Category: International

  • अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा

    अमेरिका में स्वास्थ्य बीमा नियमों पर सियासी संग्राम ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों का मुकदमा


    नई दिल्ली। अमेरिका में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना मेडिकेड के नए नियमों को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद गहरा गया है। 25 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। इन राज्यों का आरोप है कि नए कार्य संबंधी नियम जरूरतमंद लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा हासिल करना कठिन बना देंगे और कई पात्र नागरिक भी योजना के लाभ से वंचित हो सकते हैं।

    विवाद की शुरुआत अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत काम करने वाली सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से जारी अंतरिम नियमों के बाद हुई। राज्यों का कहना है कि प्रशासन ने पिछले वर्ष बने कानून की सीमा से आगे बढ़कर नए प्रावधान लागू किए हैं और कानून की ऐसी व्याख्या की है जिससे लाभार्थियों पर अतिरिक्त शर्तें लागू हो रही हैं।

    नए नियमों के अनुसार एक जनवरी से 19 से 64 वर्ष की आयु के वे लोग जो मेडिकेड विस्तार योजना के तहत आते हैं उन्हें हर महीने कम से कम 80 घंटे काम करना होगा या सामुदायिक सेवा करनी होगी अथवा आधे समय तक पढ़ाई करना अनिवार्य होगा। हालांकि गंभीर रूप से बीमार लोगों नशा मुक्ति कार्यक्रम में शामिल व्यक्तियों और कुछ अन्य श्रेणियों को छूट देने का प्रावधान रखा गया है।

    सबसे बड़ा विवाद गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की नई परिभाषा को लेकर है। पहले कानून में विकलांगता गंभीर बीमारी या नशे की लत से जूझ रहे लोगों को छूट देने की व्यवस्था थी लेकिन नए नियमों में कहा गया है कि बीमारी इतनी गंभीर होनी चाहिए जिससे व्यक्ति की काम करने पढ़ाई करने या सामुदायिक सेवा करने की क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो। तभी उसे छूट मिल सकेगी।

    मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि इस नई शर्त के कारण कैंसर मरीज दिव्यांग मानसिक रोगी और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इससे कई ऐसे लोग भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित हो सकते हैं जो वास्तव में इसके हकदार हैं।

    राज्यों ने यह भी आरोप लगाया है कि लंबे समय तक चर्चा के बाद अचानक नियम बदल दिए गए जिससे प्रशासनिक स्तर पर नई व्यवस्था लागू करना मुश्किल हो गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि गंभीर बीमारी का प्रमाण किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाएगा।

    दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि लाभ वास्तव में पात्र और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। हालांकि मुकदमा दायर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग और सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

    न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने नए नियमों पर चिंता जताते हुए कहा कि कैंसर दिव्यांगता मानसिक बीमारी या नशे की लत से उबर रहे लोगों को इलाज पाने के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई में नहीं उलझाया जाना चाहिए। उनके अनुसार इन बदलावों से हजारों जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।

  • युद्धविराम के बीच फिर दहला गाजा इस्राइली हवाई हमलों में दो मासूम समेत आठ की मौत कई घायल

    युद्धविराम के बीच फिर दहला गाजा इस्राइली हवाई हमलों में दो मासूम समेत आठ की मौत कई घायल


    नई दिल्ली। गाजा पट्टी में युद्धविराम लागू होने के बावजूद हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सोमवार को इस्राइल ने दक्षिणी और मध्य गाजा के कई इलाकों में हवाई हमले किए जिनमें दो बच्चों समेत कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई जबकि 20 से अधिक लोग घायल हो गए। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों और राहत एजेंसियों के अनुसार घायलों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज जारी है।

    सबसे बड़ा हमला दक्षिणी गाजा के खान यूनिस स्थित अल मवासी इलाके में हुआ जहां विस्थापित लोगों के तंबू को निशाना बनाया गया। इस हमले में 23 वर्षीय महिला और उसकी एक साल की बेटी की मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक हमले से पहले इलाके में चेतावनी जारी की गई थी। इसी क्षेत्र के करारा कस्बे में हुए एक अन्य हवाई हमले में 31 वर्षीय व्यक्ति की जान चली गई जिसकी कुछ महीने पहले ही शादी हुई थी और उसकी पत्नी गर्भवती है।

    खान यूनिस के तटीय क्षेत्र में विस्थापित लोगों के तंबुओं पर हुए एक अन्य हमले में दो लोगों की मौत हो गई जबकि 13 अन्य घायल हो गए। घायलों को फलस्तीनी रेड क्रिसेंट द्वारा संचालित फील्ड अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उनका उपचार चल रहा है।

    मध्य गाजा के दीर अल बलाह में ड्रोन हमले में तीन फलस्तीनियों की मौत हुई। मृतकों में आठ वर्षीय एक बच्चा उसका दादा और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं। अस्पताल अधिकारियों के अनुसार बच्चा अपनी घायल मां से मिलने आया था और हमले में उसकी मां भी घायल हो गई। इस्राइली सेना ने कहा कि यह हमला एक उग्रवादी को निशाना बनाकर किया गया था लेकिन उसने न तो उस व्यक्ति की पहचान बताई और न ही उसके मारे जाने की पुष्टि की।

    युद्धविराम लागू होने के बाद बड़े स्तर पर लड़ाई भले कम हुई हो लेकिन गाजा में लगभग रोजाना हवाई हमले जारी हैं। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि युद्धविराम लागू होने के बाद से अब तक 1045 फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है जिनमें 360 से अधिक महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। वहीं इस्राइल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई केवल उन उग्रवादियों के खिलाफ है जो उसके सैनिकों पर हमले की तैयारी कर रहे थे। इस्राइली सेना के अनुसार युद्धविराम के बाद उग्रवादी हमलों में उसके पांच सैनिक भी मारे गए हैं।

    गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक अक्टूबर 2023 में शुरू हुए युद्ध के बाद अब तक 73 हजार से अधिक फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है। दूसरी ओर इस्राइल का कहना है कि सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में करीब 1200 लोगों की जान गई थी और 251 लोगों को बंधक बनाया गया था।

    उधर वेस्ट बैंक में भी तनाव बना हुआ है। रामल्लाह के पास इस्राइली सेना की छापेमारी के दौरान 15 वर्षीय एक फलस्तीनी किशोर के सिर में गोली लगने से मौत हो गई। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय के अनुसार इस वर्ष वेस्ट बैंक में इस्राइली सैनिकों और बसने वालों की कार्रवाई में कम से कम 59 फलस्तीनियों की जान जा चुकी है।

  • भीषण गर्मी के बीच ब्रिटेन में एसी पर सख्ती, नेट जीरो नीति के तहत घरों से हटाने के निर्देश

    भीषण गर्मी के बीच ब्रिटेन में एसी पर सख्ती, नेट जीरो नीति के तहत घरों से हटाने के निर्देश


    नई दिल्ली। यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। ब्रिटेन में तापमान कई इलाकों में 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। हीटवेव के कारण जनजीवन प्रभावित है, लेकिन इसी बीच पर्यावरणीय नीतियों के तहत कुछ स्थानीय प्रशासनिक निकाय घरों में लगाए गए एयर कंडीशनर (एसी) को लेकर सख्ती बरत रहे हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार, लंदन के कुछ काउंसिल क्षेत्रों में निवासियों को एसी हटाने या उनके उपयोग को सीमित करने संबंधी नोटिस जारी किए गए हैं। अधिकारियों का तर्क है कि एयर कंडीशनर अधिक ऊर्जा की खपत करते हैं और कार्बन उत्सर्जन बढ़ाते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाना चाहिए।

    हीटवेव से जनजीवन प्रभावित

    ब्रिटेन में भीषण गर्मी के चलते कई क्षेत्रों में स्कूल बंद किए गए हैं और कुछ रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा है। मौसम विभाग ने अत्यधिक गर्मी को देखते हुए लोगों की सुरक्षा के लिए उच्च स्तर की चेतावनी जारी की है।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि कई अस्पतालों में तापमान अधिक होने और पर्याप्त शीतलन व्यवस्था नहीं होने के कारण हजारों गैर-आपातकालीन सर्जरी स्थगित करनी पड़ी हैं।

    क्या है नेट जीरो नीति?

    ब्रिटेन में लागू नेट जीरो नीति का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर तक लाना है। भवन निर्माण और ऊर्जा उपयोग से जुड़े दिशानिर्देशों के तहत पहले प्राकृतिक या पैसिव कूलिंग उपाय अपनाने पर जोर दिया जाता है।

    इन उपायों में भवनों का बेहतर वेंटिलेशन, खिड़कियां खोलकर रखना, छायादार व्यवस्था और सीलिंग फैन का उपयोग शामिल है। एसी के इस्तेमाल की अनुमति तभी दी जाती है, जब ये विकल्प पर्याप्त न हों।

    पर्यावरण संरक्षण पर जोर

    रिपोर्टों के मुताबिक, लंदन के कुछ स्थानीय निकायों ने नेट जीरो नीति के तहत भवनों में लगाए गए एसी हटाने या उनके उपयोग पर आपत्ति जताई है। प्रशासन लोगों को अधिक से अधिक प्राकृतिक वेंटिलेशन और सीलिंग फैन जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दे रहा है।

    हालांकि, भीषण गर्मी के बीच एसी के उपयोग को लेकर यह नीति बहस का विषय बनी हुई है। एक ओर सरकार और स्थानीय निकाय पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बढ़ते तापमान के बीच लोगों की सुविधा और स्वास्थ्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

  • दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं

    दोहा वार्ता पर बढ़ी अनिश्चितता: ट्रंप के दावे को ईरान ने किया खारिज, कहा- अमेरिका से फिलहाल कोई बैठक तय नहीं


    तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच कतर की राजधानी दोहा में प्रस्तावित बातचीत को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मंगलवार को दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक का दावा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद ईरान ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की वार्ता निर्धारित नहीं है।

    ईरान के इस बयान से दोनों देशों के बीच हालिया कूटनीतिक प्रयासों पर सवाल खड़े हो गए हैं। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद भी एक बार फिर सामने आ गए हैं।

    ईरान बोला- अमेरिका से कोई बातचीत तय नहीं
    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि इस सप्ताह ईरान का एक प्रतिनिधिमंडल कतर जाएगा, लेकिन इस यात्रा का अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी बैठक या वार्ता से कोई संबंध नहीं है।

    उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी स्तर की बातचीत तय नहीं है। बघाई के मुताबिक, तेहरान की प्राथमिकता फिलहाल दोनों देशों के बीच हुए समझौते से जुड़े प्रावधानों को लागू करना है और अंतिम समझौते पर चर्चा अभी शुरू नहीं हुई है।

    ट्रंप ने किया था बैठक का दावा
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया था कि दोहा में अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बैठक होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि बातचीत की पहल ईरान की ओर से की गई है। बाद में व्हाइट हाउस ने पुष्टि करते हुए बताया कि ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर उच्चस्तरीय वार्ता के लिए दोहा जाने वाले हैं।

    हालिया समझौते पर भी मंडराने लगे सवाल
    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने को लेकर एक बहु-बिंदु समझौते पर सहमति बनने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि अब दोनों पक्षों के विरोधाभासी बयानों से यह संकेत मिल रहा है कि कूटनीतिक प्रक्रिया अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिशों को नया झटका लग सकता है।

  • ट्रंप ने दोहा बैठक का किया ऐलान, तेहरान ने कहा- कोई कार्यक्रम तय नहीं, अमेरिका-ईरान रिश्तों में नई कूटनीतिक उलझन

    ट्रंप ने दोहा बैठक का किया ऐलान, तेहरान ने कहा- कोई कार्यक्रम तय नहीं, अमेरिका-ईरान रिश्तों में नई कूटनीतिक उलझन


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक असमंजस की स्थिति बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने बातचीत का अनुरोध किया है और दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच अगले दिन कतर की राजधानी दोहा में बैठक होगी। हालांकि, ट्रंप के इस बयान के कुछ ही समय बाद ईरान ने ऐसी किसी भी प्रस्तावित बैठक से साफ इनकार कर दिया। दोनों देशों के विपरीत दावों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है और यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एक संक्षिप्त संदेश जारी करते हुए कहा कि ईरान की ओर से बैठक का अनुरोध किया गया है और यह बातचीत दोहा में आयोजित होगी। उनके इस बयान को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना गया जब पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों के बाद क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है और कई देश किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर नजर बनाए हुए हैं।

    दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने स्पष्ट किया कि इस सप्ताह कतर में अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तकनीकी स्तर की बैठक की कोई योजना तय नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि विभिन्न मध्यस्थ देशों के माध्यम से बातचीत की प्रक्रिया सामान्य रूप से जारी है, लेकिन जिन बैठकों की चर्चा मीडिया में की जा रही है, उनकी पुष्टि नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, किसी भी औपचारिक तकनीकी वार्ता से पहले समय, स्थान और अन्य आवश्यक शर्तों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनना जरूरी होगा।

    ईरानी पक्ष के इस बयान से स्पष्ट संकेत मिला कि बैकचैनल संपर्क और औपचारिक वार्ता के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में दोनों देश सार्वजनिक बयानों और वास्तविक कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आधिकारिक घोषणा से पहले किसी भी संभावित बैठक को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है।

    हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहे प्रभाव ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी चाहता है कि दोनों देशों के बीच किसी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संवाद जारी रहे ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सके। हालांकि दोनों पक्ष अब भी कई प्रमुख मुद्दों पर अलग-अलग रुख अपनाए हुए हैं।

    इसी बीच ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। 4 से 9 जुलाई के बीच आयोजित होने वाले राजकीय कार्यक्रम में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन इस अवसर पर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। इसे भारत और ईरान के बीच जारी राजनयिक संपर्कों के एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

    फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक ओर ट्रंप का सार्वजनिक दावा है तो दूसरी ओर तेहरान का आधिकारिक खंडन। ऐसे में अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच वास्तव में कोई औपचारिक बैठक होती है या कूटनीतिक संपर्क केवल मध्यस्थ देशों के माध्यम से ही आगे बढ़ता है।

  • रूस में ईंधन संकट गहराया, रिफाइनरियों पर हमलों के बाद पेट्रोल-डीजल सप्लाई प्रभावित, पुतिन ने मानी चुनौतियां

    रूस में ईंधन संकट गहराया, रिफाइनरियों पर हमलों के बाद पेट्रोल-डीजल सप्लाई प्रभावित, पुतिन ने मानी चुनौतियां

    नई दिल्ली: रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का प्रभाव अब युद्धक्षेत्र से निकलकर आम नागरिकों के दैनिक जीवन तक पहुंचने लगा है। रूस के कई हिस्सों में पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें सामने आ रही हैं। ईंधन संकट को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि देश वर्तमान में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा अवसंरचना पर लगातार हमले होने की रिपोर्टें सामने आ रही हैं।

    रूस विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र पर निर्भर करता है। हालांकि हाल के महीनों में ऊर्जा सुविधाओं पर बढ़ते हमलों ने उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा दिया है। कई क्षेत्रों से पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारों और ईंधन की सीमित उपलब्धता की जानकारी मिल रही है, जिससे आम नागरिकों और व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है।

    रूसी नेतृत्व का कहना है कि सरकार हालात को नियंत्रित करने और आवश्यक आपूर्ति बनाए रखने के लिए लगातार कदम उठा रही है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि कृषि क्षेत्र और आवश्यक सेवाओं के लिए ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। फसल सीजन को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में डीजल की मांग बढ़ी हुई है, इसलिए सरकार इस क्षेत्र को प्राथमिकता देने की रणनीति पर काम कर रही है।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों पर हमलों से केवल उत्पादन ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि वितरण व्यवस्था भी बाधित होती है। कच्चे तेल को सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसे रिफाइनरियों में प्रसंस्कृत कर पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में बदला जाता है। यदि रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित होती है तो घरेलू बाजार में तैयार ईंधन की उपलब्धता कम हो सकती है, भले ही देश के पास पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल मौजूद हो।

    रूस सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी संकेत दिए हैं कि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए ऊर्जा निर्यात नीति की समीक्षा की जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ ईंधन उत्पादों के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित करना है।

    युद्ध के दौरान ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बनाए जाने से रूस की आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। तेल और गैस निर्यात से होने वाली आय रूस के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत मानी जाती है। यदि उत्पादन और निर्यात दोनों प्रभावित होते हैं, तो इसका असर सरकारी राजस्व और व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा वर्तमान समय में रूस की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हो गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रूस को घरेलू आपूर्ति, निर्यात प्रतिबद्धताओं और ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। युद्ध के लंबे खिंचने और ऊर्जा परिसंपत्तियों पर बढ़ते दबाव के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। फिलहाल सरकार आपूर्ति सामान्य बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र की मौजूदा परिस्थितियां रूस के लिए एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखी जा रही हैं।

  • सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच सऊदी अरब और फ्रांस ने क्षेत्रीय शांति तथा सुरक्षा को लेकर अपने समन्वय को और मजबूत करने के संकेत दिए हैं। इसी क्रम में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच टेलीफोन पर महत्वपूर्ण बातचीत हुई, जिसमें क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ-साथ दोनों देशों के साझा हितों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

    सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार, बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया ज्ञापन समझौते से जुड़े ताजा घटनाक्रम की समीक्षा की। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी कूटनीतिक प्रयासों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि तनाव कम करने के लिए संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाना आवश्यक है।

    वार्ता में समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी प्रमुख विषय रही। दोनों पक्षों ने अंतरराष्ट्रीय नौवहन की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समुद्री व्यापार को किसी भी प्रकार के तनाव या टकराव से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने क्षेत्रीय विवादों के समाधान के लिए सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता दोहराई।

    बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने सऊदी अरब और फ्रांस के द्विपक्षीय संबंधों की भी समीक्षा की। आर्थिक, रणनीतिक और राजनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समन्वय बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की गई। इसके अलावा साझा वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करते हुए भविष्य में सहयोग को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हस्ताक्षरित ज्ञापन समझौते का उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और संवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था। हालांकि समझौते के बावजूद दोनों देशों के बीच समय-समय पर तनावपूर्ण घटनाएं सामने आती रही हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बनी हुई है।

    हालिया घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच आगे की बातचीत को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों ने फिलहाल आपसी हमलों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों के समाधान के लिए कतर की राजधानी दोहा में वार्ता करने पर सहमति जताई है। पहले यह बैठक स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित थी, लेकिन क्षेत्र में बढ़े तनाव को देखते हुए इसका स्थान बदल दिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्ष तकनीकी स्तर की वार्ताओं को जारी रखते हुए समुद्री मार्गों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और फ्रांस के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुआ यह संवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रमुख देशों के बीच निरंतर कूटनीतिक संपर्क और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। ऐसे प्रयास क्षेत्रीय तनाव कम करने और दीर्घकालिक शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • इराक दौरे पर अराघची ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से की अहम वार्ता, ईरान-अमेरिका एमओयू, क्षेत्रीय सुरक्षा और होर्मुज तनाव पर हुई व्यापक चर्चा

    इराक दौरे पर अराघची ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से की अहम वार्ता, ईरान-अमेरिका एमओयू, क्षेत्रीय सुरक्षा और होर्मुज तनाव पर हुई व्यापक चर्चा

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच ईरान और इराक के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्क एक बार फिर चर्चा में है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने बगदाद में इराक के राष्ट्रपति निजार अमेदी और प्रधानमंत्री अली अल-जैदी से अलग-अलग मुलाकात कर क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान-अमेरिका के बीच हालिया समझौता ज्ञापन (एमओयू) और मौजूदा तनावपूर्ण परिस्थितियों पर व्यापक विचार-विमर्श किया। बैठकों में दोनों देशों ने संवाद को ही स्थायी समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने पर सहमति व्यक्त की।

    इराक के राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति अमेदी ने क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए निरंतर बातचीत और आपसी विश्वास को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि लंबित विवादों का समाधान सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से ही संभव है। उनका मानना है कि संवाद आधारित पहल से पूरे क्षेत्र में स्थिर और सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री अली अल-जैदी के साथ हुई बैठक में भी यही दृष्टिकोण सामने आया। उन्होंने कहा कि इराक किसी भी प्रकार के संघर्ष को समाप्त करने और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करने वाली सभी पहलों का समर्थन करता है। उनके अनुसार युद्ध और टकराव की स्थिति समाप्त होने से क्षेत्र के देशों के लिए आर्थिक विकास, निवेश और जनकल्याण के नए अवसर उपलब्ध होंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इराक शांति और सहयोग पर आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था का पक्षधर है।

    ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने संकट की परिस्थितियों में इराक की संतुलित भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि तेहरान अपने पड़ोसी देशों के साथ भरोसे और सहयोग पर आधारित संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया तथा कहा कि साझा चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार समन्वय बनाए रखना समय की मांग है।

    यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय हुई है जब हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव तेज हो गया था। अमेरिका ने ईरानी ठिकानों पर कार्रवाई करते हुए आरोप लगाया कि होर्मुज स्ट्रेट में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को लगातार चुनौती दी जा रही है। इसके जवाब में ईरान ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन घटनाओं ने पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ा दिया।

    हालांकि ताजा घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और ईरान ने आपसी सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोकने और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े विवादों पर बातचीत के लिए कतर की राजधानी दोहा में बैठक करने पर सहमति जताई है। इस वार्ता का उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आगे किसी भी प्रकार के टकराव से बचने के उपाय तलाशना है।

    जानकारी के अनुसार, प्रारंभिक योजना के तहत यह वार्ता स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित थी, जहां मुख्य एजेंडा ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे थे। लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव को देखते हुए बैठक का स्थान बदलकर दोहा कर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री व्यापार की निरंतरता को प्राथमिकता देने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे समय में इराक और ईरान के बीच हुई यह उच्चस्तरीय बातचीत पूरे क्षेत्र में संवाद आधारित समाधान को आगे बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में देखी जा रही है।

  • भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग

    भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन दिवसीय सेशेल्स दौरा भारत और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत और सेशेल्स के बीच कुल 19 महत्वपूर्ण समझौतों और सहयोगी पहलों पर सहमति बनी, जिनका उद्देश्य रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई दिशा देना है। इन समझौतों को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान भारत ने सेशेल्स को एक फास्ट पेट्रोल वेसल, कई यूटिलिटी वाहन, लेजर रेडियल क्लास बोट्स और छह एम्बुलेंस भेंट कीं। इन पहलों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, मानवीय सहयोग बढ़ाना और हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी को और प्रभावी बनाना है। साथ ही सेशेल्स कोस्ट गार्ड के जहाज की मरम्मत और डोर्नियर विमान के आधुनिकीकरण जैसे प्रोजेक्ट भी सहयोग के प्रमुख केंद्र रहे।

    आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई गति देने के लिए भारत और सेशेल्स के बीच यूपीआई आधारित डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करने पर सहमति बनी। इस दिशा में दोनों देशों के संबंधित वित्तीय संस्थानों के बीच समझौते किए गए, जिससे डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा और भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रणाली का अंतरराष्ट्रीय विस्तार भी मजबूत होगा। इसके साथ ही आर्थिक सहयोग और वित्तीय समावेशन को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई गई है।

    स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दोनों देशों ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जन औषधि योजना के तहत सस्ती और गुणवत्तापूर्ण भारतीय दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इसके अलावा नए राष्ट्रीय अस्पताल की शुरुआती तैयारियों और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास से जुड़े समझौतों पर भी सहमति बनी, जिससे सेशेल्स की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।

    कृषि, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने सहयोग का दायरा विस्तारित किया है। कृषि अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त कार्ययोजना तैयार की गई है। वहीं प्रोफेशनल और टेक्निकल एजुकेशन सेंटर की स्थापना तथा विदेश सेवा से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए संस्थागत सहयोग को भी नई मजबूती मिलेगी। इन पहलों का उद्देश्य स्थानीय क्षमता निर्माण के साथ दीर्घकालिक विकास साझेदारी को मजबूत करना है।

    ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और ब्लू इकोनॉमी जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। ग्रीन हाइड्रोजन, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे, समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर साझा प्रयासों पर जोर दिया गया। इसके साथ ही सेशेल्स ने आपदा-रोधी अवसंरचना से जुड़े वैश्विक गठबंधन की सदस्यता भी ग्रहण की, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सहयोग और मजबूत होगा।

    दौरे के दौरान अंतरिक्ष सहयोग, प्रत्यर्पण संधि, नाविकों के प्रशिक्षण, खाद्य सुरक्षा, विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता तथा बुनियादी ढांचे के विकास जैसे कई महत्वपूर्ण समझौते भी किए गए। भारत ने सेशेल्स को चावल और सीमेंट की आपूर्ति के साथ विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया। इन पहलों से स्पष्ट है कि दोनों देश केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और विकासात्मक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका को और मजबूत करने के साथ भारत-सेशेल्स संबंधों को नई ऊंचाई देने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

  • US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल

    US: ट्रंप फेमिली को 1.6 अरब डालर की डील में हुआ बंपर मुनाफा…. वित्त मंत्री का नाम भी शामिल


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) को लेकर एक नया बवाल शुरू हो गया है। हाल ही में हुए एक बड़े खुलासे के मुताबिक, अमेरिकी सरकार ने हाल ही में एक ऐसी डील (Deel) की है जिससे ट्रंप के बेटे को अरबों का फायदा होने जा रहा है। वहीं इस प्रॉफिट वाली डील में ट्रंप के परिवार के साथ साथ अमेरिका के वित्त मंत्री हावर्ड लुटनिक (Finance Minister Howard Lutnick) का नाम भी है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की अमेरिका फर्स्ट की नीति को लेकर सवाल उठने शुरू हो हुए हैं।

    दरअसल यह खुलासा द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में हुआ है। इसके मुताबिक कजाकिस्तान (Kazakhstan) के साथ दुनिया के सबसे बड़े दुर्लभ खनिज ‘टंगस्टन’ के भंडार को विकसित करने के लिए अमेरिका ने हाल ही में 1.6 अरब डॉलर यानी करीब 13,500 करोड़ रुपये की सरकारी डील की है। इस डील से सीधे राष्ट्रपति ट्रंप के बेटों और उनके वाणिज्य मंत्री के परिवार को तगड़ा वित्तीय मुनाफा होने जा रहा है।

    बेहद अहम है ये डील
    कजाकिस्तान के साथ हुआ यह सौदा अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। फिलहाल वैश्विक टंगस्टन बाजार पर पूरी तरह चीन का कब्जा है। चीन लगातार इस दुर्लभ खनिज के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध बढ़ा रहा है। बता दें कि टंगस्टन का इस्तेमाल मिसाइल वॉरहेड्स, फाइटर जेट्स, सेमीकंडक्टर्स और कई एडवांस सैन्य तकनीकों में होता है। अमेरिका इस डील के जरिए चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहता है। हालांकि अब टंगस्टन से ज्यादा अब चर्चा उन चेहरों की हो रही है, जिनकी तिजोरियां इस सरकारी सौदे से भरने वाली हैं।

    तय हुई डील, पीछे-पीछे बेटों ने लगा दिए पैसे
    दस्तावेजों के मुताबिक, जैसे-जैसे सरकारी स्तर पर इस डील की बातचीत आगे बढ़ रही थी, ठीक उसी समय ट्रंप और उनके करीबी मंत्रियों के परिवारों की कंपनियां इस सौदे में अपनी हिस्सेदारी खरीद रही थीं। सितंबर 2025 में न्यूयॉर्क के सेंट रेजिस होटल में अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव के बीच बैठक हुई। इसी बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद फोन कॉल के जरिए कजाकिस्तान के राष्ट्रपति को इस प्रोजेक्ट के लिए राजी किया।

    इस बैठक के ठीक कुछ हफ्तों बाद, ‘डोमिनारी सिक्योरिटीज’ नाम की एक इन्वेस्टमेंट फर्म ने इस कजाकिस्तान माइनिंग प्रोजेक्ट से जुड़ी मुख्य कंपनी में शेयर खरीद लिए। यह कंपनी ट्रंप टावर से चलती है और इसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप की 20% हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ, वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक के बेटों ब्रैंडन और काइल की एक कंपनी इन्वेस्टमेंट बैंक ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ ने इस प्रोजेक्ट में निवेश के लिए 210 मिलियन डॉलर का फंड जुटाया।

    सरकारी तिजोरी से $8.9 अरब पाने की होड़
    यह कोई इकलौता मामला नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप और लुटनिक परिवारों से जुड़ी कंपनियां कम से कम 14 ऐसी माइनिंग प्रोजेक्ट्स में हित रखती हैं, जिन्हें अमेरिकी सरकार का समर्थन प्राप्त है। ये कंपनियां अमेरिकी सरकार से लगभग 8.9 अरब डॉलर की फेडरल फंडिंग, लोन या रेगुलेटरी मंजूरी पाने की रेस में सबसे आगे हैं।

    संसद में उठे सवाल, वाइट हाउस ने खारिज किए आरोप
    अमेरिकी सांसद मैक्सिन डेक्सटर ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा, “संसद को यह सुनिश्चित करना होगा कि टैक्सपेयर्स के पैसों का इस्तेमाल देश के हित में हो, न कि ट्रंप प्रशासन के करीबी लोगों और उनके परिवार के सदस्यों की जेबें भरने के लिए।” वहीं हितों के टकराव के आरोपों पर अब वाइट हाउस ने अपनी सफाई जारी की है। वाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “ट्रंप प्रशासन के फैसलों के पीछे सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी जनता का हित है। अमेरिका की क्रिटिकल सप्लाई चेन को सुरक्षित करना राष्ट्रपति ट्रंप की प्राथमिकता है।” इधर वाणिज्य विभाग ने कहा है कि मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने अपनी पुरानी कंपनी ‘कैंटर फिट्जगेराल्ड’ में अपनी हिस्सेदारी पहले ही बेच दी है और उनका इस लोन या फंडिंग फैसलों से कोई लेना-देना नहीं है।