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  • होर्मुज की जंग में अब दक्षिण कोरिया की एंट्री, सैन्य संसाधन तैनात करने की तैयारी

    होर्मुज की जंग में अब दक्षिण कोरिया की एंट्री, सैन्य संसाधन तैनात करने की तैयारी


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ रहा है। हालिया हमलों के बाद तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। वहीं, अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत भी अब पटरी से उतरती नजर आ रही है। इस बीच दक्षिण कोरिया होर्मुज को लेकर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है।

    दक्षिण कोरिया होर्मुज में ‘फ्रीडम ऑफ नेविगेशन’ यानी जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में सहयोग के लिए सैन्य संसाधन तैनात करने पर विचार कर रहा है। दक्षिण कोरियाई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन संसाधनों को इस साल के अंत से पहले भेजने का लक्ष्य रखा गया है। रिपोर्ट्स में सरकारी और सैन्य सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।

    संसद से मंजूरी लेने की तैयारी
    दक्षिण कोरिया के कई मीडिया संस्थानों के अनुसार, सरकार सैन्य संसाधनों की संभावित तैनाती के लिए संसद की मंजूरी लेने की प्रक्रिया तैयार कर रही है। कैबिनेट की समीक्षा के बाद इसी महीने संसद में सहमति प्रस्ताव पेश करने की योजना है।

    सरकार के सामने कई विकल्प हैं। इनमें समुद्री गश्ती विमान भेजना, जहाजों को लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध कराना और समुद्री बारूदी सुरंगों का पता लगाने तथा उन्हें हटाने वाली यूनिट तैनात करना शामिल है। इसके अलावा सियोल अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस समेत कई देशों के साथ अपने संभावित योगदान के आकार और स्वरूप को लेकर भी बातचीत कर रहा है।

    राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा- अभी फैसला नहीं
    दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति कार्यालय ब्लू हाउस ने कहा है कि सियोल होर्मुज में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता में योगदान देने के व्यावहारिक तरीकों पर चर्चा कर रहा है। हालांकि, कार्यालय ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को तथ्यों से अलग बताया है, जिनमें दावा किया गया था कि सरकार ने सैन्य तैनाती का अंतिम फैसला ले लिया है।

    ट्रंप के बयान के बाद बदले समीकरण
    दक्षिण कोरिया का यह कदम अमेरिका के साथ उसके संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा था कि उन्होंने अमेरिका-दक्षिण कोरिया के संयुक्त सैन्य अभ्यासों को कुछ हद तक इसलिए कम किया, क्योंकि दक्षिण कोरिया ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका की मदद करने से इनकार कर दिया था।

    अब होर्मुज में संभावित सैन्य योगदान को अमेरिका के साथ रिश्तों में आई तल्खी कम करने की दिशा में उठाए जा रहे कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

  • भारत-बेल्जियम की दोस्ती को मिली नई धार मोदी बोले- बदलती दुनिया में दोनों देश स्वाभाविक साझेदार

    भारत-बेल्जियम की दोस्ती को मिली नई धार मोदी बोले- बदलती दुनिया में दोनों देश स्वाभाविक साझेदार


    नई दिल्ली। नई दिल्ली में भारत और बेल्जियम के बीच रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में अहम बातचीत हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता की और दोनों देशों के बीच सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों पर चर्चा की। इसके बाद दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में द्विपक्षीय संबंधों को लेकर अपनी बात रखी। इस दौरान पीएम मोदी ने भारत और बेल्जियम के रिश्तों को इतिहास से जुड़ा हुआ बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच साझा स्मृतियां और लोकतांत्रिक मूल्यों की समानता इस साझेदारी को खास बनाती है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और बेल्जियम के संबंधों की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बेल्जियम में हजारों भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान को उन्होंने दोनों देशों की साझा स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि आज लोकतांत्रिक मूल्य बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और लोगों के बीच मजबूत संपर्क भारत और बेल्जियम को स्वाभाविक साझेदार बनाते हैं।

    पीएम मोदी ने बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की पहली भारत यात्रा का स्वागत करते हुए उनके भारत से पुराने संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डी वेवर लंबे समय तक एंटवर्प के मेयर रहे हैं और इस दौरान उन्होंने वहां रहने वाले बड़े भारतीय समुदाय के साथ ही भारत और बेल्जियम के बीच हीरा कारोबार को भी समर्थन दिया।

    प्रधानमंत्री मोदी ने करीब एक दशक पहले अपनी बेल्जियम यात्रा को याद करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में दोनों देशों की साझेदारी का दायरा तेजी से बढ़ा है। अब यह सहयोग पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है बल्कि रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भी दोनों देश साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने जोरावर टैंक जैसे आधुनिक रक्षा उपकरणों पर सहयोग का जिक्र किया। इसके साथ ही आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में दुनिया के बड़े ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट्स में से एक विकसित किए जाने की बात भी कही।

    बदलते वैश्विक हालात का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि दुनिया इस समय बड़े उथल पुथल के दौर से गुजर रही है। कई क्षेत्रों में संघर्ष की स्थिति बनी हुई है और खाद्य ईंधन तथा सप्लाई चेन समेत कई क्षेत्रों में अनिश्चितता का असर दिखाई दे रहा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच भारत की अर्थव्यवस्था अपनी गति बनाए हुए है। उन्होंने पिछले क्वार्टर में 7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की विकास यात्रा दुनिया के लिए विश्वास और नए अवसरों का आधार बन रही है।

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक सहयोग को लेकर भी प्रधानमंत्री ने महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में हुए भारत-यूरोपीय संघ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का जिक्र करते हुए इसे दोनों पक्षों के लिए नई संभावनाओं का रास्ता बताया। पीएम मोदी के मुताबिक आर्थिक प्रगति और इस समझौते ने भारत और यूरोप के आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। भारत और बेल्जियम के बीच हुई बातचीत में रक्षा खाद्य क्षेत्र क्लीन एनर्जी और अन्य क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने से जुड़े समझौतों और एमओयू का भी आदान प्रदान हुआ।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत और बेल्जियम की साझेदारी आने वाले समय में और व्यापक हो सकती है। दोनों देशों के बीच बढ़ता आर्थिक सहयोग रणनीतिक साझेदारी और लोगों के बीच संपर्क इस रिश्ते को नई मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • पश्चिम के संपन्न देशों में भविष्य को लेकर पहले से ज्यादा डरे हुए हैं लोग, जानें इसकी वजह….

    पश्चिम के संपन्न देशों में भविष्य को लेकर पहले से ज्यादा डरे हुए हैं लोग, जानें इसकी वजह….


    लंदन/न्यूयॉर्क।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artifical Intelligence) से नौकरियों पर खतरा, जलवायु परिवर्तन, युद्ध की आहट और गहराता आर्थिक ध्रुवीकरण (Economic polarization)…। पश्चिमी दुनिया (Western world- अमेरिका और यूरोप) के संपन्न देशों में हर हफ्ते सामने आने वाले ओपिनियन पोल्स एक ही बात दोहरा रहे हैं, लोग भविष्य को लेकर पहले कभी इतने ज्यादा आशंकित और डरे हुए नहीं थे।

    2026 में सामने आए एक सर्वे में 5 में से 2 अमेरिकी नागरिकों (40%) ने आशंका जताई कि 2276 में अपनी स्थापना के 500 साल पूरे होने तक अमेरिका शायद एक देश के तौर पर बचेगा ही नहीं। अधिकांश लोगों का मानना है कि 2050 तक उनका देश कमजोर, आर्थिक रूप से पिछड़ा और राजनीतिक तौर पर और बंटा हुआ होगा। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अमीर देश संकटग्रस्त मुल्कों के साथ कतार में खड़े हैं। लेकिन इसके उलट, 55 देशों में किए गए यूनिसेफ और ग्लोबल सर्वे के आंकड़े बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करते हैं।

    इंडोनेशिया, कीनिया, सऊदी अरब और कोलंबिया जैसे मध्यम आय वाले देशों के नागरिक अपने कल को लेकर पश्चिमी रईसों के मुकाबले कई गुना ज्यादा आशावादी हैं। साइंस जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित शोध के अनुसार, भविष्य को लेकर उम्मीद इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आज आपके पास कितनी दौलत हैं, बल्कि यह इस बात पर टिकी है कि आप किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


    उम्र का 55वां साल : जहां से शुरू होता है निराशावाद का चक्र

    55 साल की उम्र पार करते ही निराशावादी सोच रखने वाले लोग बहुसंख्यक हो जाते हैं।
    पश्चिमी देशों की बूढ़ी आबादी : ब्रिटेन (31%), अमेरिका (30%), फ्रांस (34%) और जर्मनी (38%) में 55 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की आबादी सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि ये देश सबसे ज्यादा निराशावादी हैं। बुल्गारिया, बोस्निया, ऑस्ट्रिया और बेल्जियम दुनिया के सबसे कम उम्मीद वाले देशों में शीर्ष पर हैं।

    युवा देशों में भारी उत्साह : इसके विपरीत, युवा आबादी वाले देशों में भविष्य को लेकर जबर्दस्त सकारात्मकता है। कीनिया (सिर्फ 7.5% आबादी 55+), सीरिया (11%), सऊदी अरब (13%) और दक्षिण अफ्रीका (12%) दुनिया के सबसे ज्यादा आशावादी देशों में शामिल हैं।


    लोकतांत्रिक देशों में निराशावाद ज्यादा क्यों?

    हैरानी की बात यह है कि नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी और अवसरों की समानता के बावजूद लोकतांत्रिक देशों में अधिनायकवादी देशों की तुलना में भविष्य को लेकर निराशा ज्यादा दर्ज की जाती है। इसकी तीन मुख्य वजहें हैं:

    चुनावी वादों का भारी दबाव : लोकतंत्र में नेता हर चुनाव में जिंदगी बेहतर बनाने के बड़े-बड़े वादे करते हैं। जब वास्तविक जीवन में वे वादे पूरे नहीं होते, तो नागरिकों में गहरा असंतोष पैदा होता है।

    स्वतंत्र मीडिया का फोकस : स्वतंत्र प्रेस लगातार व्यवस्था की खामियों, घोटालों और समस्याओं को उजागर करती है, जिससे जनता के बीच लगातार नकारात्मकता का माहौल बना रहता है।

    कम संपन्न में आगे बढ़ने की संभावनाएं ज्यादा : आप जितने कम संपन्न होते हैं, आपके ऊपर उठने की उम्मीद उतनी ही ज्यादा होती हैं। आशावाद इस बात से तय नहीं होता कि आज आपके पास क्या है, बल्कि इससे तय होता है कि आप भविष्य में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। लोग अपने निजी जीवन को लेकर आमतौर पर आश्वस्त रहते हैं, लेकिन पूरे देश या समाज के भविष्य को लेकर भारी चिंता जताते हैं।

  • मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात पर अमेरिका बोला-भारत-ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता नहीं….

    मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात पर अमेरिका बोला-भारत-ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता नहीं….


    वॉशिंगटन
    । अमेरिका (America) के विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Foreign Minister Marco Rubio) ने बुधवार को कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान (India and Iran) के बीच किसी व्यापार समझौते (Trade Agreement) को लेकर बातचीत हो रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं। रूबियो ने यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Iranian President Masoud Pezeshkian) के बीच बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर हुई मुलाकात को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में की। यह सवाल फॉक्स न्यूज रेडियो के ‘द ब्रायन किल्मीड शो’ में उनसे पूछा गया था।

    कार्यक्रम के दौरान प्रस्तोता ब्रायन किल्मीड ने कहा कि पीएम मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात में ऐसा लगा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की तैयारी हो रही है। इसके जवाब में रूबियो ने कहा, ”खैर, मुझे नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता है। जाहिर तौर पर, सभी देश अपनी-अपनी विदेश नीति तय करते हैं और दुनिया के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं।”


    ईरान की मदद करने वाले देशों पर अमेरिका क्या करेगा कार्रवाई?

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, ”मेरा मतलब है कि हम भी ईरान की सरकार के कुछ लोगों के साथ मिले हैं। कुछ चर्चाओं के संदर्भ में हमारी उनसे बातचीत और संपर्क हुआ है।” रूबियो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश को ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने कहा, ”किसी भी देश को ऐसे तंत्र बनाने में उनकी मदद नहीं करनी चाहिए, जिनके जरिए वे राजस्व जुटा सकें और फिर उसका इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के साथ परमाणु हथियार बनाने की कोशिश में कर सकें। और अगर देश ऐसा करने का फैसला करते हैं, तो हमें उन पर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा।”


    पीएम मोदी से पेजेशकियन ने क्यों की मुलाकात?

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बैठक की थी। ईरान की अर्द्ध सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने आपसी रिश्तों की मौजूदा स्थिति का जायजा लिया और दोनों देशों के लिए अहम क्षेत्रों में ईरान और भारत के बीच आपसी सहयोग को मजबूत करने की जरूरत पर बल दिया गया।

    पश्चिम एशिया संकट के बीच दोनों शीर्ष नेताओं में संवाद कायम रहा है। जून में, पीएम मोदी और पेजेशकियन के बीच फोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें ईरानी राष्ट्रपति ने भारतीय पीएम को पश्चिम एशिया में हो रही घटनाओं और आगे की राह के बारे में जानकारी दी थी। बातचीत के दौरान, पीएम मोदी ने संघर्ष खत्म करने के लिए बनी सहमति का स्वागत किया था और स्थायी शांति और स्थिरता के लिए लगातार कोशिशों की जरूरत को दोहराया।

  • कोरोना के बाद इबोला ले रहा महामारी का रूप…. कांगो में 3 हजार से ज्यादा लोगों की मौत

    कोरोना के बाद इबोला ले रहा महामारी का रूप…. कांगो में 3 हजार से ज्यादा लोगों की मौत


    ब्राजाविले।
    अफ्रीका महाद्वीप (Africa Continent) के कुछ देशों में दावा किया जा रहा है कि कोरोना (Corona) के बाद इबोला महामारी (Ebola Epidemic) का रुप अख्तियार करके लोगों को असमय काल के गाल में खींच रही है. कुछ घंटे पहले जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खासकर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (Democratic Republic of Congo) में इबोला के प्रकोप से मरने वालों की संख्या 3,000 से ज्यादा हो गई है. हजारों मौतों के बाद डब्ल्यूएचओ से लेकर कई देशों की सरकारें तक स्तब्ध हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कांगो में मृतकों का आंकड़ा बढ़कर 3,007 पहुंच चुका है, जबकि इबोला से संक्रमित मरीजों की तादाद अब 6,186 है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इस साल देश की अब तक की सबसे भयानक महामारी उत्तर-पूर्व में तेजी से फैलती जा रही है. इसने लाखों लोगों को अपनी चपेट में लिया है. इस बीमारी से मरने वालों का आंकड़ा लोगों को डरा रहा है।


    शहर दर शहर इबोला का ‘कहर’

    गुरुवार के बुलेटिन में पीड़ितों और मृतकों का आंकड़ा और बढ़ सकता है. आपको बताते चलें कि इस बीमारी के फैलने की आधिकारिक घोषणा 15 मई को इतुरी प्रांत में हुई थी, हालांकि कुछ स्वास्थ्य अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि इसका प्रकोप शायद जनवरी, 2026 में ही शुरू हो गया था.

    कांगो के अधिकारियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन और सहायता समूहों की इसे रोकने की कोशिशों के बावजूद, यह बीमारी छह प्रांतों में फैल चुकी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लचर निगरानी सिस्टम, असुरक्षा और समुदायों के आपसी विरोध के कारण मरीजों की जल्दी पहचान करने और उनके इलाज की कोशिशों में रुकावट आई है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि लगभग 60% मौतें अस्पतालों के बाहर होती हैं, जिससे मरीजों की मौत होने से पहले इबोला पीड़ित मामलों का पता लगाने में आने वाली चुनौतियों का पता चलता है. साल 2026 में इबोला का प्रकोप, 2018-2020 की महामारी को पीछे छोड़ते हुए कांगो के इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे घातक रूप लेता जा रहा है. कांगो के लोगों का मानना है कि इस बार इबोला का प्रकोप साल 2014-2016 में पश्चिम अफ्रीका में फैले प्रकोप से घातक हो सकता है. एक दशक पहले गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन में 28,600 से ज्यादा लोग इबोला से संक्रमित हुए थे तब 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।


    कब-कब दहशत में आई दुनिया?

    WHO और देश की सरकारें किसी बीमारी को महामारी घोषित करती हैं. बीती कुछ सदियों की बड़ी महामारियों की बात करें तो अमेरिका सरकार की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक कोविड नाम की महामारी से पहले 1918-1919 की इन्फ्लुएंजा महामारी को मानव इतिहास की सबसे घातक बीमारी और महामारी माना गया था।

    108 साल पहले इन्फ्लुएंजा वायरस ने एक ही समय में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखा और उसने अप्रत्याशित रूप से लोगों की जान ली थी. उस समय 5 से 10 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. उस महामारी में बीमारी के लक्षण और उसके फैलने का तरीका भी कई मायनों में अप्रत्याशित था. इसी तरह 1957-58 का एशियाई फ्लू, 1968-69 का हांगकांग फ्लू और 2009-10 में स्वाइन फ्लू नाम की बीमारी ने दुनिया को डराया था।

    कोरोनावायरस महामारी के कारण दुनिया भर में आधिकारिक तौर पर 71 लाख लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी. WHO और अन्य स्वतंत्र डेटा एजेंसियों के मुताबिक महामारी के दौरान हुई अप्रत्यक्ष या अतिरिक्त मौतों को भी शामिल करें तो असल आंकड़ा 1.8 करोड़ से 3 करोड़ के बीच होने का अनुमान है। सालों पहले न तो मेडिकल साइंस आज की जैसी समृद्ध थी और न ही जीवन रक्षक दवाएं और मेडिकल उपकरण थे, तब इतनी मौतें होना समझ में आता है, लेकिन आज इतनी दवाओं और टीके होने के बावजूद तमाम वायरस से लोगों का डरना समझ से परे है।

  • यूक्रेन में मिसाइलों के साए में पढ़ाई, जमीन के नीचे बने 74 स्कूल, बंकरों में तैयार हो रही नई पीढ़ी

    यूक्रेन में मिसाइलों के साए में पढ़ाई, जमीन के नीचे बने 74 स्कूल, बंकरों में तैयार हो रही नई पीढ़ी


    नई दिल्ली। चार साल से ज्यादा समय से रूस के ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना कर रहे यूक्रेन में बच्चों की पढ़ाई का तरीका भी युद्ध के बीच बदल गया है। देश में अब 74 पूरी तरह भूमिगत स्कूल संचालित हो रहे हैं, जहां जमीन के ऊपर से सिर्फ खेल का मैदान या फुटबॉल टर्फ दिखाई देता है, लेकिन कई मीटर नीचे कंक्रीट की मजबूत दीवारों के बीच बच्चों की कक्षाएं चल रही हैं। सुरंगनुमा गलियारों में बने क्लासरूम, बेंचों पर बैठे बच्चे और ब्लैकबोर्ड पर लिखे नए पाठ इस बात की तस्वीर पेश करते हैं कि युद्ध के बीच भी शिक्षा को जारी रखने की कोशिश कैसे हो रही है।

    दक्षिणी यूक्रेन के औद्योगिक शहर जापोरिजिया में स्कूल खुलने का दृश्य किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा नजर आता है। शहर युद्ध के मोर्चे से महज 15 किलोमीटर दूर है और लगातार ड्रोन व मिसाइल हमलों के बावजूद यहां बच्चों की पढ़ाई को जारी रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। माता-पिता के लिए ये भूमिगत स्कूल डर के बीच सुरक्षा और बच्चों की शिक्षा दोनों का भरोसा बन गए हैं।

    ‘पाताल में गए बिना बच्चों को पढ़ाना मुश्किल’

    39 वर्षीय किराना दुकानदार ऑलेक्सांद्र लागिन के दो बेटे भी जमीन के नीचे बने स्कूल में पढ़ते हैं। उनका कहना है कि ड्रोन और मिसाइल हमलों के दौर में बच्चों को सुरक्षित रखते हुए सामान्य तरीके से पढ़ाना बेहद मुश्किल हो गया है। जापोरिजिया ने इस चुनौती से निपटने के लिए भूमिगत स्कूलों का विकल्प अपनाया है।

    दिलचस्प यह है कि युद्ध क्षेत्र के इतने करीब होने के बावजूद जापोरिजिया बच्चों को निर्बाध शिक्षा देने के मामले में राजधानी कीव से बेहतर तैयार नजर आता है।

    कीव में सायरन बजते ही पढ़ाई बंद

    कीव के स्कूलों में हवाई हमले का अलर्ट शिक्षा व्यवस्था को सीधे प्रभावित करता है। यहां एक स्कूल के दिन में औसतन 158 मिनट तक हवाई सायरन बजते रहते हैं। सायरन शुरू होते ही बच्चों को सामान्य बेसमेंट में ले जाया जाता है। वहां जगह सीमित होने के कारण पढ़ाई रुक जाती है और बच्चे अलर्ट खत्म होने का इंतजार करते हैं।

    इसके उलट जापोरिजिया में यूरोपीय फंडिंग की मदद से 10 अत्याधुनिक भूमिगत स्कूल बनाए गए हैं। इन स्कूलों की खास डिजाइन के कारण हवाई हमले के सायरन के दौरान भी कक्षाएं जारी रखी जा सकती हैं।

    बंकर में सुरक्षा के साथ पढ़ाई की पूरी व्यवस्था

    भूमिगत स्कूलों को सिर्फ कंक्रीट की मोटी दीवारों से सुरक्षित नहीं बनाया गया है, बल्कि यहां सामान्य स्कूल जैसी सुविधाओं के साथ सुरक्षा की आधुनिक तकनीक भी इस्तेमाल की गई है।

    इन स्कूलों में ऐसे अत्याधुनिक एयर डक्ट लगाए गए हैं, जो रेडिएशन और जहरीले धुएं को फिल्टर करने में सक्षम हैं। रूसी हमलों के दौरान बिजली का ग्रिड ठप होने की स्थिति में हेवी-ड्यूटी डीजल जनरेटर अपने आप चालू हो जाते हैं। बच्चों के लिए वेंटिलेशन पाइपों की व्यवस्था कंक्रीट की दीवारों के सहारे की गई है, जबकि इन्हीं सुरक्षित गलियारों और जगहों के बीच वे खेलते भी हैं।

    छात्र बोले- सायरन से डर नहीं, खेल छूटने का अफसोस

    8वीं कक्षा के छात्र डामिर का कहना है कि उसे भूमिगत स्कूल में पढ़ना अच्छा लगता है और यहां उसे डर नहीं लगता। हालांकि, फुटबॉल खेलते समय अगर सायरन बज जाए तो उसे खेल बीच में छोड़कर नीचे जाना पड़ता है और यही बात उसे खराब लगती है।

    युद्ध के माहौल में पले-बढ़ रहे बच्चों के लिए अब सायरन, बंकर और हमले रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।

    सैनिक पिता: अब मोर्चे पर कम चिंता होती है

    8वीं कक्षा में पढ़ने वाले 13 वर्षीय डैनिलो के पिता दिमित्रो सिजीख युद्ध के मोर्चे पर तैनात हैं। बेटे के सुरक्षित भूमिगत स्कूल में पढ़ने से उन्हें भी राहत मिली है। उनका कहना है कि बेटे की सुरक्षा को लेकर भरोसा होने के कारण वे मोर्चे पर अपने कर्तव्य का निर्वहन अधिक निश्चिंत होकर कर पा रहे हैं।

    युद्ध का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी

    सुरक्षित स्कूलों के बावजूद युद्ध का मानसिक असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। कीव की रिसर्च संस्था ‘सीडोस’ की शिक्षा विश्लेषक टेटियाना झेरियोबकिना के मुताबिक युद्ध से पैदा हुआ मानसिक तनाव और लगातार बना डर परीक्षाओं में बच्चों के प्रदर्शन को प्रभावित कर रहा है। तनाव और भय के कारण उनके टेस्ट स्कोर में गिरावट देखने को मिल रही है।

    जापोरिजिया के एक स्कूल की प्रिंसिपल हलीना वोल्कोवा गलियारे से गुजरते एक बच्चे को गले लगाते हुए कहती हैं कि वे मौजूदा हालात को भयावह या कयामत का मंजर कहकर नहीं देखते, क्योंकि यही अब उनकी जिंदगी की वास्तविकता बन चुकी है।

    युद्ध ने यूक्रेन के बच्चों से सामान्य बचपन छीन लिया है, लेकिन इन भूमिगत स्कूलों में किताबें, ब्लैकबोर्ड और खेल के बीच उनकी पढ़ाई जारी है। जमीन के ऊपर युद्ध चल रहा है और जमीन के नीचे एक पूरी पीढ़ी अपने भविष्य की तैयारी कर रही है।

  • ट्रंप को कोर्ट से झटका: बर्थराइट सिटिजनशिप सीमित करने वाले आदेश पर रोक

    ट्रंप को कोर्ट से झटका: बर्थराइट सिटिजनशिप सीमित करने वाले आदेश पर रोक


    नई दिल्ली। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बर्थराइट सिटिजनशिप यानी अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों को नागरिकता देने के नियम को सीमित करने के मामले में बड़ा झटका लगा है। मैरीलैंड की संघीय जज डेबोरा बोर्डमैन ने बुधवार को ट्रंप प्रशासन के नए आदेश के अमल पर रोक लगा दी। यह रोक प्रवासी अधिकार संगठनों की मांग पर लगाई गई है।

    जज बोर्डमैन ने कहा कि संबंधित क्लास एक्शन मुकदमे के दायरे में आने वाले बच्चों पर ट्रंप का नया आदेश लागू करना लगभग निश्चित तौर पर असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इस वर्ग में शामिल बच्चे जन्म के समय अमेरिकी नागरिक हैं।

    ट्रंप प्रशासन की दलील भी नहीं मानी
    ट्रंप प्रशासन ने कोर्ट में दलील दी थी कि मुकदमा जल्दबाजी में दाखिल किया गया है, क्योंकि नए आदेश को लागू करने के लिए संबंधित सरकारी एजेंसियों की विस्तृत गाइडलाइन अभी जारी नहीं हुई है। सरकार के मुताबिक यह गाइडलाइन शनिवार तक जारी होने की उम्मीद थी।

    हालांकि, जज बोर्डमैन ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि आदेश की भाषा को देखते हुए उसके अमल पर तत्काल रोक लगाना जरूरी है। साथ ही एजेंसियों को आदेश के क्रियान्वयन से जुड़ी गाइडलाइन तैयार करने की अनुमति दी गई है।

    बर्थ टूरिज्म को निशाना बनाता है आदेश
    राष्ट्रपति ट्रंप ने 6 अगस्त को नया कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसका मुख्य निशाना बर्थ टूरिज्म था। इसमें ऐसी महिलाएं अमेरिका आती हैं जो वहां बच्चे को जन्म देकर बच्चे को जन्म के आधार पर अमेरिकी नागरिकता दिलाना चाहती हैं।

    आदेश में उन बच्चों को भी नागरिकता से वंचित करने की कोशिश की गई है, जिनके माता-पिता में से कोई अमेरिका में किसी विदेशी सरकार के लिए काम करता है। इसके अलावा धोखाधड़ी या किसी व्यावसायिक लेनदेन के जरिए नागरिकता हासिल करने की कोशिश वाले मामलों और कुछ ऐसे लोगों के बच्चों को भी आदेश के दायरे में रखा गया है, जिन्हें ‘एलियन एनिमी’ यानी विदेशी दुश्मन की श्रेणी में रखा गया है।

    इससे पहले भी ट्रंप की कोशिश को झटका लगा था
    जन्मसिद्ध नागरिकता को सीमित करने की यह ट्रंप प्रशासन की दूसरी कोशिश है। इससे पहले जून में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के 2025 के शुरुआती आदेश को लागू करने की उनकी कोशिश को खारिज कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की कोशिश संविधान के 14वें संशोधन में मौजूद सिटिजनशिप क्लॉज से टकराती है।

    तीन सरकारी एजेंसियों को दखल न देने का आदेश
    ताजा फैसले में जज बोर्डमैन ने अमेरिकी विदेश विभाग, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग और सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन जैसी सरकारी एजेंसियों को संबंधित बच्चों की नागरिकता में दखल नहीं देने का निर्देश दिया है।

    एजेंसियां इन बच्चों की नागरिकता को खारिज नहीं कर सकेंगी और न ही उसे मान्यता देने से इनकार कर सकेंगी। इस आदेश के साथ ट्रंप प्रशासन की बर्थराइट सिटिजनशिप को सीमित करने की कोशिश को एक बार फिर कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ा है।

  • नेपाल त्रासदी: मलबे से अब भी निकल रहे शव, अब तक 1093 लोगों की मौत, 4 हजार से ज्यादा लापता

    नेपाल त्रासदी: मलबे से अब भी निकल रहे शव, अब तक 1093 लोगों की मौत, 4 हजार से ज्यादा लापता


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) में आई भीषण बाढ़ (Severe floods) और भूस्खलन (Landslides) ने भारी तबाही मचाई है. हादसे के आठवें दिन भी राहत और बचाव का काम जारी है. मलबे के बीच से अब भी लोगों को बाहर निकाला जा रहा है. नेपाल पुलिस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मंगलवार रात 8 बजे तक इस आपदा में 1093 लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं, चार हजार से ज्यादा लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।

    दरअसल, यह हादसा 26 अगस्त को उत्तरी नेपाल में हुआ था. तेज बारिश के बाद कई इलाकों में अचानक बाढ़ आ गई. इसके साथ ही बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ. देखते ही देखते पानी और मलबे ने गांवों और कस्बों को अपनी चपेट में ले लिया. कई जगहों पर घर, सड़कें और दूसरी इमारतें मलबे में दब गईं।


    तीन महीने के लिए घोषित किया गया आपदा क्षेत्र

    नेपाल सरकार ने प्रभावित इलाके को कम से कम तीन महीने के लिए आपदा संकट क्षेत्र घोषित किया है. सरकार का कहना है कि इससे राहत और बचाव के लिए जरूरी संसाधन तेजी से पहुंचाए जा सकेंगे. साथ ही राहत टीमों की तैनाती भी बेहतर तरीके से की जा सकेगी।

    सरकार अब बचाव के साथ राहत और पुनर्वास पर भी जोर दे रही है. प्रभावित इलाकों में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी और बचाव दल लगाए गए हैं. टीमें लगातार मलबे में लोगों की तलाश कर रही हैं. लापता लोगों के परिवार अभी भी अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं।


    हेलीकॉप्टर से दिखी तबाही की तस्वीर

    चीन मीडिया ग्रुप (CMG) के एक रिपोर्टर ने सोमवार को हेलीकॉप्टर से प्रभावित इलाके का जायजा लिया. यह इलाका चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग-रसुवा सीमा चौकी के नेपाली हिस्से में है. आसमान से ली गई तस्वीरों में तबाही का बड़ा मंजर दिखाई दिया।

    इस रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा चौकी के पास नेपाल की तरफ कई गांव और छोटे कस्बे पूरी तरह तबाह हो गए हैं. कई गाड़ियां और इमारतें गहरे मलबे में दब गई हैं. जहां कभी लोगों की आवाजाही रहती थी, वहां अब चारों तरफ मिट्टी और मलबा नजर आ रहा है. कीचड़ से क्षेत्र में दलदल जैसे हालात बन गए हैं.

    तबाही से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में स्याब्रुबेंसी भी शामिल है. यह शहर सीमा चौकी से सीधी दूरी में 10 किलोमीटर से भी कम दूर है. आपदा से पहले यहां काफी चहल-पहल रहती थी. लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।

    हेलीकॉप्टर से इलाके का जायजा लेने वाले रिपोर्टर का कहना है कि शहर में आम लोगों की मौजूदगी बेहद कम दिखाई दी. वहां सिर्फ राहत और बचाव दल के सदस्य नजर आए. ये टीमें मलबे में जिंदगी की तलाश कर रही हैं।

    आठ दिन बीतने के बाद भी बचाव अभियान थमा नहीं है. मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश लगातार जारी है. हर गुजरते दिन के साथ चुनौती बढ़ रही है. इसके बावजूद रेस्क्यू टीम का सर्च ऑपरेशन जारी है. चार हजार से ज्यादा लोगों के लापता होने से उनके परिवारों की चिंता बढ़ी हुई है।


    नेपाल बाढ़ में लापता पांच लोगों के शव भारत में मिले

    नेपाल में आई अचानक बाढ़ में बहकर लापता हुए पांच नेपाली नागरिकों के शव उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में गंडक नदी से बरामद हुए. मंगलवार को सभी शवों को सोनौली बॉर्डर पर नेपाल पुलिस को सौंप दिया गया. मृतकों में दो महिलाएं और तीन पुरुष शामिल हैं. ये शव कुशीनगर के बरवा पट्टी और खड्डा इलाके से मिले थे. शवों को शाम करीब 4 बजे सोनौली लाया गया. इसके बाद नेपाल के बेलहिया थाने के प्रभारी सब-इंस्पेक्टर हरिराम डांगी को सौंप दिया गया।

    अधिकारियों के मुताबिक, शवों को नेपाल के बुटवल ले जाया गया है. वहां नेपाल पुलिस मृतकों की पहचान करेगी. इसके बाद शवों को उनके परिवारों को सौंपा जाएगा. नेपाल में लगातार हो रही बारिश और अचानक आई बाढ़ के कारण कई लोग बह गए हैं. सीमा से लगे भारतीय इलाकों में भी इसका असर देखने को मिल रहा है।

    नेपाल और उत्तर प्रदेश में लगातार बारिश के कारण महाराजगंज में कई नदियों का जलस्तर बढ़ गया है. वाल्मीकिनगर के गंडक बैराज से 1,50,200 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है. महाराजगंज में पिछले 24 घंटे में 33.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है. जिले में अब तक कुल 655.5 मिलीमीटर बारिश हो चुकी है।

    मंगलवार दोपहर 2 बजे गंडक नदी का अपस्ट्रीम जलस्तर 355.30 फीट और डाउनस्ट्रीम जलस्तर 352.60 फीट दर्ज किया गया. रोहिन नदी अभी खतरे के निशान से नीचे बह रही है. हालांकि महाव नाला खतरे के निशान से ऊपर है. इसका जलस्तर नौ फीट पहुंच गया है. खतरे का निशान पांच फीट है. राप्ती, चंदन और प्यास नदियों का जलस्तर भी बढ़ रहा है. हालांकि ये नदियां अभी खतरे के निशान से नीचे हैं।

    अपर जिलाधिकारी प्रशांत कुमार ने बताया कि प्रशासन पूरी स्थिति पर नजर रख रहा है. एसडीएम, तहसील अधिकारियों, सिंचाई विभाग और बाढ़ नियंत्रण अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं. निचले और संवेदनशील इलाकों में राहत और बचाव की तैयारी पूरी रखने को कहा गया है.महाराजगंज और नेपाल से लगे इलाकों में सभी तटबंध फिलहाल सुरक्षित हैं।

  • अमेरिका में निचले सदन में दिसंबर तक फंडिंग वाला बिल पारित…. शटडाउन का संकट टला?

    अमेरिका में निचले सदन में दिसंबर तक फंडिंग वाला बिल पारित…. शटडाउन का संकट टला?


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी संसद (American Parliament) के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स-House of Representatives) ने मंगलवार को एक अस्थायी विधेयक (Provisional Bill) पारित किया। इसका मकसद संघीय सरकार के कामकाज के लिए दिसंबर की शुरुआत तक धन उपलब्ध कराना है। यह कदम इसलिए उठाया गया है, ताकि सांसदों के दोबारा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान सरकार का कामकाज बंद (शटडाउन-Shutdown) न हो।

    सांसदों के लिए सितंबर के आखिर में खत्म हो रहे वित्त वर्ष से पहले यह कदम उठाना जरूरी था। ऐसा नहीं करने पर सरकारी कामकाज के लिए पैसा खत्म हो सकता था। सांसद नहीं चाहते थे कि चुनाव प्रचार के दौरान सरकार के कामकाज को लेकर कोई संकट खड़ा हो। पिछले साल भी सरकार के कामकाज के लंबे समय तक बंद रहने से बड़ा संकट पैदा हुआ था।

    प्रतिनिधि सभा ने 370-48 वोट से विधेयक (Short-Term Funding Bill) पारित किया। सीनेट इसे पहले ही भारी बहुमत से मंजूर कर चुका है। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। उनकी मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा।

    प्रतिनिधि सभा की विनियोग समिति के अध्यक्ष सांसद टॉम कोल ने कहा कि इससे देश और लोगों को यह भरोसा मिलेगा कि सरकार का कामकाज चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि इससे यह भी तय रहेगा कि सेना के जवानों को उनका वेतन मिलता रहेगा।


    पिछले साल कितने लंबे शटडाउन हुए थे?

    पिछली शरद ऋतु में रिकॉर्ड 43 दिनों तक सरकारी कामकाज बंद रहा था। दोनों पार्टियों में उस टैक्स क्रेडिट को जारी रखने को लेकर सहमति नहीं बनी थी, जिसकी समय सीमा खत्म हो रही थी। यह टैक्स क्रेडिट अफोर्डेबल केयर एक्ट के तहत मिलने वाली स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की लागत कम करता है।

    इसके बाद गृह सुरक्षा विभाग का कामकाज भी बंद हुआ था। यह शटडाउन 76 दिनों तक चला। बाद में सांसदों ने विभाग के बड़े हिस्से के लिए फंडिंग पर सहमति बना ली। हालांकि, आव्रजन कानून लागू करने से जुड़े कामों के लिए फंडिंग नहीं दी गई।


    सांसद इस बार क्या चाहते थे?

    सांसद नहीं चाहते थे कि चुनाव से पहले फिर ऐसी स्थिति बने। उन्होंने हाल के गतिरोध के लिए एक-दूसरे की पार्टी को जिम्मेदार ठहराया। प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष माइक जॉनसन ने वोटिंग से पहले पत्रकारों से कहा कि वे एक और डेमोक्रेटिक शटडाउन के खतरे से बचेंगे।

    वोटिंग के बाद जॉनसन ने कहा कि प्रतिनिधि सभा ने अपना काम कर दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को शक था कि रिपब्लिकन बहुमत अपने अंदर के मतभेदों को दूर कर पाएगा या नहीं। इसके बावजूद समर्थन जुटाया गया। उन्होंने कहा कि वे जिम्मेदारी से काम कर रहे हैं और काम पूरा कर रहे हैं।


    डेमोक्रेट्स ने विधेयक का समर्थन क्यों किया?

    प्रतिनिधि सभा की विनियोग समिति में डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख सांसद रोजा डेलॉरो ने मंगलवार सुबह बंद कमरे में हुई बैठक में अपने साथी डेमोक्रेट सांसदों से बिल के पक्ष में वोट करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह विधेयक उस प्रस्ताव से काफी बेहतर है, जिसे इस साल की गर्मियों की शुरुआत में प्रतिनिधि सभा ने लगभग पार्टी लाइन के आधार पर पारित किया था।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विधेयक गृह सुरक्षा विभाग को बॉर्डर पेट्रोल के लिए पैसा ट्रांसफर करने से रोकता है। यह उस प्रस्तावित नियम को भी टालता है, जिसके तहत ट्रंप प्रशासन में राजनीतिक नियुक्ति पाने वाले अधिकारियों को उन संघीय अनुदानों को रोकने की ज्यादा ताकत मिल जाती, जिन्हें वे राष्ट्रपति के एजेंडे के मुताबिक नहीं मानते।

    ये बदलाव सीनेट ने अपने विधेयक के संस्करण को मंजूरी देते समय किए थे। डेमोक्रेट्स को चिंता है कि प्रशासन अनुदानों से जुड़े इस प्रस्तावित नियम का इस्तेमाल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले राज्यों से पैसा दूर करने के लिए कर सकता है। डेलॉरो ने नियम को टालने को एक अहम पहला कदम बताया। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस नीति को लागू होने से रोकने के लिए अभी और काम करना होगा।

    डेलॉरो ने कहा कि किसी समुदाय को आपदा राहत मिलेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि उसने पिछले चुनाव में किसे वोट दिया था।


    विधेयक में कितने समय की फंडिंग है?

    यह अस्थायी विधेयक संघीय एजेंसियों को आम तौर पर मौजूदा स्तर पर 11 दिसंबर तक फंडिंग देगा। इससे सांसदों को पूरे साल के लिए फंडिंग वाले विधेयक पर सहमति बनाने के लिए और समय मिलेगा। हालांकि, इस पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना आसान नहीं होगा

    रिपब्लिकन सैन्य खर्च के लिए सैकड़ों अरब डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग चाहते हैं। इसके साथ ही वे रक्षा से जुड़े नहीं ज्यादातर कार्यक्रमों के खर्च में कटौती करना चाहते हैं। डेमोक्रेट्स का कहना है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते। उनका जोर ऐसी द्विदलीय व्यवस्था पर है, जिसमें घरेलू कार्यक्रमों को भी रक्षा कार्यक्रमों के बराबर महत्व और फंडिंग मिले।

  • होर्मुज पर अमेरिका का ‘टोटल कंट्रोल’! ट्रंप बोले- ईरान सिर्फ हार टाल रहा, बातचीत की जरूरत नहीं

    होर्मुज पर अमेरिका का ‘टोटल कंट्रोल’! ट्रंप बोले- ईरान सिर्फ हार टाल रहा, बातचीत की जरूरत नहीं


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने की शांति के बाद फिर सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका का लगभग पूरा नियंत्रण है और ईरान की अर्थव्यवस्था बिखर रही है। उनका यह बयान अमेरिकी हवाई हमलों के कुछ घंटे बाद आया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच जवाबी हमले और तेज हो गए हैं।

    ट्रंप बोले- बातचीत के लिए मजबूर नहीं कर रहे

    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में एबीसी न्यूज की उस रिपोर्ट को खारिज किया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका ईरान को बातचीत के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने कहा कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईरान किसी समझौते पर हस्ताक्षर करता है या नहीं। उनके मुताबिक, मौजूदा स्थिति ही अमेरिका के लिए बेहतर है, क्योंकि होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण है और ईरान की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है।

    उन्होंने कहा कि घटनाक्रम एक तय नतीजे की ओर बढ़ रहा है। साथ ही ट्रंप ने ईरान की जनता से अपनी सरकार के खिलाफ खड़े होने की अपील भी की।

    ईरान हर बार खारिज करता रहा है दावा

    फरवरी में टकराव शुरू होने के बाद से ट्रंप कई बार होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण का दावा कर चुके हैं। हालांकि, ईरान लगातार इन दावों को खारिज करता रहा है। मंगलवार को अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर भारी हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन, बहरीन और इराक में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।

    इससे पहले सप्ताहांत में जुलाई के बाद पहली बार दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी हुई थी। सोमवार को होर्मुज से निकल रहे दो तेल टैंकरों पर हमले की खबर भी सामने आई। इसके बाद कच्चे तेल की कीमत करीब 4 डॉलर प्रति बैरल बढ़कर पांच सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

    होर्मुज पर ईरान की पकड़ का दावा

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। ईरान ने इसे जहाजों के लिए बंद कर रखा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कहना है कि अमेरिकी हमलों के बाद जलमार्ग पर उसकी पकड़ और मजबूत होगी।

    ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल निर्यात को रोकने की कोशिश की गई तो वह दूसरे देशों को भी ऐसा करने की अनुमति नहीं देगा।

    ट्रंप ने युद्धविराम की संभावना भी नकारी

    ट्रंप ने नए युद्धविराम की संभावना को भी खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि ईरान को समझौते के लिए पहले ही कई मौके दिए जा चुके हैं और अब किसी नए समझौते की जरूरत नहीं है।

    महीनों से जारी तनाव के बीच जून में हुआ समझौता भी ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सका। होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को दोनों देशों के बीच टकराव का सबसे बड़ा मुद्दा माना जा रहा है। ऐसे में ट्रंप के ताजा बयान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव और बढ़ने की आशंका है।