव (West Asia Crisis) के बीच अमेरिका (America) ने ईरान (Iran) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) (US Central Command -CENTCOM) ने कहा है कि पिछले सात दिनों में ईरान ने सात वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाजों को निशाना बनाया, जिससे करीब एक दर्जन नागरिक चालक दल (क्रू) के सदस्य मारे गए, लापता हुए या घायल हुए हैं। अमेरिका ने कहा कि इन घटनाओं के लिए वह ईरान को जिम्मेदार मानता है।

    सेंटकॉम के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने बयान जारी कर कहा कि ईरानी बलों ने जानबूझकर नागरिक जहाजों को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक, पिछले एक सप्ताह में ईरान ने सात कारोबारी जहाजों पर हमले किए। इसके अलावा ईरान ने पड़ोसी खाड़ी देशों की ओर दर्जनों मिसाइलें और ड्रोन भी दागे। उन्होंने कहा कि अमेरिका निर्दोष लोगों की जान को खतरे में डालने वाली ईरान की आक्रामक गतिविधियों के लिए उसे जवाबदेह ठहरा रहा है।


    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ा तनाव

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका का आरोप है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही को बाधित कर रहा है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त तेल और व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। सेंटकॉम ने बताया कि उसने ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों से आने-जाने वाले जहाजों पर नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने के लिए उठाया गया है, जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाजों पर हमलों में किया जा रहा है। अमेरिका के अनुसार, इस अभियान के तहत क्षेत्र में 20 से अधिक अमेरिकी युद्धपोत और सैकड़ों सैन्य विमान तैनात किए गए हैं।


    भारत ने जताई चिंता

    इस बीच भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो जहाजों; एमटी अल बहियाह और एमटी मोम्बासा; पर हुए हमले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य सवार थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।


    यूएई ने भी हमले की पुष्टि की

    संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि यूएई के झंडे वाले टैंकर मोम्बासा और बहियाह को होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से में, ओमान के क्षेत्रीय जल में, ईरानी क्रूज मिसाइलों से निशाना बनाया गया। इन घटनाओं के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है। समुद्री व्यापार, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है।

  • पोलैंड के उप विदेश मंत्री ने की PM मोदी की तारीफ…. बोले- रूसी राष्ट्रपति मानते हैं उनकी बात

    पोलैंड के उप विदेश मंत्री ने की PM मोदी की तारीफ…. बोले- रूसी राष्ट्रपति मानते हैं उनकी बात


    वारसॉ।
    पोलैंड के उप विदेश मंत्री (Polish Deputy Foreign Minister ) व्लादिस्लाव थियोफिल बार्टोशेवस्की (Vladislav Theophil Bartoshevsky) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की सराहना की है। उन्होंने पीएम मोदी को एक बहुत प्रसिद्ध और सम्मानित वैश्विक राजनेता बताया। उन्होंने कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) भारतीय प्रधानमंत्री की बातों पर ध्यान देते हैं। बार्टोशेवस्की ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि पीएम मोदी ने साल 2022 के अंत में राष्ट्रपति पुतिन को यूक्रेन में सामरिक परमाणु हथियारों (टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स) का इस्तेमाल करने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


    रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने में प्रभाव

    पोलिश नेता ने कहा कि पीएम मोदी रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अपना प्रभाव डाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी उन गिने-चुने लोगों में से एक हैं जो वास्तव में राष्ट्रपति पुतिन पर कुछ दबाव और प्रभाव डाल सकते हैं। भारत इस संघर्ष को रोकने के लिए ऐसा कर सकता है। उन्होंने कहा कि भारत एक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में रूस और पूर्व सोवियत संघ के साथ लंबे समय से संबंध बनाए हुए है।


    पश्चिम एशिया संघर्ष पर भारत का रुख

    पश्चिम एशिया संघर्ष पर भारत के रुख को सही बताते हुए बार्टोशेवस्की ने कहा कि भारत एक बड़ा और महत्वपूर्ण देश है। भारत को तेल सहित वस्तुओं के मुक्त प्रवाह से लाभ होता है। भारत खाड़ी देशों से आने वाले तेल और गैस पर बहुत निर्भर है। पोलैंड भी ईरान के संपर्क में है और कूटनीतिक समाधान चाहता है। उन्होंने कहा कि हम भी पीएम मोदी की तरह ही समझदारी से बात करने की कोशिश कर रहे हैं।


    पुतिन ने भी की थी भारत की तारीफ

    रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ था। पिछले महीने सेंट पीटर्सबर्ग इकोनॉमिक फोरम में राष्ट्रपति पुतिन ने भी भारत को एक महान देश बताया था। उन्होंने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का समर्थन किया था। पुतिन ने कहा था कि भारत का अपनी पसंद के देशों के साथ आर्थिक संबंध विकसित करना स्वाभाविक है। पुतिन ने भारत पर दबाव बनाने की अमेरिकी कोशिशों की आलोचना करते हुए इसे द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए नुकसानदेह बताया था।

    पुतिन ने पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक वृद्धि की सराहना की थी और कहा था कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उन्होंने इसे पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार की कड़ी मेहनत का परिणाम बताया था। उन्होंने भारत और रूस के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को भी रेखांकित किया था।

  • ईरान के पड़ोसी देश से अमेरिका हटाएगा अपनी सेना, सितंबर 2026 तक पूरी होगी वापसी

    ईरान के पड़ोसी देश से अमेरिका हटाएगा अपनी सेना, सितंबर 2026 तक पूरी होगी वापसी


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक अहम बदलाव होने जा रहा है। करीब 23 साल पहले इराक में सैन्य अभियान शुरू करने वाला अमेरिका अब वहां से अपनी सैन्य मौजूदगी खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के साथ व्हाइट हाउस में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि 30 सितंबर 2026 तक सभी अमेरिकी सैनिक इराक से वापस लौट जाएंगे।

    ट्रंप ने कहा कि अब इराक में अमेरिकी सेना रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में दोनों देशों के संबंध सैन्य सहयोग के बजाय आर्थिक, व्यापारिक और निवेश आधारित होंगे।

    यह फैसला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और कूटनीतिक स्थिति को प्रभावित किया है। ईरान लंबे समय से इराक और मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की मांग करता रहा है। पिछले कई वर्षों में ईरान समर्थित समूहों की ओर से इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए जाते रहे हैं। हालिया संघर्ष के दौरान भी अमेरिकी ठिकाने निशाने पर रहे।

    कई विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को ईरान के लिए रणनीतिक बढ़त के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम होना क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

    संघर्ष के बीच बदली अमेरिका की रणनीति
    हालिया युद्ध के दौरान ईरान ने इराक और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। जवाब में अमेरिका ने भी ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। लगातार बढ़ते तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच वॉशिंगटन अब अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करता दिखाई दे रहा है। इससे पहले भी अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपनी कुछ सैन्य गतिविधियों को सीमित करने के संकेत दे चुका है।

    इराक छोड़ने का मतलब रिश्ते खत्म करना नहीं
    राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि सैनिकों की वापसी का अर्थ इराक से अमेरिका का पूरी तरह अलग होना नहीं है। उन्होंने कहा कि तेल, ऊर्जा, निवेश और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग आगे भी जारी रहेगा।

    इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने भी कहा कि 30 सितंबर तक अमेरिकी सैनिक देश से बाहर हो जाएंगे, लेकिन अमेरिकी कंपनियां इराक के विकास में अपनी भूमिका निभाती रहेंगी। यानी अब सैन्य ताकत की जगह आर्थिक साझेदारी पर जोर दिया जाएगा।

    2003 में शुरू हुआ था अमेरिका का इराक मिशन
    अमेरिका का इराक मिशन साल 2003 में शुरू हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने सद्दाम हुसैन सरकार को हटाने के लिए इराक पर हमला किया था। उस समय इराक पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने का आरोप लगाया गया था, लेकिन बाद में ऐसे हथियार बरामद नहीं हुए। साल 2007 में इराक में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर 1.7 लाख से अधिक हो गई थी।

    ओबामा के कार्यकाल में भी हुई थी वापसी
    2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन ने अधिकांश अमेरिकी सैनिकों को इराक से वापस बुला लिया था। हालांकि 2014 में आतंकी संगठन आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव के बाद इराक सरकार के अनुरोध पर अमेरिकी सेना दोबारा वहां पहुंची।

    इसके बाद करीब 2,500 अमेरिकी सैनिक इराकी सेना को प्रशिक्षण देने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग कर रहे थे। 2024 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद अमेरिकी सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे कम की जा रही थी और अब पूरी वापसी की समयसीमा तय कर दी गई है।

    ईरान संघर्ष में अमेरिकी सेना को इराक में नुकसान
    ईरान के साथ हुए संघर्ष के दौरान इराक में अमेरिकी सेना को नुकसान भी उठाना पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान इराक में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, जबकि कई अन्य घायल हुए। ईरान की ओर से किए गए बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में इरबिल और ऐन अल-असद जैसे अमेरिकी सैन्य ठिकाने प्रभावित हुए। हमलों में सैन्य गोदाम, हैंगर, रनवे और उपकरणों को नुकसान पहुंचा।

    इसके अलावा सलाह अल-दीन प्रांत में ईरान समर्थित समूहों ने अमेरिका के MQ-9 रीपर ड्रोन को भी मार गिराने का दावा किया। रिपोर्टों में कहा गया है कि पूरे क्षेत्र में अमेरिका को करीब 2.3 से 2.8 अरब डॉलर के अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का नुकसान हुआ।

  • हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में हॉर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से गहराते टकराव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा चलता है तो भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को महंगे तेल, बढ़ती महंगाई, कमजोर रुपये और ऊंचे आयात बिल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की रसोई से लेकर परिवहन, उद्योग और अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से और बड़ी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों को तेजी से प्रभावित करती है। हाल के दिनों में कई जहाजों ने सुरक्षा कारणों से इस मार्ग पर संचालन सीमित किया है, जिससे समुद्री परिवहन और बीमा लागत भी बढ़ी है।

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते देश तक पहुंचती है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और आयात व्यय दोनों बढ़ेंगे। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    रसोई गैस को लेकर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इन आयातों का अधिकांश भाग हॉर्मुज मार्ग से होकर आता है। यदि आपूर्ति प्रभावित होती है या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो घरेलू गैस सिलेंडर की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने सब्सिडी बढ़ाने या उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त कीमत का बोझ डालने जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं।

    महंगे कच्चे तेल का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमतों में वृद्धि से माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका प्रभाव फल, सब्जियां, दूध, अनाज, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे खुदरा महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है। साथ ही तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।

    ऊंची तेल कीमतों का असर सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू स्तर पर कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाती, तो कंपनियों पर लागत का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। वहीं तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को ऊंचे वैश्विक दामों का लाभ मिलने की संभावना रहती है, जबकि विमानन, परिवहन, रसायन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।

    ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भी कर रहा है। सरकार भविष्य में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ता तनाव केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आम नागरिकों के दैनिक खर्च से भी जुड़ा हुआ है।

  • बलूचिस्तान ने खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने का किया दावा, ‘85% क्षेत्र पर नियंत्रण’ का बयान वायरल, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

    बलूचिस्तान ने खुद को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने का किया दावा, ‘85% क्षेत्र पर नियंत्रण’ का बयान वायरल, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक कथित घोषणा पत्र में ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के नाम से क्षेत्र को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किए जाने की बात कही गई है। इस दस्तावेज में यह भी दावा किया गया है कि बलूचिस्तान की सेना ने क्षेत्र के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। हालांकि, इस दावे की अब तक किसी आधिकारिक सरकारी स्रोत, अंतरराष्ट्रीय संस्था या स्वतंत्र एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। इसलिए इन दावों को सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    वायरल हो रहे कथित घोषणा पत्र में कहा गया है कि नए राष्ट्र के लिए अलग झंडा, राष्ट्रगान, मुद्रा और प्रशासनिक व्यवस्था लागू कर दी गई है। साथ ही यह भी दावा किया गया है कि गैस क्षेत्र, खनिज संसाधन और कोयला खदानों पर नए प्रशासन का नियंत्रण स्थापित हो चुका है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों ने कथित रूप से इस्तीफा देकर बलूचिस्तान का समर्थन किया है। हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान का सबसे संवेदनशील और अशांत क्षेत्र रहा है। यहां वर्षों से अलगाववादी गतिविधियां, सुरक्षा बलों और विद्रोही संगठनों के बीच संघर्ष तथा राजनीतिक असंतोष देखने को मिलता रहा है। कई अवसरों पर स्थानीय संगठनों और नागरिक समूहों ने पाकिस्तान सरकार की नीतियों का विरोध किया है और अधिक अधिकारों अथवा स्वतंत्रता की मांग उठाई है। हाल के वर्षों में क्षेत्र में हिंसा और सुरक्षा संबंधी घटनाओं में भी वृद्धि दर्ज की गई है।

    पिछले कुछ महीनों में बलूचिस्तान में सुरक्षा बलों और सशस्त्र समूहों के बीच कई मुठभेड़ों की खबरें सामने आई हैं। पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा एजेंसियां लगातार विभिन्न अभियानों के जरिए उग्रवादी गतिविधियों पर नियंत्रण पाने का दावा करती रही हैं। दूसरी ओर, अलगाववादी संगठन भी समय-समय पर अपने प्रभाव और कार्रवाई को लेकर दावे करते रहे हैं। मौजूदा वायरल घोषणा भी ऐसे ही संवेदनशील माहौल के बीच सामने आई है।

    अब तक पाकिस्तान सरकार की ओर से इस कथित स्वतंत्रता घोषणा पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र, प्रमुख वैश्विक शक्तियों या किसी मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय संगठन ने भी बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने की घोषणा नहीं की है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार किसी नए राष्ट्र की स्थिति और वैधता के लिए व्यापक राजनयिक मान्यता महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित ऐसे दावों की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से किए बिना उन्हें तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वर्तमान में उपलब्ध जानकारी के आधार पर केवल इतना स्पष्ट है कि स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किए जाने और 85 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम पर पाकिस्तान सरकार, अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विश्वसनीय एजेंसियों की आधिकारिक प्रतिक्रियाओं का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले समय में स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही इस दावे की वास्तविकता का निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।

  • पहलगाम हमले की जांच में अहम मोड़, NIA की सप्लीमेंट्री चार्जशीट के बाद हाफिज सईद पर गैरहाजिरी में ट्रायल का रास्ता साफ

    पहलगाम हमले की जांच में अहम मोड़, NIA की सप्लीमेंट्री चार्जशीट के बाद हाफिज सईद पर गैरहाजिरी में ट्रायल का रास्ता साफ

    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले की जांच में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने बड़ा कदम उठाते हुए आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी है। जांच एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में हाफिज सईद को इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता बताया है। इसके बाद संबंधित अदालत ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है। इस आदेश के साथ ही उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाने और गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

    एनआईए ने अदालत में लगभग 60 पृष्ठों की सप्लीमेंट्री चार्जशीट प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि पहलगाम आतंकी हमले की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी और इसमें हाफिज सईद की अहम भूमिका रही। जांच एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के आधार पर उसके खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ाना आवश्यक है, ताकि मामले में न्यायिक कार्रवाई बाधित न हो।

    अदालत में दायर आवेदन में एनआईए ने यह भी कहा कि हाफिज सईद वर्तमान में पाकिस्तान में है और उसे भारत लाना फिलहाल संभव नहीं है। एजेंसी के अनुसार, उसे भारत लाने के लिए उपलब्ध कानूनी विकल्प लगभग समाप्त हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में नए आपराधिक कानूनों के तहत गैरहाजिरी में मुकदमा चलाने का प्रावधान लागू किया जाना उचित होगा। अदालत ने एजेंसी की दलीलों से सहमति जताते हुए गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया।

    न्यायालय के आदेश के बाद यदि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बावजूद आरोपी अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं होता है, तो उसे भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई भी आगे बढ़ सकती है। इसके बाद अदालत उसके बिना उपस्थित हुए भी मामले की सुनवाई जारी रख सकती है। यह प्रावधान हाल ही में लागू किए गए नए आपराधिक कानूनों के तहत शामिल किया गया है, जिसका उद्देश्य ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखना है, जहां आरोपी जानबूझकर न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता।

    एनआईए की पहली चार्जशीट में भी इस मामले में कई आरोपियों को नामजद किया गया था। जांच एजेंसी ने तीन पाकिस्तानी आतंकियों के साथ-साथ पाकिस्तान में बैठे कथित आतंकी संचालकों और स्थानीय सहयोगियों को भी आरोपी बनाया है। एजेंसी का दावा है कि इन सभी की भूमिका हमले की योजना बनाने, उसे अंजाम देने और आतंकियों को सहायता उपलब्ध कराने में रही।

    नए कानूनों के तहत ‘ट्रायल इन एब्सेंशिया’ का प्रावधान ऐसे मामलों में लागू किया जा सकता है, जहां आरोपी देश से फरार हो, अदालत में जानबूझकर पेश न हो और उसके खिलाफ गंभीर अपराधों के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हों। इसके लिए पहले समन और वारंट जारी किए जाते हैं। यदि इसके बावजूद आरोपी अदालत में उपस्थित नहीं होता, तो उसे भगोड़ा घोषित कर उसकी गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाया जा सकता है।

    गौरतलब है कि 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इस घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने व्यापक जांच शुरू की थी। बाद में भारतीय सुरक्षा बलों ने आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के तहत सीमापार आतंकी ढांचों को निशाना बनाते हुए अभियान भी चलाया। अब एनआईए की सप्लीमेंट्री चार्जशीट और अदालत के आदेश के बाद इस मामले की कानूनी प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है और आगे की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी।