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  • 450 साल पुराने नक्शे को बदलने की तैयारी, नए मैप में अफ्रीका दिखेगा बड़ा, यूरोप-अमेरिका होंगे छोटे

    450 साल पुराने नक्शे को बदलने की तैयारी, नए मैप में अफ्रीका दिखेगा बड़ा, यूरोप-अमेरिका होंगे छोटे


    नई दिल्ली। स्कूलों में पढ़ाया जाने वाला दुनिया का पारंपरिक नक्शा अब बदल सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐसा विश्व मानचित्र अपनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जो महाद्वीपों का आकार उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाता है। नए ‘इक्वल अर्थ’ (Equal Earth) प्रोजेक्शन में अफ्रीका पहले की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार छोटा नजर आएगा। प्रस्ताव के समर्थन में 164 देशों ने वोट किया, छह देश मतदान से दूर रहे और अमेरिका ने अकेले इसके खिलाफ मतदान किया।

    इस बदलाव की जड़ करीब 450 साल पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन में है। 1569 में कार्टोग्राफर गेरार्डस मर्केटर ने ऐसा नक्शा तैयार किया था, जिसका सबसे बड़ा फायदा समुद्र में यात्रा करने वाले नाविकों को मिला। लेकिन दिशा और रास्तों को सीधी रेखाओं में दिखाने की इस तकनीक ने धरती के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक आकार में बड़ा अंतर पैदा कर दिया।

    धरती गोल, कागज सपाट… यहीं से शुरू हुई दिक्कत

    पृथ्वी गोल है, जबकि नक्शा सपाट कागज पर बनाया जाता है। इसे समझने के लिए संतरे का उदाहरण लिया जा सकता है। संतरे के छिलके को निकालकर पूरी तरह सपाट फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह कहीं न कहीं खिंचेगा, फटेगा या उसका आकार बिगड़ेगा। पृथ्वी के साथ भी नक्शा बनाते समय यही समस्या आती है।

    मर्केटर ने उस समय इस समस्या का ऐसा समाधान निकाला, जिससे समुद्र में दिशा तय करना आसान हो गया। उस दौर में जहाज महीनों समुद्र में चलते थे। नक्शे पर सीधी रेखाओं में रास्ते और दिशाएं मिलने से नाविकों को अपना मार्ग तय करने में मदद मिलती थी।

    लेकिन इसका दूसरा असर यह हुआ कि जैसे-जैसे नक्शे पर भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, जमीन का आकार जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है।

    ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण समझिए

    मर्केटर प्रोजेक्शन में यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड अपने वास्तविक आकार से काफी बड़े दिखाई देते हैं। दूसरी ओर भूमध्य रेखा के आसपास मौजूद अफ्रीका और भारत जैसे बड़े भूभाग अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।

    सबसे बड़ा अंतर अफ्रीका और ग्रीनलैंड को देखकर समझ आता है। वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है, लेकिन पारंपरिक मर्केटर नक्शे में दोनों लगभग समान आकार के नजर आते हैं।

    यानी यह नक्शा समुद्री नेविगेशन के लिहाज से उपयोगी था, लेकिन दुनिया के अलग-अलग भूभागों के वास्तविक आकार की तस्वीर सही नहीं देता था।

    ‘इक्वल अर्थ’ में क्या अलग होगा?

    ‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन 2018 में कार्टोग्राफरों ने तैयार किया था। इसका उद्देश्य महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है। इसमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया पहले के मुकाबले बड़े दिखाई देंगे। इसके उलट यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार छोटा नजर आएगा।

    इसका मकसद केवल नक्शे की शक्ल बदलना नहीं है। इसके जरिए लोगों, खासकर बच्चों को दुनिया के भूगोल और देशों के वास्तविक आकार की ज्यादा सटीक तस्वीर दिखाने की कोशिश की जा रही है।

    164 देशों का समर्थन, अमेरिका अकेला विरोध में

    संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। छह देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया। प्रस्ताव को टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने आगे बढ़ाया था।

    डुसी का कहना था कि नक्शे केवल भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं होते। उनका असर बच्चों की शिक्षा, लोगों की कल्पना और दुनिया को देखने के नजरिए पर भी पड़ता है। उनके मुताबिक किसी क्षेत्र को वास्तविक आकार से अलग दिखाने वाली तस्वीर लंबे समय तक लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकती है।

    अमेरिका ने कहा- UN असली मुद्दों से भटक रहा

    अमेरिका ने प्रस्ताव पर नाराजगी जताई। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेंसविच ने कहा कि ऐसे कदमों की वजह से ही संयुक्त राष्ट्र अपनी साख खो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है, तब संगठन 16वीं सदी के नक्शों पर चर्चा करने में समय क्यों लगा रहा है।

    हालांकि, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब सदस्य देशों से पारंपरिक मर्केटर प्रोजेक्शन के बजाय ‘इक्वल अर्थ’ को अपनाने की अपील की गई है। इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को दुनिया का भूगोल उसके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है।

  • जॉर्जिया मेलोनी ने बनाया इटली में नया रिकॉर्ड, पीएम मोदी ने सबसे लंबे कार्यकाल पर मित्रता और रणनीतिक साझेदारी को सराहा

    जॉर्जिया मेलोनी ने बनाया इटली में नया रिकॉर्ड, पीएम मोदी ने सबसे लंबे कार्यकाल पर मित्रता और रणनीतिक साझेदारी को सराहा

    नई दिल्ली । इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने देश के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। मेलोनी शुक्रवार को लगातार 1413 दिन तक सरकार का नेतृत्व करने के साथ इटली गणराज्य बनने के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने वाली प्रधानमंत्री बन गई हैं। उनकी इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी है और भारत तथा इटली के बीच संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका की सराहना की है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में जॉर्जिया मेलोनी को अपनी मित्र बताते हुए कहा कि यह उपलब्धि इटली के लोगों के उनके नेतृत्व में भरोसे और विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि मेलोनी की मित्रता भारत और इटली के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण रही है।

    मोदी ने भारत और इटली के लोगों के बेहतर भविष्य के लिए दोनों देशों के साथ मिलकर आगे भी काम करने की उम्मीद जताई। उन्होंने मेलोनी को आने वाले वर्षों के लिए सफलता की शुभकामनाएं भी दीं। प्रधानमंत्री के संदेश में दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग और व्यक्तिगत स्तर पर नेताओं के संबंधों को भी प्रमुखता मिली।

    मेलोनी सरकार ने शुक्रवार को लगातार सत्ता में रहने के 1413 दिन पूरे किए। इसके साथ ही उनकी सरकार ने इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। बर्लुस्कोनी की सरकार वर्ष 2001 से 2005 के बीच लगातार 1412 दिन तक सत्ता में रही थी। मेलोनी की सरकार ने एक दिन अधिक लगातार सत्ता में रहकर नया रिकॉर्ड कायम किया है।

    यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इटली का राजनीतिक इतिहास लंबे समय तक सरकारों की अस्थिरता से जुड़ा रहा है। देश में गठबंधन सरकारों के टूटने और राजनीतिक बदलाव के कारण सरकारों का औसत कार्यकाल करीब 13 महीने बताया जाता है। ऐसे राजनीतिक माहौल में मेलोनी की सरकार का लगातार इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहना उनके लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है।

    जॉर्जिया मेलोनी इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री भी हैं। उन्होंने तीन दक्षिणपंथी और कंजरवेटिव पार्टियों वाले गठबंधन के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। गठबंधन की सरकार के सामने अलग-अलग राजनीतिक विचारों और प्राथमिकताओं के बीच तालमेल बनाए रखने की चुनौती रही है। इसके बावजूद सरकार का लगातार बने रहना मेलोनी के नेतृत्व की स्थिरता के रूप में देखा जा रहा है।

    मेलोनी खुद भी इस उपलब्धि को अपनी सरकार की महत्वपूर्ण सफलता के तौर पर पेश कर रही हैं। इसी सिलसिले में उनकी पार्टी की ओर से शुक्रवार शाम बारी शहर में एक बड़ी रैली आयोजित की जानी है। मेलोनी इस कार्यक्रम में शामिल होकर भाषण भी देंगी। माना जा रहा है कि रैली के दौरान वह सरकार के कार्यकाल और अब तक की उपलब्धियों को लेकर अपना पक्ष सामने रखेंगी।

    भारत और इटली के बीच संबंधों के लिहाज से भी मेलोनी का कार्यकाल महत्वपूर्ण रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और मेलोनी के बीच कई मौकों पर द्विपक्षीय सहयोग तथा रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने को लेकर बातचीत हुई है। मोदी के ताजा संदेश से संकेत मिलता है कि भारत दोनों देशों के बीच सहयोग को भविष्य में भी मजबूत बनाए रखने को महत्व देता है। मेलोनी की रिकॉर्ड उपलब्धि के बीच भारत की ओर से दी गई यह बधाई दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों में निरंतरता का संदेश देती है।

  • अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत पर बदला ट्रंप प्रशासन का बयान, हॉवर्ड लुटनिक ने स्वीकार की अपनी बड़ी गलती

    अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत पर बदला ट्रंप प्रशासन का बयान, हॉवर्ड लुटनिक ने स्वीकार की अपनी बड़ी गलती

    नई दिल्ली ।ईरान में जारी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बीच अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ मंत्री के बयान में बदलाव ने सैनिकों की मौत के आंकड़ों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने पहले ईरान अभियान के दौरान किसी अमेरिकी सैन्यकर्मी की मौत नहीं होने की बात कही थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपने बयान को गलत बताते हुए 18 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत की पुष्टि की।

    लुटनिक ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए मृत सैनिकों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सैन्यकर्मियों के बलिदान को लेकर गलत जानकारी देना गंभीर चूक थी और इसके लिए वह माफी मांगते हैं। उनका यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान मारे गए और घायल हुए सैनिकों की संख्या को लेकर प्रशासन से लगातार सवाल किए जा रहे हैं।

    लुटनिक के अनुसार, यह गलती उस समय हुई जब वह एक कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी विषयों पर बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उनसे ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियान से जुड़े सवाल पूछे गए। जवाब देते समय उन्होंने गलत जानकारी दे दी और कहा कि किसी अमेरिकी सैन्यकर्मी की जान नहीं गई है।

    उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उस वक्त उनके दिमाग में वेनेजुएला में हुए एक अलग सैन्य अभियान की जानकारी थी। इसी वजह से उन्होंने ईरान से संबंधित सवाल का गलत उत्तर दे दिया। लुटनिक ने कहा कि उनका बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था और वह इसकी जिम्मेदारी लेते हैं।

    अमेरिकी मंत्री ने अपने स्पष्टीकरण में सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश की सेवा करने वाले अमेरिकी पुरुषों और महिलाओं के बलिदान को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से उन परिवारों के प्रति दुख जताया जिन्होंने ईरान में सैन्य कार्रवाई के दौरान अपने प्रियजनों को खोया है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। अमेरिकी अभियान से जुड़े नुकसान और सैन्यकर्मियों की स्थिति पर स्पष्ट जानकारी को लेकर प्रशासन के बयानों पर नजर रखी जा रही है। ऐसे में एक वरिष्ठ मंत्री के बयान में बदलाव ने सरकारी सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए हैं।

    लुटनिक की सार्वजनिक माफी को प्रशासन की ओर से गलत सूचना को स्पष्ट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने अपने पहले बयान को सही ठहराने के बजाय सीधे तौर पर गलती स्वीकार की और मृत सैनिकों की संख्या के संबंध में संशोधित जानकारी सामने रखी।

    ईरान अभियान में अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत का मुद्दा अब केवल सैन्य कार्रवाई से जुड़ा विषय नहीं रह गया है, बल्कि अमेरिकी प्रशासन की जवाबदेही और आधिकारिक सूचनाओं की सटीकता से भी जुड़ गया है। 18 सैनिकों की मौत की बात स्वीकार किए जाने के बाद आगे की कार्रवाई और नुकसान से संबंधित आधिकारिक जानकारी पर भी विशेष ध्यान रहेगा।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच लुटनिक ने अमेरिकी सेना में सेवा देने वाले लोगों के योगदान और बलिदान को याद करते हुए कहा कि देश की सुरक्षा के लिए काम करने वाले सैन्यकर्मियों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके बयान में हुई गलती के बाद दी गई माफी से प्रशासन की ओर से स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

  • रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    नई दिल्ली ।विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि यूक्रेन युद्ध का समाधान किसी देश के तेल खरीदने या नहीं खरीदने से नहीं निकलेगा। उन्होंने कहा कि करीब पांचवें वर्ष में पहुंच चुका यह संघर्ष संवाद, कूटनीति और गंभीर बातचीत के जरिए ही समाप्त हो सकता है।

    कीव में गुरुवार को जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है। करीब 1.4 अरब आबादी वाले देश के लिए पर्याप्त और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन का अपना दृष्टिकोण है और भारत उसका सम्मान करता है, लेकिन युद्ध खत्म करने का रास्ता केवल तेल खरीदने या रोकने से नहीं निकल सकता।

    अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित प्रतिबंध या अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने के सवाल पर भी विदेश मंत्री ने भारत की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संघर्ष को समाप्त करने के लिए उन उपायों पर ध्यान देना जरूरी है, जो सीधे शांति और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ते हों।

    जयशंकर ने कहा कि रूस से तेल, खनिज, धातु, एल्यूमिना या उर्वरक खरीदना अथवा नहीं खरीदना युद्ध का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक वास्तविक समाधान बातचीत के जरिए ही संभव है और भारत दोनों पक्षों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने की अपनी नीति पर कायम है।

    रूस और यूक्रेन के बीच 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से सवाल उठाए जाते रहे हैं। भारत ने लगातार कहा है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और उचित कीमत सुनिश्चित करना है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव के बीच रूसी तेल भारत के लिए एक व्यावहारिक ऊर्जा विकल्प भी बना है।

    जयशंकर इन दिनों तीन दिवसीय यूक्रेन और पोलैंड यात्रा पर हैं। कीव में उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात की। यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करना है।

    उन्होंने भारत की उस नीति को भी दोहराया कि यह युद्ध का युग नहीं है और किसी संघर्ष का स्थायी समाधान युद्ध के मैदान में नहीं खोजा जा सकता। भारत दोनों पक्षों के साथ संपर्क बनाए हुए है। जयशंकर ने हाल में मॉस्को में हुई उच्चस्तरीय बातचीत के बाद अब कीव में भी सीधे संवाद किया है।

    विदेश मंत्री ने हाल में कीव पर हुए हमले का उल्लेख करते हुए वहां हुई भारतीय नागरिक की मौत पर भी शोक जताया। उन्होंने कहा कि संघर्ष में जान गंवाने वाले सभी लोगों के परिवारों के प्रति भारत की संवेदनाएं हैं। इस घटना ने यूक्रेन में मौजूद भारतीय नागरिकों और वहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

    जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत में काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हो रहे हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय नाविक विभिन्न देशों के जहाजों पर काम करते हैं और ऐसे हमलों से उनकी सुरक्षा प्रभावित होती है।

    भारत ने काला सागर में नागरिक और व्यावसायिक जहाजों पर किसी भी पक्ष की ओर से किए जाने वाले हमलों को अस्वीकार्य बताया है। समुद्री मार्ग बाधित होने से ईंधन, उर्वरक और खाद्य सामग्री की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। भारत का जोर इसलिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीतिक समाधान के साथ नागरिकों तथा वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर भी बना हुआ है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को लेकर अमेरिकी रणनीति और चीन की संभावित भूमिका पर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को अधिक जिम्मेदार देश बताते हुए कहा कि बीजिंग ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयास में सहयोग के लिए तैयार है।

    अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य ईरान की आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। ऐसे में चीन का सहयोग अमेरिकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चीन ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध रखने वाले देशों में शामिल है।

    वेंस ने कहा कि चीन सरकार इस मामले में सहयोग करने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका और चीन के बीच कई नीतिगत मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संबंधों को सकारात्मक बताया।

    ईरान और चीन की तुलना करते हुए वेंस ने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय विवादों में अपनी बात मनवाने के लिए वाणिज्यिक जहाजों पर उसी तरह गोलीबारी करने वाला देश नहीं है, जैसा अमेरिका ईरान के मामले में आरोप लगा रहा है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    वेंस के अनुसार तुर्किये, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देश भी अलग-अलग स्तर पर अमेरिका की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ देश सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन निजी तौर पर वे वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को लेकर ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में हैं।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर भी स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास आर्थिक, सैन्य, राजनयिक और गुप्त उपायों सहित कई विकल्प मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने इन विकल्पों की विस्तृत जानकारी देने से इनकार किया।

    वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अपनी योजनाओं को सार्वजनिक नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने से राष्ट्रपति ट्रंप की निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो सकती है। उनका कहना था कि राष्ट्रपति को परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने के लिए रणनीतिक गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है।

    वेंस ने हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान वहां वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने वाली गतिविधियां बंद नहीं करता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी लंबे समय तक व्यवधान से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसका असर एशिया और यूरोप सहित उन अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है जो पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करती हैं।

    अमेरिका की ओर से चीन के सहयोग का दावा इस पूरे घटनाक्रम में विशेष महत्व रखता है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ दबाव अभियान में संभावित सहयोग पश्चिम एशिया की बदलती कूटनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन वास्तव में अमेरिकी आर्थिक दबाव अभियान में किस स्तर तक सहयोग करता है और ईरान की प्रतिक्रिया क्या रहती है।

  • जयशंकर की जेलेंस्की से मुलाकात के बीच कीव पर रूसी ड्रोन हमला

    जयशंकर की जेलेंस्की से मुलाकात के बीच कीव पर रूसी ड्रोन हमला

    कीव। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने दावा किया है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर जब कीव में उनसे मुलाकात कर रहे थे, उसी दौरान रूस ने यूक्रेन पर ड्रोन हमला किया। जेलेंस्की के मुताबिक, रूस की ओर से जेट इंजन वाले ‘शाहेद’ ड्रोन लॉन्च किए गए थे। यूक्रेन पहले भी इन ड्रोन के विकास में ईरान की मदद का आरोप लगाता रहा है।

    जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेनी लड़ाकू विमानों ने ज्यादातर ड्रोन को हवा में ही मार गिराया, जिसके चलते जयशंकर के नेतृत्व वाला भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहा।

    युद्ध खत्म करने के रास्तों पर हुई चर्चा

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गुरुवार को यूक्रेन की राजधानी कीव में राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात की। बातचीत में रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के संभावित रास्तों के साथ-साथ भारत और यूक्रेन के द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

    जयशंकर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने जेलेंस्की को यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ हुई बातचीत की जानकारी दी। दोनों पक्षों के बीच चर्चा का प्रमुख मुद्दा युद्ध का समाधान तलाशना रहा।

    इसी मुलाकात के दौरान कीव में रूसी ड्रोन हमले की खबर सामने आई।

    जेलेंस्की ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल का किया जिक्र

    जेलेंस्की ने अपने बयान में खास तौर पर जयशंकर के प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेनी लड़ाकू विमानों ने ज्यादातर ड्रोन को नष्ट कर दिया और इसी कारण भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित रहा।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति के मुताबिक, जिस समय जयशंकर उनके साथ कीव में मौजूद थे, उसी वक्त रूस ने एक बार फिर जेट इंजन वाले शाहेद ड्रोन लॉन्च किए। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जयशंकर ऐसे समय यूक्रेन पहुंचे थे जब राजधानी में रूसी हवाई हमलों का खतरा बना हुआ था।

    जेलेंस्की ने दुनिया से मांगा स्पष्ट रुख

    जेलेंस्की ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और दुनिया की प्रमुख शक्तियों से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर स्पष्ट रुख अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि युद्ध को समाप्त करने की जरूरत है और शांति ऐसी होनी चाहिए जो भरोसेमंद और लंबे समय तक टिकाऊ रहे।

    उन्होंने भारत के रुख का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यूक्रेन युद्ध समाप्त करने की भारत की प्रतिबद्धता की सराहना करता है।

    बंदरगाहों और खाद्य आपूर्ति को लेकर रूस पर आरोप

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने रूस पर यूक्रेन के बंदरगाहों, खाद्य गलियारे और आपूर्ति व्यवस्था को बाधित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने खास तौर पर ब्लैक सी में नागरिक जहाजों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताया।

    जेलेंस्की का तर्क है कि समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की रुकावट का असर केवल यूक्रेन तक सीमित नहीं रहेगा। इससे उन क्षेत्रों में भी खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जो इन समुद्री रास्तों पर निर्भर हैं।

    जयशंकर की कीव यात्रा के दौरान हुई यह मुलाकात और उसी समय सामने आया ड्रोन हमला रूस-यूक्रेन युद्ध की मौजूदा स्थिति की गंभीरता को भी रेखांकित करता है।

  • भारतीयों पर दोहरी मार! अमेरिका में ग्रीन कार्ड की राह और मुश्किल

    भारतीयों पर दोहरी मार! अमेरिका में ग्रीन कार्ड की राह और मुश्किल


    वाशिंगटन/दुबई।
    अमेरिका में स्थायी रूप से बसने और ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीयों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने संकेत दिया है कि भारी मांग के कारण भारतीय नागरिकों के लिए रोजगार आधारित पहली प्राथमिकता यानी ईबी-1 श्रेणी के ग्रीन कार्ड आने वाले हफ्तों में अस्थायी रूप से उपलब्ध नहीं हो सकते। दूसरी ओर, अमेरिका-ईरान तनाव ने खाड़ी देशों में रहने वाले करीब 90 लाख भारतीय प्रवासियों की चिंता बढ़ा दी है।

    एक तरफ अमेरिका में ग्रीन कार्ड की लंबी कतार और कोटा खत्म होने का खतरा है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा, यात्रा और रोजगार को लेकर नई चिंता पैदा कर रहा है।

    ईबी-1 ग्रीन कार्ड पर कोटा खत्म होने का खतरा

    अमेरिकी विदेश विभाग के सितंबर वीजा बुलेटिन के मुताबिक, भारतीय आवेदकों की भारी संख्या के कारण वित्त वर्ष के 30 सितंबर को समाप्त होने से पहले ईबी-1 श्रेणी में भारत के लिए उपलब्ध वीजा संख्या खत्म हो सकती है।

    विभाग ने हालांकि कहा है कि वह वीजा उपलब्धता पर लगातार नजर रख रहा है। परिस्थितियों के अनुसार वीजा संख्या और तारीखों में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं।

    ईबी-1 श्रेणी में आमतौर पर असाधारण क्षमता वाले पेशेवरों, प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों के अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारियों को शामिल किया जाता है। भारतीय पेशेवरों के बीच इस श्रेणी की काफी मांग रहती है।

    अक्टूबर 2022 तक की प्राथमिकता तारीख वालों को मौका

    सितंबर के लिए भारत की ईबी-1 श्रेणी की अंतिम कार्रवाई तारीख 15 अक्टूबर 2022 तय की गई है। इसका सीधा मतलब है कि सामान्य परिस्थितियों में उन्हीं भारतीय आवेदकों के मामलों पर अंतिम कार्रवाई की जा सकती है, जिनकी प्राथमिकता तारीख 15 अक्टूबर 2022 से पहले की है।

    इससे नई प्राथमिकता तारीख वाले आवेदकों के लिए इंतजार और लंबा होने की आशंका है। हालांकि, वीजा उपलब्धता बदलने के साथ आगे तारीखों में भी बदलाव संभव है।

    खाड़ी में करीब 90 लाख भारतीयों की बढ़ी चिंता

    ग्रीन कार्ड की परेशानी के बीच खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के सामने एक अलग संकट खड़ा हो गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से यूएई, बहरीन, कुवैत, कतर और सऊदी अरब में रहने वाले करीब 90 लाख भारतीय प्रवासियों की चिंता बढ़ गई है।

    पश्चिम एशिया में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात बनने के बाद अमेरिका ने क्षेत्र के लिए दूसरी सबसे ऊंची श्रेणी की यात्रा चेतावनी जारी की है। वहीं, यूरोपीय विमानन सुरक्षा एजेंसी ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के लिए अपनी विमानन चेतावनी को 30 सितंबर तक बढ़ा दिया है।

    अमेरिका-ईरान तनाव से क्या हो सकता है असर?

    इन घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने पर हवाई यात्रा, कारोबार और आवाजाही प्रभावित हो सकती है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, ऐसे में किसी बड़े सैन्य टकराव का असर उनके रोजगार, यात्रा और सुरक्षा पर पड़ सकता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओवल ऑफिस में कहा कि एक महीने की शांति खत्म करने की वजह यह थी कि ईरान अपने रडार और मिसाइल सिस्टम को दोबारा तैयार करने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेनाएं एक और हमले के लिए तैयार हैं। दूसरी ओर, ईरान की तरफ से भी लगातार जवाबी हमले किए जाने की बात कही गई है।

    आगे की तस्वीर क्यों अहम है?

    भारतीयों के लिए मौजूदा स्थिति दो मोर्चों पर चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका में ईबी-1 वीजा की उपलब्धता और प्राथमिकता तारीखों पर नजर रखना जरूरी होगा, जबकि खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा और उड़ानों से जुड़े घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे।

    यदि अमेरिका-ईरान तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर खाड़ी में रहने वाले भारतीयों के साथ-साथ वहां से जुड़े व्यापार और यात्रा पर भी पड़ सकता है। वहीं, अमेरिका में ग्रीन कार्ड चाहने वाले भारतीयों के लिए वीजा बुलेटिन में आने वाले बदलाव यह तय करेंगे कि उनकी प्रतीक्षा अवधि कितनी बढ़ती है।

  • मोहम्मद मुइज्जू की यात्रा से पहले मालदीव की सैन्य विमान देने की तैयारी में पाकिस्तान?

    मोहम्मद मुइज्जू की यात्रा से पहले मालदीव की सैन्य विमान देने की तैयारी में पाकिस्तान?


    नई दिल्ली।
    मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की अक्टूबर में प्रस्तावित पाकिस्तान यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर पाकिस्तान की तैयारियों का एक कथित गोपनीय दस्तावेज सामने आया है। दस्तावेज के मुताबिक, पाकिस्तान मालदीव को अपने इस्तेमाल किए हुए सैन्य विमान देने के प्रस्ताव पर काम कर रहा है। इसके अलावा मालदीव की वायुसेना के लिए बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण, तकनीकी और वित्तीय सहायता देने की योजना भी प्रस्तावित है।

    दस्तावेज में इस पूरे प्रयास को दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध मजबूत करने की दिशा में उठाए जाने वाले कदम के तौर पर बताया गया है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों ने इसके रणनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं।

    13 अगस्त की चिट्ठी में क्या है?

    दावे के मुताबिक, 13 अगस्त 2026 को पाकिस्तान स्थित मालदीव के उच्चायोग ने रावलपिंडी स्थित पाकिस्तान रक्षा मंत्रालय को एक गोपनीय पत्र भेजा। इस पत्र की जानकारी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई गई।

    दस्तावेज के अनुसार, 20 से 22 अक्टूबर के बीच मालदीव के साथ एक बड़ी सैन्य डील को लेकर तैयारियां की जा रही हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर समेत संबंधित विभाग इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में बताए गए हैं।

    पत्र में यह सुझाव भी दिया गया है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा के दौरान समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर की घोषणा की जा सकती है।

    सैन्य विमान के साथ ट्रेनिंग और तकनीकी मदद का प्रस्ताव

    गोपनीय दस्तावेज में केवल सैन्य विमान उपलब्ध कराने की बात ही नहीं है। प्रस्ताव में मालदीव की वायुसेना के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने, प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और तकनीकी सहायता देने का भी उल्लेख है।

    इसके साथ वित्तीय सहयोग की संभावना भी बताई गई है। यानी पाकिस्तान का प्रस्ताव केवल सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि मालदीव के रक्षा ढांचे में अपनी भूमिका बढ़ाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।

    रक्षा विशेषज्ञ ने भारत की सुरक्षा से जोड़ा मामला

    रक्षा मामलों के जानकार कर्नल सीबी भगत का कहना है कि भारत और मालदीव के बीच पहले से अच्छे संबंध हैं। उनके मुताबिक, ऐसे में पाकिस्तान की ओर से मालदीव के साथ सैन्य उपकरणों की डील की कोशिश को केवल सामान्य रक्षा सहयोग के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    उनका मानना है कि हिंद महासागर में भारत के बेहद करीब स्थित मालदीव की वायुसेना में पाकिस्तानी सैन्य विमानों की मौजूदगी क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को प्रभावित कर सकती है। भगत के अनुसार, इसके पीछे भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पैदा करने की कोशिश हो सकती है।

    पाकिस्तान खुद चीन पर कितना निर्भर?

    पाकिस्तान के रक्षा क्षेत्र की अपनी सीमाएं भी इस प्रस्ताव के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। रक्षा उत्पादन के मामले में पाकिस्तान का सैन्य औद्योगिक ढांचा सीमित है और वह अपने प्रमुख हथियारों की जरूरत के लिए चीन पर काफी निर्भर है।

    दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के प्रमुख हथियारों के आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत रही।

    ऐसे में मालदीव को सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने की पाकिस्तान की कोशिश को क्षेत्रीय रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, इस प्रस्ताव का वास्तविक स्वरूप और दोनों देशों के बीच अंतिम समझौता होने की स्थिति आगे की बातचीत पर निर्भर करेगी।

    मुइज्जू की अक्टूबर यात्रा पर नजर

    मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की अक्टूबर में प्रस्तावित पाकिस्तान यात्रा इस पूरे घटनाक्रम के लिहाज से अहम मानी जा रही है। यदि रक्षा सहयोग को लेकर सहमति बनती है, तो यात्रा के दौरान किसी समझौते या MoU की घोषणा की संभावना जताई गई है।

    फिलहाल सामने आए दस्तावेज में प्रस्तावित रक्षा सहयोग की जानकारी है। इसे अंतिम सैन्य समझौता मानने से पहले दोनों देशों की आधिकारिक पुष्टि और आगे की कार्रवाई का इंतजार करना होगा।

  • पाकिस्तान के साथ नो डील…. बेल्जियम के PM ने मानी भारत की बात, हुए 10 बड़े समझौते

    पाकिस्तान के साथ नो डील…. बेल्जियम के PM ने मानी भारत की बात, हुए 10 बड़े समझौते


    नई दिल्ली।
    ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत (India) लगातार आक्रामक तरीके से पाकिस्तान (Pakistan) को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। इसी कड़ी में भारत ने बेल्जियम (Belgium) को कहा कि वह पाकिस्तान के साथ किसी प्रकार का रक्षा समझौता (Defence Agreement) नहीं करे और न ही किसी प्रकार की रक्षा तकनीक का हस्तांतरण करे। बेल्जियम ने इस पर सहमति व्यक्त करते हुए भारत को आश्वस्त किया है।


    बेल्जियम ने मानी भारत की बात

    सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बेल्जियम के रक्षा मंत्री थियो फ्रैंकन के साथ बातचीत के दौरान यह बात रखी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को रक्षा तकनीक देने का मतलब है कि उसका दुरुपयोग होना। यह तकनीकें आतंकियों तक पहुंच सकती हैं। इसलिए बेल्जियम उसे कोई तकनीक नहीं दे। बेल्जियम ने इस पर सहमति प्रकट की है। उन्होंने भारत को आश्वस्त किया कि पाकिस्तान के साथ ऐसा कोई करार बेल्जियम नहीं करेगा।


    जापान को भी किया था आगाह

    मौजूदा समय में बेल्जियम के साथ पाकिस्तान का कोई रक्षा समझौता नहीं है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि वह इसके लिए प्रयासरत है। बता दें कि पिछले दिनों जब जापान के रक्षा मंत्री भारत आए थे तो भारत ने उन्हें भी आगाह किया था कि वे पाक को कोई रक्षा तकनीक हस्तांतरित नहीं करें। वहीं, रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ ने बेल्जियम की रक्षा कंपनियों से आग्रह किया कि वे साझा सुरक्षा व समृद्धि के लिए विशिष्ट रक्षा उत्पादों के संयुक्त विकास और उत्पादन में भारत की विनिर्माण क्षमता और अपनी तकनीकी विशेषज्ञता का भी लाभ उठाएं। फ्रैंकन ने संयुक्त प्रयासों के माध्यम से दोनों देशों की सेनाओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत यात्रा पर आए बेल्जियम के रक्षा एवं विदेश व्यापार मंत्री थियो फ्रैंकन संग द्विपक्षीय वार्ता की। इस दौरान दोनों पक्षों ने रक्षा व औद्योगिक सहयोग के सभी पहलुओं की समीक्षा की तथा सहयोग को गहरा करने पर सहमति जताई। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि दोनों मंत्रियों ने रक्षा सहयोग वार्ता, यात्राओं, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देने पर सहमति जताई है।


    चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने में भारत सहायक

    बेल्जियम के रक्षा और व्यापार मंत्री थियो फ्रेंकेन ने भारत की बढ़ती सैन्य क्षमताओं के रणनीतिक महत्व पर बल देते हुए कहा है कि भारत के रक्षा-औद्योगिक आधार के विस्तार में उनके देश का प्रत्यक्ष सुरक्षा हित जुड़ा हुआ है। मजबूत भारतीय रक्षा क्षेत्र दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता लाएगा। यह भारत को एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के सामने एक म उपयोगी संतुलनकर्ता बनाता है।


    भारत-बेल्जियम के हुए 10 समझौते

    1. रक्षा क्षेत्र में सहयोग की इच्छा
    2. बेल्जियम एवं भारत के रक्षा निर्माताओं के बीच एमओयू
    3. रिन्यूबल ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग
    4. सीबीआई और बेल्जियम संघीय पुलिस में समझौता
    5. कूटनीतिक प्रशिक्षण को करार
    6. ब्रुसेल्स में डिफेंस अटैची की नियुक्त
    7. फास्ट ट्रैक निवेश मैकेनिज्म की स्थापना
    8. व्यापार दोगुना करने की घोषणा
    9. इंडिया-बेल्जियम बिजनेस फोरम का गठन
    10. भारत और बेल्जियम के बीच कौंसुलर डायलाग की स्थापना

  • भारत की डिफेंस कंपनी से 768 करोड़ की डील में चूक, गई एस्टोनिया के रक्षा मंत्री की कुर्सी

    भारत की डिफेंस कंपनी से 768 करोड़ की डील में चूक, गई एस्टोनिया के रक्षा मंत्री की कुर्सी


    नई दिल्ली। यूक्रेन के लिए गोला-बारूद खरीदने की 70 मिलियन यूरो यानी करीब ₹768.50 करोड़ से अधिक की डिफेंस डील विवादों में घिर गई है। इस मामले की राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पेवकुर 2022 से रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

    विवाद उस समय सामने आया, जब डील में भारत के स्वामित्व वाली एक ऐसी कंपनी को शामिल किया गया, जिसका इससे पहले आर्टिलरी शेल्स बेचने का कोई रिकॉर्ड नहीं था। पेवकुर ने बुधवार को इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि वह इस डिफेंस डील की जिम्मेदारी ले रहे हैं।

    इटली की कंपनी से हुआ था करार
    मामला 2024 में हुए उस समझौते से जुड़ा है, जिसे एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इनवेस्टमेंट्स ने इटली में रजिस्टर्ड Datasel SRL नाम की कंपनी के साथ किया था। इसी साल Datasel को भारत की Neco Defence Munitions ने खरीद लिया था।

    इस डील का उद्देश्य यूक्रेन के लिए तोपखाने के गोले उपलब्ध कराना था। एस्टोनिया यूक्रेन का मजबूत समर्थक रहा है और उस समय यूक्रेनी सेना को गोला-बारूद की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा था।

    एस्टोनिया ने इस खरीद के लिए यूरोपीय संघ की European Peace Facility से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल किया। डील के तहत कंपनी को बड़ी रकम एडवांस में भी दी गई थी।

    डिलीवरी में होती रही देरी, क्वालिटी पर भी सवाल
    करार के बाद उम्मीद थी कि कुछ ही महीनों में गोला-बारूद यूक्रेन पहुंच जाएगा। हालांकि, उत्पादन से जुड़ी कथित समस्याओं के चलते डिलीवरी लगातार टलती रही। आखिरकार 2025 में जब गोला-बारूद की आपूर्ति हुई तो उसकी गुणवत्ता को लेकर भी सवाल खड़े हो गए।

    एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इनवेस्टमेंट्स के डायरेक्टर ने भी माना कि यह सौदा नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “अगर मैं एक घर बनाना शुरू करूं और ऐसी कंपनी को काम पर रखूं, जिसने पहले कभी घर नहीं बनाया हो, तो यह संदेह होना स्वाभाविक है कि वह घर पूरा नहीं कर पाएगी।”

    रक्षा मंत्री बोले- हर डील की निगरानी संभव नहीं
    हालांकि, हन्नो पेवकुर ने रक्षा मंत्रालय के भीतर जिम्मेदारियों के बंटवारे का बचाव किया। उनका कहना था कि रक्षा मंत्री व्यक्तिगत रूप से हर डिफेंस डील की निगरानी नहीं करता।

    एस्टोनिया के प्रधानमंत्री Kristen Michal ने भी कहा कि उन्हें इस मामले में पेवकुर की कोई व्यक्तिगत गलती नजर नहीं आती। इसके बावजूद राजनीतिक जिम्मेदारी तय किए जाने की स्थिति में रक्षा मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

    इस्तीफे के बाद पेवकुर ने कहा कि उन्होंने यह कदम इस विश्वास के साथ उठाया है कि एस्टोनिया ने अपनी राष्ट्रीय रक्षा को मजबूत करने के लिए सही फैसले लिए हैं।