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  • शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने WHO के क्षेत्रीय प्रमुख पद से दिया इस्तीफा, वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों के बीच बड़ा फैसला

    शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने WHO के क्षेत्रीय प्रमुख पद से दिया इस्तीफा, वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों के बीच बड़ा फैसला


    नई दिल्ली।
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बुधवार को अपना इस्तीफा सौंपा, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो गया। वाजेद के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े से जुड़े आरोपों की जांच चल रही थी। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है।

    साइमा वाजेद ने वर्ष 2024 की शुरुआत में WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक का पद संभाला था। उनका कार्यकाल पांच साल का निर्धारित था। हालांकि, आरोपों और जांच के बीच WHO ने उन्हें पिछले साल बिना वेतन प्रशासनिक छुट्टी पर भेज दिया था।

    बांग्लादेश की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने भी लगाए थे आरोप

    साइमा वाजेद के खिलाफ बांग्लादेश की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने भी कार्रवाई की थी। एजेंसी ने मार्च 2025 में उन पर फ्रॉड और फर्जीवाड़े के आरोप लगाए थे। इसके बाद जुलाई 2025 में WHO ने उन्हें प्रशासनिक छुट्टी पर भेज दिया।

    WHO की ओर से लगाए गए आरोपों में चीन की यात्रा से जुड़े खर्च में कथित वित्तीय अनियमितता भी शामिल थी। इसके अलावा संगठन ने उनकी शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठाए थे। हालांकि, वाजेद ने इन आरोपों को खारिज किया है।

    वकीलों ने WHO को भेजा जवाब

    साइमा वाजेद के वकीलों ने जुलाई 2026 में WHO को पत्र भेजकर उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब दिया था। पत्र में कहा गया था कि उनकी मुवक्किल ने किसी तरह की वित्तीय धोखाधड़ी नहीं की है। वकीलों ने उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर लगाए गए आरोपों को भी गलत बताया था।

    जमीन हासिल करने के आरोप पर भी दी सफाई

    साइमा वाजेद पर बांग्लादेश में एक जमीन का प्लॉट कथित तौर पर गलत तरीके से हासिल करने का आरोप भी लगाया गया था। इस्तीफे में उन्होंने इस आरोप का भी जवाब दिया।

    वाजेद के मुताबिक, उन्होंने संबंधित जमीन WHO में शामिल होने से पहले हासिल की थी। उनका कहना है कि यह जमीन बांग्लादेश के उस कानून के तहत मिली थी, जो देश के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता शेख मुजीबुर रहमान के परिवारों से जुड़ा था। शेख मुजीबुर रहमान, शेख हसीना के पिता हैं।

    शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बढ़ा परिवार पर दबाव

    साइमा वाजेद का इस्तीफा ऐसे समय हुआ है जब बांग्लादेश में शेख हसीना और उनके परिवार से जुड़े लोगों पर राजनीतिक दबाव बढ़ा हुआ है। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

    हसीना के कई करीबी नेताओं और सहयोगियों पर बांग्लादेश में अलग-अलग मामलों में आरोप लगाए गए हैं। इनमें भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी शामिल हैं। शेख हसीना देश छोड़ने के बाद भारत में रह रही हैं।

    हालांकि, साइमा वाजेद के खिलाफ लगे आरोपों को उनके द्वारा लगातार खारिज किया गया है। उनके इस्तीफे को शेख हसीना के परिवार पर बढ़ते राजनीतिक और कानूनी दबाव के व्यापक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।

    WHO शुरू करेगा नए क्षेत्रीय प्रमुख के चुनाव की प्रक्रिया

    साइमा वाजेद के इस्तीफे के बाद WHO अब दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के लिए नए क्षेत्रीय प्रमुख के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगा। एक सूत्र के मुताबिक, यह प्रक्रिया अगले महीने शुरू होने की उम्मीद है।

    WHO का दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय सदस्य देशों में स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों और नीतियों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में नए क्षेत्रीय निदेशक का चुनाव संगठन के लिए अहम माना जा रहा है।

  • BRICS Summit 2026: फ्लाइंग क्रेमलिन से रोलिंग बंकर तक, पुतिन की सुरक्षा के लिए दिल्ली में अभेद्य किले जैसा इंतजाम

    BRICS Summit 2026: फ्लाइंग क्रेमलिन से रोलिंग बंकर तक, पुतिन की सुरक्षा के लिए दिल्ली में अभेद्य किले जैसा इंतजाम


    नई दिल्ली।
    भारत की अध्यक्षता में इस सप्ताहांत होने वाली ब्रिक्स शिखर बैठक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई देशों के शीर्ष नेता नई दिल्ली पहुंचने वाले हैं। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के आगमन से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को कई स्तरों में मजबूत किया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2023 के जी-20 सम्मेलन के बाद दिल्ली में इतनी व्यापक सुरक्षा तैयारियां पहली बार देखने को मिल रही हैं।

    विदेशी नेताओं के साथ उनकी विशेष सुरक्षा व्यवस्था भी राजधानी पहुंचेगी। इनमें अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक से लैस विमान, बख्तरबंद वाहन, निजी खाद्य सुरक्षा इंतजाम और अन्य विशेष उपकरण शामिल बताए जा रहे हैं। खासतौर पर रूसी राष्ट्रपति पुतिन की सुरक्षा के लिए रूस की फेडरल प्रोटेक्टिव सर्विस और भारतीय सुरक्षा एजेंसियां मिलकर सुरक्षा घेरा तैयार कर रही हैं।

    छतों पर AI तकनीक से निगरानी, ड्रोन पर भी नजर

    सुरक्षा व्यवस्था के तहत ऊंची इमारतों की छतों पर स्नाइपर तैनात किए जाने की तैयारी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ स्थानों पर AI-गाइडेड स्नाइपर सिस्टम और जेस्चर-रिकग्निशन कैमरों के जरिए निगरानी की जाएगी। ये कैमरे लोगों की गतिविधियों में असामान्य बदलाव पहचानने में मदद करेंगे।

    आपात स्थिति के लिए कमांडो को हेलीकॉप्टर से रस्सियों के सहारे उतारने की व्यवस्था भी तैयार रखी जाएगी। इसके अलावा सड़कों पर चौबीसों घंटे एंटी-ग्राफिटी टीमें तैनात रहेंगी।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए बिना पायलट वाले हवाई वाहन यानी UAV और ड्रोन भी प्रमुख खतरा माने जा रहे हैं। इसके लिए कई स्थानों पर ड्रोन के सिग्नल को जाम करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय करने वाले सिस्टम लगाए जाने की बात सामने आई है।

    संभावित विरोध-प्रदर्शन पर भी खुफिया निगरानी

    रिपोर्ट के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि कुछ विदेशी नेताओं को निशाना बनाकर आयोजन स्थलों के आसपास अचानक विरोध-प्रदर्शन किए जा सकते हैं। इसके अलावा सार्वजनिक स्थानों पर भड़काऊ संदेश स्प्रे-पेंट किए जाने की आशंका को देखते हुए एंटी-ग्राफिटी टीमें लगातार निगरानी करेंगी।

    हर महत्वपूर्ण अतिथि, उनके होटल और काफिले के लिए अलग-अलग कोड नेम या कॉल साइन तय किए गए हैं। इसका उद्देश्य सुरक्षा और आवाजाही के दौरान सूचनाओं के आदान-प्रदान को व्यवस्थित रखना है।

    पुतिन के लिए ‘रोलिंग बंकर’

    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की जमीनी आवाजाही के लिए रूस से उनकी विशेष ऑरस सेनेट बख्तरबंद कार लाई गई है। इसे सुरक्षा कारणों से ‘रोलिंग बंकर’ के नाम से भी जाना जाता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, यह वाहन स्नाइपर फायर, बारूदी सुरंग और रासायनिक हमले जैसे खतरों से सुरक्षा के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें रन-फ्लैट टायर और आपातकालीन ऑक्सीजन सिस्टम जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं।

    ‘फ्लाइंग क्रेमलिन’ से सफर करते हैं रूसी राष्ट्रपति

    पुतिन के हवाई सफर के लिए विशेष रूप से तैयार Ilyushin IL-96-300PU विमान का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे अक्सर ‘फ्लाइंग क्रेमलिन’ कहा जाता है। विमान में सुरक्षित कमांड सिस्टम और मिसाइल डिफेंस से जुड़े सुरक्षा उपाय मौजूद होने की जानकारी दी जाती है।

    रिपोर्ट के अनुसार, विमान की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए जरूरत पड़ने पर डिकॉय विमानों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

    पुतिन के खाने की भी होगी कड़ी जांच

    रूसी प्रतिनिधिमंडल अपनी सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स को लेकर विशेष सतर्कता बरत रहा है। पुतिन के साथ निजी शेफ और खाद्य पदार्थों की जांच के लिए पोर्टेबल टेस्टिंग लैब जैसी व्यवस्थाएं किए जाने की बात कही गई है।

    सुरक्षा व्यवस्था में जैविक कचरे को सुरक्षित तरीके से एकत्र करने और उसके निस्तारण तक के इंतजाम शामिल बताए जा रहे हैं। कुछ होटलों में सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए डमी डिग्निटरीज यानी नेताओं के हमशक्ल या प्रतिनिधियों की तैनाती की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है।

    होटलों को अलग-अलग सुरक्षा जोन में बांटा गया

    विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के ठहरने के लिए दिल्ली के मध्य क्षेत्र, एयरोसिटी और गुरुग्राम के चुनिंदा होटलों को अलग-अलग सिक्योरिटी जोन में बांटा गया है।

    प्रत्येक होटल की सुरक्षा के लिए डीसीपी स्तर के अधिकारी को वेन्यू कमांडर बनाया गया है, जबकि बड़े क्षेत्रों की निगरानी स्पेशल कमिश्नर स्तर के अधिकारी करेंगे।

    हर होटल में दो कमरों को ऑपरेशनल कमांड पोस्ट में बदलने की तैयारी है। इनमें से एक दिल्ली पुलिस के केंद्रीय C4i कमांड सिस्टम से जुड़ा रहेगा, जबकि दूसरे का इस्तेमाल आपात स्थिति में बैकअप कंट्रोल रूम के तौर पर किया जाएगा।

    ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दुनिया के कई प्रमुख नेताओं की मौजूदगी को देखते हुए दिल्ली में जमीन से लेकर आसमान तक सुरक्षा का व्यापक नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की अपनी सुरक्षा व्यवस्थाओं के साथ भारतीय एजेंसियों की बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था राजधानी में किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए तैयार रहेगी।

  • फिलीपींस में बड़ा हादसा….. समुद्री क्षेत्र में यात्री फेरी में लगी भीषण आग, 5 लोगों की मौत और 80 से ज्यादा लापता

    फिलीपींस में बड़ा हादसा….. समुद्री क्षेत्र में यात्री फेरी में लगी भीषण आग, 5 लोगों की मौत और 80 से ज्यादा लापता


    मनीला।
    फिलीपींस (Philippines) के पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में एक बड़ा समुद्री हादसा सामने आया है। मनीला (Manila) से कोरोन (पालवान प्रांत) जा रही एक यात्री फेरी ‘एमवी जून एस्टर’ (MV June Aster) में अचानक भीषण आग लग गई। इस दुर्घटना में कम से कम 5 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। फिलीपींस कोस्ट गार्ड (Philippine Coast Guard) की टीम मौके पर राहत और बचाव कार्य में जुटी हुई है।


    134 लोग थे सवार, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी

    तटरक्षक बल की प्रवक्ता कमोडोर नोएमी कायाबयाब (Commodore Noemie Cayabyab) ने एक रेडियो साक्षात्कार में हादसे की पुष्टि करते हुए बताया, ‘दुर्घटनाग्रस्त फेरी में कुल 134 लोग सवार थे, जिनमें 117 यात्री और 17 क्रू मेंबर्स (नाविक दल) शामिल थे।’ बताया गया कि अब तक 42 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है।

    लापता लोगों का आंकड़ा: शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार लगभग 87 लोग लापता बताए जा रहे हैं, लेकिन बचाव अभियान जारी रहने के कारण इस संख्या में बदलाव हो सकता है।


    मनीला से पालवान जा रही थी फेरी

    तटरक्षक बल के अनुसार, यात्री फेरी ‘MV June Aster’ राजधानी मनीला से रवाना हुई थी और बुधवार को जब यह पालवान प्रांत के कोरोन (Coron) द्वीप के पास पहुंची, तभी जहाज में अचानक आग भड़क उठी। आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है।

    घटनास्थल की तस्वीरों में कोस्ट गार्ड के कर्मचारी बचे हुए लोगों की ओर लाइफ जैकेट फेंकते हुए दिखे, जबकि पीछे फेरी जल रही थी। छोटी नावें भी बचे हुए लोगों को कम गहरे पानी में ले गईं।

    फिलीपींस के द्वीपों में फेरी परिवहन का एक आम जरिया है। तूफान, खराब रखरखाव वाली नावें, क्षमता से ज्यादा भीड़ और सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन न होने (खासकर दूर-दराज के इलाकों में) की वजह से समुद्री दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

  • ट्रंप ने किया H-1B Visa की नई फीस को सपोर्ट…. बोले- 'अमेरिकी वर्कर को मिले जॉब

    ट्रंप ने किया H-1B Visa की नई फीस को सपोर्ट…. बोले- 'अमेरिकी वर्कर को मिले जॉब


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में H-1B वीजा (US H-1B Visa) सरकार के निशाने पर आ चुका है और इसके जरिए विदेशों से होने वाली हायरिंग को मुश्किल बनाया जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने H-1B वीजा याचिका पर लगाई जाने वाली फीस को लेकर पेश किए गए एक प्रस्ताव को सपोर्ट किया है। उनका कहना है कि इससे कंपनियां अब विदेश से स्किल वर्कर को लाने से पहले अमेरिकी वर्कर्स को नौकरी और ट्रेनिंग देंगी। फीस से उन्हें ऐसा करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

    अमेरिका में लेबर डे के मौके पर दिए गए एक संदेश में उन्होंने H-1B वीजा को लेकर ये सारी बातें कही हैं। ट्रंप ने कहा, ‘ये तय करने के लिए कि हम अमेरिकी वर्कर्स को काम पर रखें और उन्हें ट्रेनिंग दें, हम H-1B वीजा याचिकाओं पर एक नई फीस का प्रस्ताव रख रहे हैं। इससे कंपनियां विदेश से लेबर देखने से पहले योग्य अमेरिकियों में निवेश करने के लिए प्रेरित होंगी।’ उनके इस बयान के बाद अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों की परेशानियां बढ़ गई हैं।


    जिस प्रस्ताव को ट्रंप ने सपोर्ट किया, उसमें क्या है?

    दरअसल, ट्रंप के संदेश में जिस फीस का जिक्र किया गया है, वो लेबर डे पर शुरू किया गया कोई नया चार्ज नहीं है। अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) ने इससे पहले कैप-सब्जेक्ट H-1B आवेदनों के लिए 1,03,265 डॉलर (लगभग 97 लाख रुपये) की फीस का प्रस्ताव रखा था। इस फीस से एडवांस डिग्री यानी मास्टर्स-पीएचडी वाले लोगों को भी छूट नहीं दी जा रही है। ये प्रस्तावित फीस मौजूदा इमिग्रेशन खर्चों के अलावा, H-1B याचिका दाखिल करते समय चुकानी होगी। ये कदम फेडरल रेगुलेटरी प्रोसेस का हिस्सा है और फिलहाल कोई एक्टिव चार्ज नहीं है।


    अमेरिकी कंपनियां अब वापस लौट रहीं देश: ट्रंप

    राष्ट्रपति ट्रंप ने इस प्रस्तावित H-1B फीस को डॉमेस्टिक एंप्लॉयमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के अपने बड़े अभियान से जोड़ा है। उनकी लेबर डे की स्पीच का फोकस अमेरिकी वर्कर्स, इंडस्ट्रियल कंपनियां और ट्रेड नीतियां रहीं। ट्रंप ने कहा, ‘दशकों से विनाशकारी ट्रेड पॉलिसी की वजह से हमारी इंडस्ट्रियल ताकत दूसरे देशों को सौंप दी गई, अब कंपनियां वापस लौट रही हैं, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में खरबों डॉलर निवेश कर रही हैं और 9 लाख से ज्यादा जॉब्स जोड़ी गई हैं।’


    भारतीयों की चिंता क्यों बढ़ी?

    दरअसल, अमेरिका में H-1B वीजा प्रोग्राम के जरिए बड़ी टेक कंपनियां और अन्य सेक्टर्स की कंपनियां स्किल वर्कर्स की हायरिंग करती हैं। H-1B वीजा पाने में भारतीय सबसे आगे रहते हैं। 2024 में अकेले वीजा का 71% भारतीयों को मिला। इस वीजा पर जॉब करने वाले भारतीयों को ये डर सता रहा है कि अगर उनकी नौकरी चली जाती है और फिर ये नई फीस लागू हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में अमेरिकी कंपनियां उन्हें दोबारा से नौकरी नहीं देंगी।

    अमेरिकी कंपनियों के लिए उनकी हायरिंग महंगी हो जाएगी। इसी तरह से अमेरिका में पढ़ाई करने वाले भारतीय भी चिंतित हैं, क्योंकि नई फीस के दायरे में वो भी होंगे। कोई भी कंपनी इतनी महंगी फीस देकर उन्हें भी नौकरी देने से बचेगी। भारत में भी जो लोग अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करने का प्लान कर रहे हैं, उनके लिए भी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं, क्योंकि उन्हें भी वीजा पाने में दिक्कत आ सकती है।

  • 20 साल बाद ईरान पर बड़ा एक्शन, IAEA ने परमाणु मामला UN सुरक्षा परिषद को भेजा

    20 साल बाद ईरान पर बड़ा एक्शन, IAEA ने परमाणु मामला UN सुरक्षा परिषद को भेजा


    नई दिल्ली। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने करीब 20 साल बाद पहली बार ईरान के मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंचाने का फैसला किया है। ईरान पर आरोप है कि उसने उन स्थानों पर मिले यूरेनियम के निशानों की जांच में पर्याप्त सहयोग नहीं किया, जिन्हें उसने परमाणु गतिविधियों के लिए घोषित नहीं किया था।

    पश्चिमी देशों के अधिकारियों को आशंका है कि इन स्थलों से मिले यूरेनियम के निशान इस बात का संकेत दे सकते हैं कि 2003 तक ईरान में एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम चल रहा था। हालांकि, ईरान लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है। उसका कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा।

    सुरक्षा परिषद पहुंचने से क्या होगा?
    ईरान का मामला सुरक्षा परिषद में जाने के बाद उस पर नए प्रतिबंध लगाने या उसकी संपत्तियां जब्त करने जैसे कदमों की संभावना बन सकती है। हालांकि, तत्काल कड़े दंडात्मक कदम उठाए जाने की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि ईरान के प्रमुख सहयोगी रूस और चीन सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति रखते हैं।

    प्रस्ताव के पक्ष में 23 देशों ने वोट किया
    वियना स्थित IAEA मुख्यालय में बुधवार को 35 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में प्रस्ताव पर मतदान हुआ। राजनयिकों के मुताबिक 23 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। चीन, रूस और नाइजर ने इसका विरोध किया, जबकि आठ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। एक देश बकाया राशि के कारण वोट नहीं कर सका। यह प्रस्ताव अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने पेश किया था।

    जून 2025 से चल रही थी तैयारी
    ईरान को लेकर यह कूटनीतिक कदम जून 2025 से ही विचाराधीन था। उस समय IAEA बोर्ड ने पाया था कि जांच में सहयोग नहीं करने के कारण ईरान परमाणु प्रसार रोकने से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहा है।

    अब मामला सुरक्षा परिषद में भेजे जाने का फैसला ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ा हुआ है। कॉपी के मुताबिक, इस सप्ताह अमेरिका ने ईरान के पांच तेल टैंकरों को नष्ट किया और इसके जवाब में तेहरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। इसे छह महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष में तनाव बढ़ने के नए दौर के तौर पर देखा जा रहा है।

    IAEA ने ईरान से फिर सहयोग मांगा
    प्रस्ताव के मसौदे में IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रोसी से कहा गया है कि वे प्रस्ताव और पहले पारित प्रस्तावों की जानकारी IAEA के सभी सदस्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा को दें। प्रस्ताव में ईरान से पिछले समझौतों के अनुपालन में हुई कमियों को जल्द से जल्द दूर करने और IAEA की जरूरी शर्तों को पूरा करने की मांग दोहराई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान की परमाणु सामग्री का गलत इस्तेमाल न हो।

    इजरायल-अमेरिका के हमलों के बाद निरीक्षण रुका
    जून 2025 में 12 दिन तक चले संघर्ष के दौरान इजरायल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने हमलों से प्रभावित परमाणु स्थलों तक IAEA निरीक्षकों की पहुंच रोक दी। बमबारी के बाद से IAEA ईरान के पास मौजूद उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम के भंडार की स्थिति की भी पूरी तरह पुष्टि नहीं कर पाया है।

    ईरान के पास 60% तक संवर्धित 440.9 किलो यूरेनियम
    IAEA के अनुसार, ईरान के पास 60% शुद्धता तक संवर्धित 440.9 किलोग्राम (972 पाउंड) यूरेनियम का भंडार है। यह हथियार बनाने के लिए जरूरी करीब 90% शुद्धता के स्तर से तकनीकी रूप से ज्यादा दूर नहीं है।

    IAEA प्रमुख राफेल ग्रोसी ने पिछले साल एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार बनाने की दिशा में ले जाने का फैसला करता है, तो इस मात्रा से 10 परमाणु बम तक बनाए जा सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान के पास फिलहाल कोई परमाणु हथियार मौजूद है।

  • सिंध के बंटवारे के प्रस्ताव पर भड़के बिलावल भुट्टो, मोहसिन नकवी को संसद में मुद्दा उठाने की दी चुनौती

    सिंध के बंटवारे के प्रस्ताव पर भड़के बिलावल भुट्टो, मोहसिन नकवी को संसद में मुद्दा उठाने की दी चुनौती


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान में मौजूदा प्रांतों के विभाजन को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया सिंध से सामने आई है, जहां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार है। पीपीपी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने प्रांतों के बंटवारे की पैरवी कर रहे पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी पर निशाना साधते हुए उन्हें संसद में आकर इस मुद्दे पर बात रखने की चुनौती दी है।

    बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा कि मोहसिन नकवी को प्रांतों के विभाजन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर किसी बिजनेस फोरम में चर्चा करने के बजाय देश की संसद में अपनी बात रखनी चाहिए। उनका कहना है कि इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। बिलावल ने नकवी को सलाह देते हुए स्पष्ट किया कि यदि सरकार प्रांतों के पुनर्गठन का प्रस्ताव आगे बढ़ाना चाहती है, तो उसे संसद के सामने रखना चाहिए।

    बिलावल अपने पिता और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ लंदन पहुंचे हैं। इसी दौरान उन्होंने प्रांतों के विभाजन को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। मोहसिन नकवी अलग-अलग मंचों पर प्रांतों के बंटवारे के विचार के समर्थन में सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रस्ताव को लेकर पाकिस्तान की राजनीति में अलग-अलग दलों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं।

    पाकिस्तान में मौजूदा चार प्रांतों को विभाजित करके 12 से 15 नए छोटे प्रांत बनाए जाने का प्रस्ताव चर्चा में है। इस योजना के तहत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे चार बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने का विचार है। प्रस्ताव के अनुसार प्रत्येक बड़े प्रांत को तीन छोटे हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है, जिससे देश में कुल 12 से 15 नए प्रांत बनाए जाने की संभावना पर चर्चा हो रही है।

    इसी प्रस्ताव को लेकर शहबाज शरीफ सरकार के कई मंत्री देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार और पाकिस्तानी सेना की ओर से इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि मौजूदा प्रांत बहुत बड़े और केंद्रीयकृत हो गए हैं। उनका कहना है कि बड़े प्रांतों के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं का वितरण प्रभावी तरीके से नहीं हो पा रहा है।

    प्रस्ताव के समर्थकों के अनुसार छोटे प्रांत बनने से प्रशासन को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस विचार का राजनीतिक विरोध भी हो रहा है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम जैसी पार्टियां प्रांतों के विभाजन के प्रस्ताव के खिलाफ हैं।

    पीपीपी के विरोध के पीछे सिंध में उसके राजनीतिक आधार को लेकर चिंता भी बताई जा रही है। पार्टी को आशंका है कि सिंध के विभाजन से वहां उसका राजनीतिक आधार कमजोर हो सकता है। इसी वजह से बिलावल भुट्टो जरदारी ने इस प्रस्ताव पर खुलकर आपत्ति जताई है और इसे संसद में चर्चा के लिए लाने की बात कही है। सिंध के विभाजन को लेकर उनका रुख पाकिस्तान में चल रही प्रांतों के पुनर्गठन की बहस में महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आया है।

  • मसूद अजहर के अफगानिस्तान में छिपे होने के पाकिस्तानी दावे को तालिबान ने खारिज किया, काबुल ने जवाब में रखी स्थिति स्पष्ट

    मसूद अजहर के अफगानिस्तान में छिपे होने के पाकिस्तानी दावे को तालिबान ने खारिज किया, काबुल ने जवाब में रखी स्थिति स्पष्ट


    नई दिल्ली ।मसूद अजहर को लेकर पाकिस्तान के दावे पर अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पाकिस्तान के उस दावे से इनकार किया है, जिसमें कहा जाता रहा है कि जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक मसूद अजहर अफगानिस्तान में छिपकर रह रहा है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि मसूद अजहर अफगानिस्तान में मौजूद नहीं है।

    अफगान पक्ष ने यह भी कहा कि उसकी जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ हिंसा या आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इस बयान के साथ तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के दावे को सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। मसूद अजहर की कथित मौजूदगी को लेकर दोनों देशों के दावों में लंबे समय से अंतर रहा है।

    अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने कहा कि मसूद अजहर उनके देश में मौजूद नहीं है। तालिबान की ओर से पहले भी इस तरह का इनकार किया जा चुका है। सितंबर 2022 में तालिबान के एक प्रवक्ता ने मसूद अजहर के अफगानिस्तान में होने से जुड़ी खबरों को गलत बताया था।

    अफगान पक्ष का कहना है कि पाकिस्तान ने भी मसूद अजहर के अफगानिस्तान में मौजूद होने की कोई पुख्ता आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई है। इसके बावजूद पाकिस्तान लगातार यह दावा करता रहा है कि जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक अफगानिस्तान में छिपा हुआ है।

    पाकिस्तान के मुताबिक मसूद अजहर मई 2019 में डूरंड रेखा पार करके अफगानिस्तान चला गया था। इसके बाद से वह अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। हालांकि, अफगान सरकार इस दावे को स्वीकार नहीं करती है और अब विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने भी उसकी मौजूदगी से स्पष्ट रूप से इनकार किया है।

    तालिबान ने अपने बयान में एक बार फिर यह रुख दोहराया कि अफगान जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ हिंसा या आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। इस बयान को पाकिस्तान के आरोपों के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि मसूद अजहर का नाम लंबे समय से दोनों देशों के बीच सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों में सामने आता रहा है।

    मसूद अजहर को लेकर यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पर आतंकी संगठनों और उनके नेताओं के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव की चर्चा होती रही है। पाकिस्तान पहले वित्तीय कार्रवाई कार्यबल की निगरानी सूची में भी रह चुका है। उसे 2018 से 2022 के बीच इस सूची में रखा गया था।

    उस अवधि में आतंकवाद के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को रोकने और आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान की व्यवस्था पर चिंता जताई गई थी। निगरानी सूची से बाहर आने के लिए पाकिस्तान को कई कदम उठाने पड़े थे। इनमें जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल थी।

    अब मसूद अजहर की कथित मौजूदगी को लेकर पाकिस्तान के दावे और तालिबान के इनकार ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। अफगानिस्तान ने जहां अजहर के अपने देश में होने से इनकार किया है, वहीं पाकिस्तान अपने पुराने दावे पर कायम रहा है।

  • ट्रंप ने पुतिन को मिलाया फोन, यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर हुई चर्चा

    ट्रंप ने पुतिन को मिलाया फोन, यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर हुई चर्चा

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से करीब एक घंटे फोन पर बातचीत की। दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की संभावनाओं और आगे की कूटनीतिक पहल को लेकर चर्चा हुई। क्रेमलिन ने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि युद्ध का अंत अमेरिका और रूस के संबंधों को सामान्य बनाने का रास्ता खोल सकता है।

    अमेरिकी दूतों की मॉस्को-कीव यात्रा के बाद हुई बातचीत

    ट्रंप और पुतिन के बीच यह फोन वार्ता अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की हालिया मॉस्को तथा कीव यात्रा के बाद हुई। दोनों अमेरिकी प्रतिनिधि यूक्रेन युद्ध को लेकर लंबे समय से रुकी बातचीत को फिर शुरू कराने की कोशिश में जुटे हैं।

    क्रेमलिन के अधिकारी यूरी उशाकोव के मुताबिक, पुतिन और ट्रंप ने अमेरिकी दूतों की ओर से किए जा रहे प्रयासों को सकारात्मक माना। बातचीत के दौरान पुतिन ने ट्रंप को युद्धक्षेत्र की मौजूदा स्थिति की जानकारी दी और यह भी बताया कि संघर्ष खत्म कराने में अमेरिका किस तरह भूमिका निभा सकता है।

    ट्रंप चाहते हैं अपने कार्यकाल में युद्ध का अंत

    उशाकोव ने बताया कि ट्रंप की इच्छा है कि उनके मौजूदा राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ही यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की दिशा में कोई बड़ी सफलता हासिल हो। ट्रंप ने यह भी कहा कि युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका और रूस के बीच व्यापार तथा आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

    क्रेमलिन ने कहा कि युद्ध खत्म होने की स्थिति में दोनों देशों के रिश्तों को पूरी तरह सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

    यूरोप को लेकर पुतिन ने क्या कहा?

    फोन बातचीत में पुतिन ने यूरोपीय देशों को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट किया। क्रेमलिन के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति ने ट्रंप से कहा कि रूस की यूरोप के खिलाफ कोई आक्रामक मंशा नहीं है।

    पुतिन ने आरोप लगाया कि रूस से संभावित खतरे को लेकर यूरोपीय देशों में पैदा की जा रही चिंताएं उन्हें यूक्रेन के लिए सैन्य समर्थन बढ़ाने और अपने रक्षा खर्च में वृद्धि करने का आधार देती हैं।

    हालांकि, क्रेमलिन ने यह भी दोहराया कि रूस अपने घोषित सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    बातचीत से क्या निकला?

    ट्रंप और पुतिन की बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका युद्ध को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी दूतों की मॉस्को और कीव यात्राओं के बाद दोनों पक्षों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। ऐसे में ट्रंप-पुतिन की फोन वार्ता को आगे की बातचीत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • वोंग बने दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले प्रधानमंत्री, 64% वृद्धि के बाद ट्रंप से भी ज्यादा हुआ वेतन

    वोंग बने दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले प्रधानमंत्री, 64% वृद्धि के बाद ट्रंप से भी ज्यादा हुआ वेतन


    सिंगापुर।
    सिंगापुर (Singapore) के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग (Prime Minister Lawrence Wong) ने मंगलवार को संसद को बताया कि राजनीतिक नेताओं (Political Leaders) की सैलरी बढ़ाई जाएगी। इससे मंत्रियों की सैलरी में 60% से ज्यादा की बढ़ोतरी होगी।

    सिंगापुर ने राजनीतिक नेताओं के भारी-भरकम वेतन को सही ठहराया है। तर्क दिया है कि इससे काबिल लोग आकर्षित होते हैं और अच्छा शासन सुनिश्चित होता है। फिर भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि कैबिनेट सदस्यों की आय ज्यादातर आम नागरिकों की आय से कहीं ज्यादा है।


    कितनी हो जाएगी सिंगापुर के पीएम की सैलरी?

    वोंग ने कहा कि इस बदलाव के बाद उनकी सालाना बेंचमार्क सैलरी 2.2 मिलियन सिंगापुर डॉलर (1.7 मिलियन डॉलर) से बढ़कर 3.6 मिलियन सिंगापुर डॉलर हो जाएगी। उप-प्रधानमंत्री की 1.87 मिलियन सिंगापुर डॉलर से बढ़कर 3.06 मिलियन सिंगापुर डॉलर हो जाएगी, जबकि कैबिनेट मंत्रियों को उनकी सीनियरिटी और पोर्टफोलियो के महत्व के आधार पर 1.80 मिलियन सिंगापुर डॉलर से 2.88 मिलियन सिंगापुर डॉलर के बीच सैलरी मिलेगी।


    दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले पीएम

    वोंग ने कहा कि वे अपने कार्यकाल के दौरान वेतन में हुई पूरी बढ़ोतरी को सही और अच्छे कामों के लिए दान करने की योजना बना रहे हैं। वेतन में बढ़ोतरी से पहले भी सिंगापुर के प्रधानमंत्री की सैलरी अमेरिका और जी7 देशों समेत कई अन्य नेताओं की सैलरी से कहीं ज्यादा थी।

    वोंग ने कहा, “राजनीतिक वेतन एक मुश्किल और भावनात्मक मुद्दा है।” वोंग की पीपल्स एक्शन पार्टी लंबे समय से सत्ता में है और सिंगापुर की संसद तथा 21 सदस्यों वाली कैबिनेट पर उसका दबदबा है। उन्होंने कहा, “इसमें शामिल रकम ज्यादातर नागरिकों की कमाई से कहीं ज्यादा है, इसलिए मैं समझता हूं कि सिंगापुर के लोग इसकी बारीकी से जांच-पड़ताल क्यों करते हैं और क्यों कई लोग इस मामले को लेकर इतनी मजबूत राय रखते हैं।”

    हालांकि, वोंग ने कहा कि असल मुद्दा यह है कि क्या आने वाले दशकों में सिंगापुर में वैसी राजनीतिक लीडरशिप बनी रहेगी, जिसकी हमारे देश को आगे ले जाने के लिए जरूरत है। सिंगापुर को दुनिया के सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देशों में लगातार गिना जाता है। वोंग ने कहा कि वेतन बढ़ाने की सिफारिश एक स्वतंत्र समिति ने की थी। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा पदधारियों को तुरंत नए वेतनमानों पर नहीं लाया जाएगा।

  • BRICS Summit: आपसी मतभेद भुलाकर क्या मजबूत साझा सुर तलाश पाएंगे ब्रिक्स देश?

    BRICS Summit: आपसी मतभेद भुलाकर क्या मजबूत साझा सुर तलाश पाएंगे ब्रिक्स देश?


    नई दिल्ली।
    आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) से ठीक पहले कूटनीतिक हलकों में यह सवाल सबसे अहम है कि क्या ब्रिक्स देश (BRICS Country) अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक मजबूत साझा सुर तलाश पाएंगे। इस चिंता की मुख्य वजह यह है कि भारत की अध्यक्षता में मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों (BRICS Foreign Ministers) की बैठक में तमाम कोशिशों के बावजूद किसी संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति नहीं बन पाई थी। ब्रिक्स पारंपरिक रूप से सर्वसम्मति से काम करता है, लेकिन असहमति इस बात का संकेत है कि जैसे-जैसे इसका कुनबा बढ़ा है, वैसे-वैसे इसके भीतर अंतर्विरोध भी गहरे हुए हैं।


    क्यों फंसा था पेंच? :

    विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति, फलस्तीन मुद्दे और लाल सागर में नौवहन सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर सदस्य देशों के बीच तीखा मतभेद देखने को मिला था। इस गतिरोध के केंद्र में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात थे। ईरान ने पश्चिम एशिया संघर्ष पर कड़ी भाषा की मांग की, जबकि यूएई समेत कुछ सदस्यों ने आपत्ति जताई। ईरान ने फिलिस्तीन और लाल सागर से जुड़े कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई थी। नतीजतन संयुक्त बयान के स्थान पर भारत को अध्यक्षीय बयान से ही संतोष करना पड़ा।


    विस्तारित कुनबे की जटिलताएं

    ब्रिक्स में अब केवल पांच पारंपरिक देश- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका- के साथ-साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया भी जुड़ चुके हैं। दुनिया की बहुत बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था की नुमाइंदगी करने वाले इस विस्तारित मंच का आकार जितना बढ़ा है, कूटनीति के पेचीदा मामलों पर आमराय कायम करना उतना ही कठिन होता गया है। संगठन के भीतर अलग-अलग सामरिक गठबंधनों से जुड़े देशों के हित टकराते हैं, तो सहमति तलाशना कठिन साबित होता है।


    संतुलन साधने की परीक्षा

    ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहे भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की दोहरी चुनौती है। भारत की अध्यक्षता का मुख्य फोकस लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के एजेंडे के तहत वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करना है। साथ ही आर्थिक-तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना रहा है। हालांकि पश्चिम एशिया संघर्ष और बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच भारत को यह सुनिश्चित करना पड़ रहा है कि ब्रिक्स किसी एकपक्षीय गुट के रूप में उभर कर न आए। इसकी बजाय विकासशील देशों के आर्थिक हितों का मंच बना रहे।