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  • एलपीजी संकट पर लोकसभा में हंगामा: राहुल गांधी ने उठाया मुद्दा, पेट्रोलियम मंत्री पुरी ने दी पूरी स्थिति की जानकारी

    एलपीजी संकट पर लोकसभा में हंगामा: राहुल गांधी ने उठाया मुद्दा, पेट्रोलियम मंत्री पुरी ने दी पूरी स्थिति की जानकारी



    नई दिल्ली। गुरुवार को लोकसभा में एलपीजी संकट और देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारी हंगामा देखने को मिला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने संसद में ऊर्जा संकट को लेकर चर्चा शुरू की और कहा कि अभी तो केवल “दर्द की शुरुआत” हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार समय रहते उपाय नहीं करेगी, तो छोटे व्यापारी, रेस्टोरेंट और आम नागरिक गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। राहुल ने कहा कि किसी भी देश की बुनियाद उसकी ऊर्जा सुरक्षा होती है और वर्तमान वैश्विक हालात में अमेरिका और अन्य देशों के निर्णय से भारत की ऊर्जा नीति प्रभावित हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पेट्रोलियम मंत्री ने एक निजी बातचीत में एपस्टीन को अपना दोस्त बताया था, जिससे सदन में विवाद पैदा हो गया।

    राहुल गांधी के बयान के तुरंत बाद विपक्षी सांसदों ने संसद वेल में नारेबाजी शुरू कर दी। स्पीकर ओम बिरला ने राहुल को टोका और कहा कि केवल नोटिस दिए गए विषय पर ही चर्चा करें। इस दौरान विपक्ष के सांसदों ने ‘देखो-देखो कौन आया, एपस्टीन का दोस्त आया’ जैसे नारे लगाए। भारी हंगामा बढ़ते देख स्पीकर ने कार्यवाही को शाम 5 बजे तक स्थगित कर दिया।

    केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सदन में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि देश में एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने बताया कि रिफाइनरियां उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं और एलपीजी उत्पादन में 28% की वृद्धि की गई है। पुरी ने कहा कि मोदी सरकार की प्राथमिकता है कि 33 करोड़ परिवारों की रसोई में किसी तरह की कमी न हो। उन्होंने सभी को आश्वस्त किया कि घरेलू गैस सिलेंडर की सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित है और डिलीवरी चेन में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    पुरी ने बताया कि होर्मुज स्ट्रेट से भारत को मिलने वाला क्रूड ऑयल सुरक्षित स्तर पर उपलब्ध है। संघर्ष के कारण होर्मुज से 20% आवाजाही प्रभावित हुई थी, लेकिन सरकार ने इसके लिए रणनीति तैयार की है। वर्तमान में भारत 40 देशों से कच्चा तेल आयात करता है, जबकि 2006-07 में यह संख्या केवल 27 थी। उन्होंने कहा कि लंबे समय से अपनाई गई विविधीकरण नीति ने भारत को विकल्प दिए हैं, जो कई अन्य देशों के पास नहीं हैं।

    पेट्रोलियम मंत्री ने सदन में स्पष्ट किया कि यह समय अफवाह फैलाने या फेक नैरेटिव बनाने का नहीं है। उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा संकट के बावजूद देश में पेट्रोल, डीजल, केरोसीन, एटीएफ और फ्यूल ऑयल की सप्लाई सामान्य रूप से जारी है। उन्होंने जनता और उद्योग को भरोसा दिलाया कि भारत संकट का प्रबंधन कर रहा है और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है।

    लोकसभा में पुरी के बोलने के दौरान विपक्ष ने लगातार नारेबाजी की, जिससे कार्यवाही बाधित हुई। स्पीकर ने दोबारा हिदायत दी कि संसद के नियमों का पालन किया जाए और केवल नोटिस किए गए मुद्दे पर ही चर्चा हो। इस हंगामे के बीच संसद की कार्यवाही स्थगित कर दी गई और विपक्षी सांसदों से वेल खाली करने का आदेश दिया गया।

    कुल मिलाकर संसद में एलपीजी और ऊर्जा सुरक्षा पर हुई यह बहस दर्शाती है कि देश में ऊर्जा आपूर्ति पर सभी की निगाहें हैं। विपक्ष ने सरकार की तैयारी पर सवाल उठाए, जबकि केंद्रीय मंत्री ने भरोसा दिलाया कि देश की ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति पूरी तरह सुनिश्चित है। एलपीजी संकट को लेकर लगातार अफवाहें फैल रही हैं, लेकिन सरकार की रणनीति और उत्पादन वृद्धि ने स्थिति नियंत्रण में रखने का काम किया है।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 3 मई से गोरखपुर से शुरू होगी ‘गविष्ट यात्रा’, बनाएंगे ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 3 मई से गोरखपुर से शुरू होगी ‘गविष्ट यात्रा’, बनाएंगे ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’


    प्रयागराज। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) ने घोषणा की है कि वह 3 मई से गोरखपुर से ‘गविष्ट यात्रा’ की शुरुआत करेंगे। यह अभियान 81 दिनों तक चलेगा और 23 जुलाई को गोरखपुर में ही इसका समापन होगा।
    उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान टीमें उत्तर प्रदेश के गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेंगी और सनातन धर्म व गौसंरक्षण के मुद्दों पर संवाद करेंगी।

    प्रयागराज में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि इस यात्रा के माध्यम से राज्य के करीब 1.08 लाख गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने समर्थकों से टीम बनाकर गांव-गांव जाने और प्रमाण के साथ सच बात जनता तक पहुंचाने का आह्वान किया।

    अनुमति को लेकर लगाए आरोप
    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई बाधाएं खड़ी की गईं। उनके अनुसार पहले काशी में कार्यक्रम रोकने की कोशिश हुई, फिर लखनऊ में प्रवेश को लेकर आपत्ति जताई गई और अंततः देर रात 16 शर्तों के साथ अनुमति दी गई, जिसके बाद 10 और शर्तें जोड़कर कुल 26 कर दी गईं।

    ‘शंकराचार्य पद सनातन धर्म का सुप्रीम कोर्ट’
    अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि शंकराचार्य पद सनातन धर्म में सर्वोच्च स्थान रखता है। उनके मुताबिक यह व्यवस्था ज्ञान और परंपरा पर आधारित है, न कि भीड़तंत्र पर। उन्होंने गौसंरक्षण और सनातन धर्म की रक्षा को समाज की जिम्मेदारी बताते हुए संत समाज से सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

    ‘कोई राजनीतिक दल नहीं बना रहे’
    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य कोई राजनीतिक दल बनाना नहीं है।

    उन्होंने कहा कि संत समाज जनता के बीच जाकर केवल यह संदेश देगा कि जो भी गौसंरक्षण और समाज के हित में काम करे, उसे ही समर्थन दिया जाना चाहिए।

    अखाड़ों को लिखा जाएगा पत्र
    उन्होंने कहा कि साधु समाज में आई कुछ विकृतियों पर भी चर्चा की जाएगी। इसके लिए विभिन्न अखाड़ों को पत्र लिखकर उनकी भूमिका स्पष्ट करने को कहा जाएगा। साथ ही उन्होंने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’ बनाने की बात भी कही, जिसमें संन्यासी, बैरागी, उदासीन और गृहस्थ शामिल होंगे।

  • मिडिल ईस्ट युद्ध में दो भारतीयों की मौत, एक अब भी लापता; विदेश मंत्रालय ने दी पहली आधिकारिक जानकारी

    मिडिल ईस्ट युद्ध में दो भारतीयों की मौत, एक अब भी लापता; विदेश मंत्रालय ने दी पहली आधिकारिक जानकारी

    नई दिल्ली/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत के दो नागरिकों की मौत हो गई है, जबकि एक भारतीय अब भी लापता बताया जा रहा है। इस बारे में पहली बार आधिकारिक जानकारी देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs (India) के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल (Randhir Jaiswal) ने बुधवार को पुष्टि की कि क्षेत्र में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने क
    े लिए सरकार लगातार निगरानी कर रही है।

    जहाजों पर हमले के दौरान हुई घटना

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, मृतक भारतीय उन व्यापारिक जहाजों पर सवार थे जिन पर संघर्ष प्रभावित समुद्री क्षेत्र में हमला हुआ था। इस दौरान कुछ अन्य भारतीय नागरिक घायल भी हुए हैं।

    मंत्रालय के मुताबिक एक भारतीय नागरिक Israel में घायल हुआ है, जबकि Dubai में भी एक भारतीय के घायल होने की सूचना मिली है। फिलहाल दो भारतीयों की मौत की पुष्टि हुई है और एक व्यक्ति अभी भी लापता है।

    भारतीय दूतावास लगातार संपर्क में

    प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि विदेश मंत्रालय प्रभावित परिवारों के संपर्क में है और क्षेत्र में मौजूद भारतीय दूतावास व वाणिज्य दूतावास भारतीय समुदाय को हर संभव सहायता प्रदान कर रहे हैं।

    स्थिति को देखते हुए नई दिल्ली में 24 घंटे काम करने वाला एक विशेष नियंत्रण कक्ष भी स्थापित किया गया है, जो आपातकालीन कॉल और ईमेल प्राप्त कर संबंधित देशों में भारतीय मिशनों के साथ समन्वय कर रहा है।

    पीएम मोदी और विदेश मंत्री स्थिति पर नजर रखे हुए

    विदेश मंत्रालय के अनुसार Narendra Modi पश्चिम एशिया के हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और United Arab Emirates, Qatar, Saudi Arabia, Oman, Bahrain, Jordan, Kuwait और Israel के नेताओं के संपर्क में हैं।

    वहीं विदेश मंत्री Subrahmanyam Jaishankar भी Iran समेत कई देशों के अपने समकक्षों से लगातार बातचीत कर रहे हैं।

    युद्ध से बढ़ा क्षेत्रीय तनाव

    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया।

    इस संघर्ष के कारण समुद्री मार्गों में बाधा आई है और वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता पर भी असर पड़ रहा है।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • कश्मीर विश्वविद्यालय में उपराष्ट्रपति का संदेश,बोेले-मेरा नहीं, हमारा कश्मीर कहिए, ड्रग्स से दूर रहने की अपील

    कश्मीर विश्वविद्यालय में उपराष्ट्रपति का संदेश,बोेले-मेरा नहीं, हमारा कश्मीर कहिए, ड्रग्स से दूर रहने की अपील


    नई दिल्ली। कश्मीर विश्वविद्यालय के 21वें कॉन्वोकेशन में भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने युवाओं को शिक्षा, एकता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रेरक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि देश की एकता में केवल कानून या सत्ता नहीं, बल्कि सहनशीलता और सम्मान की भावना सबसे महत्वपूर्ण है। उपराष्ट्रपति ने छात्रों से अपील की कि वे कश्मीर को मेरा कश्मीर या तुम्हारा कश्मीर न कहें, बल्कि हमेशा हमारा कश्मीर कहें। उनका कहना था कि यह सोच देश के लिए एकजुटता और मजबूती का प्रतीक है।

    ”युवाओं को ज्ञान और मूल्य दोनों की समझ होना जरूरी”
    सीपी राधाकृष्णन ने युवाओं को ड्रग्स और सोशल मीडिया के दुरुपयोग से बचने की चेतावनी दी। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा ही व्यक्तिगत और राष्ट्रीय विकास की सबसे मजबूत नींव है। युवाओं को ज्ञान और मूल्य दोनों की समझ होना जरूरी है ताकि वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें। उन्होंने पीएम स्कॉलरशिप और अन्य शैक्षिक योजनाओं की तारीफ की और बताया कि ये पहल युवा शक्ति को भविष्य के लिए तैयार करती हैं और राष्ट्रीय और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती हैं।

    ”हमें अपनी भावनाओं पर गर्व होना चाहिए”
    उपराष्ट्रपति ने झारखंड में अपने राज्यपाल कार्यकाल का उदाहरण साझा किया। उन्होंने कहा कि कश्मीरी छात्रों के दौरे पर, यह जानते हुए कि अधिकांश छात्र नॉन-वेजिटेरियन हैं, उन्होंने उनके खाने की पसंद का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने समझाया कि लोकतांत्रिक समाज में दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा, हमें अपनी भावनाओं पर गर्व होना चाहिए, लेकिन दूसरों की भावनाओं को नीचा नहीं दिखाना चाहिए। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

    ”समाज में योगदान के जरिए इसकी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं”
    इस कॉन्वोकेशन में कुल 59,558 डिग्रियां वितरित की गईं, जिनमें 44,910 अंडरग्रेजुएट, 13,545 पोस्टग्रेजुएट, 465 एमडी/एमएस/एम.च, 638 एमफिल और 168 पीएचडी शामिल हैं। कुल 239 गोल्ड मेडल में से 186 मेडल महिलाओं को मिले, जिसे उपराष्ट्रपति ने खास तौर पर सराहा। उन्होंने खुशी जताई कि राज्य की शिक्षा मंत्री, यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर और अधिकतर गोल्ड मेडल विजेता महिलाएं हैं। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी की असली विरासत इसके छात्र हैं, जो अपने कैरेक्टर और समाज में योगदान के जरिए इसकी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं।

    ”समाज में सकारात्मक बदलाव लाएं”
    उपराष्ट्रपति ने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा, सहनशीलता और एकता के माध्यम से ही देश मजबूत बन सकता है। उनका संदेश था कि युवा हमेशा हमारा कश्मीर की भावना के साथ आगे बढ़ें और समाज में सकारात्मक बदलाव लाएं।

  • पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट: चुनाव से पहले राजनीतिक तूफ़ान तेज, एसआईआर और दस्तावेज़ विवाद से बढ़ी चिंता

    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन की अटकलों ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। राज्यपाल के अचानक बदलाव, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे पर विवाद और चुनाव आयोग की टीम के दौरे के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन ने इस संभावना को और गहरा कर दिया है।

    इतिहास और संवैधानिक पहलू
    पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू होने का इतिहास बहुत लंबा नहीं है। 30 अप्रैल 1977 को तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जो वाममोर्चा सरकार के शपथ ग्रहण तक 52 दिनों तक जारी रहा। अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या बंगाल एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है।

    चुनाव आयोग का दौरा और विरोध प्रदर्शन
    चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने कोलकाता दौरे के दौरान सभी राजनीतिक दलों और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों का जायजा लिया। हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर सीधे जवाब देने से परहेज किया और कहा कि कानून-व्यवस्था की समीक्षा के बाद चुनाव की तारीख और चरण तय किए जाएंगे।

    तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने एक या दो चरणों में मतदान कराने की मांग की। आयोग को कोलकाता और आसपास बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। तृणमूल समर्थकों ने काले झंडे दिखाए और “लोकतंत्र का हत्यारा” जैसे पोस्टर भी लगाए।

    एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद
    राज्य में नवंबर से चल रही एसआईआर (Special Summary Revision) प्रक्रिया के तहत लगभग 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज विचाराधीन हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दस्तावेजों की जांच में न्यायिक अधिकारियों को दो महीने का समय लगने की संभावना है। राजनीतिक दलों का कहना है कि इस स्थिति में चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण होगा।

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से वैध वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने की साजिश की जा रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अचानक राज्यपाल सीवी आनंद बोस की जगह आर.एन. रवि को क्यों नियुक्त किया गया, जो तमिलनाडु में विवादित रहे हैं।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का दौरा और विवाद
    राष्ट्रपति का दौरा सिलीगुड़ी में आदिवासी सम्मेलन के लिए था। हालांकि मुख्यमंत्री ने इसे लेकर असंतोष जताया और कहा कि उन्हें न्यूनतम प्रोटोकॉल तक नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रपति के अपमान का आरोप लगाया।

    राजनीतिक माहौल और भविष्य की चुनौतियां
    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एसआईआर के तहत विचाराधीन 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेज समय पर जांच कर लिए जाएंगे। यदि यह कार्य पूरा नहीं हुआ, तो या तो चुनाव टालना पड़ सकता है या बिना पूरी सूची के चुनाव कराना पड़ सकता है। इससे राष्ट्रपति शासन की संभावना बढ़ सकती है।अगले कुछ दिनों में केंद्र और चुनाव आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा साफ होगी।

  • 20 साल से इसी दिन का इंतजार था: कौन है कमल सिंह जामवाल? जिसने फारूक अब्दुल्ला पर तान दी बंदूक

    20 साल से इसी दिन का इंतजार था: कौन है कमल सिंह जामवाल? जिसने फारूक अब्दुल्ला पर तान दी बंदूक


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के संरक्षक Farooq Abdullah पर बुधवार रात एक शादी समारोह के दौरान फायरिंग की कोशिश की गई। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की सतर्कता से यह हमला नाकाम हो गया और वह बाल-बाल बच गए। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

    कहां हुई घटना
    यह घटना बुधवार रात जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित रॉयल पार्क बैंक्विट हॉल में हुई। यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और वरिष्ठ वकील दिनेश सिंह चौहान की बेटी की शादी का समारोह चल रहा था। समारोह में Farooq Abdullah के अलावा जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary, कैबिनेट मंत्री Satish Sharma और मुख्यमंत्री Omar Abdullah के राजनीतिक सलाहकार नासिर असलम भी मौजूद थे।

    कैसे हुई हमले की कोशिश
    सूत्रों के मुताबिक, Farooq Abdullah रात करीब 9:15 बजे समारोह में पहुंचे थे। कुछ समय तक उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। करीब 10:10 बजे जब वह समारोह से निकलकर अपनी कार की ओर जा रहे थे, तभी भीड़ में मौजूद एक शख्स अचानक उनके पीछे आया और उनकी पीठ पर बंदूक तान दी। हालांकि इससे पहले कि वह गोली चला पाता, सुरक्षा में तैनात एक सुरक्षाकर्मी ने तुरंत बंदूक को हटा दिया। इस दौरान गोली ऊपर की ओर चली गई और कोई बड़ा हादसा होने से बच गया।

    कौन है आरोपी कमल सिंह
    पुलिस के मुताबिक हमलावर की पहचान कमल सिंह जामवाल के रूप में हुई है। वह जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का रहने वाला है। रिपोर्ट्स के अनुसार कमल सिंह का जन्म 1963 में हुआ था। जम्मू के ओल्ड सिटी इलाके में उसकी कई दुकानें हैं। वह इन दुकानों से मिलने वाले किराए से अपना गुजारा करता है। पुलिस ने आरोपी के पास से घटना में इस्तेमाल किया गया हथियार भी बरामद कर लिया है। पुलिस की शुरुआती पूछताछ में आरोपी ने चौंकाने वाला दावा किया। उसने कहा कि वह पिछले 20 साल से Farooq Abdullah को मारना चाहता था और इसी मौके का इंतजार कर रहा था। उसने यह भी बताया कि हमला करना उसका “पर्सनल एजेंडा” था। फिलहाल पुलिस उससे पूछताछ कर रही है और घटना के पीछे की वजहों की जांच जारी है।

    चश्मदीदों ने क्या बताया
    शादी समारोह में मौजूद एक चश्मदीद राकेश सिंह के मुताबिक, सभी लोग समारोह से बाहर निकल रहे थे तभी अचानक एक व्यक्ति ने पीछे से आकर डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर रिवॉल्वर तान दी। उन्होंने बताया कि सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत कार्रवाई की और बंदूक को हटा दिया, जिससे बड़ी घटना टल गई।

    मंत्री सतीश शर्मा ने क्या कहा
    जम्मू-कश्मीर के मंत्री Satish Sharma ने कहा कि यह एक गंभीर घटना है, लेकिन Farooq Abdullah पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने बताया कि आरोपी को पुलिस हिरासत में लेकर मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

  • ईरान में फंसे भारतीयों की सुरक्षित घर वापसी कराने में जुटी सरकार, ये दो देश कर रहे मदद

    ईरान में फंसे भारतीयों की सुरक्षित घर वापसी कराने में जुटी सरकार, ये दो देश कर रहे मदद


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत सरकार (Indian Government) अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर लगातार सक्रिय है। विदेश मंत्रालय ने बताया कि ईरान में मौजूद भारतीयों की सुरक्षित वापसी के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। सरकार उन भारतीयों की मदद कर रही है जो ईरान से बाहर निकलना चाहते हैं। इसके लिए आर्मेनिया (Armenia) और अजरबैजान (Azerbaijan) के रास्ते लोगों को सुरक्षित बाहर लाने की व्यवस्था की जा रही है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि तेहरान स्थित भारतीय दूतावास पूरी तरह सक्रिय है और हाई अलर्ट पर काम कर रहा है। दूतावास भारतीय छात्रों, तीर्थयात्रियों और अन्य नागरिकों से लगातार संपर्क में है। जो लोग ईरान छोड़ना चाहते हैं उन्हें जमीन के रास्ते आर्मेनिया और अजरबैजान भेजा जा रहा है, जहां से वे व्यावसायिक उड़ानों के जरिए भारत लौट सकते हैं।


    ईरान में कितने भारतीय मौजूद हैं?

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक ईरान में करीब नौ हजार भारतीय नागरिक मौजूद हैं। इनमें बड़ी संख्या में छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। सरकार ने कहा कि कई भारतीय पहले ही सरकार की एडवाइजरी का पालन करते हुए स्वदेश लौट चुके हैं। बाकी लोगों से भी लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।


    सरकार ने सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए हैं?

    सरकार ने बताया कि कुछ छात्रों और आगंतुकों को सुरक्षा कारणों से ईरान के अलग-अलग शहरों में स्थानांतरित किया गया है। इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने एक कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है, जो चौबीसों घंटे काम कर रहा है। यहां परिवार के लोग फोन या ईमेल के जरिए जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अधिकारियों से मदद ले सकते हैं।


    खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा क्यों अहम है?

    विदेश मंत्रालय के अनुसार खाड़ी सहयोग परिषद के देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं। सरकार ने कहा कि इन सभी भारतीयों की सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार क्षेत्र के कई नेताओं के संपर्क में हैं और भारतीय समुदाय की सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं।


    संघर्ष में भारतीयों को कितना नुकसान हुआ?

    सरकार ने बताया कि हालिया घटनाओं में दो भारतीय नागरिकों की मौत हुई है और एक व्यक्ति लापता है। ये तीनों एक व्यापारी जहाज पर मौजूद थे, जो हमले का शिकार हुआ था। इसके अलावा कुछ भारतीय घायल भी हुए हैं। एक भारतीय इस्राइल में और एक दुबई में घायल हुआ है। दोनों का इलाज चल रहा है और भारतीय दूतावास उनके संपर्क में है।

  • संसद में आज मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी

    संसद में आज मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) में लोकसभा स्पीकर पद (Lok Sabha Speaker’s post) से हटाने संबंधी प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार (Chief Election Commissioner (CEC) Gyanesh Kumar) के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है। संभावना है कि तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में एकजुट विपक्ष (Opposition) गुरुवार को सीईसी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देगा। नोटिस पर लोकसभा के 120 और राज्यसभा के 60 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। तृणमूल की रणनीति मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को प. बंगाल विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाने की है।


    सीईसी के खिलाफ टीएमसी को मिला कांग्रेस-सपा का साथ

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की इस मुहिम पर बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के चैंबर में हुई बैठक में सहमति बनी। बैठक में राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तृणमूल के प्रस्ताव का समर्थन किया। इसके बाद नोटिस देने के लिए जरूरी सांसदों के हस्ताक्षर कराए गए। योजना दोनों सदनों में नोटिस देने की है। दरअसल, महाभियोग की प्रक्रिया के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत पड़ती है। सीईसी को हटाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जजों को हटाने की तरह ही प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।


    जल्दबाजी में क्यों हैं तृणमूल

    दरअसल पार्टी चाहती है कि अप्रैल-मई में बंगाल विधानसभा चुनाव में एसआईआर को बड़ा मुद्दा बनाने के लिए इसी सत्र में महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा हो। प्रक्रिया शुरू करने और मुख्य रूप से चर्चा के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी है। यदि बृहस्पतिवार को नोटिस दिया गया तो इसी सत्र में प्रस्ताव पर चर्चा हो जाएगी। नोटिस में सीईसी पर सरकार के इशारे पर एसआईआर के बहाने जानबूझकर उचित मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने का आरोप लगाया गया है।


    क्या है महाभियोग की प्रक्रिया?

    मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही होती है। इसके लिए ‘साबित दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ को आधार बनाना होता है। यह प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। इसे पास कराने के लिए सदन के कुल सदस्यों के बहुमत और मौजूद व वोट देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।

  • लोकसभा में विपक्ष को झटका… ओम बिरला को अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव हुआ खारिज

    लोकसभा में विपक्ष को झटका… ओम बिरला को अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव हुआ खारिज


    नई दिल्ली।
    ओम बिरला (Om Birla) को स्पीकर पद (Speaker Post) से हटाने का प्रस्ताव बुधवार को लोकसभा (Lok Sabha) में ध्वनिमत से खारिज हो गया, जिससे विपक्ष (Opposition) को झटका लगा है। विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से माफी की मांग की गई थी, चेयर पर बैठे जगदंबिका पाल ने घोषणा की कि अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया है। पाल ने विपक्ष से अपनी सीटों पर बैठने का आग्रह किया ताकि वह प्रस्ताव पर वोटिंग करा सकें। लेकिन विरोध जारी रहने पर, उन्होंने सदन से वोटिंग की मांग की और प्रस्ताव को वॉइस वोट से खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने सदन को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया। इससे पहले, गृह मंत्री ने बिरला को स्पीकर पद से हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष पर निशाना साधा।

    विपक्ष ने शाह की कुछ बातों पर आपत्ति जताई और नारे लगाने लगे, कार्यवाही में बाधा डाली और उनसे माफी की मांग की। दो दिन तक चली बहस का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि सदन अपने नियमों से चलेगा, किसी पार्टी के नियमों से नहीं। उन्होंने कहा, “यह कोई आम बात नहीं है, क्योंकि लगभग चार दशकों के बाद स्पीकर के खिलाफ ऐसा मोशन लाया गया है।” गृह मंत्री ने कहा कि पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ विपक्षी पार्टियां स्पीकर की ईमानदारी पर सवाल उठा रही हैं। शाह ने कहा कि भाजपा सबसे लंबे समय तक विपक्ष में रही है, लेकिन पार्टी ने कभी किसी स्पीकर के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस मोशन नहीं लाया।

    उन्होंने कहा, “इस सदन के स्थापित इतिहास के अनुसार, इसकी कार्यवाही आपसी विश्वास के आधार पर चलती है। स्पीकर एक न्यूट्रल कस्टोडियन के रूप में काम करते हैं, जो रूलिंग पार्टी और विपक्ष दोनों को रिप्रेजेंट करते हैं। पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव आया है।” शाह ने कहा कि विपक्ष ने बिरला की ईमानदारी पर सवाल उठाए और कहा कि यह देश की डेमोक्रेटिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने जैसा है। बहस के पूरे समय के दौरान बिरला सदन में मौजूद नहीं थे।


    बिरला के खिलाफ प्रस्ताव अफसोसजनक: शाह

    गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ संकल्प लाने को लेकर विपक्ष पर निशाना साधते हुए बुधवार को कहा कि विपक्षी दलों ने बिरला की निष्ठा पर सवाल खड़े किए हैं, जो बहुत अफसोसजनक है। उन्होंने सदन में विपक्ष के संकल्प पर चर्चा का जवाब देते हुए यह भी कहा कि किसी को भी नियम के विपरीत बोलने का अधिकार नहीं है। शाह ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी दावा करते हैं कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता, जबकि ”वह खुद बोलना नहीं चाहते।” उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा लाए गए विधेयकों का उल्लेख करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने विधेयकों पर चर्चा में भाग नहीं लिया। उन्होंने दावा किया कि वह (राहुल) पिछले साल शीतकालीन सत्र के दौरान जर्मनी की यात्रा पर थे। शाह ने कहा, ”जब-जब महत्वपूर्ण सत्र होता है, उनका विदेश दौरा होता है। जब आप विदेश में हैं तो आप कैसे बोलेंगे। यहां वीडियो कांफ्रेंस का प्रावधान नहीं है। अगर ऐसा प्रावधान होता तो उन्हें बोलने का मौका दे देते।”