Category: International

  • युवाओं को सोशल मीडिया की लत का आरोप मेटा पर 1.4 खरब डॉलर जुर्माने की मांग से बढ़ीं मुश्किलें

    युवाओं को सोशल मीडिया की लत का आरोप मेटा पर 1.4 खरब डॉलर जुर्माने की मांग से बढ़ीं मुश्किलें


    नई दिल्ली । अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनी मेटा एक बार फिर कानूनी विवादों के केंद्र में आ गई है। फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी पर आरोप लगाया गया है कि उसने अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जिससे किशोरों और युवा यूजर्स में सोशल मीडिया की लत बढ़ी और कंपनी ने सुरक्षा से जुड़े संभावित खतरों के बारे में लोगों को पूरी और सही जानकारी नहीं दी। इन गंभीर आरोपों के आधार पर अमेरिका के चार राज्यों ने मेटा पर लगभग 1.4 खरब डॉलर के जुर्माने की मांग की है। यदि यह मांग अदालत में स्वीकार होती है तो यह तकनीकी कंपनियों के खिलाफ प्रस्तावित सबसे बड़े आर्थिक दंडों में से एक माना जाएगा।

    कैलिफोर्निया कोलोराडो केंटकी और न्यू जर्सी की ओर से दायर मामलों में कहा गया है कि मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह विकसित किया जिससे युवा उपयोगकर्ता लंबे समय तक स्क्रीन पर बने रहें। आरोप है कि कंपनी ने एल्गोरिद्म और अन्य फीचर्स के जरिए उपयोगकर्ताओं की निर्भरता बढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती। राज्यों का कहना है कि इस वजह से बड़ी संख्या में किशोर प्रभावित हुए हैं और इसी आधार पर भारी जुर्माने की मांग की गई है।

    मेटा ने अदालत में दायर अपने जवाब में इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि प्रस्तावित जुर्माना तथ्यों और कानूनी आधार से परे है। मेटा के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी राशि के दंड का कोई उदाहरण नहीं है। कंपनी का यह भी दावा है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम को युवाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लगातार नए सुरक्षा फीचर्स के साथ अपडेट किया जाता रहा है और सोशल मीडिया की लत संबंधी आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है।

    इस मामले में सिर्फ चार राज्य ही नहीं बल्कि अमेरिका के कई अन्य राज्यों ने भी मेटा के खिलाफ अलग-अलग कानूनी कार्रवाई शुरू कर रखी है। कुल 29 राज्यों ने संघीय अदालत में कंपनी पर बच्चों और किशोरों के डेटा संग्रह तथा ऑनलाइन गोपनीयता कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। इन मामलों में यह भी कहा गया है कि कंपनी ने अभिभावकों की उचित सहमति के बिना नाबालिगों से संबंधित जानकारी एकत्र की जो संघीय कानूनों का उल्लंघन हो सकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल मेटा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भविष्य में सभी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली और उनकी जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि अदालत राज्यों के पक्ष में फैसला देती है तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में नए और कड़े नियम लागू होने का रास्ता खुल सकता है।

    अब इस बहुचर्चित मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई अगस्त में अमेरिकी संघीय अदालत में होगी। इस दौरान अदालत यह तय करेगी कि मेटा पर लगाए गए आरोपों में कितनी कानूनी मजबूती है और क्या कंपनी पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाना उचित होगा। दुनिया भर की टेक कंपनियों और डिजिटल उद्योग की नजरें अब इस फैसले पर टिकी हुई हैं क्योंकि इसका असर वैश्विक सोशल मीडिया उद्योग पर भी पड़ सकता है।

  • लॉरेंस बिश्नोई गैंग पर FBI का बड़ा शिकंजा, ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ के तहत 50 से ज्यादा जगह पर की छापेमारी

    लॉरेंस बिश्नोई गैंग पर FBI का बड़ा शिकंजा, ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ के तहत 50 से ज्यादा जगह पर की छापेमारी


    नई दिल्ली। लॉरेंस बिश्नोई गैंग और उससे जुड़े आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ अमेरिका की जांच एजेंसी FBI ने बड़ा अभियान शुरू किया है। FBI और उसकी सहयोगी एजेंसियों ने 7 जुलाई को अमेरिका के कैलिफोर्निया समेत कई स्थानों पर कार्रवाई करते हुए कम से कम 20 लोगों को हिरासत में लिया। इस दौरान प्रतिबंधित सामान, हथियार और ड्रग्स बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ के नाम से चलाया गया अभियान
    FBI ने अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट के खिलाफ की गई इस कार्रवाई को ‘Operation Hard Ball’ नाम दिया है। एजेंसी के अधिकारियों और सहयोगी टीमों ने अमेरिका, कनाडा और यूरोप में 50 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित सामान और ड्रग्स जब्त किए गए।

    गोल्डी बरार और जग्गू भगवानपुरिया नेटवर्क पर भी फोकस
    FBI की इस कार्रवाई का निशाना लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथ-साथ उसके सहयोगियों गोल्डी बरार और जग्गू भगवानपुरिया से जुड़े नेटवर्क भी रहे। जांच एजेंसियों के अनुसार, गैंग से जुड़े कई वांटेड सदस्य अमेरिका, कनाडा और यूरोप में रहकर भारत में अपनी आपराधिक गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। आरोप है कि ये लोग विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय के लोगों को भी निशाना बनाकर रंगदारी वसूलने जैसे अपराधों में शामिल रहे हैं।

    कनाडा ने घोषित किया था आतंकी संगठन
    लॉरेंस बिश्नोई गैंग को लेकर कनाडा सरकार ने पिछले साल इसे आतंकी संगठन घोषित किया था। वहीं, लॉरेंस बिश्नोई का भाई अनमोल बिश्नोई भी लंबे समय तक अमेरिका में रहने की बात सामने आई थी। आरोप है कि अमेरिका में रहते हुए उसने मुंबई में एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या और अभिनेता सलमान खान के घर पर फायरिंग से जुड़े मामलों में भूमिका निभाई थी। बाद में अनमोल बिश्नोई को भारत डिपोर्ट किया गया।

    विदेशों में फैले नेटवर्क पर एजेंसियों की नजर
    भारतीय जांच एजेंसियां भी समय-समय पर यह जानकारी देती रही हैं कि लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नेटवर्क अमेरिका, कनाडा और यूरोप तक फैला हुआ है। एजेंसियों के मुताबिक, भारत से फरार होकर कई गैंग सदस्य इन देशों में ठिकाने बनाकर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं। FBI का ‘ऑपरेशन हार्ड बॉल’ अभी जारी है और लॉरेंस बिश्नोई गैंग तथा उससे जुड़े नेटवर्क के खिलाफ जांच और कार्रवाई आगे भी जारी रहने की संभावना है।

  • सुप्रीम लीडर की विदाई या नई रणनीति का ऐलान? खामेनेई के अंतिम संस्कार के जरिए ईरान ने दुनिया के सामने रखा अपना राजनीतिक संदेश

    सुप्रीम लीडर की विदाई या नई रणनीति का ऐलान? खामेनेई के अंतिम संस्कार के जरिए ईरान ने दुनिया के सामने रखा अपना राजनीतिक संदेश

    नई दिल्ली । ईरान में पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देने वाले आयोजन के रूप में देखा जा रहा है। पूरे देश में लाखों लोगों की मौजूदगी और धार्मिक परंपराओं के बीच आयोजित कार्यक्रम ने यह संकेत देने का प्रयास किया कि सत्ता संरचना, वैचारिक निरंतरता और राष्ट्रीय एकजुटता पहले की तरह कायम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आयोजन के माध्यम से देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण संदेश दिए गए हैं।

    विदेश नीति और पश्चिम एशिया मामलों के जानकारों का कहना है कि शिया परंपरा में धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक व्यवस्था को अलग-अलग नहीं देखा जाता। इसी कारण सुप्रीम लीडर का पद केवल संवैधानिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे धार्मिक मार्गदर्शन का भी केंद्र माना जाता है। ऐसे में अंतिम संस्कार जैसे अवसर केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शासन व्यवस्था की निरंतरता और वैचारिक प्रतिबद्धता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी बन जाते हैं।

    अंतिम यात्रा के लिए चुने गए मार्ग को भी प्रतीकात्मक महत्व दिया जा रहा है। यात्रा की शुरुआत ईरान के महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों से जुड़ी परंपरा के अनुरूप हुई और इसे शिया आस्था से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों की विरासत से जोड़ा गया। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के प्रतीकों के माध्यम से ईरान ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि उसकी धार्मिक और राजनीतिक पहचान अब भी मजबूत और संगठित है। साथ ही यह आयोजन इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि सर्वोच्च नेतृत्व की संस्था अपनी वैचारिक और संस्थागत शक्ति बनाए हुए है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, उत्तराधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच नए नेतृत्व की भूमिका पर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। सुरक्षा कारणों से संभावित नए सुप्रीम लीडर सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहे, जबकि उनकी ओर से लिखित संदेश जारी किए गए। इसे सुरक्षा व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कदम यह दिखाने के लिए भी उठाए जाते हैं कि नेतृत्व परिवर्तन नियंत्रित और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रहा है।

    अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने देश के भीतर भावनात्मक माहौल को भी उजागर किया। कई स्थानों पर लोगों ने राष्ट्रीय एकता और नेतृत्व के समर्थन में नारे लगाए। साथ ही पश्चिम एशिया में ईरान के सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संकेत भी दिया कि क्षेत्रीय स्तर पर उसके पुराने संबंध और रणनीतिक साझेदारियां अब भी सक्रिय हैं। इसे ईरान की क्षेत्रीय नीति और उसके सहयोगी नेटवर्क के सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।

    हालांकि आयोजन के दौरान कुछ स्थानों पर अमेरिका और इजरायल के विरोध में नारे और पोस्टर भी दिखाई दिए। ये दृश्य उस जनभावना को दर्शाते हैं जो हालिया क्षेत्रीय तनाव और संघर्षों के बाद देश के एक वर्ग में देखने को मिल रही है। हालांकि भविष्य की नीतियों और किसी भी संभावित कदम को लेकर आधिकारिक स्तर पर कोई नई घोषणा नहीं की गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतिम संस्कार केवल एक शीर्ष नेता की विदाई नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक दिशा, धार्मिक पहचान और सत्ता की निरंतरता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था। आने वाले समय में दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि नए नेतृत्व के तहत ईरान अपनी घरेलू और विदेश नीति को किस दिशा में आगे बढ़ाता है तथा पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में उसकी भूमिका किस प्रकार विकसित होती है।

  • दमिश्क में राष्ट्रपति मैक्रों के दौरे के दौरान दो धमाकों से मची अफरातफरी, सुरक्षा घेरे के बीच सीरिया में फिर उठे सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल

    दमिश्क में राष्ट्रपति मैक्रों के दौरे के दौरान दो धमाकों से मची अफरातफरी, सुरक्षा घेरे के बीच सीरिया में फिर उठे सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा के दौरान राजधानी दमिश्क में हुए दो विस्फोटों ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ये विस्फोट उस इलाके में हुए जहां राष्ट्रपति मैक्रों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। घटना ऐसे समय हुई जब उनका आधिकारिक कार्यक्रम जारी था और वे विभिन्न बैठकों में हिस्सा ले रहे थे। विस्फोटों के बावजूद उनका निर्धारित दौरा जारी रहा तथा उन्होंने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शारा से तय कार्यक्रम के अनुसार मुलाकात भी की।

    जानकारी के अनुसार विस्फोट दमिश्क के व्यस्त प्रशासनिक क्षेत्र में हुए, जहां कई सरकारी कार्यालय, राष्ट्रीय संग्रहालय और प्रमुख होटल स्थित हैं। पहला विस्फोट उस समय हुआ जब राष्ट्रपति मैक्रों का काफिला एक आधिकारिक बैठक के लिए राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ रहा था। इसके कुछ समय बाद उसी इलाके में दूसरा विस्फोट हुआ। घटनास्थल पर मौजूद लोगों में अफरातफरी फैल गई और सुरक्षा एजेंसियों ने तत्काल पूरे क्षेत्र को घेर लिया।

    प्रारंभिक जानकारी के अनुसार इस घटना में कई लोग घायल हुए हैं, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल बताए गए हैं। दूसरे विस्फोट के समय एक एंबुलेंस के आसपास बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, जिससे घायलों की संख्या बढ़ गई। राहत एवं बचाव दल ने तत्काल मौके पर पहुंचकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया और पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई।

    घटना के बाद भी राष्ट्रपति मैक्रों के आधिकारिक कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया। उन्होंने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शारा के साथ निर्धारित बैठक की, जिसमें दोनों देशों के संबंधों और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई। इस मुलाकात को विशेष महत्व इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद मैक्रों सीरिया का दौरा करने वाले पहले यूरोपीय नेता हैं। उनकी यात्रा को दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रपति या उनके दल ने विस्फोटों की आवाज नहीं सुनी। प्रारंभिक आकलन के अनुसार उनका काफिला घटनास्थल से आगे निकल चुका था और विस्फोट उसके बाद हुए। दूसरी ओर सीरियाई प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम की जांच शुरू कर दी है। सुरक्षा एजेंसियां घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने के साथ-साथ विस्फोटों के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में जुटी हैं।

    सीरिया के आंतरिक सुरक्षा विभाग ने इलाके को पूरी तरह सील कर दिया है और जांच एजेंसियां विभिन्न पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। प्रशासन का कहना है कि घटना की विस्तृत जांच के बाद ही विस्फोटों के कारणों और जिम्मेदार तत्वों के बारे में आधिकारिक जानकारी दी जाएगी। फिलहाल किसी संगठन ने इस घटना की जिम्मेदारी नहीं ली है।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सीरिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। लंबे समय से संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रहे देश में विदेशी नेताओं की यात्राओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था हमेशा चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में मैक्रों की यात्रा के दौरान हुए ये विस्फोट सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर परीक्षा साबित हुए हैं। हालांकि फ्रांसीसी और सीरियाई अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कूटनीतिक कार्यक्रम पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार जारी रहेंगे और दोनों देशों के बीच वार्ता पर इस घटना का तत्काल कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

  • सीरिया दौरे के बीच राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के बाहर धमाके, दमिश्क में सुरक्षा पर उठे सवाल, शांति और पुनर्निर्माण एजेंडे पर बना तनाव

    सीरिया दौरे के बीच राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के बाहर धमाके, दमिश्क में सुरक्षा पर उठे सवाल, शांति और पुनर्निर्माण एजेंडे पर बना तनाव

    नई दिल्ली । फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा उस समय अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई जब दमिश्क में उनके ठहरने वाले होटल के निकट सिलसिलेवार विस्फोट हुए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार घटना में कई लोग घायल हुए, जबकि फ्रांसीसी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति मैक्रों सुरक्षित हैं और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा के साथ उनकी बैठक जारी रही। इस घटना ने राजधानी दमिश्क की सुरक्षा व्यवस्था और सीरिया में स्थिरता स्थापित करने की कोशिशों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मैक्रों वर्ष 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद सीरिया का दौरा करने वाले पहले प्रमुख पश्चिमी नेता माने जा रहे हैं। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब सीरिया लंबे गृहयुद्ध के बाद आर्थिक पुनर्निर्माण, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। फ्रांसीसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे मैक्रों की यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना और पुनर्निर्माण परियोजनाओं में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा करना बताया गया।

    द्विपक्षीय वार्ता के दौरान निवेश, आर्थिक सहयोग और पुनर्निर्माण से जुड़े कई विषयों पर बातचीत हुई। युद्ध से प्रभावित सीरिया अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर कई समझौतों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ता है तो इससे सीरिया के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।

    मैक्रों ने पिछले कुछ समय में यूरोपीय देशों के बीच सीरिया पर लगाए गए कई प्रतिबंधों में राहत देने की वकालत की है। उनका मानना है कि आर्थिक पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। इसी दृष्टिकोण के साथ उनकी यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों से भी जुड़ी मानी जा रही है।

    वर्तमान सीरियाई नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे देश में स्थिर प्रशासन स्थापित करना और विभिन्न समुदायों का विश्वास जीतना है। लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद देश के कई हिस्सों में अभी भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। राजधानी दमिश्क अपेक्षाकृत शांत मानी जाती रही है, लेकिन हालिया विस्फोटों ने यह संकेत दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। ऐसे घटनाक्रम सरकार के लिए आंतरिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय भरोसे, दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकते हैं।

    सीरिया पिछले डेढ़ दशक से संघर्ष, आर्थिक संकट और बड़े पैमाने पर मानवीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। युद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए, बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और देश का बुनियादी ढांचा गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। अस्पताल, सड़कें, स्कूल और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं लंबे संघर्ष की वजह से भारी नुकसान झेल चुकी हैं। ऐसे में पुनर्निर्माण और विदेशी निवेश सीरिया की प्राथमिक आवश्यकताओं में शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मैक्रों की यह यात्रा केवल फ्रांस और सीरिया के संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि दमिश्क में हुए विस्फोटों ने इस यात्रा पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं की छाया डाल दी है, फिर भी दोनों देशों ने संवाद और सहयोग की प्रक्रिया जारी रखने का संकेत दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह कूटनीतिक पहल सीरिया के पुनर्निर्माण, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को किस दिशा में आगे बढ़ाती है।

  • नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नई दिल्ली । क्यूबा में एक बार फिर देशव्यापी बिजली संकट ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। राष्ट्रीय बिजली ग्रिड ठप होने के बाद देश के अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति रुक गई, जिससे संचार, परिवहन, जलापूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ा। लगभग 96 लाख की आबादी वाले इस द्वीपीय देश में यह वर्ष के भीतर तीसरी बड़ी बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटना मानी जा रही है। इस घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी देश की ऊर्जा व्यवस्था बाधित होने पर आधुनिक जीवन का लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

    बिजली बंद होते ही सबसे पहले संचार सेवाओं पर असर दिखाई देता है। मोबाइल टावर और इंटरनेट नेटवर्क सीमित समय तक बैटरी या जनरेटर के सहारे चलते हैं, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर उनकी क्षमता समाप्त हो जाती है। इसके बाद मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं बाधित होने लगती हैं, जिससे लोगों के बीच संपर्क टूट जाता है। डिजिटल संचार पर निर्भर सरकारी और निजी सेवाओं के संचालन में भी कठिनाइयां बढ़ जाती हैं।

    बिजली संकट का दूसरा बड़ा प्रभाव परिवहन व्यवस्था पर पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल बंद होने से प्रमुख शहरों में यातायात अव्यवस्थित हो जाता है। बिजली आधारित रेल सेवाएं, मेट्रो और अन्य सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होते हैं, जिससे यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में ईंधन की उपलब्धता पहले से सीमित हो, वहां परिवहन व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित होने लगती है।

    राष्ट्रीय स्तर पर बिजली आपूर्ति रुकने का सीधा असर वित्तीय लेनदेन पर भी पड़ता है। एटीएम, डिजिटल भुगतान प्रणाली, कार्ड स्वाइप मशीनें और ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने से बाजार की गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। जिन लोगों के पास नकद राशि उपलब्ध नहीं होती, उन्हें दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदने में भी कठिनाई होती है। इससे स्थानीय व्यापार और खुदरा बाजारों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

    जलापूर्ति व्यवस्था भी बिजली पर निर्भर होने के कारण गंभीर रूप से प्रभावित होती है। नगरों और महानगरों में पानी की आपूर्ति करने वाले पंप बंद हो जाते हैं, जिससे ऊंची इमारतों और आवासीय परिसरों में पानी का दबाव समाप्त हो जाता है। कुछ ही समय में पीने और घरेलू उपयोग के पानी की कमी महसूस होने लगती है। लंबे समय तक संकट बने रहने पर स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है।

    स्वास्थ्य सेवाओं पर भी ऐसे संकट का गहरा प्रभाव पड़ता है। अस्पतालों में सीमित अवधि तक जनरेटर की सुविधा उपलब्ध रहती है, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर दवाओं और टीकों के कोल्ड स्टोरेज, चिकित्सा उपकरणों तथा नियमित उपचार सेवाओं पर असर पड़ सकता है। कई स्थानों पर गैर-आपातकालीन चिकित्सा प्रक्रियाओं को टालना पड़ सकता है, जिससे मरीजों की परेशानियां बढ़ जाती हैं।

    क्यूबा में बिजली संकट के पीछे पुराने बिजली संयंत्रों, ईंधन आपूर्ति की चुनौतियों और ऊर्जा अवसंरचना पर बढ़ते दबाव को प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। लंबे समय से चल रही ऊर्जा संबंधी समस्याओं ने देश की बिजली व्यवस्था को कमजोर किया है। ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश के लिए मजबूत ऊर्जा अवसंरचना केवल विकास का आधार ही नहीं, बल्कि सामान्य जनजीवन, आर्थिक गतिविधियों और आवश्यक सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है।

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में नई गति की उम्मीद, पीएम मोदी की यात्रा से वार्षिक समिट, आर्थिक सहयोग और लोगों के जुड़ाव को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में नई गति की उम्मीद, पीएम मोदी की यात्रा से वार्षिक समिट, आर्थिक सहयोग और लोगों के जुड़ाव को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तेजी से मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। यात्रा से पहले ऑस्ट्रेलिया में भारत के उच्चायुक्त नागेश सिंह ने दोनों देशों के बीच विकसित हो रहे रणनीतिक सहयोग, आर्थिक साझेदारी, रक्षा संबंधों, लोगों के बीच बढ़ते संपर्क और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा दृष्टिकोण पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने विश्वास जताया कि यह दौरा दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत करेगा तथा भविष्य के सहयोग के लिए नए रास्ते खोलेगा।

    उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह तीसरा ऑस्ट्रेलिया दौरा है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दोनों देशों के संबंध लगातार नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहे हैं। वर्ष 2020 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया गया था, जिसके बाद रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उनके अनुसार दोनों लोकतांत्रिक देशों के साझा मूल्य इस संबंध को और अधिक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

    नागेश सिंह ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत और ऑस्ट्रेलिया का सहयोग पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने कहा कि दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र, सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समृद्ध बनाए रखने के पक्षधर हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष और अस्थिरता के बावजूद भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध स्थिरता और भरोसे के साथ आगे बढ़े हैं। यही कारण है कि दोनों देश क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भी एक-दूसरे के साथ समन्वय बढ़ा रहे हैं।

    उन्होंने आर्थिक सहयोग को भी इस साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके अनुसार ऑस्ट्रेलिया के पास प्रचुर मात्रा में महत्वपूर्ण खनिज और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, जबकि भारत के पास विशाल बाजार और मजबूत विनिर्माण क्षमता है। दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उनका मानना है कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभदायक साबित होगी।

    भारतीय उच्चायुक्त ने दोनों देशों के बीच लोगों के आपसी जुड़ाव को भी संबंधों की सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लगभग दस लाख लोग विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में भारतीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी दोनों देशों के बीच मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक पुल का कार्य कर रही है। इससे आपसी विश्वास और सहयोग को लगातार नई मजबूती मिल रही है।

    उन्होंने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आयोजित होने वाले वार्षिक नेताओं के शिखर सम्मेलन को भी विशेष महत्व का बताया। उनके अनुसार भारत बहुत कम देशों के साथ हर वर्ष शीर्ष नेतृत्व स्तर पर नियमित शिखर बैठक आयोजित करता है। यह परंपरा दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास और निरंतर संवाद का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा उसी निरंतरता का हिस्सा है और इससे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नई पहल सामने आने की उम्मीद है।

    प्रधानमंत्री के ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान भारतीय समुदाय को संबोधित करने के लिए एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाएगा। उच्चायुक्त ने बताया कि इस कार्यक्रम को लेकर भारतीय समुदाय में व्यापक उत्साह है और देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने पहुंचेंगे। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल भारतीय समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों की गहराई को भी प्रदर्शित करेगा।

    खेल सहयोग पर उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट से आगे बढ़कर अन्य खेलों में भी साझेदारी का विस्तार करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच खेलों के आदान-प्रदान, प्रशिक्षण और नई खेल संस्कृतियों को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हो रही है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और ऑस्ट्रेलिया की द्विपक्षीय साझेदारी अपने स्वतंत्र आधार पर आगे बढ़ रही है और इसका मूल उद्देश्य शांति, स्थिरता, साझा विकास तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करना है।

  • इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित हुए प्रधानमंत्री मोदी, देशभर से बधाइयों का दौर; नेताओं ने बताया भारत के गौरव का क्षण

    इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित हुए प्रधानमंत्री मोदी, देशभर से बधाइयों का दौर; नेताओं ने बताया भारत के गौरव का क्षण

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्ण ऑफ द रिपब्लिक ऑफ इंडोनेशिया’ से सम्मानित किए जाने के बाद देशभर में उन्हें बधाइयां देने का सिलसिला शुरू हो गया। लोकसभा अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्रियों और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने इस उपलब्धि को भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और दोनों देशों के बीच मजबूत होते रणनीतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया। नेताओं का कहना है कि यह सम्मान भारत की सक्रिय विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ते प्रभाव की व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।

    लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रधानमंत्री को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह सम्मान भारत और इंडोनेशिया के बीच लगातार मजबूत हो रहे द्विपक्षीय संबंधों का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच विश्वास, सहयोग और साझेदारी को नई दिशा मिली है। उनके अनुसार यह सम्मान क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाने के लिए किए गए प्रयासों की भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे दोनों देशों के बीच मित्रता और अधिक मजबूत होगी।

    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी प्रधानमंत्री को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान उनके दूरदर्शी नेतृत्व, प्रभावशाली कूटनीति और भारत के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता की वैश्विक पहचान है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका लगातार मजबूत हुई है और यह सम्मान उसी बढ़ते प्रभाव का प्रमाण है। उनके अनुसार भारत आज विश्व समुदाय के बीच एक भरोसेमंद और जिम्मेदार साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी प्रधानमंत्री मोदी को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह सम्मान उनकी वैश्विक नेतृत्व क्षमता और भारत-इंडोनेशिया के बीच गहरे होते संबंधों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ की सफलता का भी महत्वपूर्ण संकेत है। उनके अनुसार दोनों देशों के बीच आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग लगातार नए आयाम हासिल कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय विकास और साझा समृद्धि को भी बल मिलेगा।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह सम्मान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रदान किया। इसे इंडोनेशिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान माना जाता है और यह उन व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने असाधारण योगदान के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक सहयोग को नई दिशा दी हो। इस सम्मान को भारत और इंडोनेशिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक भी माना जा रहा है।

    सम्मान ग्रहण करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि न बताते हुए देश के 140 करोड़ नागरिकों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि उन्हें मिला यह सम्मान भारत के लोगों के प्रति इंडोनेशिया की सद्भावना और दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक है। उन्होंने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति, वहां की सरकार और जनता के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि दोनों देशों की मित्रता आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत होगी।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच सहयोग केवल राजनीतिक या रणनीतिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, रक्षा, समुद्री सुरक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे अनेक क्षेत्रों में लगातार विस्तार हो रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास के साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह सम्मान भारत की विदेश नीति की बढ़ती स्वीकार्यता और वैश्विक स्तर पर मजबूत होती भूमिका का संकेत है। हाल के वर्षों में भारत ने विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को विस्तार दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी स्थिति और प्रभाव दोनों मजबूत हुए हैं। ऐसे सम्मान न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा देते हैं, बल्कि वैश्विक समुदाय में भारत की सकारात्मक और विश्वसनीय छवि को भी और सुदृढ़ बनाते हैं।

  • भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई रणनीतिक मजबूती, पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो की वार्ता में व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग पर बनी व्यापक सहमति

    भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई रणनीतिक मजबूती, पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो की वार्ता में व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग पर बनी व्यापक सहमति

    नई दिल्ली । भारत और इंडोनेशिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में मंगलवार को महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में व्यापार, रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास सहित कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर व्यापक चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के बीच सहयोग को नई गति देना समय की आवश्यकता है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वार्ता के बाद कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों में केवल मजबूती ही नहीं आई है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग का दायरा भी लगातार विस्तृत हुआ है। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि मौजूदा बैठक से रणनीतिक साझेदारी और अधिक मजबूत होगी तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर सहयोग के नए अवसर तैयार होंगे।

    वार्ता के दौरान आर्थिक सहयोग को विशेष प्राथमिकता दी गई। दोनों नेताओं ने व्यापार और निवेश बढ़ाने के साथ-साथ कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में साझेदारी को विस्तार देने पर विचार-विमर्श किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि आपसी सहयोग से न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय विकास और स्थिरता को भी मजबूती मिलेगी।

    रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी बैठक का प्रमुख केंद्र रहा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण समुद्री देशों के रूप में भारत और इंडोनेशिया ने समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर साझा दृष्टिकोण दोहराया। दोनों देशों ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा, रणनीतिक समन्वय और रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इस दौरान रक्षा क्षेत्र में हुए समझौतों को दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया।

    संयुक्त प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं। इनमें सबसे प्रमुख ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली से जुड़ा सहयोग रहा, जिसके तहत भारत इंडोनेशिया को अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल यूनिट उपलब्ध कराएगा। इसके साथ ही इंडोनेशिया ने भारतीय ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली को खरीदने का निर्णय भी लिया है। इन समझौतों को भारत के रक्षा निर्यात और दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    प्रधानमंत्री मोदी का तीन दिवसीय इंडोनेशिया दौरा केवल रणनीतिक और आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संबंधों को भी नई ऊर्जा देने का प्रयास माना जा रहा है। उन्होंने साझा सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि योग्याकार्ता स्थित एक हजार वर्ष से अधिक पुराने प्रम्बानन मंदिर का पुनर्निर्माण परियोजना दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। प्रधानमंत्री बुधवार को राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस परियोजना का शुभारंभ करेंगे।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय को भी संबोधित करेंगे। माना जा रहा है कि यह यात्रा भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक सहयोग, रक्षा साझेदारी, आर्थिक संबंधों और सांस्कृतिक जुड़ाव को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। दोनों देशों ने भविष्य में आपसी विश्वास, साझा हितों और क्षेत्रीय शांति को आधार बनाकर सहयोग को और अधिक मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

  • भारत-इंडोनेशिया संबंधों को मिली नई रणनीतिक रफ्तार, पीएम मोदी बोले- दोनों देशों की साझेदारी का लाभ पूरी दुनिया और मानवता को मिलेगा

    भारत-इंडोनेशिया संबंधों को मिली नई रणनीतिक रफ्तार, पीएम मोदी बोले- दोनों देशों की साझेदारी का लाभ पूरी दुनिया और मानवता को मिलेगा

    नई दिल्ली । भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को नई मजबूती देते हुए दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, शिक्षा, अंतरिक्ष, औद्योगिक सहयोग और तकनीक समेत अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनाई है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और इंडोनेशिया की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका सकारात्मक प्रभाव 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था और पूरी मानवता पर भी दिखाई देगा। उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच सहयोग का नया दौर साझा विकास और स्थिरता को नई दिशा देगा।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो द्वारा दिए गए आत्मीय स्वागत और देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान को भारत के 140 करोड़ नागरिकों के सम्मान के रूप में स्वीकार करते हुए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान दोनों देशों के दशकों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों का प्रतीक है तथा भविष्य में सहयोग को और अधिक मजबूत करने की प्रेरणा देगा।

    उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों में विश्वास, सहयोग और रणनीतिक समझ लगातार बढ़ी है। वर्ष 2018 में स्थापित व्यापक रणनीतिक साझेदारी अब नए चरण में प्रवेश कर रही है। विकास, सुरक्षा, तकनीक, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों ने उल्लेखनीय प्रगति की है और आगे भी इसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प लिया गया है।

    रक्षा और समुद्री सुरक्षा को लेकर दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है। रक्षा आदान-प्रदान, आपदा प्रबंधन, औद्योगिक सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिए दोनों देशों के तटरक्षक बल मिलकर काम करेंगे। ब्लू इकोनॉमी, बंदरगाह विकास और समुद्री व्यापार के क्षेत्र में भी साझेदारी को विस्तार देने पर सहमति बनी है, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों और समुद्री संपर्क को नई गति मिलने की उम्मीद है।

    स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को भी सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया है। भारत की किफायती दवाओं की उपलब्धता इंडोनेशिया में बढ़ाने, वहां के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण में सहयोग देने तथा उन्नत गेहूं के बीज उपलब्ध कराने जैसे कदमों पर सहमति बनी है। इसके साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं के संचालन से जुड़े भारतीय अनुभव भी साझा किए जाएंगे, ताकि दोनों देशों के नागरिकों तक सरकारी सेवाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।

    तकनीक और डिजिटल क्षेत्र में दोनों देशों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दूरसंचार, डिजिटल अवसंरचना और स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने का निर्णय लिया है। भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस प्रणाली को इंडोनेशिया की भुगतान व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में भी सहमति बनी है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और पर्यटन को सुविधा मिलेगी। शिक्षा के क्षेत्र में भारत के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान का परिसर इंडोनेशिया में स्थापित करने की योजना भी सामने आई है, जिससे पूरे आसियान क्षेत्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलने की संभावना है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरिक्ष अनुसंधान, तकनीकी क्षमता निर्माण, महत्वपूर्ण खनिजों, स्टील और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए भी संयुक्त प्रयासों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों, विविधता में एकता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने में दोनों देशों की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, आसियान की केंद्रीय भूमिका, संवाद आधारित कूटनीति और वैश्विक शांति के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोनों देशों के संबंधों को और अधिक मजबूत बनाएगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि साझा इतिहास, साझा विश्वास और साझा समृद्धि के आधार पर भारत और इंडोनेशिया आने वाले वर्षों में नई सफलताओं की मिसाल कायम करेंगे।