Category: International

  • पाकिस्तान का नया दावा फिर बेनकाब: “फतह-1 से उड़ाए भारत के एयरबेस”, जिनका अस्तित्व ही नहीं!

    पाकिस्तान का नया दावा फिर बेनकाब: “फतह-1 से उड़ाए भारत के एयरबेस”, जिनका अस्तित्व ही नहीं!



    नई दिल्ली। पाकिस्तान की सेना एक बार फिर अपने दावों को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। हाल ही में पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी ने दावा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी फतह-1 मिसाइलों ने भारत के दो सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था, लेकिन जिन एयरबेसों का नाम लिया गया, वे वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं।

    पाकिस्तानी अधिकारी कैप्टन मुनीब जमाल ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि फतह-1 मिसाइलों ने “राजौरी एयरबेस” और “मामून एयरबेस” को सफलतापूर्वक तबाह कर दिया। हालांकि हकीकत यह है कि राजौरी में कोई वायुसेना एयरबेस मौजूद नहीं है और मामून केवल पठानकोट के पास एक सैन्य कैंटोनमेंट क्षेत्र है, न कि कोई एयरबेस।

    भारत-पाकिस्तान के बीच “ऑपरेशन सिंदूर” को लेकर पहले से ही तनाव और दावे-प्रतिदावे जारी हैं। इसी बीच पाकिस्तान का यह नया बयान एक बार फिर उसके दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है। भारत की ओर से पहले भी कई बार ऐसे हमलों को नाकाम किए जाने की पुष्टि की जा चुकी है।

    सोशल मीडिया पर भी पाकिस्तानी दावे को लेकर जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है, जहां यूजर्स “काल्पनिक एयरबेस” का उल्लेख कर इस बयान को हास्यास्पद बता रहे हैं।

  • असीम मुनीर का भारत पर बिना नाम हमला, बोले- आतंकवाद, दुष्प्रचार और बाहरी ताकतें पाकिस्तान की तरक्की नहीं रोक सकतीं

    असीम मुनीर का भारत पर बिना नाम हमला, बोले- आतंकवाद, दुष्प्रचार और बाहरी ताकतें पाकिस्तान की तरक्की नहीं रोक सकतीं


    नई दिल्ली। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने बलूचिस्तान की धरती से एक बार फिर भारत का नाम लिए बिना कड़ा बयान दिया है। अपने संबोधन में उन्होंने बाहरी ताकतों पर पाकिस्तान में आतंकवाद फैलाने और दुष्प्रचार चलाने का आरोप लगाया और कहा कि ऐसी कोशिशें देश की तरक्की और स्थिरता को रोक नहीं सकतीं।

    मुनीर ने कमांड एंड स्टाफ कॉलेज, क्वेटा में अधिकारियों और सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान का “निश्चित उदय” किसी भी प्रकार के प्रॉक्सी वॉर, गलत सूचना अभियान या आतंकवाद से प्रभावित नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी सेना और जनता मिलकर देश से आतंकवाद का पूरी तरह सफाया करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    अपने भाषण में उन्होंने बलूचिस्तान में तैनात सैन्य अधिकारियों की ट्रेनिंग और पेशेवर क्षमता की भी सराहना की। मुनीर ने कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है और ऐसे में सेना को मल्टी-डोमेन ऑपरेशन, नई तकनीक और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल पर लगातार काम करना होगा।

    उन्होंने जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि बदलते सुरक्षा हालात में निरंतर प्रशिक्षण और उच्च स्तर की परिचालन तैयारी बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी चुनौती का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

    मुनीर ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ “शत्रु ताकतें” पाकिस्तान के खिलाफ फर्जी खबरों और दुष्प्रचार के जरिए देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सेना और जनता की एकता के आगे ये प्रयास सफल नहीं होंगे।

    बलूचिस्तान में स्थायी शांति और विकास पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्र की प्रगति सुरक्षा, समावेशी विकास और बेहतर शासन पर निर्भर करती है।

  • पीएम मोदी से सवाल पर विवाद: नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने कहा- मैं विदेशी जासूस नहीं, पत्रकारिता करना अपराध नहीं

    पीएम मोदी से सवाल पर विवाद: नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने कहा- मैं विदेशी जासूस नहीं, पत्रकारिता करना अपराध नहीं



    नई दिल्ली। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पूछे गए एक सवाल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस घटना के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग सोशल मीडिया पर आलोचना और आरोपों के घेरे में आ गईं, जिसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से सफाई दी है।

    हेले लिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई पोस्ट करते हुए स्पष्ट किया कि वह किसी भी तरह की “विदेशी जासूस” नहीं हैं और उनका काम केवल पत्रकारिता करना है। उन्होंने कहा कि पत्रकार का दायित्व सत्ता में बैठे लोगों से सीधे सवाल पूछना होता है, चाहे वह सवाल टकराव पैदा करने वाले ही क्यों न हों। उनके अनुसार, पत्रकारों को पहले से तैयार जवाबों को बिना सवाल किए स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि सच्चाई सामने लाने के लिए कठिन सवाल पूछना उनका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है।

    यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब ओस्लो में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हेले लिंग ने पीएम मोदी से कुछ सवाल पूछे। सवालों की प्रकृति और पूछने के तरीके को लेकर वहां मौजूद कुछ लोगों और बाद में सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना शुरू हो गई। इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थिति स्पष्ट की गई और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर जोर दिया गया।

    विवाद बढ़ने के बाद हेले लिंग ने एक पोस्ट में लिखा कि उन्हें कभी नहीं लगा था कि उन्हें यह स्पष्ट करना पड़ेगा कि वह किसी विदेशी सरकार की एजेंट या जासूस नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह मुख्य रूप से नॉर्वे में पत्रकारिता करती हैं और उनका उद्देश्य केवल मानवाधिकार, लोकतंत्र और शासन व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाना है।

    उन्होंने यह भी बताया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे जुड़े वीडियो पर कुछ समय बाद कमेंट्स बंद कर दिए गए, लेकिन इससे पहले ही उनके सवालों को लेकर ऑनलाइन बहस तेज हो चुकी थी। पत्रकार का कहना है कि अगर सार्वजनिक मंच पर नेताओं से सवाल पूछने का अवसर मिलता है तो पत्रकारों को अपनी भूमिका निभाने से रोका नहीं जाना चाहिए।

    इस पूरे मामले पर भारतीय पक्ष की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद भारतीय राजनयिक ने कहा कि भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां संवैधानिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मजबूत व्यवस्था है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में विविध भाषाओं और क्षेत्रों में सैकड़ों मीडिया संस्थान सक्रिय हैं, जो देश के लोकतांत्रिक ढांचे को और मजबूत बनाते हैं।

    इस घटना ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सवाल पूछने के अधिकार और राजनयिक संवाद की मर्यादाओं पर बहस छेड़ दी है।

  • भारत-नॉर्डिक समिट 2026: ओस्लो में PM मोदी की मौजूदगी से रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार, 5 देशों के साथ बढ़ेगा सहयोग

    भारत-नॉर्डिक समिट 2026: ओस्लो में PM मोदी की मौजूदगी से रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार, 5 देशों के साथ बढ़ेगा सहयोग


    नई दिल्ली। भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन का तीसरा संस्करण मंगलवार 19 मई 2026 को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाग ले रहे हैं। इस उच्चस्तरीय बैठक में भारत के साथ पांच नॉर्डिक देश नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड के शीर्ष नेता शामिल हो रहे हैं। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, रक्षा सहयोग और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना है।

    प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि लगभग 43 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे दौरा हुआ है। इससे पहले 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नॉर्वे का दौरा किया था। यह समिट पहले 2018 में स्टॉकहोम और 2022 में कोपेनहेगन में हो चुकी बैठकों की अगली कड़ी है, जिसमें लगातार भारत और नॉर्डिक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितताएं बढ़ी हुई हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक व्यापार में बदलावों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति पर भी असर डाला है। ऐसे हालात में नॉर्डिक देशों के साथ भारत की साझेदारी को और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक में मुख्य रूप से ग्रीन एनर्जी, रिन्यूएबल एनर्जी, डिजिटल इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लीन टेक्नोलॉजी और औद्योगिक सहयोग पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसके साथ ही व्यापार बढ़ाने, निवेश को आसान बनाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी एजेंडे में शामिल हैं। भारत और नॉर्डिक देशों के बीच वर्तमान में लगभग 19 अरब डॉलर का व्यापार होता है, जो भविष्य में और बढ़ने की संभावना है।

    नॉर्डिक क्षेत्र की कंपनियों की भारत में मजबूत उपस्थिति है, जिनमें नोकिया, वॉल्वो और IKEA जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियां शामिल हैं। वहीं भारत की ओर से फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, आईटी सेवाएं और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, नॉर्डिक देश अपने तकनीकी नवाचार, ग्रीन ट्रांजिशन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल के लिए दुनिया में अग्रणी हैं, जो भारत की विकास नीतियों के साथ मेल खाता है।

    कुल मिलाकर यह समिट भारत और नॉर्डिक देशों के बीच न केवल आर्थिक साझेदारी को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक चुनौतियों के बीच एक स्थिर और टिकाऊ सहयोग मॉडल को भी मजबूत करेगा।

  • ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट

    ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की संसद में एक ऐसे बिल पर चर्चा चल रही है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ कार्रवाई करने वालों को भारी इनाम देने का प्रावधान हो सकता है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक प्रस्ताव स्तर पर है और इस पर अंतिम वोटिंग बाकी है। इस कदम को पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव का और बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के हवाले से सामने आई जानकारी में कहा गया है कि यह प्रस्ताव हाल के सैन्य और राजनीतिक तनावों के जवाब में तैयार किया जा रहा है। कुछ सांसदों ने यह भी संकेत दिया है कि इस पर जल्द ही संसद में मतदान हो सकता है। इसी बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचे में हालिया घटनाओं को लेकर भी नाराजगी बढ़ी हुई बताई जा रही है, जिससे क्षेत्रीय हालात और संवेदनशील हो गए हैं।

    दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख देखने को मिल रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया गया है। ट्रम्प के मुताबिक कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के नेताओं ने बातचीत के लिए कुछ समय देने की अपील की थी, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार रहेगा।

    इस घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया में तनाव कई मोर्चों पर बढ़ता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बनी हुई है, जहां हजारों नाविकों के साथ बड़ी संख्या में जहाज फंसे होने की रिपोर्ट सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या टकराव से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

    इसी दौरान क्षेत्र में ड्रोन गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं की खबरों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और हवाई रक्षा को और मजबूत किया है। वहीं ईरान ने भी अपने भीतर सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज स्ट्रेट में नौवहन की स्वतंत्रता किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होनी चाहिए। UN ने सभी पक्षों से संयम बरतने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की अपील की है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर ईरान-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला दिया है, जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर सैन्य और रणनीतिक तैयारी भी तेज होती दिख रही है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन

    भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन



    नई दिल्ली। भारत अपनी रणनीतिक समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है, और ब्रिटिश थिंक टैंक IISS की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाली S5 श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियां देश की न्यूक्लियर डिटरेंस क्षमता को एक नए स्तर पर ले जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ये पनडुब्बियां भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को और ज्यादा मजबूत बनाकर दुश्मनों के लिए जवाबी हमला लगभग अटूट बना देंगी।

    भारतीय नौसेना पहले ही INS अरिहंत (S2), INS अरिघात (S3) और हाल ही में शामिल INS अरिदमन (S4) के साथ अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी क्षमता को मजबूत कर चुकी है। इन पनडुब्बियों का काम समुद्र की गहराइयों में छिपकर परमाणु मिसाइलों के जरिए लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता रखना है।

    रिपोर्टों के अनुसार INS अरिदमन का हाल ही में विशाखापत्तनम में कमीशन होना भारत की रणनीतिक शक्ति में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह पनडुब्बी INS अरिहंत और INS अरिघात के साथ मिलकर काम करेगी, जिससे भारत की समुद्री परमाणु शक्ति और मजबूत होगी।

    पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि ये महीनों तक समुद्र में बिना सतह पर आए रह सकती हैं और इन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। इसी वजह से इन्हें किसी भी देश की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” की रीढ़ माना जाता है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला हो तो जवाबी हमला निश्चित रूप से किया जा सकता है।

    डिफेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत का लक्ष्य “Continuous At-Sea Deterrence (CASD)” हासिल करना है, जिसमें हमेशा कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी समुद्र में तैनात रहे। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।

    इसके साथ ही भारत अपनी आगामी S5 श्रेणी की पनडुब्बियों पर भी काम कर रहा है, जिन्हें मौजूदा SSBN से अधिक लंबा, एडवांस और ज्यादा मिसाइल क्षमता वाला बताया जा रहा है। साथ ही विशाखापत्तनम के पास बन रहा ‘आईएनएस वर्षा’ बेस भी इन पनडुब्बियों के संचालन में अहम भूमिका निभाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इन विकासों के बाद भारत की परमाणु त्रिस्तरीय (न्यूक्लियर ट्रायड) क्षमता पूरी तरह मजबूत हो जाएगी, जिससे समुद्र के रास्ते देश की सुरक्षा रणनीति पहले से कहीं अधिक सशक्त बन जाएगी।

  • ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग

    ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) द्वारा देशभर में आम नागरिकों को हथियार चलाने और सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

    तेहरान सहित कई शहरों में कथित तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को हथियारों के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि छोटी उम्र के बच्चों को भी प्रतीकात्मक रूप से हथियार चलाने का अभ्यास कराया गया।

    इसके साथ ही ईरानी सरकारी मीडिया से जुड़े कुछ वायरल वीडियो में एंकरों को हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घटनाक्रम उस व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान अभी भी अनिश्चित स्थिति में है।

    हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों के संकेतों ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

  • मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल

    मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और शांति प्रयासों के बीच पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत लगभग 8000 सैनिकों की तैनाती की है, जिसमें लड़ाकू विमान, ड्रोन स्क्वाड्रन और वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।

    सूत्रों के अनुसार इस तैनाती में चीन के सहयोग से विकसित JF-17 Thunder लड़ाकू विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या लगभग 16 बताई जा रही है। इसके साथ ही दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 Air Defense System भी तैनात की गई है, जिसे पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि यह पूरी तैनाती सऊदी अरब के खर्च पर की जा रही है और इसे “युद्ध-सक्षम समर्थन बल” के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर और सैनिकों की तैनाती का भी प्रावधान है, जिससे यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम उस समय उठाया गया है जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्रीय शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि अब तक पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों और संभावित संघर्ष की आशंकाओं से जुड़ी हो सकती है।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित एक बड़े सैन्य हमले को फिलहाल के लिए रोक दिया है। यह हमला मंगलवार को होने वाला था, लेकिन अंतिम समय पर खाड़ी देशों के नेताओं की अपील के बाद इसे टाल दिया गया।

    ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में दोनों पक्षों के बीच गंभीर बातचीत चल रही है, इसलिए सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई ठोस समझौता नहीं होता है तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। इससे पहले ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि अगर वार्ता विफल रहती है तो युद्धविराम के कमजोर होने के बाद स्थिति गंभीर संघर्ष में बदल सकती है।

    जानकारी के मुताबिक, इस संभावित हमले को लेकर अमेरिकी सेना को पहले से तैयार रहने के निर्देश दिए गए थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य अधिकारियों से कहा था कि यदि ईरान के साथ कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तो पल भर के नोटिस पर बड़े सैन्य हमले के लिए तैयार रहें। इससे यह संकेत मिला था कि अमेरिका कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था। हालांकि यह हमला अचानक टाल दिया गया। ट्रंप ने बताया कि यह फैसला मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों—कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अपील के बाद लिया गया है।

    इससे पहले सप्ताहांत में ट्रंप ने ईरान को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के पास समय बहुत कम है और अगर समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है और युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।