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  • Iran-US War : लेबनान में तनाव बढ़ा, इजरायल ने 9 इलाकों को खाली करने का दिया आदेश; होर्मुज को लेकर भी बढ़ी चिंता

    Iran-US War : लेबनान में तनाव बढ़ा, इजरायल ने 9 इलाकों को खाली करने का दिया आदेश; होर्मुज को लेकर भी बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सीजफायर के दावों के बीच हालात फिर से बिगड़ते दिख रहे हैं, जहां एक तरफ अमेरिका संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान के कई इलाकों को खाली करने का आदेश जारी कर दिया है।

    दक्षिणी लेबनान में इजरायल ने 9 से अधिक कस्बों को खाली करने की चेतावनी दी है, जिससे पहले से विस्थापित लाखों लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। कई लोग सीजफायर के बाद लौटे थे, लेकिन नए हालात के चलते एक बार फिर पलायन का खतरा पैदा हो गया है।

    इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव भी कम नहीं हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यदि बातचीत विफल होती है तो अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर दोबारा बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले हफ्तों में हमलों की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति गंभीर बनी हुई है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि वह इसे “दोस्त देशों के लिए खुला और दुश्मनों के लिए सीमित” कर सकता है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है। वहीं अमेरिका इसे खोलने के लिए दबाव बना रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र में भी इस मुद्दे पर टकराव देखने को मिला है, जहां ईरान ने चेतावनी दी है कि किसी भी अमेरिकी समर्थित प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों को भविष्य के तनाव के लिए जिम्मेदार माना जाएगा।

  • ईरान के राष्ट्रपति ने पोप लियो का किया धन्यवाद, अमेरिका-इजराइल हमलों के विरोध पर जताई सराहना, ट्रंप से बढ़ा विवाद

    ईरान के राष्ट्रपति ने पोप लियो का किया धन्यवाद, अमेरिका-इजराइल हमलों के विरोध पर जताई सराहना, ट्रंप से बढ़ा विवाद



    नई दिल्ली। तेहरान में एक बड़ा कूटनीतिक बयान सामने आया है, जहां ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो XIV को धन्यवाद दिया है। उन्होंने कहा कि पोप ने अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के खिलाफ जो नैतिक और निष्पक्ष रुख अपनाया है, वह सराहनीय है।

    ईरानी राष्ट्रपति के मुताबिक, पोप लियो ने लगातार ईरान पर हुए हमलों की आलोचना की है और इन्हें मानवता के खिलाफ बताया है। पेजेश्कियान ने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए ईरान पर हमले किए गए, तब पोप ने सही और न्यायपूर्ण आवाज उठाई, जिसके लिए ईरान उनका आभारी है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, पोप लियो XIV ने अमेरिका और इजराइल के सैन्य हमलों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा था कि इससे आम नागरिकों और बच्चों की मौत हो रही है, जो बेहद दुखद है। उन्होंने युद्ध के बजाय शांति और बातचीत की अपील की है। इसी रुख को लेकर उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी तनातनी देखने को मिली थी।

    ईरानी राष्ट्रपति ने अपने बयान में यह भी कहा कि इन हमलों में कई मासूम लोगों की जान गई, जिनमें दक्षिणी ईरान के मीनाब शहर के एक स्कूल के बच्चे भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और कानून के शासन को सीधी चुनौती देती है।

    इस बीच भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली ने भी अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था अब एक ही शक्ति के भरोसे नहीं चल सकती। उन्होंने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां किसी एक देश का दबदबा टिकाऊ नहीं है।

    कुल मिलाकर, पोप लियो के बयान और ईरान के समर्थन ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया तनाव और बहस पैदा कर दी है, जिसमें अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता नजर आ रहा है

  • अर्जेंटीना ने रिटायर किए पुराने A-4 जेट, तेजस छोड़ अमेरिकी F-16 पर जताया भरोसा

    अर्जेंटीना ने रिटायर किए पुराने A-4 जेट, तेजस छोड़ अमेरिकी F-16 पर जताया भरोसा



    नई दिल्ली। अर्जेंटीना ने अपने पुराने A-4AR/OA-4AR फाइटिंगहॉक लड़ाकू विमानों को आधिकारिक तौर पर सेवा से रिटायर कर दिया है। इन विमानों ने करीब छह दशक तक अर्जेंटीना की वायुसेना में अहम भूमिका निभाई। अब उनकी जगह अमेरिकी F-16 लड़ाकू विमान लेने जा रहे हैं। खास बात यह है कि अर्जेंटीना पहले भारत के स्वदेशी तेजस फाइटर जेट को खरीदने पर विचार कर रहा था, लेकिन आखिरकार उसने अमेरिकी F-16 को चुना।

    अर्जेंटीनाई वायुसेना ने सैन लुइस प्रांत के विला रेनॉल्ड्स एयर बेस पर आयोजित कार्यक्रम में फाइटिंगहॉक बेड़े को विदाई दी। यह एयर बेस अर्जेंटीना की 5वीं एयर ब्रिगेड का मुख्य केंद्र था, जहां A-4 विमान तैनात थे। वायुसेना के अधिकारियों ने बताया कि पुराने विमानों की ऑपरेशनल लागत लगातार बढ़ रही थी और उनका रखरखाव भी मुश्किल होता जा रहा था। इसी वजह से उन्हें सेवा से हटाने का फैसला लिया गया।

    A-4 फाइटिंगहॉक दरअसल पुराने अमेरिकी A-4 स्काईहॉक का अपग्रेडेड वर्जन था, जिसे खास तौर पर अर्जेंटीना के लिए तैयार किया गया था। लॉकहीड मार्टिन ने अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के पुराने विमानों को आधुनिक तकनीक से अपग्रेड किया था। इनमें F-16 के शुरुआती मॉडल में इस्तेमाल होने वाला AN/APG-66 रडार लगाया गया था। इसके अलावा विमान AIM-9M साइडवाइंडर मिसाइलों से लैस थे और इनमें आधुनिक कॉकपिट, मल्टीफंक्शन डिस्प्ले और एडवांस नेविगेशन सिस्टम भी दिया गया था।

    अर्जेंटीना को इन विमानों की डिलीवरी 1990 के दशक में शुरू हुई थी। कुल 32 A-4AR और चार OA-4AR विमान वायुसेना में शामिल किए गए थे। हालांकि समय के साथ इनकी तकनीक पुरानी पड़ने लगी और रखरखाव महंगा होता गया। ऐसे में अर्जेंटीना ने अपनी वायुसेना को आधुनिक बनाने के लिए नए लड़ाकू विमान की तलाश शुरू की।

    भारत का तेजस लड़ाकू विमान इस दौड़ में मजबूत दावेदार माना जा रहा था। दोनों देशों के बीच इसे लेकर कई दौर की बातचीत भी हुई थी। लेकिन तेजस में इस्तेमाल होने वाले कुछ ब्रिटिश मूल के पार्ट्स अर्जेंटीना के लिए बड़ी बाधा बन गए। दरअसल, फॉकलैंड युद्ध के बाद से ब्रिटेन ने अर्जेंटीना को अपने रक्षा उपकरणों और पार्ट्स की बिक्री पर रोक लगा रखी है। तेजस में ब्रिटिश तकनीक से जुड़े कई पार्ट्स होने के कारण अर्जेंटीना यह विमान नहीं खरीद सका।

    आखिरकार अर्जेंटीना ने अमेरिकी F-16 फाइटर जेट खरीदने का फैसला किया। इसे उसकी वायुसेना के आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। वहीं भारत के लिए यह मौका हाथ से निकलने जैसा रहा, क्योंकि तेजस को पहला बड़ा विदेशी ग्राहक मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी।

  • ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण

    ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। 13 से 15 मई तक बीजिंग में हुई इस बैठक को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगर अमेरिका और चीन के रिश्तों में नरमी आती है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका-चीन तनाव के बीच खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत साझेदार के रूप में स्थापित किया था। लेकिन अगर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच समझौते बढ़ते हैं तो अमेरिका के लिए भारत की रणनीतिक अहमियत कम हो सकती है। इससे रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ने की आशंका है।

    व्यापार के मोर्चे पर भी भारत के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। हाल के वर्षों में कई वैश्विक कंपनियां चीन से बाहर निकलकर भारत में निवेश कर रही थीं, लेकिन अगर अमेरिका चीन पर लगाए गए टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंधों में ढील देता है तो निवेश दोबारा चीन की ओर लौट सकता है। इससे भारत के “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत मिले फायदे कमजोर पड़ सकते हैं।

    चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका चीन के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर उसका दबाव कम हो सकता है। इससे चीन खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है, जिसका असर कश्मीर और सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों पर दिखाई दे सकता है।

    पश्चिम एशिया और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर भी भारत सतर्क नजर आ रहा है। भारत की बड़ी तेल जरूरतें होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं। अगर अमेरिका और चीन ईरान और खाड़ी क्षेत्र को लेकर किसी नई रणनीति पर साथ आते हैं तो भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। इससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल दो देशों की कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। भारत के लिए यह संकेत है कि आने वाले समय में उसे अपनी विदेश नीति, आर्थिक रणनीति और सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि बदलते वैश्विक समीकरणों में उसका प्रभाव कायम रह सके।

  • अमेरिका में पेट्रोल पंपों के फ्यूल सिस्टम पर साइबर हमला, जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक; ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

    अमेरिका में पेट्रोल पंपों के फ्यूल सिस्टम पर साइबर हमला, जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक; ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। अमेरिका के कई राज्यों में पेट्रोल पंपों के ऑटोमैटिक टैंक गेज (ATG) सिस्टम को निशाना बनाकर साइबर हमले किए जाने का मामला सामने आया है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि इसके पीछे ईरान समर्थित हैकर समूह हो सकते हैं, हालांकि अब तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, हैकर्स ने उन डिजिटल सिस्टम्स में सेंध लगाई जो पेट्रोल पंपों में फ्यूल की मात्रा मापने और मॉनिटर करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। शुरुआती जांच में पता चला है कि कई सिस्टम इंटरनेट से जुड़े थे और उनमें पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा मौजूद नहीं थी, जिससे हैकर्स को घुसपैठ का मौका मिला।

    अधिकारियों के अनुसार, कुछ मामलों में डिस्प्ले स्क्रीन पर दिखने वाले डेटा से छेड़छाड़ की गई, लेकिन फ्यूल की वास्तविक मात्रा या सप्लाई सिस्टम को प्रभावित नहीं किया जा सका। फिलहाल किसी बड़े हादसे या नुकसान की सूचना नहीं है।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसे सिस्टम पर पूरी तरह नियंत्रण हासिल कर लिया जाए तो गैस लीक, आग या बड़े औद्योगिक हादसों जैसी गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसी वजह से इस घटना को अमेरिकी ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर माना जा रहा है।

    जांच एजेंसियां इस मामले को अमेरिका-ईरान तनाव के मौजूदा दौर से भी जोड़कर देख रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान समर्थित साइबर समूह पहले भी तेल, गैस, पानी और मेडिकल सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में ईरानी साइबर नेटवर्क की तकनीकी क्षमता काफी बढ़ी है और वे अब पारंपरिक युद्ध के बजाय साइबर हमलों को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

    अमेरिका के कई पेट्रोल पंपों के फ्यूल मॉनिटरिंग सिस्टम में साइबर घुसपैठ का मामला सामने आया है, जिसमें जांच एजेंसियों को ईरान समर्थित हैकर्स पर शक है।
    हालांकि कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने अमेरिका की ऊर्जा और साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

  • चीन-अमेरिका शक्ति संतुलन पर नई बहस, ट्रंप-शी मुलाकात के बाद बदले वैश्विक समीकरण; भारत की रणनीति पर बढ़ी चर्चा

    चीन-अमेरिका शक्ति संतुलन पर नई बहस, ट्रंप-शी मुलाकात के बाद बदले वैश्विक समीकरण; भारत की रणनीति पर बढ़ी चर्चा




    नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर वैश्विक राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। हालिया ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolar World) की ओर बढ़ रही है, जहां चीन अब अमेरिका को खुली चुनौती देता दिखाई दे रहा है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा से यह संकेत मिला कि व्यापार, तकनीक और रणनीतिक मुद्दों पर अमेरिका चीन पर निर्णायक दबाव बनाने में अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। वहीं शी जिनपिंग ने “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का जिक्र कर यह संकेत देने की कोशिश की कि चीन खुद को अब उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है।

    हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार यह भी मानते हैं कि अमेरिका का प्रभाव तुरंत खत्म होने वाला नहीं है। अमेरिका अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय रूप से दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में बना हुआ है, जबकि चीन को भी आर्थिक सुस्ती, सप्लाई चेन और जनसंख्या गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

    इस पूरे बदलते समीकरण में भारत की भूमिका को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत आने वाले दशकों में अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने वाली बड़ी शक्ति बन सकता है। यूरोप, रूस और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ भारत के संबंध भी आने वाले समय में उसकी रणनीतिक स्थिति तय करेंगे।

    विदेश नीति विश्लेषकों के अनुसार, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने हितों का संतुलन बनाए रखते हुए आर्थिक और सामरिक रूप से खुद को मजबूत करे।

  • ग्वादर पोर्ट को INSTC से जोड़ने पर रूस सहमत, पाकिस्तान-चीन को मिल सकती है रणनीतिक बढ़त; भारत की बढ़ी चिंता

    ग्वादर पोर्ट को INSTC से जोड़ने पर रूस सहमत, पाकिस्तान-चीन को मिल सकती है रणनीतिक बढ़त; भारत की बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। रूस ने पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से जोड़ने की संभावना पर सकारात्मक रुख दिखाया है। रूस के उप प्रधानमंत्री एलेक्सी ओवरचुक ने कहा है कि मॉस्को और इस्लामाबाद लंबे समय से इस कनेक्टिविटी पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें रेलवे और व्यापारिक नेटवर्क भी शामिल हैं।

    ग्वादर पोर्ट, जिसे चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के तहत विकसित किया गया है, अरब सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। यदि यह INSTC नेटवर्क से जुड़ता है, तो रूस, मध्य एशिया, पाकिस्तान और चीन के बीच व्यापारिक पहुंच और मजबूत हो सकती है।

    INSTC मूल रूप से भारत, रूस और ईरान की पहल है, जिसका उद्देश्य यूरोप और एशिया के बीच तेज और कम लागत वाला व्यापार मार्ग तैयार करना है। अब पाकिस्तान की संभावित एंट्री को क्षेत्रीय भू-राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और CPEC को अतिरिक्त रणनीतिक मजबूती मिल सकती है। वहीं भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए माना जा रहा है क्योंकि ग्वादर पोर्ट पहले से ही हिंद महासागर क्षेत्र में चीन-पाकिस्तान की बढ़ती मौजूदगी का प्रतीक माना जाता है।

    हालांकि, अभी इस परियोजना पर अंतिम समझौते या औपचारिक शामिल किए जाने की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन रूस की सहमति को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से अहम संकेत माना जा रहा है।
    रूस ने पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को INSTC कॉरिडोर से जोड़ने पर सकारात्मक रुख दिखाया है, जिससे चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है।
    इस घटनाक्रम को भारत के लिए क्षेत्रीय प्रभाव और व्यापारिक हितों के लिहाज से नई चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

  • सुपर एल नीनो 2027 की चेतावनी से वैज्ञानिक चिंतित, दुनिया के सबसे गर्म साल का खतरा; मौसम में भारी बदलाव की आशंका

    सुपर एल नीनो 2027 की चेतावनी से वैज्ञानिक चिंतित, दुनिया के सबसे गर्म साल का खतरा; मौसम में भारी बदलाव की आशंका


    नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि साल 2027 में एक शक्तिशाली “सुपर एल नीनो” विकसित हो सकता है, जो वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा सकता है। अमेरिकी एजेंसी NOAA के शुरुआती आकलनों के अनुसार प्रशांत महासागर के तापमान में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो इस जलवायु पैटर्न के बनने का संकेत है।

    एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यीय हिस्से (Niño 3.4 क्षेत्र) का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। जब यह वृद्धि अत्यधिक होती है, तो इसे “सुपर एल नीनो” कहा जाता है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, इस स्थिति में कई क्षेत्रों में सूखा, बाढ़, हीटवेव और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। साथ ही अटलांटिक और प्रशांत महासागर में तूफानों की तीव्रता भी प्रभावित हो सकती है।

    मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह पैटर्न मजबूत रूप में विकसित होता है, तो 2027 हाल के इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। इससे पहले 1997-98 के एल नीनो ने भी वैश्विक स्तर पर गंभीर मौसमीय प्रभाव डाले थे।

    हालांकि, वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि यह फिलहाल शुरुआती मॉडल और संभावनाओं पर आधारित अनुमान है और इसकी तीव्रता व समय में बदलाव संभव है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव पर बड़ा दावा, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की रिपोर्ट से हलचल संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा, आधिकारिक पुष्टि नहीं

    अमेरिका-ईरान तनाव पर बड़ा दावा, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की रिपोर्ट से हलचल संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा, आधिकारिक पुष्टि नहीं



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यदि ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है, जिसमें कथित तौर पर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ जैसी योजनाओं का उल्लेख किया जा रहा है।

    हालांकि, अब तक न तो पेंटागन और न ही अमेरिकी सरकार की ओर से इस नाम के किसी भी ऑपरेशन की आधिकारिक पुष्टि की गई है। रिपोर्ट्स में इसे संभावित रणनीतिक योजना या सैन्य विकल्पों की चर्चा के रूप में बताया गया है, न कि घोषित अभियान के रूप में।

    जानकारी के अनुसार, चर्चा में मौजूद संभावित विकल्पों में ईरान के सैन्य ढांचे, परमाणु संबंधित ठिकानों और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर सीमित हवाई हमलों की संभावना शामिल बताई जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में विशेष अभियानों और समुद्री/रणनीतिक ठिकानों को लेकर भी अलग-अलग सैन्य विकल्पों का जिक्र किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव पहले से ही नाजुक दौर में है और किसी भी सैन्य कार्रवाई की स्थिति में पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।

    फिलहाल यह पूरा मामला खुफिया रिपोर्ट्स और मीडिया दावों पर आधारित है, जबकि दोनों देशों की ओर से आधिकारिक स्तर पर संयम और कूटनीतिक बातचीत की ही बात कही जाती रही है।

  • India-Pakistan Clash: ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर जफर खान की टिप्पणी से विवाद, भारत पर ‘एस्केलेशन ट्रैप’ में फंसने का दावा; न्यूक्लियर डिटरेंस पर फिर छिड़ी बहस

    India-Pakistan Clash: ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर जफर खान की टिप्पणी से विवाद, भारत पर ‘एस्केलेशन ट्रैप’ में फंसने का दावा; न्यूक्लियर डिटरेंस पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली। भारत-पाकिस्तान संबंधों और सैन्य रणनीति को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय राजनीति प्रोफेसर जफर खान ने दावा किया है कि संकट की स्थिति में भारत द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल जैसे परमाणु-सक्षम हथियारों का उपयोग “कमजोरी और जोखिम भरा कदम” हो सकता है, जिससे क्षेत्र “एस्केलेशन ट्रैप” में फंस सकता है।

    उन्होंने एक विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा कि दक्षिण एशिया के दोनों परमाणु-संपन्न देशों के बीच किसी भी सीमित युद्ध की अवधारणा जटिल है और यह तेजी से बड़े संघर्ष में बदल सकती है। उनके अनुसार, पाकिस्तान के पास भी लंबी दूरी के सिस्टम मौजूद हैं, लेकिन उसने कुछ स्थितियों में जानबूझकर जवाबी हमले से परहेज किया, ताकि स्थिति परमाणु स्तर तक न पहुंचे।

    जफर खान ने यह भी तर्क दिया कि भारत-पाक संकट की तुलना अन्य वैश्विक हालातों से करना सही नहीं है, क्योंकि यहां “परमाणु डिटरेंस” सीधे युद्ध की रणनीति को प्रभावित करता है और किसी भी संघर्ष में नियंत्रण सीमित हो सकता है।

    वहीं, इस पूरे मुद्दे पर अलग-अलग रक्षा विशेषज्ञों के बीच मतभेद बना हुआ है। एक पक्ष इसे पाकिस्तान की “परमाणु धमकी की पुरानी रणनीति” बता रहा है, जबकि दूसरा इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के गंभीर जोखिम के रूप में देख रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि हाल के तनावपूर्ण हालातों में भारत की ओर से किए गए मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशंस को पाकिस्तान पूरी तरह रोक नहीं पाया, जिससे दोनों देशों के बीच सैन्य संतुलन पर भी सवाल उठे हैं।फिलहाल यह मुद्दा रणनीतिक बहस और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है, लेकिन इससे भारत-पाक संबंधों में तनाव और बयानबाजी फिर तेज हो गई है।