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  • डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा

    डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा


    नई दिल्ली ।भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की इस मंजूरी के बाद निर्धारित योग्यता और आवश्यक मानकों को पूरा करने वाली भारतीय कंपनियां इन मिसाइल प्रणालियों का देश में उत्पादन कर सकेंगी।

    इस फैसले का सीधा असर भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता पर पड़ने की उम्मीद है। अब तक मिसाइल प्रणालियों के अनुसंधान, विकास और तकनीकी परीक्षण में डीआरडीओ की प्रमुख भूमिका रही है। नई व्यवस्था के तहत विकसित और निर्धारित मानकों पर खरी उतरने वाली तकनीक को उद्योगों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे अनुसंधान से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

    रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल देश में हथियारों का इस्तेमाल करने या तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उत्पादन क्षमता, आपूर्ति श्रृंखला, जरूरी कलपुर्जों की उपलब्धता और तकनीकी विशेषज्ञता का घरेलू स्तर पर मजबूत होना भी जरूरी है। मिसाइल तकनीक के हस्तांतरण से इन सभी क्षेत्रों में भारतीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है।

    इस व्यवस्था के तहत योग्य कंपनियां डीआरडीओ की विकसित तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मिसाइल प्रणालियों के औद्योगिक उत्पादन में भूमिका निभाएंगी। इससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक प्रणालियों की आपूर्ति को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रगति होने की उम्मीद है।

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए अवसर बढ़ना है। मिसाइल निर्माण केवल मुख्य प्रणाली तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष सामग्री, सेंसर, संचार प्रणालियों, यांत्रिक हिस्सों और अन्य तकनीकी घटकों की जरूरत होती है। ऐसे में बड़ी कंपनियों के साथ छोटे और मध्यम भारतीय उद्यम भी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं।

    सरकार की व्यापक रणनीति देश में ऐसा रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करने की है, जिसमें अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल हो। डीआरडीओ नई और उन्नत सैन्य तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास पर अधिक ध्यान दे सकता है, जबकि पहले से विकसित तकनीकों को औद्योगिक उत्पादन में बदलने की जिम्मेदारी प्रमाणित भारतीय कंपनियां संभाल सकती हैं।

    इससे नई सैन्य तकनीक विकसित होने और उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने के बीच लगने वाले समय को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है। भारतीय उद्योगों को तकनीकी क्षमता विकसित करने और रक्षा उत्पादन में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के घरेलू निर्माण को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने का यह निर्णय उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, तकनीकी क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर, डीआरडीओ की विकसित मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों के लिए उपलब्ध कराने से अनुसंधान और उत्पादन के बीच की दूरी कम करने का प्रयास किया गया है। यह कदम भारतीय कंपनियों और एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के साथ देश की रक्षा आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • आईफोन नहीं, माता-पिता को फिर साथ देखना चाहता था कुनाल, पुणे पहाड़ी हादसे में पारिवारिक विवाद का नया पहलू सामने आया

    आईफोन नहीं, माता-पिता को फिर साथ देखना चाहता था कुनाल, पुणे पहाड़ी हादसे में पारिवारिक विवाद का नया पहलू सामने आया

    नई दिल्ली । पुणे के पहाड़ी हादसे में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। शुरुआती जानकारी में इस घटना को 19 वर्षीय कुनाल और उसके माता-पिता के बीच आईफोन तथा उसकी ईएमआई को लेकर हुए विवाद से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन अब जांच और परिवार से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद मामले का एक अलग पहलू सामने आया है। बताया जा रहा है कि कुनाल की सबसे बड़ी चिंता आईफोन नहीं बल्कि अपने माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव को खत्म करना था। वह चाहता था कि उसके पिता मुरलीधर और मां संगीता फिर सामान्य तरीके से साथ रहें और परिवार में चल रही परेशानियां खत्म हों।

    घटना से जुड़े लोगों के अनुसार कुनाल के माता-पिता के रिश्ते पिछले कई वर्षों से तनावपूर्ण थे। संपत्ति से जुड़े विवाद और कथित वैवाहिक मतभेदों ने परिवार के माहौल को प्रभावित किया था। हालांकि आसपास रहने वाले लोगों ने उनके बीच किसी बड़े विवाद की जानकारी से इनकार किया है। परिवार के परिचितों के मुताबिक दोनों सामान्य व्यवहार करते दिखाई देते थे, लेकिन घर के भीतर की परिस्थितियां अलग थीं।

    परिवार के लिए यह पहला बड़ा सदमा नहीं था। कुनाल के एक भाई की करीब आठ वर्ष पहले मौत हो चुकी थी। इसके बाद परिवार पर मानसिक दबाव और तनाव बढ़ गया था। कुनाल पढ़ाई में अच्छा था। उसने दसवीं कक्षा में 82 प्रतिशत अंक हासिल किए थे और आगे चलकर एमबीबीएस की पढ़ाई करना चाहता था। परिवार से जुड़ी परेशानियों के बीच उसके व्यवहार और मानसिक स्थिति को लेकर भी अब कई सवाल उठ रहे हैं।

    घटना वाले दिन कुनाल पहाड़ी क्षेत्र में पहुंच गया था। बताया गया कि आईफोन को लेकर घर में विवाद हुआ था और इसके बाद वह खुद को नुकसान पहुंचाने के इरादे से पहाड़ी की ओर चला गया। उसके माता-पिता उसे समझाने के लिए वहां पहुंचे। पुलिस और दमकल कर्मियों ने भी मौके पर पहुंचकर उसे बचाने का प्रयास किया। खाई में सुरक्षा के लिए जाल भी लगाया गया था, लेकिन कुनाल लगातार अपनी जगह बदल रहा था।

    इसी दौरान उसके पिता ने उसे पकड़कर सुरक्षित स्थान पर खींचने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि इसी प्रयास में संतुलन बिगड़ गया और दोनों गहरी खाई में जा गिरे। इसके बाद मां संगीता ने भी खाई में छलांग लगा दी। इस तरह परिवार के तीनों सदस्यों की मौत हो गई। घटना के बाद सामने आए विवरणों ने इसे केवल एक पारिवारिक विवाद या आईफोन से जुड़ा मामला मानने पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मुरलीधर की बहन के अनुसार उन्होंने और संगीता ने करीब 22 वर्ष पहले प्रेम विवाह किया था। परिवार के कुछ सदस्य इस विवाह के पक्ष में नहीं थे और शादी के समय भी उनके शामिल नहीं होने की बात सामने आई है। शादी के बाद दोनों परिवारों के बीच तनाव बना रहा। हालांकि मुरलीधर के परिचित उन्हें अनुशासित और शांत स्वभाव का व्यक्ति बताते हैं। वह करीब दस वर्षों से ड्राइवर के रूप में काम कर रहे थे।

    परिवार कुछ महीने पहले ही किराए के मकान में रहने आया था। घटना के बाद घर में पालतू कुत्ता शेरू अकेला रह गया, जिसे बाद में एक पशु कल्याण समूह अपने साथ ले गया। अब पुलिस और संबंधित अधिकारी पूरे घटनाक्रम की परिस्थितियों की जांच कर रहे हैं। परिवार के रिश्तों, घटना से पहले की स्थिति और उस दिन हुए घटनाक्रम को जोड़कर देखा जा रहा है। नए तथ्यों ने यह संकेत जरूर दिया है कि इस दुखद घटना के पीछे केवल आईफोन का विवाद नहीं, बल्कि परिवार के भीतर लंबे समय से चल रहा भावनात्मक और वैवाहिक तनाव भी महत्वपूर्ण भूमिका में हो सकता है।

  • बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान के बीच पार्टी को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बढ़त मिली है। उत्तर 24 परगना जिले की आमडांगा विधानसभा सीट से विधायक कासेम सिद्दीकी ने बागी गुट छोड़कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे में वापस लौटने की घोषणा की है। वापसी के बाद सिद्दीकी ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी राजनीतिक निष्ठा दोहराते हुए कहा कि उनके लिए दीदी ही सब कुछ हैं।

    कासेम सिद्दीकी की वापसी ऐसे समय हुई है जब विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक मतभेद सामने आए हैं। पार्टी के कई विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अलग गुट का रुख किया था। इस गुट के साथ बड़ी संख्या में विधायक जुड़े थे और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोलने की कोशिश हुई थी।

    सिद्दीकी भी कुछ समय के लिए इसी बागी गुट के साथ थे। हालांकि अब उन्होंने वहां से अलग होकर ममता बनर्जी के साथ बने रहने का फैसला किया है। उन्होंने अपने निर्णय के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि उन्हें बागी गुट के उद्देश्य को लेकर अलग जानकारी दी गई थी।

    सिद्दीकी के अनुसार, उन्हें बताया गया था कि कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं और ये दस्तावेज ममता बनर्जी तक पहुंचाए जाएंगे। उन्हें यह भी बताया गया था कि बागी गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही काम करेगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गुट की गतिविधियों को देखा तो उन्हें वहां तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के नेतृत्व या भूमिका का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं दिया।

    इसके बाद उन्होंने बागी गुट से अलग होने का फैसला किया। सिद्दीकी ने कहा कि उन्हें ममता बनर्जी ने टिकट दिया और उनके नेतृत्व में ही वह विधानसभा तक पहुंचे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तस्वीर के साथ लोगों के बीच जाकर समर्थन मांगा था और मतदाताओं ने भी उनके नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए उन्हें समर्थन दिया।

    कासेम सिद्दीकी का राजनीतिक प्रभाव केवल उनके विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। उनका संबंध हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ से जुड़े धार्मिक और सामाजिक प्रभाव वाले समुदाय से है। मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए उनकी राजनीतिक स्थिति तृणमूल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले साल पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में राज्य महासचिव की जिम्मेदारी भी दी गई थी।

    इसके बाद विधानसभा चुनाव में उन्हें आमडांगा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने जीत दर्ज की। अब उनका ममता बनर्जी के खेमे में लौटना पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    हालांकि कासेम सिद्दीकी की वापसी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पार्टी के दोनों पक्षों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस को लेकर भी दोनों गुटों की ओर से अलग-अलग तैयारियां की जा रही हैं।

    28 अगस्त को मेयो रोड पर गांधी प्रतिमा के पास छात्र परिषद का स्थापना दिवस मनाने को लेकर विवाद सामने आया है। दोनों पक्षों ने कार्यक्रम की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमे पारंपरिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति चाहता है।

    ऐसे समय में कासेम सिद्दीकी की वापसी को पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी वापसी यह संकेत देती है कि बागी खेमे के भीतर भी सभी विधायक एकजुट नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी किस दिशा में जाती है और कितने अन्य नेता या विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व में वापस आते हैं।

  • सोनम वांगचुक फिर आंदोलन की तैयारी में, लद्दाख हिंसा की जांच रिपोर्ट और राज्य के दर्जे की मांग पर बढ़ेगा दबाव

    सोनम वांगचुक फिर आंदोलन की तैयारी में, लद्दाख हिंसा की जांच रिपोर्ट और राज्य के दर्जे की मांग पर बढ़ेगा दबाव

    नई दिल्ली ।लद्दाख में पिछले साल हुई हिंसा की बरसी से पहले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक बार फिर आंदोलन तेज करने का संकेत दिया है। लेह में 24 सितंबर 2025 की हिंसक घटना में मारे गए लोगों की याद में कैंडल मार्च निकाला गया। इस दौरान वांगचुक ने कहा कि आने वाले दिनों में लद्दाख की लंबित मांगों और पिछले साल की घटना की जवाबदेही को लेकर कार्यक्रमों को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा।

    वांगचुक के मुताबिक 24 अगस्त से 24 सितंबर तक का समय पिछले साल की घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए रखा गया है। उन्होंने कहा कि शुरुआती कार्यक्रम को सीमित रखा गया है, क्योंकि इस समय दलाई लामा लद्दाख में हैं। उनके लद्दाख से जाने के बाद बड़े स्तर पर प्रदर्शन शुरू करने का संकेत दिया गया है।

    24 सितंबर 2025 को लद्दाख में राज्य के दर्जे और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने समेत कई मांगों को लेकर चल रहा आंदोलन हिंसक हो गया था। इस दौरान सरकारी और राजनीतिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा, वाहनों में आगजनी हुई और सुरक्षा बलों के साथ झड़प की स्थिति बनी। हिंसा के दौरान कई लोगों की मौत हुई और सुरक्षा बलों के जवान भी घायल हुए थे।

    इस घटना से पहले वांगचुक ने 10 सितंबर 2025 को भूख हड़ताल शुरू की थी। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में लद्दाख को राज्य का दर्जा देना, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा क्षेत्र के प्रशासन में स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना शामिल रहा है।

    24 सितंबर की घटना के बाद केंद्र सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। आयोग का उद्देश्य हिंसा की परिस्थितियों, घटनाक्रम और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच करना है। वांगचुक और आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग अब यह है कि आयोग की रिपोर्ट जल्द सार्वजनिक की जाए।

    वांगचुक ने कहा है कि घटना को एक साल पूरा होने के करीब है, लेकिन जांच रिपोर्ट सामने नहीं आने से लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं। उनके अनुसार रिपोर्ट सार्वजनिक होने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि 24 सितंबर को परिस्थितियां किस तरह बिगड़ीं और हिंसा तथा पुलिस कार्रवाई के पीछे क्या घटनाक्रम रहा।

    लद्दाख की राजनीतिक मांगों को लेकर केंद्र और क्षेत्र के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत भी जारी रही है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस लंबे समय से राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची जैसी मांगों को लेकर केंद्र के साथ बातचीत कर रहे हैं। मई 2026 में भी केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच महत्वपूर्ण बैठक हुई थी।

    मई की बातचीत में लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर चर्चा हुई थी। बातचीत के दौरान कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी विचार सामने आया, लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग अब भी आंदोलनकारी पक्ष के प्रमुख मुद्दों में बनी हुई है। दोनों पक्षों के बीच आगे की बातचीत को लेकर भी उम्मीद बनी हुई है।

    सोनम वांगचुक की भूमिका इस आंदोलन में महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 की घटनाओं के बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में उनकी हिरासत रद्द कर दी, जिसके बाद वह दोबारा सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय हुए। इसके बाद उन्होंने बातचीत और शांतिपूर्ण आंदोलन के जरिए लद्दाख की मांगों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

    अब सितंबर की बरसी के दौरान लद्दाख में होने वाले कार्यक्रमों पर सबकी नजर रहेगी। वांगचुक ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कैंडल मार्च केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में आंदोलन का स्वरूप बड़ा हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि लद्दाख की मांगों को आगे बढ़ाने का रास्ता शांतिपूर्ण होना चाहिए। जांच रिपोर्ट, राज्य के दर्जे और संवैधानिक सुरक्षा जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में केंद्र और लद्दाख प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के केंद्र में रहेंगे।

  • सुनारिया जेल से कड़ी सुरक्षा में बाहर निकला राम रहीम, सिरसा डेरा मुख्यालय जाने की जानकारी, फरलो पर उठे फिर सवाल

    सुनारिया जेल से कड़ी सुरक्षा में बाहर निकला राम रहीम, सिरसा डेरा मुख्यालय जाने की जानकारी, फरलो पर उठे फिर सवाल

    नई दिल्ली ।डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर आ गया है। हरियाणा के रोहतक स्थित हाई सिक्योरिटी सुनारिया जेल से मंगलवार सुबह उसे 21 दिन की फरलो पर रिहा किया गया। वर्ष 2020 के बाद यह उसकी 17वीं अस्थायी रिहाई है। जेल से बाहर निकलने के बाद वह कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा मुख्यालय के लिए रवाना हुआ।

    राम रहीम मंगलवार सुबह करीब 6:05 बजे सुनारिया जेल से बाहर निकला। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई। उसकी ताजा रिहाई ऐसे समय हुई है जब वह गंभीर आपराधिक मामलों में मिली सजा काट रहा है और उसकी पैरोल तथा फरलो को लेकर पहले भी सार्वजनिक स्तर पर चर्चा होती रही है।

    राम रहीम को अगस्त 2017 में दो महिला अनुयायियों से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया गया था। इस मामले में उसे 20 साल की सजा सुनाई गई थी। इसके अलावा उसे पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या समेत अन्य मामलों में भी दोषी ठहराया जा चुका है। मौजूदा समय में वह सुनारिया जेल में सजा काट रहा है।

    ताजा फरलो से पहले राम रहीम 26 जून को 30 दिन की पैरोल पूरी करके जेल लौटा था। इसके बाद दो महीने से भी कम समय के भीतर उसे एक बार फिर अस्थायी रिहाई मिल गई। इस बार उसे 21 दिन की फरलो दी गई है। रिहाई की शर्तों के तहत उसे निर्धारित अवधि पूरी होने पर वापस जेल लौटना होगा।

    राम रहीम को वर्ष 2020 से लगातार अलग-अलग मौकों पर पैरोल और फरलो मिलती रही है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, अक्टूबर 2020 में उसे पहली बार एक दिन की अस्थायी रिहाई मिली थी। इसके बाद 2021 में कुछ घंटों की रिहाई से लेकर 21, 30, 40 और 50 दिन तक की पैरोल या फरलो उसे अलग-अलग अवसरों पर मिलती रही।

    वर्ष 2022 में उसे 21 दिन और 30 दिन की रिहाई मिली, जबकि अक्टूबर में 40 दिन की पैरोल दी गई। वर्ष 2023 में भी उसे कई बार अस्थायी रिहाई मिली। जनवरी 2024 में 50 दिन की पैरोल सहित अलग-अलग अवधि की रिहाइयों के बाद 2025 में भी उसे कई बार जेल से बाहर आने की अनुमति मिली।

    वर्ष 2026 में जनवरी में उसे 40 दिन की पैरोल मिली थी। इसके बाद मई में 30 दिन की पैरोल दी गई। 26 जून को वह इस अवधि को पूरा करने के बाद जेल लौट आया था। अब अगस्त में 21 दिन की फरलो मिलने के साथ वर्ष 2026 में उसकी एक और अस्थायी रिहाई हुई है।

    राम रहीम की बार-बार होने वाली अस्थायी रिहाई लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। फरलो और पैरोल अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के तहत दी जाती हैं और इनके लिए निर्धारित नियमों तथा सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी जरूरी होती है। हरियाणा में अस्थायी रिहाई से जुड़े प्रावधानों के तहत पात्र कैदियों को निर्धारित शर्तों के साथ पैरोल और फरलो का लाभ मिल सकता है।

    ताजा रिहाई के बाद राम रहीम अब 21 दिनों तक जेल से बाहर रहेगा। इस दौरान उसकी गतिविधियों और निर्धारित शर्तों के पालन पर संबंधित प्रशासन की निगरानी रहेगी। फरलो की अवधि समाप्त होने के बाद उसे फिर सुनारिया जेल लौटना होगा। इस तरह गंभीर मामलों में सजा काट रहे डेरा प्रमुख की अस्थायी रिहाई का सिलसिला एक बार फिर सामने आया है।

  • इंडिगो के सह-संस्थापक राकेश गंगवाल की IIT कानपुर को 300 करोड़ की मदद, मेडिकल स्कूल और अस्पताल को मिलेगा विस्तार

    इंडिगो के सह-संस्थापक राकेश गंगवाल की IIT कानपुर को 300 करोड़ की मदद, मेडिकल स्कूल और अस्पताल को मिलेगा विस्तार


    नई दिल्ली ।आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र और इंडिगो के सह-संस्थापक राकेश गंगवाल ने अपने संस्थान को 300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। यह राशि आईआईटी कानपुर में विकसित किए जा रहे गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के विस्तार और विकास में इस्तेमाल की जाएगी। इससे पहले वर्ष 2022 में गंगवाल ने इसी संस्थान के लिए 100 करोड़ रुपये का योगदान दिया था। इस तरह मेडिकल स्कूल के लिए उनका कुल योगदान 400 करोड़ रुपये हो जाएगा।

    राकेश गंगवाल का आईआईटी कानपुर से पुराना और मजबूत संबंध रहा है। उन्होंने वर्ष 1975 में संस्थान से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया स्थित व्हार्टन स्कूल से एमबीए किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विमानन क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और कई बड़ी एयरलाइनों के साथ काम किया।

    गंगवाल ने US एयरवेज, एयर फ्रांस और यूनाइटेड एयरलाइंस जैसी कंपनियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में वर्ष 2006 में उन्होंने राहुल भाटिया के साथ मिलकर इंटरग्लोब एविएशन की शुरुआत की। इसी कंपनी के जरिए इंडिगो एयरलाइन का संचालन हुआ और भारतीय विमानन क्षेत्र में कंपनी ने तेजी से अपनी पहचान बनाई।

    आईआईटी कानपुर में मेडिकल शिक्षा और तकनीक को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी की स्थापना की गई है। संस्थान ने इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के साथ चिकित्सा क्षेत्र में शोध, नवाचार और क्लिनिकल सुविधाओं को जोड़ने की दिशा में इस पहल को महत्वपूर्ण कदम के तौर पर विकसित किया है।

    गंगवाल स्कूल की विकास योजना में आईआईटी कानपुर परिसर में 500 बेड वाले सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की स्थापना शामिल है। इसके अलावा 200 बेड वाले कैंसर केयर एवं रिसर्च सेंटर का भी प्रस्ताव है। इन सुविधाओं के जरिए मेडिकल शिक्षा, चिकित्सा अनुसंधान और मरीजों के लिए उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं को एक साथ आगे बढ़ाने की योजना है।

    राकेश गंगवाल की ओर से दी जा रही 300 करोड़ रुपये की नई राशि मैचिंग ग्रांट के तौर पर दी गई है। इसका मतलब है कि संस्थान के विकास के लिए अन्य सहयोगियों की ओर से जुटाए गए योगदान के बराबर गंगवाल ने भी सहयोग दिया है। इससे मेडिकल स्कूल की विकास योजनाओं को वित्तीय मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    आईआईटी कानपुर ने वर्ष 2021 में मेडिकल स्कूल स्थापित करने का फैसला लिया था। इसका उद्देश्य इंजीनियरिंग, तकनीक और चिकित्सा के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना तथा स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में नई संभावनाएं तैयार करना था। वर्ष 2022 में गंगवाल के 100 करोड़ रुपये के योगदान के बाद इस योजना को महत्वपूर्ण आर्थिक आधार मिला।

    गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के डीन प्रो. अनिल के लालवानी हैं। संस्थान का मानना है कि गंगवाल का योगदान मेडिकल शिक्षा और शोध के क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव पैदा कर सकता है। उत्तर प्रदेश में उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं और चिकित्सा अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिहाज से भी इस परियोजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राकेश गंगवाल का योगदान यह भी दर्शाता है कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान के पूर्व छात्र उसके भविष्य के विकास में किस तरह बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। पांच दशक से अधिक समय पहले आईआईटी कानपुर से बीटेक करने वाले गंगवाल अब उसी संस्थान में मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए बड़ी आर्थिक भागीदारी कर रहे हैं।

  • किचन से आ रही थी तेज बदबू, सीमेंट के नीचे छिपा था राज; मां की हत्या के बाद शव दफनाकर फरार हुआ बेटा!

    किचन से आ रही थी तेज बदबू, सीमेंट के नीचे छिपा था राज; मां की हत्या के बाद शव दफनाकर फरार हुआ बेटा!

    नई दिल्ली । ओडिशा के पुरी से सामने आया एक खौफनाक हत्याकांड लोगों को हैरान कर रहा है। यहां एक व्यक्ति पर अपनी बुजुर्ग मां की हत्या करने के बाद उसके शव को किराए के मकान की रसोई के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। इतना ही नहीं शव को छिपाने के लिए उसके ऊपर सीमेंट की चुनाई भी करा दी गई। मामले का खुलासा तब हुआ जब मकान मालिक को किचन से लगातार बदबू आने लगी और महिला कई दिनों से दिखाई नहीं दी। बेटे के अचानक घर से गायब होने के बाद शक और गहरा गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की तो रसोई के फर्श का एक हिस्सा बाकी जगहों की तुलना में नया और सीमेंट से ढका हुआ मिला।

    घटना पुरी शहर के कुंभारापाड़ा इलाके की बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक मां और बेटा करीब दो महीने से इस किराए के मकान में रह रहे थे। पड़ोसियों के अनुसार कुछ दिनों से बुजुर्ग महिला दिखाई नहीं दे रही थी। शुरुआत में लोगों ने इसे सामान्य बात माना लेकिन जब उसका बेटा भी अचानक घर छोड़कर चला गया और रसोई से तेज दुर्गंध आने लगी तो मकान मालिक को किसी अनहोनी की आशंका हुई। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।

    पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मौके पर साइंटिफिक टीम को बुलाया। जांच के दौरान किचन के उस हिस्से को तोड़ने का फैसला लिया गया जिस पर नया सीमेंट लगा हुआ था। सीमेंट की परत हटाई गई तो पुलिस के सामने जो दृश्य आया उसने सभी को हैरान कर दिया। फर्श के नीचे महिला का सड़ा गला शव दफन मिला। पुलिस ने शव को बाहर निकालकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल महिला की आधिकारिक पहचान और उसकी मौत के सही कारणों की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद होने की उम्मीद है।

    पुलिस को आशंका है कि महिला के बेटे ने ही हत्या की वारदात को अंजाम दिया और फिर शव को घर के अंदर छिपाकर सबूत मिटाने की कोशिश की। घटना के बाद से बेटा फरार बताया जा रहा है और पुलिस उसकी तलाश में जुटी है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हत्या आखिर किस वजह से की गई और क्या इसके पीछे कोई पारिवारिक विवाद या अन्य कारण था।

    मकान मालकिन मनोरमा साहू के मुताबिक मां और बेटा करीब दो महीने से यहां रह रहे थे। महिला को पिछले कई दिनों से नहीं देखा गया था जबकि बेटा भी अचानक मकान छोड़कर चला गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि बेटा जगन्नाथ भजनों से जुड़े एक स्टूडियो में काम करता था और महिला भीख मांगकर अपना गुजारा करती थी। पड़ोसियों ने मां और बेटे के बीच किसी बड़े विवाद की जानकारी होने से इनकार किया है। यही वजह है कि घर के अंदर शव मिलने की घटना ने आसपास के लोगों को और भी चौंका दिया।

    पुरी के एसपी प्रतीक सिंह के मुताबिक मामले की जांच के लिए पुलिस टीम बनाई गई है। घटनास्थल से फोरेंसिक सैंपल भी जुटाए गए हैं। पुलिस अब हत्या के पीछे की वजह जानने के साथ फरार बेटे की तलाश कर रही है। जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि मां बेटे ने मकान किराए पर लेते समय कौन से दस्तावेज दिए थे और क्या उनकी पहचान से जुड़ी कोई जानकारी मकान मालिक के पास मौजूद है।

    फिलहाल इस मामले में पुलिस की जांच जारी है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। लेकिन जिस तरह से रसोई के फर्श के नीचे शव को दफनाकर उसके ऊपर सीमेंट की परत चढ़ाई गई उसने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। बदबू नहीं आती तो शायद यह खौफनाक राज लंबे समय तक दबा रह जाता।

  • मराठी नहीं आई तो 20 हजार जुर्माना!’ अफवाह से सड़क पर उतरे ऑटो-टैक्सी ड्राइवर, फडणवीस बोले- ऐसा कोई मकसद नहीं

    मराठी नहीं आई तो 20 हजार जुर्माना!’ अफवाह से सड़क पर उतरे ऑटो-टैक्सी ड्राइवर, फडणवीस बोले- ऐसा कोई मकसद नहीं


    नई दिल्ली ।
    महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के विरोध प्रदर्शन तक पहुंच गया है। राज्य सरकार के मराठी भाषा से जुड़े फैसले को लेकर सोमवार को मुंबई और आसपास के कई इलाकों में ड्राइवरों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान ड्राइवरों के बीच भारी जुर्माने और लाइसेंस रद्द होने जैसी खबरें तेजी से फैलने लगीं। मामला बढ़ता देख मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को खुद सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य ड्राइवरों को मराठी भाषा का विशेषज्ञ बनाना नहीं है बल्कि उन्हें इतनी मराठी सिखाना है जिससे वे यात्रियों से सामान्य बातचीत कर सकें।

    मुंबई के कांदिवली मलाड वेस्ट दहिसर अंधेरी और आसपास के कई इलाकों में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के विरोध की खबर सामने आई। कुछ जगहों पर प्रदर्शन कर रहे ड्राइवरों ने दूसरे ड्राइवरों को यात्रियों को ले जाने से रोकने की कोशिश भी की। इससे सुबह के व्यस्त समय में यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। विरोध के बीच सोशल मीडिया पर यह दावा तेजी से फैल गया कि अगर किसी ड्राइवर को कामकाजी मराठी नहीं आती है तो उस पर 5 हजार से 20 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा।

    इसी अफवाह ने ड्राइवरों की चिंता बढ़ा दी। अधिकारियों के मुताबिक ड्राइवरों के बीच भ्रामक जानकारी फैलने के कारण स्थिति बिगड़ी। बोरीवली RTO के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी माना कि इस मुद्दे को लेकर गलत जानकारी प्रसारित हुई थी। इसके बाद सरकार को स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत महसूस हुई।

    मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि सरकार का मकसद किसी ड्राइवर को मराठी का एक्सपर्ट बनाना नहीं है। उन्हें सिर्फ इतनी मराठी आनी चाहिए जिससे वह यात्रियों से बातचीत कर सकें और रोजमर्रा के काम में भाषा का इस्तेमाल कर सकें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए पहले ही पर्याप्त समय दिया गया है और अगर उन्हें अतिरिक्त समय की जरूरत होगी तो सरकार उस पर भी विचार कर सकती है।

    फडणवीस ने यह भी कहा कि किसी भी ड्राइवर का लाइसेंस केवल इस वजह से तुरंत रद्द नहीं किया गया है। उनका कहना था कि भाषा सीखने के मामले में सरकार का जोर समझ विकसित करने पर है न कि अनावश्यक सख्ती पर। यानी सरकार चाहती है कि दूसरे राज्यों से महाराष्ट्र में आकर काम करने वाले ड्राइवर भी स्थानीय यात्रियों से बुनियादी स्तर पर मराठी में संवाद कर सकें।

    वहीं परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने नियमों को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि अगर कोई RTO अधिकारी निर्धारित समय से पहले ड्राइवर पर जुर्माना लगाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हालांकि सरकार की ओर से भाषा सीखने के लिए तय समयसीमा को लेकर आगे की प्रक्रिया भी बताई गई है। मंत्री के मुताबिक निर्धारित अवधि में कामचलाऊ मराठी नहीं सीखने वाले ड्राइवरों को अतिरिक्त समय दिया जा सकता है और नियमों के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी।

    इस पूरे विवाद के बीच शिवसेना नेता संजय निरुपम भी सरकार से ड्राइवरों पर तत्काल जुर्माना न लगाने की अपील कर चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि कुछ ड्राइवरों को नोटिस अवधि पूरी होने से पहले ही भारी जुर्माने का डर दिखाया जा रहा है। अब मुख्यमंत्री की सफाई के बाद सरकार की कोशिश यही है कि भाषा सीखने के फैसले को लेकर फैली अफवाहों पर विराम लगे और ड्राइवरों को नियमों की वास्तविक स्थिति समझाई जा सके।

  • हवा-सूरज के बाद अब समुद्र की लहरों से बिजली बनाने की तैयारी, बनाई खास डिवाइस

    हवा-सूरज के बाद अब समुद्र की लहरों से बिजली बनाने की तैयारी, बनाई खास डिवाइस


    नई दिल्ली।
    बिजली (Electricity) बनाने के लिए आपने सोलर पैनल (Solar panel) और विंड टर्बाइन (Wind turbine) के बारे में तो सुना ही होगा. लेकिन अब समुद्र की लहरों (Ocean Waves) से भी बिजली बनाने की कोशिश हो रही है. इसके लिए खास तरह की डिवाइस बनाई गई है, जिसे Wave Energy Converter यानी WEC कहा जाता है. ये डिवाइस समुद्र की लहरों की मूवमेंट को बिजली में बदलने का काम करती है. चीन में इस टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है।


    जानिए समुद्र की लहरों से कैसे बनती है बिजली?

    आसान भाषा में समझें तो समुद्र की लहरें जब ऊपर-नीचे होती हैं तो उनमें काफी एनर्जी होती है. WEC इसी एनर्जी को पकड़ने का काम करता है. डिवाइस का कुछ हिस्सा लहरों के साथ मूव करता है और इस मूवमेंट को मैकेनिकल या हाइड्रोलिक सिस्टम के जरिए बिजली बनाने वाले जनरेटर तक पहुंचाया जाता है।

    कुछ डिवाइस में लहरों से टर्बाइन घूमती है. वहीं कुछ डिवाइस पानी की लहरों के साथ ऊपर-नीचे या आगे-पीछे होने वाली बॉडी का इस्तेमाल करती हैं. यानी WEC का डिजाइन अलग हो सकता है, लेकिन मकसद एक ही है समुद्र की लहरों की एनर्जी को बिजली में बदलना.


    चीन ने बनाया बड़ा वेव एनर्जी कन्वर्टर

    चीन में WEC को लेकर काफी काम हुआ है. इनमें नानकुन नाम का बड़ा डिवाइस भी शामिल है. इसका वजन करीब 6,000 टन बताया गया है और यह एक दिन में 24,000 kWh तक बिजली पैदा करने की कैपिसिटी रखता है. इसे करीब 3,500 घरों की रोजाना बिजली खपत के बराबर बताया गया है. यही वजह है कि वेव एनर्जी को लेकर एक बार फिर चर्चा बढ़ी है. अब तक सोलर और विंड एनर्जी पर ज्यादा फोकस रहा है, लेकिन समुद्र की लहरों में भी काफी एनर्जी मौजूद है।


    सोलर और विंड से कैसे अलग?

    सोलर पैनल को बिजली बनाने के लिए सूरज की रोशनी चाहिए, जबकि विंड टर्बाइन हवा पर निर्भर करती है. WEC समुद्र की लहरों की मूवमेंट का इस्तेमाल करता है. समुद्र का पानी हवा से ज्यादा भारी होता है, इसलिए लहरों में काफी एनर्जी मौजूद हो सकती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वेव एनर्जी को आसानी से बिजली में बदला जा सकता है. इसके लिए सही जगह, सही डिजाइन और मजबूत सिस्टम की जरूरत होती है।

    चीन में बनी वेव एनर्जी कन्वर्टर टेक्नोलॉजी में लगातार एडवांस बनाया जा रहा है, अगर ये टेक्नोलॉजी बड़े लेवल पर सक्सेस होती है तो आने वाले समय में समुद्र भी क्लीन एनर्जी का एक बड़ा सोर्स बन सकता है. यानी सक्सेस में बिजली के लिए सिर्फ सूरज और हवा ही नहीं, समुद्र की लहरों पर भी नजर होगी।

  • इस साल 2009 के बाद होगी सबसे कम बारिश… मॉनसून की जल्द हो सकती है वापसी !

    इस साल 2009 के बाद होगी सबसे कम बारिश… मॉनसून की जल्द हो सकती है वापसी !


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में इस साल का मानसून (Monsoon) करीब दो दशक में सबसे कमजोर रहने का अनुमान है। एक रिपोर्ट में मौसम विभाग (IMD) के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने मानसून के अंतिम माह सितंबर (September) में भी कम बारिश (Rain) होने की आशंका जताई है। इस दौरान देश में सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो 2009 के बाद यह सबसे कमजोर मानसून होगा।

    भारत की करीब 70 प्रतिशत वार्षिक बारिश मानसून से होती है। बारिश में बड़ी कमी का असर खरीफ फसलों के उत्पादन, खाद्य कीमतों और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है। खासकर सितंबर में पर्याप्त बारिश नहीं होने पर कपास, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इससे गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों के लिए जरूरी मिट्टी की नमी पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल सितंबर की बारिश मानसून और कृषि दोनों के लिए निर्णायक मानी जा रही है।


    सितंबर में बारिश पर सबसे नजर

    रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में एल नीनो का असर और मजबूत होने की आशंका है। मौसम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सितंबर में बारिश की कमी दो अंकों में पहुंच सकती है। कुछ पूर्वी राज्यों को छोड़कर अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है। फिलहाल इस साल के पूरे मानसून सीजन में बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम है। जुलाई में एक प्रतिशत अधिक बारिश ने कुछ राहत दी। अगस्त में मानसून फिर कमजोर पड़ा।


    मानसून की वापसी भी जल्दी संभव

    मौसम विभाग के एक अन्य अधिकारी के अनुसार, अगर कोई नई मौसम प्रणाली विकसित नहीं हुई तो मानसून अगले महीने उत्तर-पश्चिम भारत से सामान्य समय से कुछ दिन पहले लौटना शुरू कर सकता है। आमतौर पर मानसून की वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से करीब 17 सितंबर के आसपास शुरू होती है और अक्टूबर के मध्य तक पूरे देश से इसकी वापसी हो जाती है।


    तमिलनाडु में जलभराव से आमजन परेशान

    चेन्नई और आसपास के तिरुवल्लूर, कांचीपुरम और चेंगलपट्टू जिलों में तेज बारिश से कई इलाकों में पानी भर गया। सड़कों पर जलभराव से यातायात प्रभावित हुआ। चेन्नई में सोमवार सुबह तक कई इलाकों में बारिश दर्ज की गई।


    पश्चिम बंगाल के कई जिलों में चलेगी तेज हवा

    पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मेदिनीपुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया, कोलकाता और हावड़ा में 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलेंगी। दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में भारी बारिश की संभावना है।


    छत्तीसगढ़ में अगले सात दिन भारी बारिश के आसार

    छत्तीसगढ़ में मौसम विभाग ने अगले सात दिनों तक मध्यम से भारी बारिश जारी रहने का अनुमान जताया है। वहीं, पूर्वी राजस्थान में भारी बारिश की संभावना है। कोटा, भरतपुर और जयपुर संभाग के कुछ इलाकों में भारी बारिश की संभावना है।