Category: International

  • 5 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोपी भारत में गिरफ्तार, अमेरिका के मोस्ट वॉन्टेड फ्रॉड पर था 1.25 करोड़ का इनाम

    5 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोपी भारत में गिरफ्तार, अमेरिका के मोस्ट वॉन्टेड फ्रॉड पर था 1.25 करोड़ का इनाम


    नई दिल्ली। अमेरिकी सरकारी योजनाओं में करीब 6 लाख डॉलर यानी लगभग 5 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के आरोपी मंजीत सिंह बेदी को भारत में गिरफ्तार किया गया है। अमेरिका की जांच एजेंसी FBI की मोस्ट वॉन्टेड सूची में शामिल बेदी की गिरफ्तारी पर 1.5 लाख डॉलर यानी करीब 1.25 करोड़ रुपए का इनाम घोषित था।

    FBI निदेशक काश पटेल ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बेदी की गिरफ्तारी की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि माना जा रहा है कि बेदी पिछले साल अमेरिका से भागकर भारत पहुंचा था। FBI अब उसे अमेरिका वापस लाने की प्रक्रिया पर काम कर रही है।

    पटेल के मुताबिक करीब तीन महीने पहले नई मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट जारी होने के बाद गिरफ्तार किया गया बेदी पांचवां बड़ा जालसाज है। उनके अनुसार अब तक पकड़े गए इन आरोपियों पर सामूहिक रूप से 2 अरब डॉलर से ज्यादा की धोखाधड़ी का आरोप है। ये आरोपी गिरफ्तारी से पहले कुल मिलाकर करीब 4000 दिनों तक फरार रहे थे।

    किराना स्टोर की आड़ में SNAP कार्ड से फ्रॉड

    FBI के मुताबिक मंजीत सिंह बेदी वॉशिंगटन के टैकोमा में एक छोटी किराना दुकान चलाता था। आरोप है कि उसने अमेरिका के ‘सप्लीमेंटल न्यूट्रिशन असिस्टेंस प्रोग्राम’ यानी SNAP के तहत मिलने वाले सरकारी बेनिफिट कार्ड का गलत इस्तेमाल किया।

    जांच एजेंसी के अनुसार बेदी ग्राहकों के SNAP कार्ड से रकम काट लेता था, लेकिन उसके बदले उन्हें राशन देने के बजाय नकद पैसे देता था। इस लेनदेन में वह कुल रकम का करीब आधा हिस्सा अपने पास रख लेता था।

    FBI का आरोप है कि मार्च 2024 से जून 2025 के बीच बेदी ने अमेरिकी सरकार को कम से कम 6 लाख डॉलर का नुकसान पहुंचाया। उसके खिलाफ वायर फ्रॉड और SNAP बेनिफिट्स फ्रॉड समेत कई आरोप दर्ज किए गए हैं।

    पासपोर्ट जमा करने के आदेश के बावजूद भागा

    मामला दर्ज होने के बाद अदालत ने बेदी को तत्काल गिरफ्तार करने के बजाय तय शर्तों पर बाहर रहने की अनुमति दी थी। उसे अपना पासपोर्ट जमा करने और वॉशिंगटन राज्य की सीमा में रहने का आदेश दिया गया था।

    हालांकि, आरोप है कि बेदी इन शर्तों का उल्लंघन कर कार से कनाडा की सीमा पार कर गया। इसके बाद वह कनाडा से भारत पहुंच गया। उसके फरार होने के बाद अमेरिकी जिला अदालत ने 21 मई को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था। अब भारत में उसकी गिरफ्तारी के बाद FBI उसे अमेरिका वापस लाने की प्रक्रिया में जुटी है।

  • दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत

    दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत


    नई दिल्ली। कभी बढ़ती आबादी को दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। आशंका थी कि लगातार बढ़ते इंसानों के दबाव में धरती के संसाधन कम पड़ जाएंगे। लेकिन अब जनसंख्या को लेकर तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया के 64 देश और क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आबादी अपने उच्चतम स्तर यानी ‘पीक पॉपुलेशन’ को पार कर चुकी है और अब लगातार घट रही है। यह बदलाव किसी महामारी, युद्ध या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली, परिवार और बच्चों को लेकर बदलती सोच का परिणाम है।

    इन 64 देशों में केवल छोटे या संकटग्रस्त देश ही नहीं हैं। चीन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था भी इस बदलाव का सामना कर रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला चीन अपने जनसंख्या शिखर को पार कर चुका है और अब वहां आबादी हर साल कम हो रही है। दक्षिण कोरिया में फर्टिलिटी रेट करीब 0.72 रह गई है। मौजूदा रुझान जारी रहा तो इस सदी के अंत तक उसकी आबादी आधे से भी कम रह सकती है। जापान और थाईलैंड भी इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं।

    कौन-कौन से देश आबादी के शिखर से आगे निकल चुके?

    महाद्वीपों के हिसाब से देखें तो पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड इस चरण में पहुंच चुके हैं।

    यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया की आबादी अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी है। कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स जैसे क्षेत्र भी इस सूची में शामिल हैं।

    यूरोप और जापान इस बदलाव को काफी पहले महसूस करना शुरू कर चुके थे। जापान में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का असर बाजार तक में दिखाई देता है। वहां बच्चों के खिलौनों और डायपर की तुलना में बुजुर्गों के डायपर की बिक्री अधिक हो गई है। बच्चों की संख्या घटने से हजारों स्कूल बंद हो चुके हैं। पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों की ओर पलायन भी आबादी घटने की बड़ी वजह है।

    2.1 बच्चे भी नहीं हो रहे पैदा

    किसी देश की आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत मानी जाती है। इसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहा जाता है। लेकिन दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में रह रही है, जहां प्रजनन दर इस स्तर से काफी नीचे जा चुकी है।

    इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक दोनों कारण हैं। महानगरों में घर, बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च परिवारों के फैसलों को प्रभावित कर रहा है। कई दंपती एक से ज्यादा बच्चे की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। करियर को प्राथमिकता देना, देर से शादी करना या बच्चे न पैदा करने का फैसला अब पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य हो रहा है। इन सामाजिक बदलावों का सीधा असर जनसंख्या के आंकड़ों पर पड़ रहा है।

    बाकी दुनिया के लिए खतरे की घंटी

    आज जिन देशों में आबादी बढ़ रही है, उनके लिए यह बदलाव भविष्य का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 का दशक आते-आते ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देश भी अपने जनसंख्या शिखर के करीब पहुंच जाएंगे।

    भारत के लिए यह मोड़ 2060 के दशक में आने का अनुमान है। वर्तमान में दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत उस दशक में करीब 170 करोड़ की आबादी के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है। इसके बाद यहां भी आबादी घटने का दौर शुरू होने का अनुमान है।

    पूरी दुनिया के स्तर पर जनसंख्या का शिखर करीब 2084 में दिखाई दे सकता है। तब वैश्विक आबादी लगभग 10.3 अरब तक पहुंचकर अपने उच्चतम स्तर पर होगी और इसके बाद मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की कुल आबादी का ग्राफ लगातार नीचे जाने लगेगा।

    अमेरिका की आबादी क्यों नहीं घट रही?

    कम जन्मदर के बावजूद अमेरिका फिलहाल इस संकट से उसी तरह प्रभावित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक इस सदी के अंत तक भी अमेरिका अपनी आबादी के शिखर पर नहीं पहुंचेगा। इसकी बड़ी वजह इमिग्रेशन है। अमेरिका में हर साल बड़ी संख्या में विदेशी युवा पहुंचते हैं और वहां बसते हैं। इससे कम जन्मदर के कारण पैदा हुई आबादी की कमी काफी हद तक पूरी हो जाती है।

    कम लोग, लेकिन ज्यादा बुजुर्ग

    आबादी घटने का सबसे बड़ा असर रोजगार बाजार पर पड़ेगा। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने पर कंपनियों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा।

    दूसरी चुनौती पेंशन और हेल्थकेयर की होगी। टैक्स देने वाले युवा कम होंगे, जबकि पेंशन और इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब सरकारों के राजस्व पर दबाव और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता खर्च होगा।

    इमिग्रेशन बनेगा आर्थिक ताकत का आधार

    भविष्य में वे देश ज्यादा मजबूत स्थिति में रह सकते हैं, जो विदेशी युवाओं और कुशल कामगारों को अपने यहां आने और बसने के अवसर देंगे। इसके उलट जिन देशों की सीमाएं प्रवासियों के लिए बंद रहेंगी, उन्हें कामकाजी आबादी की कमी और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    भारत के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड का सीमित समय

    भारत और अफ्रीकी देशों के लिए यह बदलाव खास संदेश लेकर आया है। युवा आबादी इन देशों की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इस ताकत का फायदा हमेशा नहीं रहेगा। अगले 20-30 साल डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिहाज से बेहद अहम हैं।

    अगर इस अवधि में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जरूरी स्किल और पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया, तो आबादी घटने का दौर शुरू होने से पहले देश अपेक्षित आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं कर पाएंगे।

    दुनिया के 64 देशों में खाली होते स्कूल, बुजुर्ग होती आबादी और बदलती शहरों की तस्वीर बता रही है कि 21वीं सदी की चुनौती अब केवल जनसंख्या को नियंत्रित करना नहीं है। असली चुनौती ऐसी दुनिया के लिए तैयारी करना है, जहां इंसान कम और उम्रदराज आबादी ज्यादा होगी। जिन देशों की नीतियां इस बदलाव के मुताबिक समय रहते बदल जाएंगी, उनके लिए घटती आबादी संकट के बजाय नई आर्थिक ताकत बन सकती है।

  • एयर शो में दिखा मौत का खौफनाक मंजर, आग के गोले में बदला F-4 फैंटम; दोनों पायलटों की मौत

    एयर शो में दिखा मौत का खौफनाक मंजर, आग के गोले में बदला F-4 फैंटम; दोनों पायलटों की मौत


    एथेंस।
    ग्रीस में एक एयर शो के दौरान शनिवार को बड़ा हादसा हो गया। एथेंस के पास स्थित तानाग्रा एयर बेस पर प्रदर्शन कर रहा दो सीटों वाला F-4 फैंटम फाइटर जेट अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में विमान में सवार दोनों पायलटों की मौत हो गई।

    दुर्घटना उस समय हुई जब लड़ाकू विमान एयर शो में करतब दिखा रहा था। विमान जमीन से महज कुछ मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहा था। अचानक उसने नीचे की ओर गोता लगाया और कुछ ही पलों में आग के विशाल गोले में बदल गया। हादसे का दृश्य देखकर मौके पर मौजूद लोग दहशत में आ गए।

    उड़ान के कुछ मिनट बाद ही हुआ क्रैश

    यह हादसा एथेंस फ्लाइंग वीक के दौरान हुआ। यह ग्रीस का वार्षिक एयर शो है, जिसमें विभिन्न देशों की सैन्य और नागरिक विमानन टीमें हिस्सा लेती हैं।

    प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, F-4 फैंटम ने उड़ान भरने के करीब तीन मिनट बाद ही खतरनाक तरीके से नीचे की ओर झुकना शुरू कर दिया। विमान जमीन के बेहद करीब दाईं तरफ मुड़ता दिखाई दिया और इसके तुरंत बाद वह क्रैश हो गया।

    ग्रीस के सरकारी प्रसारक ईआरटी की तस्वीरों में भी विमान को जमीन से बेहद कम ऊंचाई पर तेज मोड़ लेते हुए देखा गया। इसके बाद विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें भीषण आग लग गई।

    क्रैश के बाद जंगल में फैली आग

    फाइटर जेट के जमीन से टकराते ही आग की लपटें तेजी से फैलने लगीं। दुर्घटना के बाद लगी आग आसपास के जंगल तक पहुंच गई, जिससे बचाव दल के सामने चुनौती और बढ़ गई।

    आग बुझाने के लिए 11 दमकल विमान और हेलीकॉप्टर मौके पर लगाए गए। एयर बेस के लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को इलाके से बाहर निकलने की अपील भी की जाती रही।

    नागरिकों को नहीं पहुंचा नुकसान

    हादसे में F-4 फैंटम पर सवार दोनों पायलटों की जान चली गई। हालांकि, दुर्घटना के दौरान आसपास मौजूद नागरिकों या स्थानीय लोगों के घायल होने की कोई खबर नहीं है।

    हादसे के बाद एयर शो की सुरक्षा और दुर्घटना के कारणों को लेकर जांच शुरू किए जाने की बात सामने आई है। फिलहाल यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि विमान इतनी कम ऊंचाई पर उड़ान भरते समय अचानक नियंत्रण से बाहर कैसे हुआ।

  • नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    मध्यप्रदेश। हाईकोर्ट ने नरसिंहपुर जिले के छह किसानों की निजी कृषि भूमि से सड़क निर्माण सामग्री हटाने को लेकर जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कलेक्टर को आदेश दिया कि किसानों के खेतों में रखी निर्माण सामग्री तीन दिन के भीतर हटाई जाए और जमीन को उसकी मूल स्थिति में बहाल कर किसानों को वापस सौंपा जाए।

    यह मामला जामुन पानी और भोरपानी गांवों से जुड़ा है। किसानों ने वर्ष 2021 में अपनी निजी कृषि भूमि पर बिना अनुमति सड़क निर्माण से संबंधित गतिविधियां किए जाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय का रुख किया था। किसानों की शिकायत थी कि उनकी जमीन का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया जा रहा है और लंबे समय से उन्हें अपनी भूमि का सामान्य उपयोग करने में परेशानी हो रही है।

    मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से यह दलील रखी गई थी कि संबंधित स्थान पर सड़क निर्माण का काम सीधे तौर पर नहीं किया जा रहा है। प्रशासन के अनुसार लोक निर्माण विभाग ने वहां केवल सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अस्थायी रूप से रखी थी। अदालत के समक्ष इस स्थिति को प्रशासन की ओर से अपने बचाव में प्रस्तुत किया गया।

    हालांकि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रशासन की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला कलेक्टर पूरे जिले के समग्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं। किसी समस्या से संबंधित विभाग अलग होने मात्र से कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकते। न्यायालय ने जनहित से जुड़े मामलों में जिला प्रशासन की जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना।

    अदालत की सख्ती के बाद कलेक्टर को किसानों की जमीन से निर्माण सामग्री हटाने के लिए स्पष्ट समय सीमा दी गई है। निर्देश के अनुसार तीन दिन के भीतर खेतों से सभी संबंधित सामग्री हटाकर भूमि को पहले जैसी स्थिति में लाना होगा। इसके बाद किसानों को उनकी जमीन वापस सौंपने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। उस दौरान कलेक्टर को अदालत के निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करनी होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण सामग्री हटाने और जमीन बहाल करने की कार्रवाई पूरी हुई या नहीं।

    किसानों के लिए अदालत का यह आदेश लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण राहत के रूप में सामने आया है। वर्ष 2021 से भूमि के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद में अब प्रशासन को निश्चित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होगी।

    इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी जिला प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी विभागीय कार्रवाई या प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देकर जिला स्तर पर नागरिकों की शिकायतों से जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती। कलेक्टर को जिले का समग्र प्रभारी मानते हुए न्यायालय ने समस्या के समाधान की जिम्मेदारी तय की है।

    किसानों की निजी कृषि भूमि से जुड़ा यह विवाद सरकारी निर्माण गतिविधियों और नागरिकों के भूमि अधिकारों के बीच संतुलन का विषय भी सामने लाता है। अदालत के आदेश के बाद अब प्रशासन को न केवल निर्माण सामग्री हटानी होगी, बल्कि जमीन को वास्तविक रूप से उपयोग योग्य स्थिति में वापस करना भी सुनिश्चित करना होगा।

    अगली सुनवाई में पेश होने वाली अनुपालन रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि आदेश के अनुरूप तीन दिन की समय सीमा में कार्रवाई पूरी की गई है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट के निर्देश से छह किसानों को अपनी जमीन वापस मिलने की उम्मीद बनी है और जिला प्रशासन के सामने तय समय में आदेश लागू करने की जिम्मेदारी है।

  • भारत के साथ संयुक्त विकास के वादे से पीछे हटा मालदीव, थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की CHEC से किया समझौता

    भारत के साथ संयुक्त विकास के वादे से पीछे हटा मालदीव, थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की CHEC से किया समझौता

    नई दिल्ली । मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के विकास को लेकर चीन की कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC के साथ समझौता किया है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2024 में मालदीव और भारत के बीच थिलाफुशी पोर्ट को संयुक्त रूप से विकसित करने की योजना सामने आई थी। ऐसे में परियोजना के पहले चरण के लिए चीनी कंपनी को जिम्मेदारी देने के फैसले से भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ सकती हैं।

    मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड और CHEC के बीच हुए समझौते के तहत परियोजना का काम सिंगल नॉमिनेशन के आधार पर सौंपा गया है। CHEC चीन की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी यानी CCCC से जुड़ी है। कंपनी पहले भी कई देशों में बंदरगाह और परिवहन से संबंधित बड़े प्रोजेक्ट में काम कर चुकी है।

    CHEC की अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट, केन्या का नैवाशा इनलैंड कंटेनर डिपो, गुयाना का एयरपोर्ट प्रोजेक्ट और प्रशांत क्षेत्र में नाउरू पोर्ट का पुनर्विकास शामिल रहा है। कंपनी को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में वित्तीय प्रबंधन, अनुबंध और परियोजना जोखिम से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। इसी वजह से मालदीव के मौजूदा आर्थिक हालात के बीच इस फैसले को लेकर रणनीतिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

    थिलाफुशी पोर्ट परियोजना का उद्देश्य माले पोर्ट पर बढ़ते दबाव को कम करना और मालदीव के औद्योगिक केंद्र थिलाफुशी की कनेक्टिविटी तथा व्यापारिक क्षमता को बढ़ाना है। वर्ष 2024 में राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने माले पोर्ट पर भीड़ कम करने के लिए थिलाफुशी पोर्ट के संयुक्त विकास की योजना की घोषणा की थी। इसलिए अब चीन की कंपनी के साथ समझौते को भारत-मालदीव संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब मालदीव आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश के चालू खाते और राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी का अनुमान है। इसके साथ ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों ने छोटे द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा किया है।

    दूसरी ओर, भारत पिछले कई वर्षों से मालदीव में बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। भारत के सहयोग से ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का निर्माण हुआ है, जो माले को विलिंगिली, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की दिशा में अहम परियोजना है। इसे मालदीव की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल किया जाता है।

    भारत ने पिछले वर्षों में मालदीव में कई विकास परियोजनाओं को पूरा किया है, जिनका लाभ स्थानीय आबादी को मिला है। ऐसे में थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की कंपनी का चयन दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के व्यापक परिदृश्य में अहम घटनाक्रम है। चीन की बढ़ती भागीदारी से हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी को लेकर भारत की चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।

    मालदीव के लिए चुनौती यह भी है कि वह आर्थिक जरूरतों, बुनियादी ढांचा विकास और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के बीच किस तरह तालमेल कायम करता है। थिलाफुशी पोर्ट समझौता आने वाले समय में मालदीव की विदेश नीति और भारत तथा चीन के साथ उसके संबंधों की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।

  • भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना

    भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । 
    भारत दौरे पर आए बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति और चीन की आर्थिक रणनीतियों को लेकर परोक्ष रूप से तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने बिना किसी देश या नेता का नाम लिए कहा कि व्यापार में मनमाने प्रतिबंध, अचानक लगाए जाने वाले टैरिफ और बाजारों को व्यवस्थित तरीके से प्रभावित करने की कोशिशें वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।

    डी वेवर भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से जुड़ी उच्चस्तरीय चर्चा के दौरान बोल रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने संरक्षणवाद और अप्रत्याशित व्यापारिक फैसलों की आलोचना करते हुए कहा कि दुनिया में ऐसे फैसलों का चलन बढ़ रहा है, जिनमें किसी देश की व्यापार नीति अचानक बदल जाती है। उन्होंने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अस्थिरता पैदा करने वाला बताया।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि कुछ लोग एक दिन व्यापार संबंधी फैसला लेते हैं और कुछ समय बाद उसी फैसले को वापस ले लेते हैं, फिर उसे दोबारा लागू कर देते हैं। उनकी इस टिप्पणी पर कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच हंसी और तालियां भी सुनाई दीं। इसके बाद डी वेवर ने संकेत दिया कि उपस्थित लोग समझ रहे हैं कि उनका इशारा किस दिशा में है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी का नाम नहीं ले रहे हैं। हालांकि, उनके बयान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति पर परोक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया। ट्रंप प्रशासन की ओर से अलग-अलग देशों और व्यापारिक साझेदारों पर शुल्क लगाने तथा व्यापारिक नीतियों में बदलाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा होती रही है।

    डी वेवर ने केवल अमेरिकी व्यापार नीति तक अपनी टिप्पणी सीमित नहीं रखी। उन्होंने चीन की आर्थिक गतिविधियों और बाजारों को प्रभावित करने वाली रणनीतियों की ओर भी संकेत किया। उनका कहना था कि कुछ देश जानबूझकर और व्यवस्थित तरीके से बाजारों में ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिससे उनके व्यापारिक साझेदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार, इस तरह की रणनीतियों का उद्देश्य दूसरे देशों को आर्थिक रूप से कमजोर करना और उनकी निर्भरता बढ़ाना हो सकता है। उन्होंने संरक्षणवाद और अनुचित प्रतिस्पर्धा को ऐसी दो प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और देशों के बीच राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

    उनकी टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने और मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत यूरोपीय बाजारों के साथ व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि यूरोपीय संघ भी भारत के साथ आर्थिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है।

    ऐसे माहौल में बेल्जियम के प्रधानमंत्री का संरक्षणवाद के खिलाफ बयान भारत-यूरोपीय संघ व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को लेकर विभिन्न देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में स्थिर और पूर्वानुमान योग्य व्यापार नीति की जरूरत लगातार रेखांकित की जा रही है।

    डी वेवर ने अपने संबोधन में यह संदेश देने की कोशिश की कि व्यापारिक साझेदारों के बीच भरोसा तभी मजबूत हो सकता है, जब नीतियों में स्थिरता और आर्थिक तर्क को प्राथमिकता मिले। उनके बयान में अमेरिका और चीन दोनों की ओर संकेत था, लेकिन उन्होंने किसी देश का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया।

    भारत यात्रा के दौरान बेल्जियम के प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी वैश्विक व्यापार व्यवस्था में चल रहे बदलावों और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच सामने आई है। उनका जोर इस बात पर रहा कि मनमाने व्यापारिक फैसलों और अनुचित प्रतिस्पर्धा से केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि इसका असर देशों के बीच संबंधों और व्यापक भू-राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

  • अमेरिकी सैनिक मोबाइल फोन सुरक्षा, अमेरिकी वायु सेना सैनिक, पेंटागन साइबर सुरक्षा, लोकेशन डेटा सुरक्षा, अमेरिकी सैन्य कंप्यूटर

    अमेरिकी सैनिक मोबाइल फोन सुरक्षा, अमेरिकी वायु सेना सैनिक, पेंटागन साइबर सुरक्षा, लोकेशन डेटा सुरक्षा, अमेरिकी सैन्य कंप्यूटर

    नई दिल्ली । अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों में इस्तेमाल होने वाले मोबाइल फोन और कंप्यूटरों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। अमेरिकी वायु सेना और अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड ने अपने कुछ उपकरणों में विज्ञापन पहचानकर्ताओं को बंद कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब व्यावसायिक रूप से उपलब्ध लोकेशन डेटा के संभावित दुरुपयोग से मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों की गतिविधियों और सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं।

    अमेरिकी सीनेटर रॉन वाइडन की ओर से जारी पत्रों और सैन्य अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी वायु सेना ने करीब दो महीने पहले अपने कंप्यूटर और मोबाइल फोन में विज्ञापन पहचानकर्ताओं को बंद करने की प्रक्रिया पूरी की। दूसरी ओर, अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड ने भी अपने विंडोज उपकरणों में ऐसे पहचानकर्ताओं को हाल में निष्क्रिय किया है।

    विज्ञापन पहचानकर्ता ऐसे डिजिटल संकेतक होते हैं जिनका इस्तेमाल आम तौर पर मोबाइल और कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों से संबंधित विज्ञापन और डेटा विश्लेषण के लिए किया जा सकता है। इनसे जुड़े डेटा में स्थान संबंधी जानकारी भी शामिल हो सकती है। सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय यह है कि यदि संवेदनशील स्थानों या सैन्य गतिविधियों से जुड़ी जानकारी गलत हाथों में पहुंचती है तो उसका इस्तेमाल सुरक्षा जोखिम पैदा करने के लिए किया जा सकता है।

    मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को लेकर सामने आई रिपोर्टों ने इसी खतरे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। रिपोर्टों में दावा किया गया था कि व्यावसायिक रूप से उपलब्ध लोकेशन डेटा का इस्तेमाल अमेरिकी सैनिकों की गतिविधियों को ट्रैक करने और संभावित रूप से उन्हें निशाना बनाने के लिए किया गया। हालांकि, ऐसे डेटा के इस्तेमाल और किसी विशेष हमले के बीच सीधा संबंध हर मामले में स्थापित होना अलग जांच का विषय है।

    इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी सांसदों ने सैन्य प्रतिष्ठानों में इस्तेमाल होने वाली डिजिटल तकनीक से जुड़े सुरक्षा उपायों पर सवाल उठाए हैं। सीनेटर रॉन वाइडन और प्रतिनिधि पैट हैरिगन ने सैन्य अधिकारियों से जुड़े सुरक्षा उपायों की समीक्षा के लिए पेंटागन से जांच की मांग की थी। उनका मुख्य concern यह है कि सामान्य व्यावसायिक तकनीक से एकत्र होने वाला डेटा संवेदनशील सैन्य गतिविधियों के बारे में अनजाने में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकता है।

    अमेरिकी वायु सेना द्वारा विज्ञापन पहचानकर्ताओं को बंद करने का फैसला इसी व्यापक सुरक्षा चिंता से जुड़ा माना जा रहा है। सैन्य उपकरणों पर इस तरह की तकनीकी पाबंदी का उद्देश्य उन डिजिटल संकेतों को कम करना है जिनका उपयोग डिवाइस या उपयोगकर्ता से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए किया जा सकता है।

    स्पेशल ऑपरेशंस कमांड ने भी अपने विंडोज उपकरणों के संबंध में इसी दिशा में कदम उठाया है। विशेष अभियान चलाने वाले सैन्य बलों के लिए स्थान और संचार से जुड़ी जानकारी की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि ऐसी इकाइयों की गतिविधियां अक्सर संवेदनशील सैन्य अभियानों से जुड़ी होती हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम ने सैन्य क्षेत्र में निजी कंपनियों से मिलने वाले डेटा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन पर बहस को भी तेज किया है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर और विभिन्न डिजिटल सेवाओं से बड़ी मात्रा में डेटा उत्पन्न होता है। यदि इस जानकारी तक अनधिकृत लोगों या संगठनों की पहुंच बनती है तो संवेदनशील गतिविधियों की पहचान करने का जोखिम बढ़ सकता है।

    अमेरिकी सैन्य अधिकारियों द्वारा विज्ञापन पहचानकर्ताओं को बंद करना इस खतरे को कम करने की दिशा में उठाया गया एहतियाती कदम माना जा रहा है। हालांकि, केवल एक सेटिंग बंद करने से डिजिटल सुरक्षा से जुड़े सभी जोखिम समाप्त नहीं होते। सैन्य उपकरणों, नेटवर्क, एप्लीकेशन और डेटा साझाकरण से जुड़े व्यापक सुरक्षा उपाय भी महत्वपूर्ण बने रहते हैं। इस मामले ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक युद्ध और सैन्य अभियानों में डिजिटल लोकेशन डेटा भी सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुका है।

  • बेल्जियम के प्रधानमंत्री बोले- PM मोदी ने पहले ही चेताया था… अब हम अच्छे और सच्चे साझेदार तलाश रहे

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री बोले- PM मोदी ने पहले ही चेताया था… अब हम अच्छे और सच्चे साझेदार तलाश रहे


    नई दिल्ली।
    बेल्जियम (Belgium) के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर (Belgian Prime Minister Bart D Wever) ने कहा कि ‘कुछ देशों’ पर आर्थिक और सामरिक निर्भरता का यूरोपीय देशों (European Countries) का निर्णय उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ। उन्होंने कहा कि आपके प्रधानमंत्री (Prime Minister) ने बहुत पहले यूरोप को इसके बारे में आगाह किया था, लेकिन तब उनकी बात अनसुनी कर दी गई। वेवर ने कहा कि अब यूरोप उनकी बात को समझ रहा है। यह जागरूकता देरी से आई है, लेकिन अब हम अच्छे और सच्चे साझेदार तलाश रहे हैं।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यूरोप ने लंबे समय तक सस्ते विदेशी सामान को अपने यहां बेरोकटोक आने दिया। कम कीमत पर आने वाले विदेशी सामान ने धीरे-धीरे यूरोप की कंपनियों के लिए मुश्किलें बढ़ाने के साथ इन्हें कमजोर कर दिया।


    चीन की ओर इशारा

    वेवर ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन माना जा रहा है कि उनका इशारा चीन की ओर था। उन्होंने कहा कि यूरोप को किसी देश के सामान के लिए डंपिंग जोन नहीं बनने दिया जा सकता। उन्होंने साफ कहा कि यूरोप को अब कड़वी सच्चाई का अहसास हो रहा है। भारत ने यूरोप को इन जोखिमों के बारे में तब ही आगाह कर दिया था, जब यूरोप ने खुद इन्हें समझा भी नहीं था।


    टैरिफ का डर नहीं, सहयोग करने वाले साथी चाहिए

    वेवर ने अमेरिका का नाम लिए बिना कहा कि यूरोप को ऐसे साझेदार चाहिए, जो दबाव नहीं सम्मान से सहयोग कर सकें। उन्होंने कहा कि हमें ऐसे साथियों के बारे में सोचना होगा, जो एक दिन हम पर टैरिफ लगाएं, दूसरे दिन हटा दें और अगर हम कोई ऐसी बात कहें जो उन्हें पसंद न आए, तो दोबारा टैरिफ लगा दें।


    भारत को सूची से हटाना भारी पड़ेगा: वेवर

    वेवर ने कहा, ‘दुनिया में किसके साथ, दुनिया की किस बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ हम ऐसे रिश्ते बना सकते हैं? तो, अगर इस सूची में भारत का नाम नहीं है, तो आप एक बहुत ही बुनियादी बात खो रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि यूरोपीय काउंसिल की बैठकों में अब सभी मुद्दों पर चर्चा हो रही है। हम ऐसे साथियों को ढूंढ रहे हैं, जो हमारी तरह ही हों और बहुपक्षवाद में विश्वास रखते हों। ‘भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के लागू होने से ठीक पूर्व यह महत्वपूर्ण संकेत है।’


    यूरोप के बाजारों में काबिज चीन

    यूरोप के बाजारों पर आज चीन बुरी तरह से काबिज है। वह करीब 560 अरब यूरो का निर्यात यूरोप करता है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। वहीं, यूरोप का चीन को निर्यात सिर्फ 200 अरब यूरो है। 1360 अरब यूरो के व्यापार घाटे का सामना यूरोप कर रहा है।

    जानकारी के मुताबिक यूरोप ने चीन के साथ व्यापारिक मामलों को लेकर अक्टूबर तक को डेडलाइन तय की है। यूरोपीय देश चीन से व्यापार में कुछ बुनियादी बदलावों पर जोर दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि अगर यूरोप में चीनी सामान की ‘डंपिंग’ नहीं रुकी, तो वह चीन पर टैरिफ लगा सकता है। इसके पीछे यूरोपीय संघ कथित तौर पर आपूर्ति के मामले में किसी एक देश (यानी चीन) पर से निर्भरता कम करना चाहता है। दूसरे सस्ते एवं निम्न गुणवत्ता के सामानों को यूरोप के बाजार से रोकना चाहता है।


    भारत के लिए बढ़ सकते हैं अवसर

    भारत के लिए यह अवसर हो सकता है। यूरोपीय संघ चीन से आगे बढ़कर आपूर्ति श्रृंखला में अन्य देशों की ओर रुख बदलने का प्रयास कर रहा है। दरअसल, यूरोपीय संघ के 27 देशों की मांग की पूर्ति भारत बखूबी कर सकता है। बता दें कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच इसी साल के शुरू में मुक्त व्यापार समझौता हुआ है। दोनों पक्षों को उम्मीद है कि साल के आखिर तक उसका क्रियान्वयन शुरू हो जाएगा।

    भारत के लिए, यूरोप के बाजार में अवसर बन सकते हैं। भारत कई और मशीनरी, कपड़ा, रसायन आदि यूरोप को निर्यात करता है लेकिन कई और क्षेत्रों में मौके हैं। यूरोप के साथ भारत का द्विपक्षीय कारोबार 136 अरब डॉलर है, जिसमें भारत का निर्यात 75 अरब डॉलर और आयात 61 अरब डॉलर के करीब है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस प्रकार चीनी सामानों को लेकर सख्ती दिख रही है उसका लाभ भारतीय निर्यातकों को मिल सकता है।

  • ईरान से युद्ध के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ 5 अरब डॉलर के हथियार सौदे को दी मंजूरी

    ईरान से युद्ध के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ 5 अरब डॉलर के हथियार सौदे को दी मंजूरी


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने सऊदी अरब (Saudi Arabia) को करीब 5 अरब डॉलर ($5 billion) के हथियार (Weapons) और सैन्य उपकरण बेचने की संभावित डील को मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित बिक्री में सटीक निशाना लगाने वाली जेडीएएम-ईआर प्रणालियां (JDAM-ER systems), हजारों बम और उनसे जुड़े उपकरण शामिल हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने इसकी जानकारी कांग्रेस को दी है।


    प्रस्तावित हथियार सौदे में क्या-क्या शामिल है?

    अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, सऊदी अरब ने 5,004 केएमयू-572 जेडीएएम गाइडेंस किट और 5,000 केएमयू-556 जेडीएएम गाइडेंस किट की मांग की है। इसके अलावा 5,004 बीएलयू-111 500-पाउंड सामान्य उपयोग वाले बम और 5,000 बीएलयू-117 2,000-पाउंड बम भी प्रस्तावित पैकेज का हिस्सा हैं। डील में फ्यूज सिस्टम, टारगेट डिटेक्टर, कंटेनर, स्पेयर पार्ट्स, सपोर्ट उपकरण और अन्य जरूरी सामान भी शामिल होंगे। इसके साथ अमेरिकी सरकार और ठेकेदारों की इंजीनियरिंग, तकनीकी और लॉजिस्टिक सेवाएं भी प्रस्तावित हैं।


    अमेरिका सऊदी अरब को ये हथियार क्यों देना चाहता है?

    अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि इस संभावित बिक्री से सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत होगी और खाड़ी क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता तथा आर्थिक प्रगति को बढ़ावा मिलेगा। अमेरिका के मुताबिक, इससे सऊदी अरब की मौजूदा और भविष्य की क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने की क्षमता बेहतर होगी। विभाग ने कहा कि इससे सऊदी अरब की अपनी जमीन की रक्षा करने की क्षमता बढ़ेगी और अमेरिकी तथा खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों की सेनाओं के साथ उसकी सैन्य प्रणालियों की बेहतर तालमेल क्षमता विकसित होगी।


    क्या इस सौदे से क्षेत्र का सैन्य संतुलन बदलेगा?

    अमेरिकी आकलन के मुताबिक, प्रस्तावित लेनदेन से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन में कोई बदलाव नहीं होगा। अमेरिका का यह भी कहना है कि सऊदी अरब इन हथियारों और सेवाओं को अपनी सैन्य व्यवस्था में आसानी से शामिल कर सकेगा। इस संभावित बिक्री के लिए मुख्य ठेकेदार बोइंग होगा, जिसका मुख्यालय वर्जीनिया में है। अमेरिकी सरकार ने कहा कि फिलहाल इस सौदे के साथ किसी ऑफसेट समझौते की जानकारी नहीं है।


    क्या इस हथियार सौदे का पश्चिम एशिया के तनाव से भी संबंध है?

    यह संभावित हथियार सौदा ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं। क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष, सऊदी अरब को निशाना बनाकर हुए हमलों और यमन के हूती विद्रोहियों की गतिविधियों ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब अपनी जमीन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को संभावित हवाई तथा मिसाइल खतरों से बचाने की क्षमता मजबूत करना चाहता है।


    क्या अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्ते सिर्फ रक्षा तक सीमित हैं?

    अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हालिया सहयोग केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। एक महीने से ज्यादा समय पहले दोनों देशों ने शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग के लिए भी समझौते किए थे। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे आम तौर पर ‘123 समझौता’ कहा जाता है। इसके साथ द्विपक्षीय सुरक्षा उपायों से जुड़ा समझौता भी हुआ था।

    अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक, 123 समझौता से अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के उभरते नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में ज्यादा पहुंच मिल सकती है। इसके साथ अमेरिकी उद्योग, कामगारों और सप्लाई चेन को भी लाभ पहुंचाने की बात कही गई है। दोनों समझौते परमाणु सुरक्षा, सुरक्षा मानकों और परमाणु अप्रसार को मजबूत करने के साथ अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के लिए आधार तैयार करते हैं।

    क्या हथियार और परमाणु समझौते रिश्तों की नई दिशा दिखाते हैं?
    हालिया हथियार बिक्री की संभावित मंजूरी और परमाणु सहयोग समझौते अमेरिका-सऊदी रणनीतिक रिश्तों के व्यापक दायरे को दिखाते हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग रक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिक परमाणु क्षेत्र तक फैला हुआ है। बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल के बीच वॉशिंगटन और रियाद के बीच यह साझेदारी आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

  • यूरोप में अवैध प्रवासियों पर सख्ती…. बिना कानूनी अनुमति के रह रहे लोगों को डिपोर्ट करेंगे 5 देश

    यूरोप में अवैध प्रवासियों पर सख्ती…. बिना कानूनी अनुमति के रह रहे लोगों को डिपोर्ट करेंगे 5 देश


    कोपेनहेगन।
    यूरोप (Europe) में अवैध प्रवासियों (Illegal Migrants) और बिना कानूनी अनुमति के रह रहे लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी तेज हो गई है। डेनमार्क (Denmark) की मेजबानी में हुई बैठक में जर्मनी, ऑस्ट्रिया, ग्रीस, डेनमार्क और नीदरलैंड के समूहों ने बड़ा कदम उठाया है। इन पांच देशों ने यूरोपीय संघ (European Union) से बाहर के किसी देश में रिटर्न हब (प्रवासी वापसी केंद्र) बनाने को लेकर ठोस सहमति जताई है।

    जर्मनी के गृह मंत्री एलेक्जेंडर डोब्रिंडट ने कोपेनहेगन में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि इन देशों का लक्ष्य इसी साल ऐसे तीसरे देशों के साथ समझौते को अंतिम रूप देना है। हालांकि, अभी उन देशों के नामों का खुलासा नहीं किया गया है जहां ये केंद्र बनाए जाएंगे। यूरोपीय संसद ने जून में नई प्रवासन नीति को मंजूरी दी थी।


    मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

    इस योजना को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। काउंसिल ऑफ यूरोप ने इन केंद्रों को मानवाधिकारों के लिए जोखिम भरा बताया है। वहीं, डेनिश रिफ्यूजी काउंसिल की महासचिव शार्लोट स्लेंटे का कहना है कि इससे प्रवासियों के खतरनाक रास्ते नहीं रुकेंगे। डेनमार्क के आव्रजन और एकीकरण मंत्री मोर्टन बोद्स्कोव ने उम्मीद जताई है कि साल 2027 के अंत तक प्रवासियों को भेजने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इस पूरी योजना पर चर्चा के लिए यह समूह सितंबर के अंत में जर्मनी के म्यूनिख में फिर बैठक करेगा।