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  • ईरान के हवाई नेटवर्क की घेराबंदी में जुटा अमेरिका: 27 एयरलाइंस पर पाबंदी विमान और जरूरी सामान जुटाना होगा मुश्किल

    ईरान के हवाई नेटवर्क की घेराबंदी में जुटा अमेरिका: 27 एयरलाइंस पर पाबंदी विमान और जरूरी सामान जुटाना होगा मुश्किल


    नई दिल्ली। अमेरिका ने ईरान के एविएशन सेक्टर पर दबाव बढ़ाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने ईरान से जुड़े नेटवर्क पर नई पाबंदियों का ऐलान किया है। इस कार्रवाई में ईरान की 27 एयरलाइंस को निशाना बनाया गया है। इसके साथ ही तुर्की यूएई मलेशिया और कजाकिस्तान में काम करने वाली कुछ कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि ये कंपनियां ईरानी एयरलाइंस को विमान जरूरी सामान और दूसरी सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद कर रही थीं।

    अमेरिका की इस कार्रवाई का सीधा असर ईरान के एविएशन कारोबार पर पड़ सकता है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि नए प्रतिबंधों का मकसद उन रास्तों को बंद करना है जिनके जरिए ईरानी एयरलाइंस को विदेशों से पैसा विमान उपकरण और दूसरी जरूरी सुविधाएं हासिल होती हैं। प्रतिबंधों के बाद ईरानी विमानन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करना और विदेशी कंपनियों से सेवाएं लेना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

    ईरान का एविएशन सेक्टर लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रहा है। पुराने प्रतिबंधों के कारण ईरानी एयरलाइंस को नए विमान हासिल करने के साथ साथ विमान के जरूरी पुर्जे और तकनीकी सेवाएं जुटाने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अब नई कार्रवाई के बाद यह दबाव और बढ़ने की आशंका है। खास तौर पर ऐसी कंपनियां ज्यादा मुश्किल में आ सकती हैं जो ईरानी एयरलाइंस के साथ सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कारोबार करती हैं।

    अमेरिकी अधिकारियों ने वित्तीय संस्थानों और बैंकों को भी ईरानी एविएशन नेटवर्क से जुड़े लेनदेन पर नजर रखने को कहा है। इसका मतलब यह है कि ईरानी एयरलाइंस के लिए अंतरराष्ट्रीय भुगतान करना और विदेशों से जरूरी सामान खरीदना पहले की तुलना में और कठिन हो सकता है। अमेरिका ने साफ संकेत दिया है कि ईरान की विमानन कंपनियों को सहायता देने वाले विदेशी कारोबारी नेटवर्क भी उसकी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।

    इस कार्रवाई में Mahan Air पर भी दबाव बढ़ाया गया है। अमेरिका पहले से ही इस एयरलाइन पर प्रतिबंध लगा चुका है। अमेरिकी आरोप है कि Mahan Air ने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को सहायता पहुंचाने में भूमिका निभाई है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार कुछ विदेशी कंपनियों ने Mahan Air को विमान हासिल करने और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के संचालन में मदद की। इसी तरह की गतिविधियों के आरोप में तुर्की और मलेशिया की कुछ कंपनियों पर भी कार्रवाई की गई है।

    अमेरिका के अनुसार कुछ कंपनियों ने Mahan Air को कम से कम तीन Boeing 777 विमान हासिल करने में मदद की। इन विमानों को पहले दूसरे देशों में इस्तेमाल से हटाया गया था और बाद में ईरानी एयरलाइंस के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया गया। अमेरिका का मानना है कि इस तरह के नेटवर्क प्रतिबंधों के बावजूद ईरान की विमानन क्षमता को बनाए रखने में मदद कर रहे हैं।

    नई पाबंदियों का असर केवल एयरलाइंस तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। टिकट बिक्री विमान आपूर्ति तकनीकी सेवाओं और दूसरे एविएशन कारोबार से जुड़ी विदेशी कंपनियों को भी जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। इससे ईरान के अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क पर दबाव बढ़ सकता है। दुबई दोहा और इस्तांबुल जैसे प्रमुख एयर कनेक्शन वाले क्षेत्रों में भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

    यह कार्रवाई ईरान पर अमेरिकी आर्थिक दबाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। अमेरिका पहले से ही ईरान के तेल और दूसरे आर्थिक क्षेत्रों पर प्रतिबंधों के जरिए दबाव बना रहा है। अब एविएशन सेक्टर को भी निशाना बनाकर अमेरिका ईरान तक पहुंचने वाले विदेशी पैसे सामान और तकनीकी सहायता के रास्तों को और सीमित करना चाहता है। आने वाले समय में यदि ऐसी कार्रवाई और बढ़ती है तो ईरान की एयरलाइंस के लिए विमान संचालन और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।

  • वेस्ट बैंक विवाद पर इजरायल का ब्रिटेन को जवाब, पूर्वी यरूशलम का ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास बंद करने का ऐलान

    वेस्ट बैंक विवाद पर इजरायल का ब्रिटेन को जवाब, पूर्वी यरूशलम का ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास बंद करने का ऐलान


    नई दिल्ली। वेस्ट बैंक को लेकर इजरायल और ब्रिटेन के बीच बढ़ता तनाव अब राजनयिक स्तर पर भी पहुंच गया है। इजरायल ने पूर्वी यरूशलम स्थित ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास को बंद करने का फैसला किया है। इजरायल के विदेश मंत्री गिडियन सार ने बताया कि यह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर लिए गए कई फैसलों का हिस्सा है। यह कार्रवाई ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा की उस पहल के बाद हुई है, जिसमें कब्जे वाले वेस्ट बैंक की यहूदी बस्तियों से आने वाले सामान के आयात पर रोक लगाने की बात कही गई है।

    ब्रिटेन को गाजा मिशन से भी हटाएगा इजरायल

    पूर्वी यरूशलम का ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास ब्रिटेन और फिलिस्तीनी अथॉरिटी के बीच संबंधों से जुड़े मामलों को देखता था। इजरायल ने इसके अलावा अमेरिका की अगुआई वाले गाजा समन्वय मिशन से ब्रिटेन को बाहर करने की बात कही है। साथ ही फिलिस्तीनी सुरक्षा बलों को ब्रिटेन की ओर से दी जा रही ट्रेनिंग भी रोकने का फैसला किया गया है।

    जेरेमी कॉर्बिन समेत 12 ब्रिटिश अधिकारियों पर रोक

    इजरायल ने ब्रिटेन के पूर्व नेता जेरेमी कॉर्बिन समेत 12 चुने हुए ब्रिटिश अधिकारियों और कुछ अन्य नागरिकों के देश में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। इजरायल का आरोप है कि इन लोगों की गतिविधियां यहूदी विरोधी और इजरायल विरोधी रही हैं।

    विदेश मंत्री गिडियन सार ने ब्रिटेन की पहल को गलत बताया। उन्होंने इसे किसी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप करार दिया। सार ने ब्रिटेन के विदेश सचिव एड मिलिबैंड के उस आरोप को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया था कि वेस्ट बैंक के कुछ इलाकों से फिलिस्तीनियों को जबरन हटाया जा रहा है।

    अमेरिका ने व्यापारिक पाबंदियों का किया विरोध

    दूसरी तरफ अमेरिका ने ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा की प्रस्तावित व्यापारिक पाबंदियों का समर्थन नहीं किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका इस अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के कदम वेस्ट बैंक में तनाव और अस्थिरता को और बढ़ा सकते हैं।

    वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने संयुक्त बयान में कहा कि यह कदम दो-राष्ट्र समाधान की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ है। तीनों नेता सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भी इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में हैं। डेनमार्क, नॉर्वे, पोलैंड, स्पेन और स्वीडन ने भी दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को दोहराया है।

    पाबंदी का आर्थिक असर सीमित, राजनीतिक संदेश बड़ा

    वेस्ट बैंक की यहूदी बस्तियों से मुख्य रूप से खजूर, खट्टे फल, जड़ी-बूटियां और वाइन जैसे कृषि उत्पादों का निर्यात होता है। इजरायल के कुल निर्यात में इनका हिस्सा काफी छोटा है। ऐसे में प्रस्तावित व्यापारिक पाबंदियों का सीधा आर्थिक प्रभाव सीमित माना जा रहा है, लेकिन इसका कूटनीतिक और राजनीतिक संदेश काफी महत्वपूर्ण है।

    इसी बीच इजरायल वेस्ट बैंक में करीब 1,000 नए घरों के निर्माण की योजना पर आगे बढ़ रहा है। इनमें ई1 बस्ती परियोजना को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जताई जा रही है। इसे लेकर इजरायल और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच मतभेद और गहराने की आशंका है।

  • X न्यूज का नंबर-1 सोर्स, एलन मस्क का बड़ा दावा, बोले- दुनिया के सभी अखबारों से ज्यादा है मासिक रीडरशिप

    X न्यूज का नंबर-1 सोर्स, एलन मस्क का बड़ा दावा, बोले- दुनिया के सभी अखबारों से ज्यादा है मासिक रीडरशिप


    नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X को लेकर अमेरिकी बिजनेसमैन एलन मस्क ने बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि X दुनिया में खबरों का नंबर-1 सोर्स बन चुका है। मस्क के मुताबिक, हर महीने X को पढ़ने वाले लोगों की संख्या दुनिया के सभी अखबारों की कुल सर्कुलेशन से भी अधिक है। उन्होंने यह बात X पर एक पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कही।

    मस्क ने अपने पोस्ट में कहा कि X धरती पर खबरों का नंबर-1 सोर्स है। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्लेटफॉर्म की मासिक रीडरशिप दुनिया भर के सभी अखबारों की संयुक्त सर्कुलेशन से ज्यादा है। मस्क के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर X की न्यूज भूमिका को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    यूरोप में भी X की बढ़ती लोकप्रियता का दावा

    मस्क ने जिस पोस्ट को रीपोस्ट किया, उसमें यूरोप में X के बढ़ते प्रभाव का जिक्र किया गया था। पोस्ट के मुताबिक, यूरोप के लगभग सभी देशों में X न्यूज ऐप्स के बीच नंबर-1 स्थान पर है। इसमें दावा किया गया कि यूरोपीय देशों के लोग खबरों और सूचनाओं के लिए अब X का इस्तेमाल पहले से ज्यादा कर रहे हैं।

    रीपोस्ट की गई पोस्ट में यह भी कहा गया कि यूरोप ने कई वर्षों तक X की आलोचना की, लेकिन इसके बावजूद प्लेटफॉर्म अब वहां खबरों के प्रमुख माध्यमों में शामिल हो रहा है। पोस्ट में लोगों के X की तरफ बढ़ते रुझान का भी दावा किया गया।

    फिलहाल मस्क का दावा, आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी

    इन दावों को लेकर यह ध्यान रखना जरूरी है कि संबंधित आंकड़े X पर साझा की गई पोस्ट में दिए गए हैं। मस्क ने इन्हीं दावों को रीपोस्ट करते हुए अपनी टिप्पणी की है। इसलिए फिलहाल इन्हें मस्क और संबंधित पोस्ट में किए गए दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

    एलन मस्क लंबे समय से X को महज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बजाय खबरों, सूचनाओं और विचारों के बड़े मंच के रूप में पेश करते रहे हैं। प्लेटफॉर्म पर दुनिया भर के यूजर सीधे पोस्ट कर सकते हैं और न्यूज रिपोर्ट, वीडियो तथा किसी घटना से जुड़ी जानकारी तेजी से सामने आती है।

    मस्क के ताजा बयान ने एक बार फिर पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया के बीच बदलते न्यूज कंजम्पशन पैटर्न पर बहस छेड़ दी है। X पर सूचनाएं तेजी से पहुंचती हैं, लेकिन वहां सामने आने वाली हर जानकारी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है।

  • हिंदू समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाने पर भड़के एफिल टावर कर्मचारी, एक दिन बंद रहा टावर

    हिंदू समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाने पर भड़के एफिल टावर कर्मचारी, एक दिन बंद रहा टावर

    नई दिल्ली ।पेरिस के प्रसिद्ध एफिल टावर को सोमवार को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण एक दिन के लिए बंद करना पड़ा। हड़ताल की वजह एक हिंदू धार्मिक समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाए जाने का मामला बताया जा रहा है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि कार्यस्थल पर लिंग के आधार पर भेदभाव किया गया और महिलाओं को हटाकर उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को लगाया गया।

    घटना का संबंध बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था यानी BAPS के एक प्रतिनिधिमंडल की एफिल टावर यात्रा से बताया गया है। समूह में 100 से अधिक संत और अन्य सदस्य शामिल थे। यात्रा से पहले महिला कर्मचारियों को उनके निर्धारित कार्यस्थलों से हटाने का निर्णय लिया गया था। इस फैसले से कर्मचारियों में नाराजगी पैदा हुई और बाद में उन्होंने विरोध स्वरूप हड़ताल कर दी।

    एफिल टावर की जिम्मेदारी संभालने वाली कंपनी एसईटीई के अनुसार, धार्मिक समूह की ओर से अनुरोध किया गया था कि उनके दौरे के दौरान महिलाओं से बातचीत कम से कम हो। कंपनी ने कहा कि उसने इस तरह की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। हालांकि, घटनाक्रम के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाए जाने के बाद विवाद बढ़ गया।

    कर्मचारियों की ओर से इस मामले को कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया। उनका कहना था कि किसी धार्मिक या सांस्कृतिक समूह की पसंद के आधार पर महिला कर्मचारियों को उनके काम से हटाना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर कर्मचारियों ने सोमवार को काम रोक दिया, जिसके चलते एफिल टावर आने वाले पर्यटकों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

    इस विवाद के बाद BAPS से जुड़े पेरिस स्थित हिंदू मंदिर की ओर से भी खेद जताया गया। संस्था ने कहा कि यदि उनके प्रतिनिधिमंडल की वजह से किसी व्यक्ति को ठेस पहुंची है या किसी तरह की परेशानी हुई है तो उन्हें इसका अफसोस है। संस्था ने यह भी बताया कि प्रतिनिधिमंडल में 100 से अधिक लोग शामिल थे और बड़ी संख्या को देखते हुए यात्रा के दौरान किसी तरह की परेशानी से बचने के लिए व्यवस्थाएं पहले से तय की गई थीं।

    पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि कंपनी को इस तरह की शर्तें स्वीकार नहीं करनी चाहिए थीं। विवाद ने धार्मिक स्वतंत्रता, कार्यस्थल पर समानता और महिला कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े सवालों को चर्चा में ला दिया है।

    एफिल टावर पेरिस की पहचान से जुड़ी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध संरचनाओं में से एक है। सीन नदी के किनारे स्थित यह टावर करीब 330 मीटर ऊंचा है। इसका निर्माण 1887 से 1889 के बीच कराया गया था। इसे 1889 में आयोजित विश्व मेले के लिए तैयार किया गया था। यह आयोजन फ्रांसीसी क्रांति की 100वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया गया था।

    इस विशाल टावर का डिजाइन गुस्ताव एफिल से जुड़ा है और उन्हीं के नाम पर इसे एफिल टावर कहा गया। शुरुआत में इसे प्रदर्शनी के लिए तैयार किया गया था, लेकिन समय के साथ यह पेरिस और फ्रांस की सबसे बड़ी पहचान बन गया। आज दुनियाभर से लाखों पर्यटक इसे देखने पहुंचते हैं। ऐसे में कर्मचारियों की हड़ताल के कारण इसका एक दिन बंद रहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया।

  • सिंगापुर में भारतीय समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन नस्लीय टिप्पणियों पर पीएम लॉरेंस वोंग ने कार्रवाई की चेतावनी दी

    सिंगापुर में भारतीय समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन नस्लीय टिप्पणियों पर पीएम लॉरेंस वोंग ने कार्रवाई की चेतावनी दी

    नई दिल्ली ।सिंगापुर में भारतीय समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन की जा रही नस्लीय और आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने कहा है कि किसी भी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह को स्वीकार्य या सामान्य बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी टिप्पणियों को केवल सामान्य ऑनलाइन बातचीत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    प्रधानमंत्री वोंग ने रविवार, 6 सितंबर को यह टिप्पणी नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ के बाद सोशल मीडिया पर भारतीयों के खिलाफ सामने आईं नफरत भरी टिप्पणियों के संदर्भ में की। इस बाढ़ के बाद ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भारतीय समुदाय को निशाना बनाने वाली टिप्पणियों की लहर देखने को मिली थी। नेपाल में आई इस बाढ़ में नौ सिंगापुरी नागरिक लापता हुए थे।

    सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने कहा कि इस तरह के विचार पूरे देश का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नस्लीय पूर्वाग्रह से जुड़ी टिप्पणियों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि ऐसी बयानबाजी को बिना रोक-टोक जारी रहने देने से नस्लीय पूर्वाग्रह धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन सकता है।

    गृह मामलों के मंत्री के. षणमुगम ने भी मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने पुलिस को भारतीय समुदाय के खिलाफ की जा रही टिप्पणियों की जांच करने के निर्देश दिए हैं। षणमुगम के अनुसार, हाल के दिनों में सिंगापुर में भारतीय समुदाय के खिलाफ नस्लीय टिप्पणियों में बढ़ोतरी देखी गई है।

    भारतीय मूल के गृह मंत्री ने इन टिप्पणियों को शर्मनाक, घटिया और पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। उन्होंने कहा कि पुलिस नस्लीय और विदेशी-विरोधी टिप्पणियों की जांच कर रही है। सरकार का रुख है कि ऐसी बयानबाजी को बिना कार्रवाई के आगे बढ़ने देना समाज में नस्लीय पूर्वाग्रह को बढ़ावा दे सकता है।

    प्रधानमंत्री वोंग ने कहा कि सिंगापुर में अलग-अलग मुद्दों पर मजबूत बहस हो सकती है और लोगों को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है। लेकिन किसी समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह या विदेशियों के प्रति दुश्मनी फैलाने के लिए वैध तर्कों की आड़ नहीं ली जानी चाहिए।

    सिंगापुर एक बहुसांस्कृतिक देश है और ऐसे माहौल में सरकार ने नस्लीय सद्भाव को लेकर चिंता जताई है। भारतीय समुदाय के खिलाफ सोशल मीडिया पर सामने आई टिप्पणियों ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। सरकार की ओर से पुलिस जांच के निर्देश दिए जाने के बाद ऑनलाइन की जा रही आपत्तिजनक और नस्लीय टिप्पणियों पर निगरानी बढ़ने की बात सामने आई है।

    मामले को लेकर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत या पूर्वाग्रह को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री वोंग ने यह भी कहा कि सिंगापुर में होने वाली बहस और असहमति को किसी समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण या विदेशियों के प्रति शत्रुतापूर्ण बयानबाजी का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारतीय समुदाय के खिलाफ ऑनलाइन टिप्पणियों की जांच पुलिस कर रही है। सरकार की ओर से यह संदेश दिया गया है कि नस्लीय और विदेशी-विरोधी बयानबाजी को लेकर गंभीरता से कार्रवाई की जाएगी। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सामने आए इस विवाद ने सिंगापुर में नस्लीय पूर्वाग्रह और सामाजिक सद्भाव से जुड़े सवालों को फिर सामने ला दिया है।

  • ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चांद को लेकर दिए गए बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर चांद पर किसका अधिकार है। ट्रंप ने रविवार को सोशल मीडिया पर चांद की तस्वीर साझा की, जिस पर ‘चंद्रमा हमारा है’ लिखा था और अमेरिकी झंडा भी दिखाई दे रहा था। इसके साथ ही चांद की जमीन खरीदने और उसके प्रमाणपत्र देने के दावे भी चर्चा में हैं।

    चांद पर जमीन खरीदने के दावे लंबे समय से सामने आते रहे हैं। कई लोग जन्मदिन, शादी या अन्य खास मौकों पर चांद की जमीन उपहार में देने की बात कहते हैं। कुछ संस्थाएं चांद की जमीन के नाम पर प्रमाणपत्र और दस्तावेज भी बेचती हैं। हालांकि इन दस्तावेजों से चांद की जमीन पर वास्तविक कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं होता।

    चांद और दूसरे खगोलीय पिंडों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रमुख आधार 1967 की अंतरिक्ष संधि है। इस संधि में भारत और अमेरिका समेत 114 देश शामिल हैं। संधि के अनुसार बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के लाभ और हित में होना चाहिए। चांद और दूसरे खगोलीय पिंड भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

    संधि का अनुच्छेद 2 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और अन्य खगोलीय पिंड शामिल हैं, किसी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आ सकते। कोई देश संप्रभुता, कब्जे या किसी अन्य तरीके से चांद के किसी हिस्से को अपना राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित नहीं कर सकता। इसलिए किसी देश का चांद पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप नहीं है।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि देश चांद पर मिशन नहीं भेज सकते। अंतरिक्ष संधि सभी देशों को अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों की खोज तथा इस्तेमाल की स्वतंत्रता देती है। वैज्ञानिक अनुसंधान भी किया जा सकता है, लेकिन अंतरिक्ष गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

    चांद पर पहुंचने वाले यान और उपकरणों को लेकर भी संधि में अलग व्यवस्था है। अनुच्छेद 8 के अनुसार किसी देश के पंजीकरण में दर्ज अंतरिक्ष वस्तु पर उस देश का अधिकार और नियंत्रण बना रहता है। चांद पर उतरने के बाद भी किसी यान या उपकरण का स्वामित्व केवल इसलिए खत्म नहीं होता कि वह खगोलीय पिंड पर मौजूद है। लेकिन इससे चांद की जमीन पर उस देश का मालिकाना हक नहीं बनता।

    निजी कंपनियों के लिए भी नियम स्पष्ट हैं। अनुच्छेद 6 के तहत सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी संबंधित देश की होती है। निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए संबंधित देश की अनुमति और लगातार निगरानी व्यवस्था के तहत काम करना होता है।

    चांद पर जमीन बेचने के दावे भी कई दशकों से होते रहे हैं। जर्मनी के नागरिक मार्टिन जुर्गेंस ने चांद को अपने परिवार की संपत्ति बताया था। बाद में अमेरिकी कारोबारी डेनिस होप ने लूनर एंबेसी नाम की संस्था के जरिए चांद की जमीन बेचने का दावा किया और लोगों को प्रमाणपत्र देने शुरू किए।

    ऐसे प्रमाणपत्र कुछ लोग मनोरंजन, कल्पना या उपहार के तौर पर खरीदते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में निजी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए चांद की जमीन के मालिकाना हक का कोई मान्य पंजीकरण तंत्र नहीं है। इसलिए इन प्रमाणपत्रों को कानूनी संपत्ति अधिकार नहीं माना जाता।

    चांद पर गतिविधियों से होने वाले नुकसान को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय नियम मौजूद हैं। अनुच्छेद 7 के अनुसार अंतरिक्ष वस्तुओं से दूसरे देशों या उनके लोगों को नुकसान होने की स्थिति में लॉन्च करने वाले देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बन सकती है। अनुच्छेद 9 देशों को ऐसी गतिविधियों से बचने और दूसरे देशों के हितों का ध्यान रखने की बात कहता है।

    चांद तक पहुंचने में सोवियत संघ, अमेरिका, जापान, यूरोप, भारत और चीन समेत कई देशों ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत के चंद्रयान-1 और चंद्रयान-3 जैसे मिशनों ने चंद्रमा के अध्ययन में योगदान दिया है। अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इंसानों को चांद की सतह तक पहुंचाया, जबकि हाल के वर्षों में सरकारी और निजी मिशनों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं।

    इसलिए चांद पर यान भेजना, वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करना या शोध करना और चांद की जमीन का मालिक बनना अलग-अलग बातें हैं। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियम किसी देश को चांद पर संप्रभुता स्थापित करने की अनुमति नहीं देते और जमीन खरीदने के प्रमाणपत्र भी वास्तविक कानूनी मालिकाना हक प्रदान नहीं करते।

  • अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    नई दिल्ली । भारत में सत्यनारायण भगवान की कथा या पूजा करवाना आम बात है। खास मौकों, गृह प्रवेश, शादी के बाद, नामकरण या नए कारोबार की शुरुआत जैसे अवसरों पर लोग अपने घर में पंडित को बुलाकर पूजा करवाते हैं। पूजा की सामग्री जुटाने से लेकर पंडित की व्यवस्था तक ज्यादातर काम आसानी से हो जाता है। लेकिन अमेरिका में यही पूजा करवाना काफी महंगा और मेहनत वाला काम हो सकता है।

    भारत में सत्यनारायण पूजा सामान्य तौर पर कुछ हजार रुपये में हो जाती है। छोटे शहरों और गांवों में इसका खर्च करीब दो से पांच हजार रुपये तक हो सकता है, जबकि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी करीब 15 से 20 हजार रुपये में पूजा करवाई जा सकती है। इसके मुकाबले अमेरिका में इसी पूजा का खर्च काफी ज्यादा हो सकता है।

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा के लिए पंडित की फीस 300 डॉलर या उससे अधिक हो सकती है। भारत की तरह वहां हर शहर, कस्बे या इलाके में आसानी से पंडित उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में कई दिन पहले बुकिंग करानी पड़ सकती है। पंडित अगर किसी दूसरे शहर या दूर की जगह से आ रहे हैं तो उनके आने-जाने का खर्च भी यजमान को उठाना पड़ सकता है।

    दूरी के हिसाब से पंडित के आने-जाने का खर्च करीब 50 डॉलर से लेकर 100 या 150 डॉलर तक हो सकता है। यानी पूजा के शुरुआती खर्च में ही पंडित की फीस के साथ यात्रा का खर्च जुड़ जाता है।

    अगर कोई व्यक्ति अपने घर या ऑफिस की जगह मंदिर में सत्यनारायण पूजा करवाना चाहता है, तो वहां भी पहले से बुकिंग करानी पड़ सकती है। मंदिर में पूजा करवाने के लिए अलग से शुल्क देना पड़ सकता है, जो करीब 100 से 150 डॉलर तक बताया गया है। इसके बाद पूजा सामग्री का खर्च सामने आता है।

    अमेरिका में भारत की तुलना में पूजा सामग्री हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती। फल, फूल, प्रसाद, कलश, पान, सुपारी और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य जरूरी चीजों के लिए कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ सकती है। कुछ सामग्री की कीमत भी भारत के मुकाबले अधिक हो सकती है। केले का पत्ता तक वहां महंगा मिल सकता है।

    प्रसाद की व्यवस्था भी खर्च बढ़ा सकती है। यदि घर पर प्रसाद बनाया जाए तो अलग बात है, लेकिन बाहर से ऑर्डर करने पर अतिरिक्त पैसा खर्च होता है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद अमेरिका में सत्यनारायण पूजा का कुल खर्च 1000 डॉलर यानी करीब एक लाख रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकता है।

    भारत में पूजा के खर्च में पंडित की फीस करीब 1100 से 5100 रुपये, पूजा सामग्री 500 से 2000 रुपये, ताजे फल 500 से 2000 रुपये, पंचामृत और प्रसाद 500 से 1000 रुपये तथा मुख्य प्रसाद के लिए करीब 300 से 1500 रुपये तक खर्च हो सकता है। हालांकि, जगह और आयोजन के स्तर के अनुसार यह रकम कम या ज्यादा हो सकती है।

    अमेरिका हो या भारत, यदि पूजा बड़े स्तर पर आयोजित की जाए तो सजावट, मेहमानों की संख्या और भोजन जैसी व्यवस्थाओं से खर्च कई गुना बढ़ सकता है। अमेरिका में भारतीय त्योहारों के दौरान पंडितों की मांग बढ़ने से फीस भी अधिक हो सकती है। नवरात्र, दिवाली, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर मांग बढ़ने के कारण पूजा से जुड़ा कुल खर्च और बढ़ सकता है।

  • 12 हजार फीट से लगाई छलांग, पैराशूट नहीं खुला; सिर पर लगी चोट, हवा में बेहोश हुईं

    12 हजार फीट से लगाई छलांग, पैराशूट नहीं खुला; सिर पर लगी चोट, हवा में बेहोश हुईं


    लंदन।
    ब्रिटेन में स्काइडाइविंग के दौरान एक 35 वर्षीय महिला के साथ ऐसा खतरनाक हादसा हुआ, जिसमें उसके हजारों फीट की ऊंचाई से बिना खुले पैराशूट के गिरने के बावजूद जान बच गई। महिला हवा में ही बेहोश हो गई थी और करीब 10 हजार फीट तक बिना पैराशूट खुले नीचे गिरती रही। आखिरकार एक पेड़ से टकराने के कारण उसकी गिरने की गति कम हुई और उसकी जान बच गई।

    मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, घटना 7 अगस्त को नॉटिंघम के पास स्थित लैंगर एयरफील्ड में हुई। होली विफन नाम की महिला एक समूह के साथ करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई से स्काइडाइविंग कर रही थीं। इस दौरान समूह ‘ट्रैकिंग’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहा था, जिसमें स्काइडाइवर शरीर को लगभग क्षैतिज स्थिति में रखकर तेजी से नीचे आते हैं।

    सिर पर लगी जोरदार टक्कर और हवा में बेहोश हुईं

    स्काइडाइविंग के दौरान अचानक एक अन्य स्काइडाइवर का पैर होली के सिर से टकरा गया। टक्कर इतनी जोरदार थी कि वह हवा में ही बेहोश हो गईं। बेहोशी के कारण वह अपना पैराशूट खोलने की स्थिति में नहीं थीं और लगातार तेज गति से नीचे गिरती रहीं।

    होली को इस हालत में नीचे गिरते देखकर एक अन्य स्काइडाइवर ने उनका पीछा किया और उन्हें हवा में पकड़ने की कोशिश की। हालांकि, करीब 3,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचने के बाद उसे अपना पैराशूट खोलना पड़ा। इसके बाद होली लगातार नीचे गिरती रहीं। हादसे का कुछ हिस्सा उनके हेलमेट पर लगे कैमरे में भी रिकॉर्ड हुआ।

    करीब 10 हजार फीट तक बिना पैराशूट के गिरती रहीं

    रिपोर्टों के मुताबिक, होली करीब 10 हजार फीट तक बिना खुले पैराशूट के नीचे आईं। उन्हें इस दौरान हुई घटनाओं की बहुत कम याद है। बाद में उन्होंने बताया कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह सपना देख रही हों और स्काइडाइविंग कर रही हों। उनकी अगली स्पष्ट याद तब आई, जब उन्होंने खुद को जमीन पर पाया।

    पेड़ से टकराने पर कम हुई गिरने की रफ्तार

    होली निर्धारित लैंडिंग स्थल पर नहीं पहुंचीं, बल्कि एक पेड़ से जा टकराईं। पेड़ ने उनके गिरने की रफ्तार को काफी कम कर दिया। माना जा रहा है कि इसी वजह से उनकी जान बच सकी।

    हादसे के बाद होली को अस्पताल ले जाया गया। दुर्घटना में उनकी बाईं टांग टूट गई और रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ। शरीर के कई हिस्सों में चोटें और गंभीर नीले निशान भी आए। इसके बावजूद हजारों फीट की ऊंचाई से बिना खुले पैराशूट के गिरने के बाद उनका जीवित बचना बेहद असाधारण माना जा रहा है।

  • नेपाल: बाढ़ का तांडव देखने वाले बच्चों को सदमे से निकालने का प्रयास… कल से खुलेंगे 65 स्कूल

    नेपाल: बाढ़ का तांडव देखने वाले बच्चों को सदमे से निकालने का प्रयास… कल से खुलेंगे 65 स्कूल


    काठमांडू।
    नेपाल में जल प्रलय (Nepal floods) के दो हफ्ते पूरे होने वाले हैं लेकिन नुवाकोट, रसुवा और आसपास के जिलों में जिन बच्चों ने बाढ़ का तांडव देखा या अपनों को खोया, वे एक अदृश्य डर से जूझ रहे हैं। कोई आधी रात को चौंककर उठ जाता है, कोई गुमसुम हो जाता है, तो कोई आपदा की याद दिलाने वाली किसी भी आवाज से सहम जाता है।

    बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों (Flood-Affected Areas) को फिर से बसाने की कवायद के बीच इन बच्चों को सदमें से बाहर लाने की कोशिशें भी जारी हैं। मेडिकल टीमें मानसिक सेहत सुधारने के लिए काउंसलिंग भी करा रही है। नुवाकोट के बिधुर में प्रशासन बुधवार से 65 स्कूलों को खोलने की तैयारी भी कर रहा है। बाढ़ से पहले बिदुर में कुल 79 स्कूल चल रहे थे। बिदुर की डिप्टी मेयर प्रभा बोगटी (Deputy Mayor Prabha Bogti) ने कहा, स्कूल इस बात का बंदोबस्त करेंगे कि वे आसानी से अपनी कक्षाओं में शामिल हो सकें।

    इस बीच, आपदा के 13वें दिन नेपाल में राष्ट्रीय शोक मनाया गया। इस दौरान राष्ट्र ध्वज को आधा झुका दिया गया और दीये और मोमबत्तियां जलाकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी गई।


    चुनौतीपूर्ण, अर्नोल्ड को याद आया सिलक्यारा

    2023 में भारत में सुरंग से 41 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाने वाले ऑस्ट्रेलियाई सुरंग विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स चिलिमे जलविद्युत परियोजना की सुरंग में फंसे लोगों की तलाश में जुटे हैं। उन्होंने कहा, नेपाल का अभियान सिलक्यारा से अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यहां एक साथ कई स्थानों पर बचाव कार्य चल रहा है।

    1,380 लोगों की गई जान
    5,500 से अधिक लापता
    121 के सुरंगों में फंसे होने की आशंका


    भारत के सीमांत क्षेत्रों में जापानी इंसेफेलाइटिस का खतरा

    महराजगंज, कुशीनगर समेत कई सीमावर्ती इलाकों में बाढ़ जैसे हालात के कारण मादा क्यूलेक्स मच्छर के पनपने और अंडों को सुरक्षित रखने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन गई हैं।

    नेपाल आपदा ने भारत के पूर्वी सीमांत क्षेत्रों में जापानी इंसेफेलाइटिस के लिए जमीन तैयार कर दी है। अगर निवारक उपायों की दिशा में मजबूत कदम नहीं उठाए गए तो लोगों को दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। आपदा से महराजगंज और कुशीनगर समेत कई इलाकों में महीनों दल-दल बने रहने की संभावना है। प्रभावित क्षेत्रों में अब हाईग्रेड फीवर के मरीज भी लगातार बढ़ रहे हैं जिसे जापानी इंसेफेलाइटिस का संकेत माना जाता है। ऐसे में ग्रामीणों ने गहरी चिंता जताई है। महराजगंज के सेहगीबर्वा निवासी रामधारी निशाद, कुशीनगर के तमकोही राज निवासी लोकेश और पीपरी घाट निवासी उज्वल सिंह कहते हैं बाढ़ का दूषित पानी गांव के किनारे तक पानी पहुंच गया है। लोग बीमार हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को बुखार की चपेट में आने वालों की जापानी इंसेफेलाइटिस की जांच करनी चाहिए।

    जंतु विशेषज्ञ सुनील कुमार कहते हैं, क्यूलेक्स नाम की मादा मच्छर जापानी इंसेफेलाइटिस के लिए मुख्य रोग वाहक है। यह आमतौर पर तराई वाले क्षेत्रों में देखने को मिलता है। गोरखपुर मंडल के अंतर्गत आने वाले महराजगंज, कुशीनगर और देवरिया गंडक नदी के आस-पास बसे हुए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में नमी वाला वातावरण रहता है, जिससे यहां खतरा ज्यादा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 से लेकर 2019 तक गोरखपुर मंडल में करीब 1125 लोगों की मौत दर्ज की गई।

  • ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती

    ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती


    नई दिल्ली। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव का काउंटडाउन शुरू होते ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट रिपब्लिकन पार्टी के लिए चिंता का कारण बन गई है। चुनाव से करीब दो महीने पहले सामने आए ताजा सर्वे में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। ऐसे संकेत हैं कि नवंबर में होने वाले चुनाव में डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में वापसी कर सकते हैं।

    रॉयटर्स और इप्सॉस के ताजा सर्वे के मुताबिक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग ऑल टाइम लो पर है। बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक ईरान युद्ध और देश की आर्थिक स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। ट्रंप की घटती लोकप्रियता का सीधा असर रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    सर्वे में रजिस्टर्ड वोटरों से पूछा गया कि अगर अभी कांग्रेस के चुनाव कराए जाएं तो वे किस पार्टी के उम्मीदवार को वोट देंगे। जवाबों में डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन पर 5 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली। खास बात यह है कि डेमोक्रेट समर्थक चुनाव को लेकर रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में ज्यादा उत्साहित नजर आए।

    हाउस में बहुमत का बेहद करीबी मुकाबला

    मिडटर्म चुनाव में सबसे बड़ा मुकाबला प्रतिनिधि सभा को लेकर माना जा रहा है। फिलहाल हाउस में रिपब्लिकन के पास 218 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए डेमोक्रेट्स को केवल 3 सीटें और हासिल करनी होंगी। करीब 50 सीटों पर मुकाबला कड़ा माना जा रहा है, ऐसे में कुछ सीटों के नतीजे ही सदन का पूरा समीकरण बदल सकते हैं।

    अगर डेमोक्रेट्स हाउस में बहुमत हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उनके पास प्रशासन के खिलाफ कई जांच शुरू करने की ताकत होगी। साथ ही, सरकार को अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए डेमोक्रेट्स के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं।

    सीनेट में भी रिपब्लिकन के सामने चुनौती

    सीनेट की तस्वीर फिलहाल हाउस की तुलना में कम स्पष्ट है, लेकिन यहां भी कई सीटों पर मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है। डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन की 4 सीटें जीतनी होंगी।

    अगर डेमोक्रेट्स सीनेट पर भी नियंत्रण हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन के लिए कई अहम नियुक्तियों को मंजूरी दिलाना मुश्किल हो सकता है। खासतौर पर राष्ट्रपति के नामित उम्मीदवारों की नियुक्ति रोकने की उनकी क्षमता बढ़ जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में किसी जज का पद खाली होने की स्थिति में सीनेट का यह समीकरण और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

    ट्रंप की लोकप्रियता क्यों बन रही चुनावी मुद्दा?

    अमेरिका में मिडटर्म चुनाव को अक्सर मौजूदा राष्ट्रपति के कार्यकाल पर जनता के अप्रत्यक्ष जनमत संग्रह के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रपति की पार्टी को इन चुनावों में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। इस बार ट्रंप की कम अप्रूवल रेटिंग रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

    इतिहास भी रिपब्लिकन के लिए ज्यादा राहत देने वाला नहीं है। 1938 के बाद से केवल दो मिडटर्म चुनाव ऐसे रहे हैं, जब राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई। ऐसे में नवंबर का चुनाव सिर्फ ट्रंप की लोकप्रियता की परीक्षा नहीं, बल्कि संसद में रिपब्लिकन की मौजूदा पकड़ बचाने की भी बड़ी लड़ाई माना जा रहा है।