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  • जापान की पहली पसंद भारत…. लेकिन कारखाने थाईलैंड में ज्यादा

    जापान की पहली पसंद भारत…. लेकिन कारखाने थाईलैंड में ज्यादा


    टोक्यो।
    जापान (Japan) के लिए भारत (India) कागज पर पहली पसंद है, कारखाने के लिए थाईलैंड (Thailand)। जापानी कंपनियों (Japanese Companies) की पसंद में भारत भले 61.8% वोट के साथ पसंदीदा ठिकानों की सूची में लगातार चौथे साल शीर्ष पर है, पर जापानी कंपनियां (Japanese Companies) भारत में 1400 हैं जबकि थाईलैंड में छह हजार।

    11 साल में निवेश का लक्ष्य 3.5 लाख करोड़ येन (2.10 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर 10 लाख करोड़ येन (6 लाख करोड़ रुपये) हो गया, कंपनियों की गिनती नहीं बढ़ी। रकम के वादे काम नहीं आए, इसलिए इस बार सरकार 220 भारतीय उद्योगपतियों को सीधे जापानी कारखानों के दरवाजे पर ले जा रही है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal Japan visit) के नेतृत्व वाला यह दल सोमवार से 27 अगस्त तक जापान में रहेगा। रणनीति दौरे के नक्शे से समझ आती है। पैसा टोक्यो में है, पर कारखाना लगाने वाली कंपनियां वहां नहीं हैं।

    जापान की असली विनिर्माण ताकत आइची और कंसाई की उन हजारों मझोली कंपनियों में है, जो बड़ी कंपनियों को कलपुर्जे देती हैं। कोई जापानी कंपनी जब कहीं जाती है, तो आपूर्तिकर्ताओं का पूरा झुंड साथ ले जाती है। इसीलिए भारत पहली बार इंतजार के बजाय खुद उनके पास गया है। भारतीय दल नागोया में चुकेइरेन व नागोया चैंबर के साथ रोड शो करेगा, ओसाका व क्योटो में क्षेत्रीय उद्योग से जुड़ेगा।

    सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स व एआई पर गोलमेज बैठक
    इस कार्यक्रम में मशीन को समझने या जानने पर जोर है। सेमीकंडक्टर, एआई और इलेक्ट्रॉनिक्स पर एक गोलमेज बैठक है, पूंजीगत वस्तुओं, मशीनरी और वाहन उद्योग पर दूसरी। दौरे का मकसद दोतरफा निवेश बढ़ाना है। इसी क्रम में भारतीय कंपनियों का जापान जाना भी अहम है, जहां अभी सिर्फ 100 भारतीय कंपनियां हैं।


    भारत सिर्फ खरीदार नहीं…

    दल में रिलायंस के औद्योगिक नगर मेट सिटी के प्रमुख हैं, जो जापानी कंपनियों को जमीन बेचते हैं। मारुति सुजुकी है, गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन है, बीमा व संपत्ति प्रबंधन कंपनियां हैं, जो जापान की सस्ती पेंशन पूंजी की तलाश में हैं, और स्टार्टअप का पूरा जत्था है, जिसके लिए टोक्यो में अलग बैठक होगी।

    दल में कौन-कौन?
    आरपीजी समूह के उपाध्यक्ष अनंत गोयनका, एसोचैम से निर्मल कुमार मिंडा, टीसीआई के विनीत अग्रवाल, रिन्यू पावर के सुमंत सिन्हा, किर्लोस्कर सिस्टम्स की गीतांजलि विक्रम किर्लोस्कर, एडवर्ब टेक के जलज दानी, कार्स24 के विक्रम चोपड़ा, गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन के राजेंद्र कुमार, मारुति सुजुकी के राहुल भारती, मोबिक्विक की उपासना टाकू, न्यूस्पेस रिसर्च के जूलियस अमृत, निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट के संदीप सिक्का, रिलायंस मेट सिटी के श्रीवल्लभ गोयल, स्नैबिट के आयुष अग्रवाल, स्टार यूनियन दाई-इची लाइफ के अभय तिवारी और एसपीएफ की श्वेता राजपाल कोहली। वाहन, वाहन कलपुर्जे, अभियांत्रिकी, रसायन, पेट्रो रसायन, तकनीक और स्टार्टअप, यानी हर क्षेत्र से नाम हैं।

  • ईरान का बड़ा फैसला, बोला- Hormuz से गुजरने वाले अधिकृत देशों के जहाजों से देना पड़ेगा सेवा शुल्क

    ईरान का बड़ा फैसला, बोला- Hormuz से गुजरने वाले अधिकृत देशों के जहाजों से देना पड़ेगा सेवा शुल्क


    तेहरान।
    ईरान (Iran) ने रविवार को कहा कि अधिकृत देशों के जो जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरेंगे, उन्हें अब तेहरान को सेवा शुल्क (Service Fees ) देना होगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई ने इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह शुल्क समुद्री, पर्यावरण और लॉजिस्टिक से जुड़ी कई तरह की सेवाओं के लिए लिया जाएगा।

    सरकारी प्रसारक आईआरआईबी के मुताबिक, यह फैसला ‘होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और प्रगति सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक कार्रवाई’ योजना के अनुच्छेद 3 को मंजूरी मिलने के बाद लिया गया है।

    रेजाई ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग ने इस योजना के अनुच्छेद 3 को मंजूरी दे दी है। इसके तहत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति पाने वाले देशों के जहाजों को ईरान की ओर से दी जाने वाली सेवाओं का भुगतान करना होगा।


    जहाजों से किस वजहों से शुल्क लिया जाएगा?

    उन्होंने कहा कि इन सेवाओं में जहाजों की आवाजाही के लिए मदद, पर्यावरण से जुड़ी सेवाएं, कुछ परिस्थितियों में ईंधन, बीमा, सुरक्षा और दूसरी सेवाएं शामिल हैं। प्रवक्ता ने बताया कि भुगतान के लिए लचीली वित्तीय व्यवस्था तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि शुल्क ईरानी रियाल या इस्लामी गणराज्य ईरान की ओर से पसंद की जाने वाली किसी दूसरी मुद्रा में लिया जा सकता है।


    होर्मुज जलडमरूमध्य अब भी बंद है: रेजाई

    इससे पहले शनिवार को ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने कहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य अभी भी बंद है। उन्होंने कहा था कि जब तक अमेरिका अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं करता और अपना रवैया नहीं बदलता, तब तक यह जलमार्ग दोबारा नहीं खोला जाएगा।

    आईआरआईबी को दिए इंटरव्यू में रेजाई ने कहा कि अमेरिकी दावों के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य बंद है और अमेरिका का रवैया ठीक होने तक यह नहीं खुलेगा। उन्होंने कहा कि इस बार अमेरिका को पहले अपनी जिम्मेदारियां पूरी करनी होंगी।

    रेजाई ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका सैन्य विकल्पों से निराश हो चुका है और अब आर्थिक नाकाबंदी के जरिये ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भरोसा दिलाया है कि आर्थिक नाकाबंदी ईरान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर देगी।

    दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने फिर होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका के नियंत्रण का दावा किया है। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर एक तस्वीर साझा की। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को ‘न्यू यूएस टेरिटरी’ यानी ‘नया अमेरिकी क्षेत्र’ बताया गया है। ट्रंप ने इससे पहले 18 अगस्त को एक पोस्ट साझा की थी। इस पोस्ट में उन्होंने यही तस्वीर साझा की थी।

  • Thailand के 3 प्रांतों में अलग शासन की मांग…. रातभर हुई हिंसा…. PM ने बुलाई आपात बैठक

    Thailand के 3 प्रांतों में अलग शासन की मांग…. रातभर हुई हिंसा…. PM ने बुलाई आपात बैठक


    बैंकाक।
    थाईलैंड (Thailand) के प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नविराकुल (Prime Minister Anutin Charnvirakul) ने रविवार को वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के साथ आपात बैठक की। देश के उत्तर में पहले से ही बाढ़ का संकट बना हुआ है। इसी बीच, दक्षिण के तीन प्रांतों में रातभर एक साथ हिंसा हुई। इन इलाकों में कुछ मुस्लिम विद्रोही संगठन (Muslim Insurgent Organization) सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने इलाके के लिए अलग शासन की मांग कर रहे हैं।


    पीएम अनुतिन ने क्यों बुलाई गई बैठक?

    अनुतिन के उत्तर की ओर रवाना होने से कुछ समय पहले यह बैठक हुई। उन्हें बुरी तरह बाढ़ प्रभावित नान प्रांत का जायजा लेना था। बैठक शनिवार रात दक्षिण के सबसे आखिरी तीन प्रांतों में हुई 51 घटनाओं के बाद बुलाई गई। इनमें नाराथिवाट, पट्टानी और याला शामिल हैं।

    हमलावरों का सेना या पुलिस से कोई सामना नहीं हुआ। अब तक सिर्फ तीन नागरिकों के घायल होने की जानकारी है। रविवार को बताया गया कि तीनों की हालत में सुधार हो रहा है।

    हिंसा में मुख्य रूप से छोटे बमों का इस्तेमाल हुआ। आगजनी की गई। संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। सबसे बड़ा निशाना पट्टानी का 7-इलेवन स्टोर था। सोशल मीडिया पर चल रहे एक वीडियो में हथियारबंद लोग स्टोर के बाहर घूमते दिखे। ग्राहक और कर्मचारी वहां से भागते नजर आए। इसके बाद स्टोर में आग लगा दी गई।

    नाराथिवाट में एक बम से रेल की पटरियां क्षतिग्रस्त हो गईं। इसके कारण स्थानीय और लंबी दूरी की रेल सेवाएं रोकनी पड़ीं। सुरक्षा की स्थिति साफ नहीं होने के कारण यह पता नहीं चल पाया कि सेवाएं कब फिर शुरू होंगी। ऐसी घटनाओं में अक्सर तुरंत किसी संगठन पर सार्वजनिक रूप से आरोप नहीं लगाया जाता। इस बार भी किसी संगठन ने तुरंत हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली।


    हमलों के पीछे बीआरएन को क्यों माना जा रहा है?

    हालांकि, आमतौर पर माना जाता है कि ऐसे हमले बारिसान रिवोलुसी नेशनल मेलायु पटानी यानी बीआरएन करता है। यह दक्षिण का प्रमुख विद्रोही संगठन है। उसके पास ऐसी कार्रवाई करने के लिए संगठन और समर्थन दोनों हैं। यही वह संगठन है, जिसके साथ थाई सरकार समय-समय पर शांति वार्ता करती रही है।

    थाईलैंड में ज्यादातर लोग बौद्ध हैं। लेकिन इसके तीन सबसे दक्षिणी प्रांतों में मुस्लिम आबादी बहुमत में है। बीआरएन ने कहा है कि वह इन प्रांतों के लिए खुद शासन की व्यवस्था चाहता है। मुस्लिम लोग लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि थाईलैंड में उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होता है। अलगाववादी आंदोलन भी कई दशकों से समय-समय पर सक्रिय रहे हैं।


    22 साल में 7,837 लोगों की मौत?

    2004 में विद्रोही हिंसा अचानक काफी बढ़ गई थी। इसके जवाब में सरकार ने सख्त कार्रवाई की। इससे लोगों में असंतोष और बढ़ गया। पट्टानी में प्रिंस ऑफ सोंगकला यूनिवर्सिटी के परिसर से जुड़े थिंक टैंक डीप साउथ वॉच के मुताबिक, पिछले 22 साल में इस हिंसा में 7,837 लोगों की मौत हुई है।

    इस हिंसा में पिछली बड़ी घटना जुलाई में हुई थी। उस समय करीब 10 हमलावरों ने नाराथिवाट में एक सुरक्षा चौकी पर सैनिकों पर गोलियां चलाईं। उन्होंने सैनिकों पर पाइप बम भी फेंके। इस हमले में अर्धसैनिक बल के पांच सैनिक मारे गए। छह नागरिक घायल हुए। इनमें 10 साल का एक लड़का भी शामिल था।

  • गोलन हाइट्स पर पहले इजरायल को 'कब्जाधारी' बताया, फिर पलटे अमेरिकी राजदूत टॉम बराक

    गोलन हाइट्स पर पहले इजरायल को 'कब्जाधारी' बताया, फिर पलटे अमेरिकी राजदूत टॉम बराक


    नई दिल्ली। गोलन हाइट्स को लेकर अमेरिकी राजदूत टॉम बराक के बयान से नया विवाद खड़ा हो गया है। बराक ने शुक्रवार को एक इंटरव्यू में कहा था कि इजरायल अब भी गोलन हाइट्स पर कब्जा किए हुए है और यह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के खिलाफ है। उनका यह बयान अमेरिका की मौजूदा नीति से अलग माना गया, क्योंकि 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गोलन हाइट्स पर इजरायल की संप्रभुता को मान्यता दी थी। विवाद बढ़ने के बाद बराक ने रविवार को सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    बराक ने लेबनानी-ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी और पत्रकार मारियो नौफल को दिए इंटरव्यू में गोलन हाइट्स का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि इजरायल अभी भी इस इलाके पर कब्जा किए हुए है और यह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप नहीं है।

    1967 में इजरायल ने किया था कब्जा

    गोलन हाइट्स सीरिया का रणनीतिक क्षेत्र है। 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के दौरान इजरायल ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया था। 1981 में इजरायल ने इसे अपने में मिला लिया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश देश आज भी इस कदम को मान्यता नहीं देते।

    अमेरिका का रुख हालांकि अलग रहा है। 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने गोलन हाइट्स पर इजरायल की संप्रभुता को मान्यता दी थी। यह इस मुद्दे पर दशकों पुरानी अमेरिकी नीति में बड़ा बदलाव था।

    विवाद बढ़ा तो बराक ने दी सफाई

    गोलन हाइट्स को लेकर दिए बयान के बाद अमेरिकी राजदूत सवालों के घेरे में आ गए। इजरायल की ओर से भी उनके बयान पर आपत्ति जताई गई। इसके बाद रविवार को बराक ने स्पष्ट किया कि उनके बयान का मतलब संयुक्त राष्ट्र के रुख का समर्थन करना नहीं था।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, बराक ने कहा कि 2019 में ट्रंप ने गोलन हाइट्स को लेकर जो अमेरिकी नीति तय की थी, उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि वह गोलन हाइट्स का उदाहरण दक्षिणी लेबनान की स्थिति को समझाने के लिए दे रहे थे। उनका कहना था कि बातचीत के जरिए हुए समझौते केवल नक्शे बदलने की तुलना में ज्यादा टिकाऊ होते हैं।

    अमेरिकी सांसद और इजरायल ने जताई आपत्ति

    बराक के बयान पर रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट ने भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि अमेरिकी राजदूत ट्रंप के उस फैसले को भूल गए हैं, जिसमें गोलन हाइट्स को इजरायल का हिस्सा माना गया था।

    इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने भी बराक के बयान का विरोध किया और इसे ट्रंप की नीति के बिल्कुल विपरीत बताया।

    सीरिया एयरबेस पर भी बयान से विवाद

    टॉम बराक इसी इंटरव्यू में सीरिया के एक एयरबेस पर इजरायली हमले की आलोचना को लेकर भी चर्चा में आए। इजरायल ने मंगलवार को एयरबेस पर हमला किया था। उसका कहना था कि वह सीरिया में तुर्की की सैन्य मौजूदगी को रोकने के लिए की गई कार्रवाई थी।

    रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने रविवार को इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि इजरायल सीरिया में तुर्की की ऐसी सैन्य मौजूदगी स्वीकार नहीं करेगा, जिससे उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो।

    हिजबुल्लाह पर भी देनी पड़ी सफाई

    बराक का एक अन्य बयान भी विवाद का कारण बना। उन्होंने इजरायल-लेबनान मुद्दे पर कहा था कि बातचीत की मेज से हिजबुल्लाह और ईरान गायब हैं। इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि वह दोनों को वार्ता में शामिल करने की बात कर रहे हैं।

    हालांकि, बराक ने बाद में स्पष्ट किया कि अमेरिका हिजबुल्लाह से बातचीत नहीं करता। उनका मकसद केवल यह बताना था कि इजरायल-लेबनान का मुद्दा जटिल है, क्योंकि हिजबुल्लाह को हथियार और आर्थिक मदद ईरान से मिलती है।

  • सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल

    सऊदी-पाक-तुर्की के ‘मक्का पैक्ट’ में ईरान की एंट्री? न्योता मिलने की खबर से पश्चिम एशिया में हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आने की खबर है। ईरान को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने का न्योता मिलने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान इस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। हालांकि, अभी तक ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान या तुर्की में से किसी भी देश ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    यह दावा शनिवार को अल मयादीन ने ईरानी संसद की समाचार एजेंसी ‘खानेह मेल्लत’ के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से किया। रहीमी के मुताबिक ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है और इस पर फिलहाल विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए साझा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    अगर यह खबर सही साबित होती है तो इसे पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा, क्योंकि सऊदी अरब और ईरान लंबे समय तक एक-दूसरे के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

    क्या है ‘मक्का पैक्ट’?

    सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा।

    समझौते का उद्देश्य आपसी रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। इसके तहत सैन्य तालमेल, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम किया जाएगा।

    तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने समझौते के आपसी रक्षा प्रावधान की तुलना NATO के अनुच्छेद 5 से की थी। हालांकि, तीनों देशों ने स्पष्ट किया था कि यह समझौता किसी विशेष देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।

    ईरान ने पहले नहीं जताई थी आपत्ति

    मक्का पैक्ट के गठन के बाद ईरान ने इस पर खुलकर विरोध नहीं जताया था। 10 अगस्त को ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा था कि तेहरान को समझौते से चिंता की कोई वजह नजर नहीं आती। उन्होंने माना था कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

    ऐसे में अब ईरान को इसी सुरक्षा समझौते में शामिल होने का न्योता मिलने की खबर सामने आना चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, ईरान का इसमें शामिल होना पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति में बड़ा बदलाव होगा।

    सऊदी और ईरान की रही है पुरानी प्रतिद्वंद्विता

    सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर खींचतान रही है। इसका असर यमन और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में भी दिखाई देता रहा है। यमन में सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता रहा है, जबकि ईरान के हूती विद्रोहियों से संबंध बताए जाते हैं।

    हालांकि, 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों ने राजनयिक रिश्ते बहाल किए थे। इसके बाद संबंधों में कुछ नरमी आई, लेकिन क्षेत्र में जारी तनाव के बीच दोनों देशों के रिश्तों में चुनौतियां बनी हुई हैं।

    ऐसे में यदि ईरान के ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होने की खबर की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पश्चिम एशिया के शक्ति समीकरण में महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है। फिलहाल मामला न्योते की रिपोर्ट तक सीमित है और सभी संबंधित देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

  • समुद्र के रास्ते भारत की दोस्ती का संदेश, लिस्बन पहुंचा INS सुदर्शिनी; जानिए क्यों खास है ‘लोकायन 2026’ अभियान

    समुद्र के रास्ते भारत की दोस्ती का संदेश, लिस्बन पहुंचा INS सुदर्शिनी; जानिए क्यों खास है ‘लोकायन 2026’ अभियान


    नई दिल्ली। भारतीय नौसेना का पाल प्रशिक्षण पोत आईएनएस सुदर्शिनी अपनी लंबी समुद्री यात्रा लोकायन 2026 के तहत पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन पहुंच गया है। तीन मस्तूलों और पारंपरिक पालों से सुसज्जित यह पोत टैगस नदी के रास्ते लिस्बन पहुंचा और इस दौरान पारंपरिक नौकायन तथा समुद्री कौशल का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। आधुनिक दौर में जब नौसैनिक अभियानों में अत्याधुनिक तकनीक और मशीनों का दबदबा है ऐसे समय में आईएनएस सुदर्शिनी भारत की पुरानी समुद्री परंपराओं और नौकायन कौशल की झलक दुनिया के सामने पेश कर रहा है। इसकी यात्रा को केवल एक प्रशिक्षण अभियान के तौर पर नहीं देखा जा रहा बल्कि इसके जरिए भारत अलग अलग देशों के साथ दोस्ती सहयोग और आपसी समझ का संदेश भी पहुंचा रहा है।

    भारतीय नौसेना के अनुसार लिस्बन आईएनएस सुदर्शिनी की सात महीने लंबी समुद्री यात्रा का 15वां बंदरगाह पड़ाव है। इस लंबे अभियान के दौरान पोत कई देशों के बंदरगाहों तक पहुंच रहा है। हर पड़ाव पर भारतीय नौसेना के अधिकारी चालक दल और प्रशिक्षण ले रहे कैडेट स्थानीय नौसेना तथा प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं। इस पूरी यात्रा का उद्देश्य समुद्री प्रशिक्षण के साथ भारत की समुद्री विरासत और मित्रता की भावना को दुनिया तक पहुंचाना है। लिस्बन में पोत की मौजूदगी भारत और पुर्तगाल के बीच पुराने समुद्री संबंधों को भी नई मजबूती देने वाली मानी जा रही है।

    आईएनएस सुदर्शिनी पर तैनात प्रशिक्षु नौसैनिकों के लिए यह यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। खुले समुद्र में लंबी दूरी तय करने के दौरान उन्हें समुद्र की बदलती परिस्थितियों को समझने और चुनौतीपूर्ण वातावरण में काम करने का व्यावहारिक अनुभव मिलता है। पारंपरिक पालों के जरिए नौकायन करना उनके प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे उन्हें हवा की दिशा समुद्री परिस्थितियों और जहाज के संतुलन जैसी कई बारीकियों को करीब से समझने का मौका मिलता है। इस तरह यह पोत आधुनिक नौसैनिक प्रशिक्षण के साथ पारंपरिक समुद्री कौशल को भी जीवित रखने का काम कर रहा है।

    लिस्बन पहुंचने के बाद आईएनएस सुदर्शिनी के चालक दल और कैडेट पुर्तगाली नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों स्थानीय प्रशासन और वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच पेशेवर अनुभव साझा किए जाएंगे। जहाजों का पारस्परिक निरीक्षण और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इन गतिविधियों का मकसद दोनों देशों के नौसैनिकों के बीच आपसी समझ और सहयोग को मजबूत करना है।

    लोकायन 2026 की सबसे खास बात यही है कि यह समुद्री प्रशिक्षण के साथ कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी मजबूत करने का माध्यम बन रहा है। आईएनएस सुदर्शिनी जब अलग अलग देशों के बंदरगाहों पर पहुंचता है तो वहां भारतीय समुद्री परंपरा की झलक दिखाई देती है और साथ ही भारत की मित्रता तथा सहयोग की भावना भी सामने आती है। लिस्बन में इसका पहुंचना इसी व्यापक अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    तीन मस्तूलों वाला यह पाल पोत आज भारत की समुद्री विरासत का प्रतीक बनकर दुनिया के सामने मौजूद है। एक ओर यह नौसेना के युवा कैडेटों को समुद्र की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार कर रहा है तो दूसरी ओर भारत के वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को भी आगे बढ़ा रहा है। लोकायन 2026 के तहत इसकी यात्रा जैसे जैसे आगे बढ़ेगी वैसे वैसे भारत की समुद्री मित्रता और सहयोग का संदेश दुनिया के नए हिस्सों तक पहुंचता रहेगा।

  • नीदरलैंड्स के डेटा प्रोटेक्शन नियामक ने Uber पर ठोंका ₹9,226 करोड़ का जुर्माना, जानें क्या है मामला?

    नीदरलैंड्स के डेटा प्रोटेक्शन नियामक ने Uber पर ठोंका ₹9,226 करोड़ का जुर्माना, जानें क्या है मामला?


    नई दिल्ली।
    कैब बुकिंग कंपनी उबर (Cab Booking Company Uber) पर यूरोप (Europe) में बड़ा जुर्माना लगाया गया है। नीदरलैंड्स (Netherlands) के डेटा प्रोटेक्शन वॉचडॉग (Data Protection Watchdog) ने कंपनी पर 825 मिलियन यूरो यानी करीब ₹9,226 करोड़ का जुर्माना लगाया है। मामला ड्राइवरों के अकाउंट को कथित तौर पर बिना पहले चेतावनी दिए और बिना इंसानी जांच के ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए सस्पेंड या डिएक्टिवेट करने से जुड़ा है। नियामक ने इसे ड्राइवरों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है। उसका कहना है कि किसी कंप्यूटर सिस्टम को अकेले ऐसे फैसले नहीं लेने चाहिए, जिनसे किसी व्यक्ति की कमाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ सकता है। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं।

    डच डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी के मुताबिक Uber ने कुछ मामलों में ड्राइवरों के अकाउंट को बिना पर्याप्त चेतावनी और मानवीय हस्तक्षेप के बंद किया। नियामक की डिप्टी चेयर मोनिक वर्डियर ने इसे “गंभीर उल्लंघन” बताया। उनका कहना है कि कई ड्राइवरों के लिए अकाउंट बंद होने का सीधा मतलब उनकी आय का अचानक खत्म होना था। नियामक का तर्क है कि जब किसी व्यक्ति की रोजी-रोटी पर इतना बड़ा असर पड़ रहा हो, तो केवल कंप्यूटर एल्गोरिदम के आधार पर फैसला लेना उचित नहीं है और प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    यह मामला यूरोप में 2018 से 2022 के बीच हुई घटनाओं से जुड़ा है। इसकी शुरुआत फ्रांस में एक शिकायत से हुई थी, बाद में जांच नीदरलैंड्स के डेटा प्रोटेक्शन नियामक ने संभाली, क्योंकि Uber का यूरोपीय मुख्यालय नीदरलैंड्स में स्थित है। जांच में Uber के उन सिस्टम पर सवाल उठे, जिनका इस्तेमाल ड्राइवरों की संदिग्ध गतिविधियों को पहचानने और उनके अकाउंट पर कार्रवाई करने के लिए किया जाता था। कंपनी के सिस्टम कुछ ड्राइवरों पर अनावश्यक लंबे रास्ते लेने से किराया बढ़ाने या यात्रा स्वीकार करने के बाद उसे पूरा न करने जैसी गतिविधियों का संदेह कर सकते थे।

    Uber का कहना है कि ऐसे कई सस्पेंशन अस्थायी थे और स्थायी रूप से अकाउंट बंद करने का फैसला इंसानी समीक्षा के बिना नहीं किया जाता था। कंपनी ने नियामक के इस निष्कर्ष को भी खारिज किया कि कम ग्राहक रेटिंग के आधार पर कुछ ड्राइवरों को स्थायी रूप से ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए डिएक्टिवेट किया गया। Uber ने जुर्माने को अनुपातहीन और अत्यधिक बताते हुए कहा कि वह ड्राइवरों के अधिकारों को गंभीरता से लेती है। कंपनी के मुताबिक उसके पास मानव समीक्षा और ड्राइवरों को सस्पेंशन के खिलाफ चुनौती देने का विकल्प देने वाली नीतियां मौजूद हैं।

    इस मामले में यूरोप के GDPR (General Data Protection Regulation) के नियम महत्वपूर्ण हैं। GDPR के तहत कंपनियां ऐसे फैसले केवल कंप्यूटर एल्गोरिदम के भरोसे नहीं छोड़ सकतीं, जिनका किसी व्यक्ति पर महत्वपूर्ण असर पड़ता हो। ऐसे मामलों में सार्थक मानवीय निगरानी और फैसले को चुनौती देने का अवसर जरूरी माना जाता है। Uber पर लगाया गया जुर्माना इसी सिद्धांत से जुड़ा है। नियामक ने बताया कि जुर्माने की राशि कंपनी के 2025 के सालाना कारोबार के एक हिस्से के आधार पर तय की गई है। Uber का कहना है कि प्रभावित ड्राइवरों की संख्या सीमित थी और 2021 में कम ग्राहक रेटिंग के कारण पूरे यूरोप में केवल 126 ड्राइवरों को डिएक्टिवेट किया गया था।

    यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब यूरोपीय नियामक बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों पर डेटा प्राइवेसी, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल नियमों के उल्लंघन को लेकर लगातार सख्ती कर रहे हैं। Meta, Google, Apple और Amazon जैसी कंपनियों पर भी अरबों यूरो के जुर्माने लग चुके हैं। Uber के मामले में यह फैसला एक बड़ा संदेश देता है कि AI और ऑटोमेशन से लिए गए फैसलों में भी इंसानी निगरानी और अपील का अधिकार जरूरी है, खासकर तब जब किसी फैसले का सीधा असर किसी व्यक्ति की नौकरी या आय पर पड़ता हो।

  • US में बड़ी आतंकी साजिश नाकाम…. FBI चीफ बोले- ISIS के निशाने पर था न्यूयॉर्क स्टेट कैपिटल

    US में बड़ी आतंकी साजिश नाकाम…. FBI चीफ बोले- ISIS के निशाने पर था न्यूयॉर्क स्टेट कैपिटल


    वाशिंगटन।
    एफबीआई निदेशक काश पटेल (FBI Director Kash Patel) ने शनिवार को कहा कि संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Federal Law Enforcement Agencies) ने एक आतंकी साजिश (Terrorist plot) नाकाम की है। उन्होंने कहा कि यह न्यूयॉर्क स्टेट कैपिटल को निशाना बनाने की साजिश थी। पटेल के मुताबिक, यह साजिश आईएसआईएस (ISIS) से प्रेरित थी।

    काश पटेल के मुताबिक, इस साजिश में अल्बानी की 35 साल की एक महिला शामिल थी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी दी। पटेल ने संघीय आतंकवाद रोधी अभियानों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में 640 आतंकी हमलों की साजिशें नाकाम की गईं।


    काश पटेल ने सोशल मीडिया पोस्ट में क्या लिखा?

    उन्होंने एक्स पर लिखा, अमेरिकी जमीन पर एक और संभावित आतंकी हमला नाकाम किया गया। 35 साल की अल्बानी की एक महिला पर न्यूयॉर्क स्टेट कैपिटल को निशाना बनाने का आरोप है। उसने आईएसआईएस से प्रेरित हमले की साजिश रची थी। यह उन खतरों में से सिर्फ एक है, जिनका संघीय कानून प्रवर्तन सामना कर रहा है। पिछले साल 640 आतंकी हमलों की योजनाएं नाकाम की गईं।

    पटेल ने मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि खतरे कई तरह के हैं। अधिकारी अमेरिका में लोगों को निशाना बनाने वाले खतरों से निपट रहे हैं। इसके साथ ही विदेश में तैनात अमेरिकी सैनिक भी निशाने पर हैं। उन्होंने कहा कि इन खतरों से भी अधिकारी निपट रहे हैं। अल्बानी की साजिश नाकाम होने पर पटेल ने कहा कि निर्दोष लोगों की जान जाने से पहले एक और कथित आतंकी साजिश रोक दी गई। उन्होंने कहा कि कुछ अभियानों के बारे में लोगों को जानकारी मिलती है। कई अभियानों के बारे में कभी पता नहीं चलता। उन्होंने कहा, यही हमारा मिशन है।


    साजिश को नाकाम करने में शामिल टीमों की सराहना की

    पटेल ने हमले को नाकाम करने में शामिल टीमों की तारीफ की। उन्होंने संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) की कार्रवाई को भी सराहा। उन्होंने कहा, हमारी एफबीआई अल्बानी टीम ने शानदार काम किया। न्याय विभाग में हमारे सहयोगियों ने भी अच्छा काम किया। अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांशे ने भी सहयोग किया। यह एफबीआई खतरों का पता लगाती रहेगी। उन्हें नाकाम करती रहेगी। अमेरिकियों को सुरक्षित रखेगी।


    आईएसआईएस के खिलाफ पहले भी चला था अभियान

    इससे पहले मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ी कार्रवाई की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि अमेरिकी सेना ने नाइजीरिया के सशस्त्र बलों के साथ मिलकर अभियान चलाया। इस अभियान में आईएसआईएस के दूसरे नंबर के कमांडर को मार गिराया गया था। ट्रंप ने इसे ‘जटिल और सटीक’ सैन्य अभियान बताया था। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि अबू-बिलाल अल-मिनुकी को संयुक्त अभियान में मार गिराया गया।

  • PoK में पाकिस्तान का नरसंहार रोकिए…. ब्रिटिश सांसदों ने UN महासचिव को पत्र लिखकर की अपील

    PoK में पाकिस्तान का नरसंहार रोकिए…. ब्रिटिश सांसदों ने UN महासचिव को पत्र लिखकर की अपील


    लंदन।
    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (Pakistan-occupied Kashmir-PoK) में बिगड़ते हालात को लेकर 70 से ज्यादा ब्रिटिश सांसदों (British MPs) ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस (United Nations Secretary-General António Guterres) को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। साथ ही पाकिस्तानी बलों द्वारा किए जा रहे नरसंहार को खत्म करने और नागरिकों की जान की सुरक्षा के उपाय करने की अपील भी की गई है।

    ब्रिटिश सांसदों की अपील क्षेत्र में बढ़ती हिंसा और दुर्व्यवहार के बीच आई है, जहां पाकिस्तानी बलों की क्रूर कार्रवाई में सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए हैं। क्षेत्र में अभी भी सख्त नाकाबंदी, कर्फ्यू और पूरी तरह से कम्युनिकेशन्स ब्लैकआउट लागू है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव को संबोधित पत्र में ब्रिटिश सांसदों ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में, मौतों, संचार पर प्रतिबंधों, मनमानी गिरफ्तारियों, आवश्यक आपूर्ति में व्यवधान और शांतिपूर्ण नागरिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति पर लगाम की रिपोर्टों ने काफी चिंता पैदा की है। हमने ब्रिटिश कश्मीरियों से भी लगातार सुना है, जो संबंधित क्षेत्र में अपने रिश्तेदारों और प्रियजनों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता में हैं।


    संयुक्त राष्ट्र की तरफ से उठाया गया था मुद्दा

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस के एक प्रवक्ता ने पीओके में पाकिस्तान की बर्बरता को लेकर आवाज उठाई थी और कहा था कि शांतिपूर्ण प्रद्र्शन के दौरान इस तरह का अत्याचार करने को लेकर पाकिस्तानी सरकार को जवाब देना चाहिए।


    खत्म कर दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने पीओके के हालिया घटनाक्रम पर चिंता जताई थी। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मौत मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराए जाने तथा पाकिस्तान द्वारा ‘संयुक्त अवामी कार्रवाई समिति’ पर प्रतिबंध लगाने एवं उसके नेताओं को गिरफ्तार किए जाने का मुद्दा उठाया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण रूप से एकत्र होने के अधिकार का उल्लंघन करते हुए इंटरनेट के इस्तेमाल और सार्वजनिक सभाओं पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

    हक ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर अधिकारियों की जवाबदेही तय किए जाने की मांग से जुड़े सवाल पर कहा, ”यह महत्वपूर्ण है कि हर जगह सभी प्राधिकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दें और निश्चित रूप से यहां भी ऐसा ही होना चाहिए। अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के कारण लोगों को नुकसान पहुंचा है तो इसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।” पिछले महीने जिनेवा में जारी एक बयान में कहा गया था कि तुर्क ने क्षेत्रीय चुनावों से पहले पीओके में पैदा हुई अशांति के मद्देनजर शांति बनाए रखने की अपील की।

    मानवाधिकार उच्चायुक्त ने अशांति के कारण प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के सदस्यों की हुई सभी मौतों की गहन और निष्पक्ष जांच तत्काल कराए जाने का आह्वान किया था। संयुक्त अवामी कार्रवाई समिति (जेएएसी) ने इन प्रदर्शनों की अगुवाई की। इनमें ट्रांसपोर्टर, छात्र, वकील, कार्यकर्ता एव अन्य लोग शामिल हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने के आरोप में समिति पर आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया है।

  • काबुल की सड़कों पर दिखे भारतीय पीले-काले ऑटो रिक्शा, वायरल वीडियो ने हजारों किलोमीटर दूर देसी गाड़ी की झलक दिखाई

    काबुल की सड़कों पर दिखे भारतीय पीले-काले ऑटो रिक्शा, वायरल वीडियो ने हजारों किलोमीटर दूर देसी गाड़ी की झलक दिखाई

    नई दिल्ली ।अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की सड़कों पर भारतीय ऑटो रिक्शा दिखाई देने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है। वीडियो में सड़क पर कई पीले-काले रंग के ऑटो रिक्शा एक के बाद एक गुजरते नजर आते हैं। भारत में रोजमर्रा के परिवहन का हिस्सा माने जाने वाले इन वाहनों को विदेश की सड़क पर देखकर वीडियो बनाने वाला भारतीय शख्स भी हैरान रह गया।

    वीडियो में दिखाई दे रहे ऑटो का रंग और डिजाइन भारतीय शहरों में आम तौर पर नजर आने वाले वाहनों जैसा है। खास बात यह है कि इनकी मौजूदगी काबुल की सड़क पर एक साथ दिखाई देती है। यही वजह है कि सामान्य परिवहन का यह दृश्य भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स के लिए खास बन गया और वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं।

    वीडियो में भारतीय व्यक्ति एक ऑटो चालक से बातचीत करता हुआ नजर आता है। वह चालक से पूछता है कि क्या यह ऑटो भारत में बना हुआ है। इसके जवाब में अफगान चालक हामी भरता है। बातचीत के दौरान भारतीय शख्स अपनी खुशी जाहिर करते हुए भारतीय ऑटो की विदेश में मौजूदगी को लेकर प्रतिक्रिया देता है। यह छोटा संवाद वीडियो को और दिलचस्प बना देता है।

    भारत में ऑटो रिक्शा केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की यात्रा का हिस्सा है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक कम दूरी की यात्राओं के लिए इनका इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जाता है। बाजार, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और स्थानीय इलाकों के बीच आवागमन में ऑटो रिक्शा आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

    इन वाहनों की उपयोगिता का एक बड़ा कारण उनका छोटा आकार और अपेक्षाकृत कम लागत वाला परिवहन है। संकरी सड़कों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी ऑटो रिक्शा आसानी से चल सकते हैं। इसी वजह से तीन पहिया वाहन भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी स्थानीय परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बने हैं।

    काबुल से सामने आए इस वीडियो ने लोगों की दिलचस्पी इस बात में बढ़ा दी कि भारतीय ऑटो वहां तक कैसे पहुंचे। हालांकि वीडियो में इन वाहनों के आयात, निर्माता, मॉडल, संख्या या अफगानिस्तान में इनके इस्तेमाल से जुड़ी विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए केवल वायरल वीडियो के आधार पर इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    सोशल मीडिया पर वीडियो देखने वाले कई लोगों ने भारतीय ऑटो की विदेश में मौजूदगी को लेकर उत्साह जताया। कुछ यूजर्स ने इसे भारत की रोजमर्रा की चीजों की अंतरराष्ट्रीय पहुंच से जोड़ा, जबकि कई लोगों ने पीले-काले ऑटो को देखकर अपनी परिचित सड़कों की याद साझा की।

    विदेश में किसी भारतीय वाहन को चलते देखना भारतीय दर्शकों के लिए इसलिए भी आकर्षक होता है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश के सार्वजनिक परिवहन की एक पहचान बन चुका है। भारत में लाखों यात्रियों के लिए यह कम दूरी का सुविधाजनक और अपेक्षाकृत किफायती साधन है।

    काबुल की सड़क पर दिखाई दे रहे ऑटो रिक्शा का वीडियो किसी बड़े घटनाक्रम की तस्वीर नहीं दिखाता, लेकिन भारत से दूर परिचित वाहनों की मौजूदगी इसे सोशल मीडिया के लिए रोचक जरूर बना रही है। फिलहाल वायरल वीडियो में दिखाई देने वाला यही दृश्य लोगों के बीच चर्चा और उत्सुकता का कारण बना हुआ है।