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  • यमन में जेल पर एयरस्ट्राइक का दावा, 7 की मौत, हूतियों ने सऊदी अरब को ठहराया जिम्मेदार

    यमन में जेल पर एयरस्ट्राइक का दावा, 7 की मौत, हूतियों ने सऊदी अरब को ठहराया जिम्मेदार


    नई दिल्ली। यमन में सोमवार को एक जेल पर कथित हवाई हमले के बाद तनाव बढ़ गया। हूती विद्रोहियों ने इस हमले के लिए सऊदी अरब को जिम्मेदार ठहराया है। हूतियों के मुताबिक, उत्तरी यमन के जौफ प्रांत में हुए हमले में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई है, इनमें एक बच्चा भी शामिल है। वहीं, 7 अन्य लोग घायल बताए गए हैं, जिनमें एक महिला शामिल है।

    हमला जौफ प्रांत के हज्म शहर स्थित सेंट्रल करेक्टिव फैसिलिटी पर होने का दावा किया गया है। हूती संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इमारत के मलबे में 35 कैदियों और अपने पति से मिलने पहुंची एक महिला के दबे होने की आशंका है।

    हूती मीडिया ने हमले के बाद के दृश्य भी प्रसारित किए हैं। फुटेज में क्षतिग्रस्त इमारत, चारों ओर बिखरा मलबा और राहत एवं बचाव दल के सदस्य तलाशी अभियान चलाते दिखाई दे रहे हैं।

    हूती प्रवक्ता ने दी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी

    हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सरी ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब ने जौफ में एयरस्ट्राइक कर ‘नरसंहार’ किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस हमले का जवाब दिया जाएगा और सऊदी अरब को इसकी कीमत चुकानी होगी।

    सरी ने बाद में यह भी दावा किया कि पिछले 24 घंटे में हूती बलों ने सऊदी अरब के चार टोही ड्रोन मार गिराए हैं। हालांकि, इन आरोपों और दावों पर सऊदी अरब की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    कई इलाकों में आगे बढ़ रही सरकारी सेना

    जेल पर हमले के ये आरोप ऐसे समय सामने आए हैं, जब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के प्रति वफादार बल कई मोर्चों पर आगे बढ़ने का दावा कर रहे हैं। इनमें जौफ के अलावा बैदा, दहले और मारिब के इलाके शामिल हैं।

    यमन का गृहयुद्ध 2014 में उस समय शुरू हुआ था, जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को देश छोड़ना पड़ा। वर्ष 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया था।

    जेलों को पहले भी बनाया जा चुका है निशाना

    यमन के संघर्ष में जेल और हिरासत केंद्र पहले भी हवाई हमलों का शिकार हो चुके हैं। 2022 में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के एक हमले में सादा की एक डिटेंशन फैसिलिटी में कम से कम 87 कैदियों की मौत हुई थी।

    इससे पहले 2019 में धमार में हूतियों द्वारा संचालित डिटेंशन फैसिलिटी पर हमले में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

    डेढ़ लाख से ज्यादा मौतों का अनुमान

    संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक यमन के लंबे समय से जारी संघर्ष में अब तक कम से कम 1.5 लाख लोगों की जान जा चुकी है। युद्ध की वजह से देश गंभीर मानवीय और खाद्य संकट की ओर भी धकेला गया है।

    वर्ष 2022 से बड़े स्तर पर कायम युद्धविराम अब कमजोर पड़ चुका है और अलग-अलग मोर्चों पर जारी सैन्य गतिविधियों के बीच यमन में एक बार फिर तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • चीन ने खोजी नई तकनीक….परमाणु हथियार बनाने के लिए समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालने की तैयारी

    चीन ने खोजी नई तकनीक….परमाणु हथियार बनाने के लिए समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालने की तैयारी


    बीजिंग।
    चीन (China) ने एक नई तकनीक इजाद (New Technology Invented) की है, जिससे वह समुद्र के पानी से परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) बनाने के लिए यूरेनियम (Uranium) हासिल कर सकता है। चीनी शोधकर्ताओं ने इस बारे में बड़ी सफलता हासिल की है। चीन द्वारा विकसित किए गए इस नए मटीरियल से वह समुद्र से यूरेनियम निकाल पाने में सक्षम होगा। खास बात यह है कि इस मामले में चीन ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। अमेरिका, समुद्र के एक ग्राम पानी से मात्र 6 मिलीग्राम यह पदार्थ निकाल पाता था। वहीं, चीन ने एक मिलीग्राम समुद्री पानी से 50.4मिलीग्राम पदार्थ निकालने में कामयाबी हासिल की है। इस तरह से अब समुद्र का पानी, परमाणु ईंधन के लिए अहम स्रोत बन गया है।


    क्या है यह मटीरियल

    चीन समुद्री पानी से जो मटीरियल निकालने में सफल हुआ है, उसका नाम है फॉसकेज। यह एक स्पंज जैसा मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर है, जिसमें फॉस्फेट होता है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रासायनिक जाल की तरह काम करते हैं। शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के दौरान फॉसकेज को मिलीमीटर-साइज के बीड्स (छोटी गोलियों) में बदल दिया। इन्हें खुले समुद्र में इस्तेमाल करना और वापस निकालना आसान है। इन बीड्स ने प्रति ग्राम 22.55मिलीग्राम यूरेनियम सोखा और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने पर भी काम करते रहे।


    क्या हैं इसके मायने

    चीन के लिए यह तकनीक बहुत ज्यादा मायने रखती है। इससे चीन के घरेलू यूरेनियम प्रोडक्शन में तेजी से इजाफा होगा। चीन ने साल 2024 में घरेलू खदानों से 1600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया। हालांकि वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक चीन को इससे कहीं ज्यादा 13,000 टन यूरेनियम की जरूरत है। इस भारी गैप को पूरा करने के लिए चीन आयात पर निर्भर था। ऐसे में समुद्र के पानी से यूरेनियम की पूर्ति होने से चीन का काम काफी आसान हो जाएगा।


    समुद्र के पानी में कैसे पहुंचा यूरेनियम

    गौरतलब है कि पूरी दुनिया में धरती पर 7.9 मिलियन टन यूरेनियम के ज्ञात स्रोत हैं। वहीं, समुद्र में यह आंकड़ा 4.5 बिलियन टन का हो सकता है। यह यूरेनियम समुद्र के पानी में बारिश के वक्त चट्टानों से धुलकर नदियों के रास्ते पहुंचा है। यह यूरेनियम है तो बहुत बड़ी मात्रा में, लेकिन इसे समुद्र के पानी निकालना बहुत बड़ी चुनौती है। एक टन समुद्री पानी में मात्र 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम होता है। यानी, समुद्र के पानी से यूरेनियम प्रॉसेस करने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में इसके पानी की जरूरत होगी।


    क्या हैं चुनौतियां

    ऐसा नहीं है कि समुद्र के पानी में केवल यूरेनियम ही है। इसमें और भी बहुत सारी चीजें घुली हुई हैं। ऐसे में यूरेनियम को समुद के पानी से अलग करना बहुत बड़ी चुनौती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं इस चुनौती से पार पाने के लिए कई साल मेहनत की। ओक रिज नेशनल लैबोरेट्री ने स्पेशलाइज्ड फाइबर्स डिजाइन किए। इसकी मदद से यूरेनियम कैप्चर किया जाता था। वहीं, पैसेफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेट्री ने प्राकृतिक रूप से बहते समुद्री पानी के ऊप्र इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया। हालांकि इतनी कवायदों के बावजूद यह लोग एक ग्राम समुद्री पानी से मात्र 6 मिलीग्राम यूरेनियम ही निकाल पाते थे।

  • ईरान का ये स्कूल बनेगा मेमोरियल… अमेरिका-इजराइल के हमले में यहां मारे गए थे सैकड़ों बच्चे

    ईरान का ये स्कूल बनेगा मेमोरियल… अमेरिका-इजराइल के हमले में यहां मारे गए थे सैकड़ों बच्चे


    मिनाब।
    यह परिसर फिर कभी स्कूल (School) नहीं बनेगा, लेकिन इसके चमकीले नीले गेट (Bright Blue gate) पर अब भी वे चित्र (ईरान का नक्शा, बड़े आकार की पेंसिल और विज्ञान एवं साहित्य की महान हस्तियों की तस्वीरें) बने हुए हैं, जो कभी बच्चों का स्वागत करते थे। लेकिन अब इसके आगे का रास्ता आगंतुकों को तस्वीरों की कतारों से अवगत कराता है। इनमें जन्मदिन की पार्टियों और अन्य मौकों पर व्यस्त बच्चे दिखाई देते हैं। लेकिन इसके बाद उन्हीं मासूम चेहरों को शोक के प्रतीक काले बैनरों पर देखा जा सकता है। यह उस स्कूल के उन बच्चों की याद में बनाया जा रहा स्मारक है, जो 28 फरवरी को अमेरिका (America) और इजराइल (Israel) द्वारा ईरान (Iran) में शुरू किए गए युद्ध के शुरुआती क्षणों में हुए हमले में मारे गए थे। हमलों में मिनाब स्थित शाजरेह तैयबेह स्कूल (Shajrah-e-Tayyibah School) भी निशाना बना था।


    100 छात्र मारे गए थे

    ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि 100 से अधिक छात्र मारे गए। महीनों बाद भी ट्रंप प्रशासन ने न तो सीधे तौर पर इस हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की है और न ही पेंटागन की जांच के निष्कर्ष जारी किए हैं। हालांकि, समाचार एजेंसी ‘एपी’ की एक जांच में इस बात के सबूत मिले कि कम से कम एक अमेरिकी मिसाइल स्कूल पर गिरी थी। पिछले सप्ताह एक बार फिर मिनाब का ध्यान उस समय आकर्षित हुआ, जब ईरान के दक्षिणी तट पर अमेरिका के नए हमलों में एक शादी समारोह और अन्य इलाकों को निशाना बनाया गया। घायलों में से कुछ को स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। ‘एपी’ की टीम ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त दो मंजिला इमारत का दौरा किया, जिसकी कक्षाएं मानो पढ़ाई के बीच ही जम गई हों। वहां ‘डेस्क’ आधे मलबे में दबी हुई हैं और छतें ढह चुकी हैं।


    थम नहीं रही ईरान-अमेरिका की जंग

    उधर ईरान और अमेरिका के बीच लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने तीन ईरानी कच्चे तेल के टैंकरों पर उस समय हमला किया जब ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने क्षेत्रीय जलक्षेत्र में गश्त कर रहे अमेरिकी नौसेना के दो युद्धपोतों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इस घटना से फारस की खाड़ी और उसके आसपास के क्षेत्रों में नौवहन और ज्यादा बाधित हो सकती है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कहा कि एक अमेरिकी विमानवाहक पोत और निर्देशित-मिसाइल विध्वंसक ने ईरान के कई अकारण हमलों से सफलतापूर्वक बचाव किया और किसी भी अमेरिकी कर्मी को नुकसान नहीं पहुंचा।


    सेंटकॉम ने क्या कहा

    सेंटकॉम ने कहा कि ईरान के नाकाम हमलों के बाद, सेंटकॉम ने खार्ग द्वीप के पास और जास्क के पास आईआरजीसी के कच्चे तेल के टैंकरों को हमेशा के लिए बेकार कर दिया। अमेरिकी सेना ने ओमान की खाड़ी में बिना लदे कच्चे तेल के टैंकर को भी नष्ट कर दिया। चालक दल को जहाज छोड़ने का निर्देश देने के बाद, जहाज को बेकार करने के लिए कई अहम जगहों पर हमला किया गया। सेंटकॉम ने आगे कहा कि ईरान के ये तीन कच्चे तेल के टैंकर एक ऐसे अरबों डॉलर के ‘शैडो नेटवर्क’ का हिस्सा हैं, जो आईआरजीसी और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को फंड देता है। ईरान के पास इनकी सुरक्षा का कोई माध्यम नहीं है।


    आईआरजीसी को यह साफ संदेश

    सेंटकॉम कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने कहा कि आईआरजीसी को यह साफ संदेश जाना चाहिए कि अगर आप हमारे दो जहाज़ों पर गोली चलाते हैं, तो हम आपके तीन जहाजों को नष्ट करके आप पर और भी भारी आर्थिक बोझ डालेंगे। हम अमेरिकी सेना की रक्षा करने में पीछे नहीं हटेंगे और ज़रूरत पड़ने पर ईरान के सीमित और खुले तेल बेड़े को नष्ट कर देंगे। अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सोशल मीडिया पर कहा कि अगर ईरान ने अमेरिकी जहाजों पर हमला किया तो अमेरिका ईरानी तेल टैंकरों को निशाना बनाना जारी रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना मध्य पूर्व या हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ईरानी टैंकरों पर हमला कर सकती है।

  • APEC समिट में पहुंचेंगे पुतिन और ट्रंप…. रूस-अमेरिका-चीन के बीच हो सकती है त्रिपक्षीय बैठक

    APEC समिट में पहुंचेंगे पुतिन और ट्रंप…. रूस-अमेरिका-चीन के बीच हो सकती है त्रिपक्षीय बैठक


    मॉस्को।
    एपेक शिखर सम्मेलन (APEC Summit) के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हो सकती है। रूसी समाचार एजेंसी TASSS ने रविवार को बताया कि एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (Asia-Pacific Economic Cooperation- APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने अमेरिकी समकक्ष डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात कर सकते हैं। क्रेमलिन ने यह भी स्पष्ट किया है कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं की त्रिपक्षीय बैठक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    क्रेमलिन के सहयोगी यूरी उशाकोव ने कहा कि पुतिन और ट्रंप दोनों एपेक शिखर सम्मेलन में भाग लेने की योजना बना रहे हैं। मॉस्को रूसी राष्ट्रपति के लिए अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें आयोजित करने का प्रयास करेगा, जिनमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात भी शामिल है।

    उशाकोव ने कहा कि सभी नेता एपेक शिखर सम्मेलन में भाग लेने की योजना बना रहे हैं। स्वाभाविक रूप से हम अपने नेता के लिए अलग बैठकें आयोजित करने का प्रयास करेंगे, जिनमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक भी शामिल है। और अगर अवसर मिला, तो हमारे नेता अमेरिका के राष्ट्रपति से भी मिलेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पुतिन-ट्रंप मुलाकात होती है, तो बातचीत का विषय बैठक की अवधि पर निर्भर करेगा।

    इस बीच उप विदेश मंत्री सर्गेई रियाबकोव ने कहा कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं की त्रिपक्षीय बैठक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि ऐसी बैठक की तैयारी अभी शुरू नहीं हुई है। रियाबकोव ने TASSS से कहा कि यह विचार मौजूद है और इसे सार्वजनिक मंच पर रखा जा चुका है। हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि यह तैयारी के चरण में आगे बढ़ रहा है।

    उन्होंने जोर दिया कि मुख्य प्रश्न ऐसी बैठक का ठोस एजेंडा और अपेक्षित परिणाम तय करना होगा। उन्होंने कहा कि यहां भी मुख्य प्रश्न यही है कि ठोस पक्ष को कैसे तैयार किया जाएगा और हम परिणाम के रूप में क्या अपेक्षा कर सकते हैं। रियाबकोव ने आगे कहा कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं वाला त्रिपक्षीय प्रारूप अभी व्यवहार में नहीं आया है। उन्होंने किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर फिलहाल कुछ और जोड़ने से इनकार कर दिया।

    वहीं, अमेरिका-रूस राजनयिक संपर्क के संदर्भ में क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने रविवार को कहा कि राष्ट्रपति पुतिन की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के साथ मुलाकात ने संचार के इस माध्यम से विश्वास का माहौल दर्शाया है। पेस्कोव ने आगे कहा कि बैठक का होना ही इस बात का प्रमाण है कि कम से कम संचार के इस माध्यम से विश्वास का माहौल मौजूद है और यह मजबूत हो रहा है।

  • बांग्लादेश HC से हिंदू नेता चिन्मय दास को दो और मामलों में दी जमानत… पर अभी जेल से नहीं आ पाएंगे बाहर!

    बांग्लादेश HC से हिंदू नेता चिन्मय दास को दो और मामलों में दी जमानत… पर अभी जेल से नहीं आ पाएंगे बाहर!


    ढाका।
    बांग्लादेश हाई कोर्ट (Bangladesh High Court) ने रविवार को जेल में बंद हिंदू अधिकार नेता (Hindu rights leader) चिन्मय कृष्ण दास (Chinmoy Krishna Das) को दो और मामलों में जमानत दे दी, लेकिन अन्य मामलों में आरोपों का सामना कर रहे दास के जेल से बाहर आने की संभावना नहीं है। स्थानीय मीडिया ने यह जानकारी दी। दास को पिछले महीने भी दो मामलों में जमानत मिली थी, जिनमें तोड़फोड़, हमला और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप से जुड़े मामले शामिल थे।

    दास को नवंबर 2024 में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन पर राष्ट्रीय ध्वज का कथित रूप से अपमान करने का आरोप था, जिसके बाद विरोध-प्रदर्शन और सांप्रदायिक तनाव शुरू हो गया था। इसके बाद उनके खिलाफ कई अन्य मामले दर्ज किए गए, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास और तोड़फोड़ के आरोप शामिल हैं।

    न्यायमूर्ति के.एम. जाहिद सरवर और न्यायमूर्ति शेख अबू ताहेर की पीठ ने रविवार को तोड़फोड़ और पुलिस के काम में बाधा डालने से जुड़े दो मामलों में उन्हें जमानत दी। एक समाचार पोर्टल ने उनके वकील अपूर्व कुमार भट्टाचार्य के हवाले से बताया कि दास के खिलाफ कुल छह आपराधिक मामले हैं और अब उन्हें इनमें से चार मामलों में उच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है।

    हालांकि, ‘द बिजनेस स्टैंडर्ड’ न्यूज पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार, उन पर चल रहे दूसरे मामलों की वजह से उन्हें तुरंत रिहा नहीं किया जाएगा। देशद्रोह के मामले में उनकी जमानत पर रोक लगी हुई है, जबकि हत्या के मामले में सुनवाई चटगांव के ‘त्वरित सुनवाई न्यायाधिकरण’ में हो रही है। हत्या का यह मामला एक ऐसी घटना से जुड़ा है, जिसमें सरकारी वकील सैफुल इस्लाम अलीफ की हत्या कर दी गई थी। दक्षिण-पूर्वी बंदरगाह शहर चटगांव में दास की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे लोगों ने उनकी हत्या कर दी थी।

    उस समय भारत ने हिंदू संत की गिरफ्तारी पर ‘गहरी चिंता’ जताई थी और ढाका से ‘हिंदुओं समेत सभी अल्पसंख्यकों’ की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा था। यह घटना ऐसे समय में हुई, जब अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास आ गई थी – जिसकी वजह नई दिल्ली में उनका शरण लेना था। दास, जो पहले ‘इस्कॉन’ से जुड़े थे, ‘हिंदू सम्मिलित सनातन जागरण जोत’ नामक एक समूह के प्रवक्ता हैं।

  • सूडान में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप, गोपनीय दस्तावेजों में सेना पर क्लोरीन गैस हमलों की गंभीर जानकारी सामने आई

    सूडान में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप, गोपनीय दस्तावेजों में सेना पर क्लोरीन गैस हमलों की गंभीर जानकारी सामने आई

    नई दिल्ली । तपते रेगिस्तान में चोरी-छिपे बम परीक्षण, हथियारों की सीक्रेट फैक्टरी के फर्श पर दम घुटने से मरे पड़े बिच्छू और कीड़े-मकोड़े, और जंग के बीच राजधानी खारतूम के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से क्लोरीन के बड़े-बड़े सिलिंडरों की चोरी…गोपनीय डोजियर से सामने आई ऐसी कुछ जानकारियां सूडान सरकार के इन दावों को नकारने के लिए काफी है कि उसने गृह युद्ध के दौरान रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया।

    खुफिया रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    सूडान में पिछले तीन साल से जारी खूनी गृहयुद्ध के बीच एक पश्चिम एशियाई खुफिया एजेंसी की ओर से जुटाए गए 150 से अधिक दस्तावेजों, वीडियो, तस्वीरों और हजारों इंटरसेप्टेड फोन कॉल्स से चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इससे पता चलता है कि सूडानी सेना ने अपने खिलाफ मोर्चा खोलने वाली रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) को पस्त करने के लिए 2024 में बड़े पैमाने पर क्लोरीन गैस आधारित रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया था। इस केमिकल प्रोजेक्ट की कमान ब्रिगेडियर जनरल तारिक हुसैन के हाथों में थी।

    पारंपरिक वॉरहेड के साथ क्लोरीन का उपयोग

    लीक ब्लूप्रिंट के अनुसार, पारंपरिक वॉरहेड के साथ 33 पाउंड क्लोरीन गैस का इस्तेमाल किया गया। योजना यह थी कि धमाके के छर्रों से दुश्मन घायल हो और बची-खुची जान जहरीली गैस ले लेगी। साथ ही धमाके के चलते मौके पर केमिकल के सबूत भी नष्ट हो जाएंगे।

    राहत एजेंसियों की मदद का किया दुरुपयोग

    राजधानी खारतूम पर जब आरएसएफ का कब्जा होने लगा, तो जुलाई 2024 में जनरल तारिक ने सेना को क्लोरीन बम बनाने का सुझाव दिया। सेना ने ओमडुरमैन स्थित अल-मनारा वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट से बड़े पीले सिलिंडर जब्त किए। विडंबना यह है कि युद्धग्रस्त इलाकों में हैजा महामारी को रोकने और पानी साफ करने के लिए ये सिलिंडर अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों ने दान में दिए थे। अगस्त 2024 में जनरल हुसैन के भेजे एक संदेश से पता चलता है कि मिस्र से 20 क्लोरीन सिलिंडर मंगवाए गए थे, जो 1,100 रासायनिक बम बनाने के लिए पर्याप्त थे।

    सेना प्रमुख ने दिए सबूत मिटाने के निर्देश

    अमेरिकी प्रशासन ने कुछ सबूतों के आधार पर जनवरी 2025 से सूडानी सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान पर कड़े प्रतिबंध लगाने शुरू किए थे। अब सामने आए डोजियर से साफ हुआ है कि जनरल बुरहान को इस पूरे प्रोजेक्ट की सीधी जानकारी थी और उन्होंने अमेरिकी खुलासे के बाद इसके सभी सबूत मिटाने के निर्देश दिए थे।

    दुश्मनों ने पी ली जहरीली गैस…सच कैसे सामने आया?

    अक्तूबर 2024 तक मेरोवे एयरपोर्ट के बेस पर करीब 300 केमिकल बम तैयार करके रख दिए गए थे। 22 जुलाई 2024 को मेरोवे एयरपोर्ट से एंटोनोव विमान ने उड़ान भरी और रेगिस्तान में पहला सफल टेस्ट किया। लीक डोजियर से पता चलता है कि उसी समय जनरल हुसैन ने मैसेज भेजा था, परीक्षण 100% सफल रहा, बम निशाने पर गिरा और गैस फैल गई। सितंबर 2024 को अल-जैली तेल रिफाइनरी पर रासायनिक हमला किया गया। हुसैन के इंटरसेप्ट किए गए संदेश में लिखा था, उन्होंने गैस पी ली है। उस समय सोशल मीडिया पर विद्रोहियों को ऑक्सीजन मास्क पहने देखा गया था।

    सबूत मिटाने का खेल

    मई 2025 में जब अमेरिका ने रासायनिक हथियारों के संदेह पर सूडान पर प्रतिबंध लगाए, तो सेना प्रमुख जनरल बुरहान ने तुरंत जनरल हुसैन को मैसेज भेजकर सबूत मिटाने का फरमान सुनाया। जवाब मिला. ऑपरेशन एक महीने पहले ही पूरा कर दिया गया है। बाद में दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए बुरहान ने आरोपों की जांच के लिए एक आंतरिक कमेटी गठित की। इसका मुख्य सलाहकार ब्रिगेडियर जनरल तारिक हुसैन को ही बना दिया गया।

  • आसिम मुनीर को मिली तीनों सेनाओं की कमान, नए कानून से पाकिस्तान में सेना प्रमुख की ताकत और सैन्य ढांचे में बड़ा बदलाव

    आसिम मुनीर को मिली तीनों सेनाओं की कमान, नए कानून से पाकिस्तान में सेना प्रमुख की ताकत और सैन्य ढांचे में बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की संसद ने देश के इतिहास में पहली बार एक ही सैन्य अधिकारी को सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों की कमान सौंपी है। इससे उन्हें अभूतपूर्व कानूनी ताकत मिली है। अगस्त के अंत में नेशनल असेंबली ने डिफेंस फोर्सेस ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026 पारित कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) का नया पद बनाया। नए कानून के तहत फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को देश का पहला सीडीएफ नियुक्त किया गया। वह अपने मौजूदा सेना प्रमुख के पद के साथ नई जिम्मेदारी को भी संभालेंगे।

    1976 के बाद पाकिस्तानी सैन्य कमान में सबसे बड़ा बदलाव

    सीडीएफ के पद के साथ मुनीर पाकिस्तान में और ताकतवर बनकर उभरे हैं। 1976 के बाद से यह पाकिस्तानी सैन्य कमान में सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव माना जा रहा है। इससे पहले 1976 में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद बनाया गया था, लेकिन उसके पास नौसेना या वायुसेना को संचालित करने की कोई औपचारिक कानूनी ताकत नहीं थी। पुराने पद का काम सिर्फ तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बिठाना था और उसका नौसेना या वायुसेना पर कोई अधिकार नहीं था। इसके उलट सीडीएफ के पास तीनों सेनाओं पर कानूनी ऑपरेशनल कमांड है। यह सीधे सरकार को रिपोर्ट करेगा और इसके पास ऐसे फैसले लागू करने की शक्ति है जो पुराने पद के पास कभी नहीं थी।

    परमाणु कमान पर सिर्फ सेना के पास

    नए नियमों के अनुसार, परमाणु बलों की कमान का पद अब कानूनी रूप से केवल सेना के पास होगा। विश्लेषक मजीद निजामी का कहना है कि इस बदलाव से नौसेना और वायुसेना के लिए वह भूमिका औपचारिक रूप से खत्म हो गई है।

    संशोधन पर तीखी बहस

    इस संशोधन पर पाकिस्तान के अंदर तीखी बहस छिड़ गई है। समर्थकों का तर्क है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्धक तैयारियों में मजबूती आएगी। रावलपिंडी के सेवानिवृत्त जनरल नईम खालिद लोधी और सुप्रीम कोर्ट के वकील हाफिज अहसान अहमद खोखर जैसे समर्थकों का मानना है कि यह ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसी पश्चिमी प्रणालियों की तर्ज पर प्रधानमंत्री से लेकर जमीनी इकाइयों तक बेहतर समन्वय, साइबर-ड्रोन अभियानों में तेजी और संकट के समय त्वरित निर्णय लेने के लिए एक वैध कदम है। वहीं आलोचकों की चिंता है कि यह कदम देश के संविधान और नागरिक नियंत्रण के संतुलन को कमजोर करेगा तथा सेना के प्रभाव को और अधिक स्थायी बनाता है। अब्दुल मोइज जाफेरी और कर्नल इनाम रहीम जैसे आलोचकों का तर्क है कि इससे एक सेवा प्रमुख दूसरे के अधीन हो गया है और सीडीएफ को अब कैबिनेट की मंजूरी के बिना केवल एक पत्र के जरिये अधिकारियों को बर्खास्त करने की शक्ति मिल गई है।

  • सिंगापुर में भारतीयों पर घटिया और नस्ली टिप्पणियां….. सरकार ने दिए जांच के आदेश

    सिंगापुर में भारतीयों पर घटिया और नस्ली टिप्पणियां….. सरकार ने दिए जांच के आदेश


    सिंगापुर।
    सिंगापुर (Singapore ) के गृह मंत्री के. शनमुगम (Home Minister K. Shanmugam) ने भारतीयों (Indians) को लेकर इंटरनेट पर की जा रही नस्ली और आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि चीन-नेपाल (China-Nepal) में आई भीषण बाढ़ और एयर इंडिया (Air India) में सिंगापुर एयरलाइंस (Singapore Airlines- SIA) के निवेश से जुड़े मामलों को लेकर कुछ लोगों ने बेहद घटिया और नस्ली टिप्पणियां की हैं। शनमुगम ने कहा कि उन्होंने पुलिस से इन टिप्पणियों की जांच करने को कहा है। उनका कहना था कि ऐसे लोगों को इंटरनेट की गुमनामी के पीछे छिपने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि उनकी पहचान कर कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने इन टिप्पणियों को शर्मनाक, घटिया और पूरी तरह अस्वीकार्य बताया।

    शनमुगम ने कहा कि नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद जब कई सिंगापुरवासी लापता हैं, तब भी सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ नस्ली टिप्पणियां की गईं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कुछ लोगों ने लापता सिंगापुरवासियों को लेकर भी बेहद आपत्तिजनक बातें लिखीं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब 1000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और कई लोग अब भी लापता हैं। शनमुगम ने कहा कि ज्यादातर सिंगापुरवासी ऐसी सोच नहीं रखते। उन्होंने बताया कि सिंगापुर रेड क्रॉस ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए 30 लाख सिंगापुर डॉलर से ज्यादा जुटाए हैं। सिंगापुर के लोग अलग-अलग समुदायों से होने के बावजूद जरूरत के समय एक-दूसरे और दूसरे देशों के लोगों की मदद करते हैं।


    एयर इंडिया से जुड़ा क्या है मामला

    एयर इंडिया में सिंगापुर एयरलाइंस के निवेश को लेकर भी सोशल मीडिया पर भारतीयों के खिलाफ नस्ली टिप्पणियों की नई लहर देखने को मिली। शनमुगम ने कहा कि कुछ लोगों ने भारतीयों को लेकर सांप, करी, पराठा और काले जादू जैसी टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर टेमासेक के सीईओ और सीनियर अधिकारियों को भी उनकी जातीय पहचान के आधार पर निशाना बनाया। यह कहना कि किसी अधिकारी की भारतीय मूल की वजह से वह एयर इंडिया के पक्ष में फैसला करेगा, गलत और बदनाम करने वाली बात है।

    के. शनमुगम ने जोर देकर कहा कि संबंधित अधिकारी सिंगापुर में पैदा हुए, वहीं पढ़े और पूरी तरह सिंगापुरवासी हैं। किसी व्यक्ति को उसकी जातीय पहचान के आधार पर निशाना बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। एयर इंडिया की ओर से अपने शेयरधारकों से करीब 1.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी मांगे जाने की खबरों के बीच सिंगापुर एयरलाइंस को निवेश पर फैसला करना है। शनमुगम ने साफ कहा कि एयर इंडिया में निवेश जारी रखना है या नहीं, इसका फैसला सिंगापुर एयरलाइंस के निदेशक मंडल और मैनेजमेंट को करना चाहिए।

  • फिर आ गई 9/11 की बरसी…. 25 साल में US में बहुत कुछ बदल गया.. मगर मुस्लिमों की छवि जस की तस

    फिर आ गई 9/11 की बरसी…. 25 साल में US में बहुत कुछ बदल गया.. मगर मुस्लिमों की छवि जस की तस


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) अगले हफ्ते 9/11 हमले की 25वीं बरसी मनाएगा। इस लंबी अवधि ने बहुत कुछ बदल दिया है। लेकिन आज भी अमेरिकी समाज (American Society) में मुस्लिमों की छवि नहीं बदल पाई है। प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) के सर्वे के मुताबिक, 51% अमेरिकी अब भी मुस्लिमों को संदेह की नजर से ही देखते हैं। अमेरिका में मुस्लिम आबादी, मस्जिदों की संख्या बढ़ी है और राजनीतिक स्तर पर भी समुदाय की सक्रियता बढ़ी है। लेकिन हिंसक समुदाय होने की उसकी छवि जस की तस बनी है।

    प्यू रिसर्च सेंटर अमेरिका में मुस्लिमों की स्थिति, अमेरिकियों की सोच और खुद मुस्लिमों की राय पर समय-समय पर सर्वे करता रहा है। इस साल के सर्वे में 43% अमेरिकी वयस्कों ने माना कि मुसलमान अन्य नागरिकों की तुलना में कम देशप्रेमी हैं, जबकि 42% का मानना था कि अमेरिकी मुसलमानों का देश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसके पीछे 9/11 का खौफ साफ झलकता है। एफबीआई के मुताबिक, 2001 में मुस्लिमों के खिलाफ घृणा अपराध मामले 481 तक पहुंच गए थे, जो 2000 में मात्र 28 थे। तबसे इनमें उतार-चढ़ाव आता रहा है (2021 में 95 थे और 2016 में 307) लेकिन आंकड़ा 9/11 से पूर्व के स्तर पर नहीं लौट सका। डेमोक्रेट्स की तुलना में रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े लोग अधिकतर यह राय रखते हैं कि मुस्लिम धर्म को मानने वाले अधिक हिंसक होते हैं।


    ढाई दशक में 38% से कम नहीं रही नकारात्मक प्रक्रिया

    अल-कायदा के हमलों के महज छह महीने बाद मार्च 2002 में, 25% अमेरिकी वयस्कों का कहना था कि मुस्लिम के अन्य धर्मों के लोगों की तुलना में हिंसा को बढ़ावा मिलने की संभावना अधिक होती है। इसके बाद 11 अलग-अलग सर्वे में यह आंकड़ा कभी 38% से कम नहीं हुआ। पिछले एक दशक में यह 45% से 52% के बीच बना रहा है।

    इस साल की शुरू में एक सर्वे में शामिल लगभग आधे (51%) अमेरिकी वयस्कों ने कहा कि मुस्लिम हिंसा को अधिक बढ़ावा देते हैं। अमेरिका में मुस्लिम समुदाय की आबादी और मस्जिदों की संख्या पिछले वर्षों में बढ़ी है। वर्ष 2007 में अमेरिका में करीब 24 लाख मुस्लिम थे, जबकि अब यह संख्या बढ़कर 55 लाख हो गई है। इसी तरह, वर्ष 2000 में अमेरिका में करीब 1,200 मस्जिदें थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर 2,800 हो गई है।


    मुस्लिमों का अमेरिका पर प्रभाव

    42% काफी नकारात्मक
    17% थोड़ा नकारात्मक
    40% कोई प्रभाव नहीं

    मुस्लिमों ने कहा भेदभाव होता है
    2026 - 59%
    2017  - 48%
    2011 - 43%
    2007 - 40%


    अमेरिकियों के साथ तुलना

    43% कम देशभक्त
    4% अधिक देशभक्त
    51% न कम न ज्यादा


    टीवी-फिल्मों में गलत छवि दिखाई जा रही

    2026- 59%
    2017- 60%
    2011- 55%
    2007- 57%
    2026-  34%
    2017-  49%
    2011-  37%
    2007-  32%

  • ग्रीस में F-4 फाइटर जेट क्रैश…. एयर शो में करतब दिखाते समय हुआ हादसा, दोनों पायलटों की मौत

    ग्रीस में F-4 फाइटर जेट क्रैश…. एयर शो में करतब दिखाते समय हुआ हादसा, दोनों पायलटों की मौत


    एथेन्स।
    ग्रीस (Greece) में शनिवार, 5 सितंबर को एयर शो (Air Show) के दौरान दो सीटों वाला F-4 फैंटम फाइटर जेट (F-4 Phantom Fighter Jet) क्रैश हो गया. इस हादसे में विमान में सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई. सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में फाइटर जेट को नीचे गिरते हुए देखा गया. इसके बाद आसमान में काले धुएं का गुबार उठता दिखाई दिया. यह घटना एयर शो देखने पहुंचे दर्शकों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर हुई।

    यह हादसा एथेंस के उत्तर में स्थित तानाग्रा एयर बेस पर हुआ, जहां एयर शो आयोजित किया जा रहा था. रॉयटर्स ने लेन के लेआउट, आसपास के इंफ्रास्ट्रक्चर और पहाड़ों के आधार पर घटना की जगह की पुष्टि की, जो आर्काइव और सैटेलाइट तस्वीरों से मेल खाते थे. घटना की तारीख की पुष्टि फाइल के मेटाडेटा और इलाके में विमान हादसे की रिपोर्ट से की गई।

    एयर बेस पर लगे लाउडस्पीकर के जरिए लोगों से इलाके को छोड़ने की अपील की जा रही थी. क्रैश हुआ F-4 विमान एथेंस फ्लाइंग वीक में हिस्सा ले रहा था. यह एक वार्षिक कार्यक्रम है, जिसमें कई देशों की सैन्य और नागरिक विमानन टीमें हिस्सा लेती हैं।

    ग्रीस के एयरफोर्स अधिकारियों के मुताबिक, रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान दोनों पायलटों के शव बरामद कर लिए गए. यह अभियान शुरुआती दौर में तानाग्रा एयरफोर्स बेस के परिसर में लगी आग के कारण प्रभावित हुआ था. यह एयरबेस एथेंस से करीब 60 किलोमीटर उत्तर में स्थित है.

    आग पर काबू पाने के लिए 85 दमकलकर्मियों के साथ 11 पानी गिराने वाले विमान और हेलीकॉप्टर लगाए गए थे. आग एथेंस फ्लाइंग वीक में दर्शकों के लिए बनाए गए क्षेत्र से कुछ दूरी पर थी.हादसे के बाद आयोजकों ने सप्ताहांत में होने वाले बाकी सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए. वहीं, एयरबेस के पास के एक इलाके में लगी आग के कारण लोगों को वहां से निकलने का आदेश भी दिया गया था।