Category: National

  • ईरान का हवाई क्षेत्र बंद, रायपुर परिवार समेत कई यात्रियों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा टली

    ईरान का हवाई क्षेत्र बंद, रायपुर परिवार समेत कई यात्रियों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा टली


    नई दिल्ली। इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य और राजनीतिक तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात पर दिखाई देने लगा है। सुरक्षा कारणों को हवाला देते हुए ईरान ने अपना एयरस्पेस अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इस फैसले से भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाने वाली कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को बीच रास्ते में ही वापस लौटना पड़ा, जिससे यात्रियों में भारी असुविधा और असमंजस पैदा हुआ।

    जानकारी के अनुसार, 14 जनवरी की देर रात मुंबई से उड़ान भरने वाली कई अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स का मार्ग तय रूट के अनुसार तेहरान एयरस्पेस से होकर गुजरना था। हालांकि, उड़ान के कुछ घंटे बाद ईरान की ओर से एयरस्पेस बंद करने की सूचना मिलने पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने सभी संबंधित विमानों को मुंबई लौटने के निर्देश दिए। सुबह करीब 4 बजे ये फ्लाइट्स वापस मुंबई एयरपोर्ट पर लैंड हुईं, जिससे यात्रियों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।इन उड़ानों में रायपुर निवासी करोबारी महावीर तालेड़ा और उनका परिवार भी शामिल थे, जो न्यूयॉर्क जा रहे थे। महावीर ने बताया कि फ्लाइट ने समय पर उड़ान भरी थी, लेकिन दो घंटे बाद पायलट ने घोषणा की कि तकनीकी और सुरक्षा कारणों से विमान को वापस ले जाया जा रहा है। अचानक लिए गए इस फैसले से यात्रियों में चिंता और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई।

    मुंबई एयरपोर्ट पर लौटने के बाद यात्रियों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। महावीर के अनुसार, यात्रियों के ठहरने और आगे की यात्रा के विकल्पों की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। कई यात्रियों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें रिफंड या वैकल्पिक फ्लाइट के बारे में तुरंत कोई जानकारी नहीं दी गई, जिससे नाराजगी बढ़ी।एयर इंडिया ने यात्रियों के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है। एयरलाइन ने बताया कि ईरान के एयरस्पेस बंद होने के कारण कुछ उड़ानों को वैकल्पिक रूट से संचालित किया जा रहा है, जिससे देरी हो सकती है। वहीं, कुछ रूट ऐसे हैं जहां बदलाव संभव न होने के कारण उड़ानें रद्द कर दी गई हैं।

    इंडिगो ने भी अपनी एडवाइजरी में कहा कि ईरान के हवाई क्षेत्र बंद होने से कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर असर पड़ सकता है। एयरलाइंस ने यात्रियों से अपील की है कि वे फ्लाइट की स्थिति अपनी एयरलाइन की आधिकारिक वेबसाइट या कस्टमर केयर से पहले जांच लें।विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान हालात में अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए अनिश्चितता बनी हुई है। ईरान और इजराइल के बीच तनाव से जुड़े हालात कब सामान्य होंगे, इसका अभी कोई निश्चित अनुमान नहीं है। यात्रियों को अपनी यात्रा के दौरान धैर्य बनाए रखने और सभी अपडेट लगातार जांचने की सलाह दी जा रही है।

  • बीएमसी चुनाव: बहुमत में तो कभी नहीं आई शिवसेना, आज उद्धव के लिए चुनौती

    बीएमसी चुनाव: बहुमत में तो कभी नहीं आई शिवसेना, आज उद्धव के लिए चुनौती

    मुंबई। बीएमसी चुनाव में आज वोटिंग का दिन है. फैसला 16 जनवरी यानी कल आएगा. उद्धव ठाकरे के लिए पार्टी को बचाने की निर्णायक लड़ाई है. कभी ठाकरे परिवार के दबदबे वाली बीएमसी में पिछले तीस सालों में जो कुछ हुआ, आज उद्धव को सारी बातें याद आ रही होंगी. इसमें ‘बिग ब्रदर’ की हैसियत उन्हें सबसे ज्यादा चुभ रही होगी जो पहले जूनियर था लेकिन बाद में पार्टी को ही चुनौती दे बैठा.
    वैसे तो भाजपा का गठबंधन भी भारत के सबसे अमीर नगर निगम पर फतह के लिए जोर लगा रहा है लेकिन कोई और है जिसके लिए यह अग्निपरीक्षा है. जून 2022 में पार्टी के विभाजन के बाद यह तीसरी चुनावी फाइट है. करीब तीन दशक से लगातार शिवसेना मुंबई पर राज करती आई है.
    बीएमसी का मतलब ही शिवसेना बन चुका था. ऐसे में 2017 के बाद होने जा रहे इस हाई प्रोफाइल चुनाव पर देश की नजरें हैं क्योंकि अब शिवसेना दो हिस्सों में बंट चुकी है. उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों अपनी शिवसेना को सही और असली साबित करने के लिए यह निर्णायक लड़ाई जीतना चाहेंगे.

    उद्धव ठाकरे इस चुनाव की अहमियत समझते हैं शायद इसीलिए उन्होंने अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करने के लिए सबसे पहले परिवार को एकजुट करने की सोची. महाराष्ट्र में दशकों से बाल ठाकरे का ही नाम बोलता है. शिंदे भी ठाकरे की तस्वीर लेकर अपनी सियासत चमका रहे हैं. आज भी सोशल मीडिया के प्रोफाइल में उन्होंने बैकग्राउंड में ठाकरे को लगा रखा है. ऐसे में उद्धव के सामने चुनौती बड़ी है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने मराठी वोटों को एकसाथ लाने के लिए चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ गठबंधन किया है. राज ने नवंबर 2005 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बना ली थी. हालांकि इतने से ही बीएमसी में जीत की गारंटी नहीं मिल जाती. उद्धव की सबसे बड़ी चुनौती वो जूनियर है जो आज ‘बिग ब्रदर’ बनकर सामने खड़ा है.
    – ग्रेटर मुंबई नगर निगम के तौर पर इसे 1873 में स्थापित किया गया.
    – 1931 में प्रेसिडेंट की जगह बीएमसी चीफ को मेयर कहा जाने लगा.
    – आजादी के बाद 1948 में वयस्क मताधिकार के आधार पर बीएमसी में पहले चुनाव हुए.
    – 1972 में बीएमसी ने मराठी को आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया.
    – 1991 में सीटों की संख्या 221 पहुंची. 1992 और 1997 में चुनाव कराए गए
    – 2002 में सीटें 227 हुईं. इसका वार्षिक बजट कई छोटे राज्यों से भी ज्यादा है.

    उद्धव शिवसेना की चुनौती
    – मुंबई ही नहीं, पूरे देश में यह धारणा है कि बीएमसी का मतलब शिवसेना है लेकिन कम लोग जानते होंगे कि ठाकरे पार्टी ने अपने दम पर कभी बहुमत हासिल नहीं किया. शिवसेना ने हमेशा गठबंधन से ही नगर निगम की सरकार चलाई है.
    – इसने 1985 में चुनाव जीता था और 170 में से 74 सीटें मिलीं. तब पार्टी ने 140 सीटों पर चुनाव लड़ा था.
    – अविभाजित शिवसेना का सबसे जबर्दस्त प्रदर्शन 1997 में दिखा जब शिवसेना ने 221 में 103 सीटें जीत लीं.
    – इसके बाद ग्राफ गिरने लगा और 100 से नीचे आ गया. 2012 में 75 सीटें मिली थीं.
    – 2017 में यह 84 सीटों पर आकर सिमट गई.
    – 2019 के विधानसभा चुनाव में संयुक्त शिवसेना ने 16 प्रतिशत वोट हासिल किए थे. पांच साल बाद दोनों गुटों को मिलाकर 20 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले.

    इसमें शिंदे ग्रुप को ज्यादा 12 प्रतिशत और उद्धव गुट को 10 प्रतिशत मिले थे. इस बार उद्धव चाहेंगे कि बीएमसी में शिंदे ग्रुप से ज्यादा वोट अपने साथ खींचा जाए.
    भाजपा का बढ़ना
    हां, शिवसेना के साथ अलायंस में जूनियर के तौर पर शामिल हुई भाजपा लगातार बढ़ती गई. 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में वह ‘बिग ब्रदर’ बन गई. बीएमसी चुनाव में भी वह पहले 20-30 सीटें निकाल रही थी लेकिन 2017 में यह 82 के आंकड़े पर पहुंच गई. तब यह शिवसेना से केवल 2 सीटें पीछे थी. इस बार के चुनाव में भाजपा शिंदे सेना की मदद से पहली बार बीएमसी पर कब्जा करना चाहती है. आसान नहीं है लेकिन पहले से कम मुश्किल है. इसका मैसेज बड़ा होगा- ठाकरे अब भाजपा के लिए किसी भी तरह से चुनौती नहीं हैं.
  • चुनावी वादा पूरा करने के लिए हफ्तेभर में 500 कुत्तों को मार डाला! जानिए मामला?

    चुनावी वादा पूरा करने के लिए हफ्तेभर में 500 कुत्तों को मार डाला! जानिए मामला?


    हैदराबाद। चुनावी वादा पूरा करने में नेताओं का रिकॉर्ड भले ही खराब रहता हो, लेकिन हाल ही में तेलंगाना से चुनावी वादा को पूरा करने के लिए कुत्तों की हत्या का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां कुछ गांव के सरपंचों ने लोगों से किया हुआ वादा निभाने के चक्कर में एक सप्ताह में करीब 500 कुत्तों को मार डाला है। घटना सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है।

    एक हफ्ते में कई गांवों में 500 कुत्तों को जहर देकर मार दिया गया। पशु कल्याण कार्यकर्ता अडुलापुरम गौतम द्वारा 12 जनवरी को दर्ज कराई गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कामारेड्डी जिले के भवानीपेट, पालवंचा, फरीदपेट, वाडी और बंदारमेश्वरपल्ली सहित कई गांवों में आवारा कुत्तों को योजनाबद्ध तरीके से मारा गया। उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन दिनों में ही लगभग 200 कुत्तों को मारा गया है।

    सरपंचों ने करवाई हत्या

    शिकायत के मुताबिक गौतम को 12 जनवरी को दोपहर करीब 3 बजे कुत्तों की कथित सामूहिक हत्या को लेकर विश्वसनीय जानकारी मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि ये काम गांव के सरपंचों के कहने पर किए गए। हत्याओं को क्रूर बताते हुए गौतम ने इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
    कुत्तों को लगाए गए जहरीले इंजेक्शन

    वहीं पुलिस के मुताबिक पांच गांव के सरपंचों और किशोर पांडे नाम के एक व्यक्ति सहित छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कुत्तों को जहरीले इंजेक्शन दिए गए, जिससे उनकी मौत हो गई।

    पुलिस अधिकारियों ने बताया कि शवों को गांवों के बाहरी इलाकों में दफना दिया गया था और बाद में पशु चिकित्सा टीमों द्वारा पोस्टमार्टम जांच के लिए उन्हें बाहर निकाला गया। आगे की जांच जारी है।
    चुनाव से पहले किया था वादा

    ग्रामीणों के मुताबिक कुछ उम्मीदवारों ने हाल ही में हुए पंचायत चुनावों के दौरान ग्रामीणों से आवारा कुत्तों से निजात दिलाने का वादा किया था। ग्रामीणों ने बताया, “पिछले साल दिसंबर में हुए चुनावों से पहले, कुछ उम्मीदवारों ने ग्रामीणों से वादा किया था कि वे आवारा कुत्तों और बंदरों की समस्या से निपटेंगे। अब वे आवारा कुत्तों को मारकर उन वादों को ‘पूरा’ कर रहे हैं।”

  • दिल्ली-नोएडा की तर्ज पर पूरे यूपी में लागू होगा डबल हेलमेट नियम, जानें कितनी होगी जुर्माने की रकम

    दिल्ली-नोएडा की तर्ज पर पूरे यूपी में लागू होगा डबल हेलमेट नियम, जानें कितनी होगी जुर्माने की रकम


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए नया कदम उठाया है। अब सड़क पर बाइक और स्कूटी चलाने वाले सभी वाहन चालकों और उनके सवारों के लिए डबल हेलमेट पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। यह नियम दिल्ली और नोएडा में लागू डबल हेलमेट नियम की तर्ज पर राज्यव्यापी प्रभावी होगा।

    क्यों जरूरी है डबल हेलमेट?
    बाइक और स्कूटी पर सवार लोगों की सुरक्षा बढ़ाने और सिर की चोटों से बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है।

    अधिकारियों के अनुसार, कई बार दुर्घटनाओं में सवार का सिर और चालक का सिर दोनों गंभीर रूप से घायल होते हैं, इसलिए केवल चालक के लिए हेलमेट पहनना पर्याप्त नहीं है।

    जुर्माना और दंड
    यदि कोई चालक या सवार डबल हेलमेट नहीं पहनता है, तो उसे 200 रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि नियम के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जाएगी, और यह नियम सभी सड़क और हाईवे पर लागू रहेगा।

    सरकार का उद्देश्य
    उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि इस कदम से सड़क दुर्घटनाओं में मौत और गंभीर चोटों की संख्या में कमी आएगी। साथ ही यह सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी मदद करेगा।

  • विदेशियों को आकर्षित नहीं कर पा रहा भारत…. राजस्थान से भी छोटे देश वियतनाम पहुंचे 3 गुना से भी ज्यादा टूरिस्ट

    विदेशियों को आकर्षित नहीं कर पा रहा भारत…. राजस्थान से भी छोटे देश वियतनाम पहुंचे 3 गुना से भी ज्यादा टूरिस्ट


    नई दिल्ली।
    साल 2025 के पहले नौ महीनों में भारत (India) सिर्फ 6.18 मिलियन विदेशी पर्यटकों (6.18 Million Foreign Tourists) को ही आकर्षित कर पाया. यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि अकेला पेरिस शहर (Paris city) एक साल में करीब 18 मिलियन अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का स्वागत कर चुका है. भारत के बेहद करीब वियतनाम (Vietnam), जो क्षेत्रफल में राजस्थान से भी छोटा है, उसने 2025 में 20 मिलियन विदेशी पर्यटकों का रिकॉर्ड बनाया.


    क्या भारत अब बजट डेस्टिनेशन नहीं रहा?

    आज भारत न तो विदेशी टूरिस्ट के लिए सस्ता है और न ही अपने ही नागरिकों के लिए. घरेलू छुट्टी का खर्च कई बार श्रीलंका या थाईलैंड जैसे देशों की इंटरनेशनल ट्रिप से ज्यादा हो जाता है. घरेलू फ्लाइट्स महंगी हैं, होटल ओवरप्राइस्ड हैं और सर्विस क्वालिटी में लगातार गिरावट देखी जा रही है. वियतनाम में एक हफ्ते की अच्छी ट्रिप 50 से 60 हजार रुपये प्रति व्यक्ति में हो जाती है. वहीं गोवा की इसी तरह की यात्रा का खर्च इतना ही या उससे ज्यादा हो सकता है. यही वजह है कि कई भारतीयों को विदेशी यात्रा ज्यादा सस्ती और ज्यादा आकर्षक लगने लगी है।


    इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं में क्या कमी है?

    भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट भरोसेमंद नहीं है. कई टूरिस्ट प्लेस पर कैब ड्राइवर मीटर से चलने से इनकार करते हैं और गैंग बनाकर मनमाना किराया वसूलते हैं. मेट्रो शहरों से आखिरी मील कनेक्टिविटी कमजोर है. इसके अलावा प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है, राजधानी दिल्ली में AQI महीनों तक तीन अंकों में बना रहता है. सार्वजनिक स्थानों पर थूकना आम है. ऐतिहासिक स्मारकों पर लिखावट और नुकसान दिखाई देता है. शौचालय गंदे हैं और कई हेरिटेज साइट्स पर बदबू पर्यटकों का स्वागत करती है. ऐसी हालत में लोग ऊंची कीमत चुकाने से पहले सौ बार सोचते हैं।


    टूरिज्म में सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता क्यों?

    सुरक्षा भारत की सबसे कमजोर कड़ी बन चुकी है. महिला वर्ल्ड कप के दौरान ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के साथ छेड़छाड़, राजस्थान में फ्रेंच टूरिस्ट के साथ रेप और कर्नाटक में इजरायली महिला के साथ गैंगरेप जैसी घटनाएं अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचती हैं. ये घटनाएं भारत की वैश्विक छवि को गहराई से प्रभावित करती हैं. गोवा या केरल के बजट में लोग बाली, कुआलालंपुर या दुबई घूम लेते हैं. थाईलैंड में अलग से टूरिस्ट पुलिस है. वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर, शहर साफ और सुरक्षा सिस्टम मजबूत है. ऐसे में सवाल उठता है कि कोई भारत क्यों चुने, जब खर्च ज्यादा और अनुभव कमजोर हो।


    भारत पर्यटन को मजबूत कैसे बना सकता है?

    भारत के पास प्राचीन मंदिर, जीवंत संस्कृति, रेगिस्तान, पहाड़, समुद्र तट और जंगल हैं. सबसे पहले सुरक्षा पर जीरो टॉलरेंस जरूरी है. साफ-सफाई को सख्ती से लागू करना होगा और नागरिकों को भी जिम्मेदारी निभानी होगी. कीमत और सुविधाओं में संतुलन, बेहतर सर्विस स्टैंडर्ड और प्रोफेशनल प्रमोशन जरूरी है. पर्यटन सिर्फ स्मारक नहीं, अनुभव है और वही तय करता है कि पर्यटक दोबारा लौटेगा या नहीं.

  • महाराष्ट्र: मरठवाड़ा में 5 साल में 5000 से किसानों ने की खुदकुशी, हर दिन 3 किसान ले रहे अपनी जान

    महाराष्ट्र: मरठवाड़ा में 5 साल में 5000 से किसानों ने की खुदकुशी, हर दिन 3 किसान ले रहे अपनी जान


    मुम्बई।
    महाराष्ट्र (Maharashtra) के सूखाग्रस्त क्षेत्र (Drought-affected areas) के रूप में पहचाने जाने वाले मराठवाड़ा क्षेत्र (Marathwada region) में किसानों की हालत लगातार गंभीर बनी हुई है। एक आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पाँच सालों में 5,000 से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी कर ली है। हैरत की बात ये है कि 2025 में सबसे ज़्यादा आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए हैं। डिविजनल कमिश्नर कार्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में कुल 1,129 किसानों ने आत्महत्या की है, जो एक साल पहले 948 थी, जबकि 2021 से अब तक कुल पांच वर्षों में कुल 5,075 आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वहां हर दिन औसतन तीन किसान अपनी जीवन लीला खत्म कर रहे हैं।

    मराठवाड़ा डिवीजन में छत्रपति संभाजीनगर, जालना, परभणी, नांदेड़, बीड, धाराशिव, हिंगोली और लातूर जिले शामिल हैं। डिवीजनल कमिश्नर कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में 887, 2022 में 1,023, 2023 में 1,088, 2024 में 948 और 2025 में 1,129 किसानों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली है। कुल मिलाकर 2021 से अब तक 5,075 किसानों की आत्महत्या हो चुकी है।


    बीड जिला सबसे ज़्यादा प्रभावित

    2025 में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज़्यादा मामले बीड जिले से सामने आए, जहां 256 किसानों ने जान दे दी। इनमें से 193 परिवारों को अनुग्रह राशि दी गई है। 2025 में जिलेवार किसानों की आत्महत्याएं इस प्रकार रही हैं: छत्रपति संभाजीनगर- 224, जालना- 90, परभणी- 104, हिंगोली- 68, नांदेड़- 170, बीड- 256, लातूर- 76 और धाराशिव-141।


    बारिश और बाढ़ बनी बड़ी वजह

    अधिकारियों के अनुसार, पिछले साल मराठवाड़ा के कई हिस्सों में असमय बारिश हुई। मई महीने में कुछ इलाकों में 125 से 150 प्रतिशत तक अधिक वर्षा दर्ज की गई। इसके अलावा सितंबर–अक्टूबर 2025 में आई बाढ़ ने क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में हुई कुल आत्महत्याओं में से 537 मौतें मई से अक्टूबर के बीच हुईं, जब बारिश और प्राकृतिक आपदाओं ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं।


    चिंता का विषय

    लगातार खराब मौसम, फसल नुकसान, बढ़ता कर्ज़ और आर्थिक दबाव मराठवाड़ा के किसानों को गहरे संकट में धकेल रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हालात से निपटने के लिए स्थायी और प्रभावी नीतियों की ज़रूरत है, ताकि किसानों को राहत मिल सके।

  • वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर विकास का बड़ा कदम, सुविधाओं में होगा सुधार

    वाराणसी में मणिकर्णिका घाट पर विकास का बड़ा कदम, सुविधाओं में होगा सुधार

    नई दिल्ली। वाराणसी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर हर वर्ष लाखों शवदाह होते हैं, जिसके कारण जगह की कमी, साफ-सफाई और व्यवस्थाओं में कई चुनौतियां सामने आती हैं। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए घाट पर एक व्यापक विकास परियोजना लागू की जा रही है, जिसका उद्देश्य श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के लिए सुविधाओं को सुधारना है।

    शवदाह के लिए नए प्लेटफॉर्म और ऊंची चिमनी

    जिलाधिकारी वाराणसी सतेंद्र कुमार ने बताया कि परियोजना के तहत शवदाह के लिए नए व्यवस्थित प्लेटफॉर्म बनाए जा रहे हैं। साथ ही, शवदाह के बाद बची राख के फैलने की समस्या को रोकने के लिए घाट पर ऊंची चिमनी का निर्माण किया जा रहा है। इससे राख का उचित निस्तारण संभव होगा और आसपास के घरों व स्थानों में फैलने से रोक लगेगी।

    लकड़ी और मुंडन संस्कार की सुविधाएं

    घाट पर शवदाह में प्रयुक्त लकड़ी को व्यवस्थित रखने की व्यवस्था की जा रही है, जिससे अव्यवस्था और गंदगी की समस्या कम हो सके। मुंडन संस्कार के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को अब बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, जिससे उन्हें पहले जैसी कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

    पुराने हिस्सों का पुनर्स्थापन और सुदृढ़ीकरण

    जिलाधिकारी ने बताया कि यह परियोजना पिछले एक वर्ष से चल रही है। इसके तहत घाट के कच्चे हिस्सों में नए निर्माण कार्य किए जा रहे हैं, जबकि पक्के हिस्सों का पुनर्स्थापन और सुदृढ़ीकरण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य घाट की पारंपरिक पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप सुविधाओं का विकास करना है।

    सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों पर प्रशासन की सफाई

    सतेंद्र कुमार ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो को लेकर स्पष्ट किया कि वे घाटों और सीढ़ियों पर बनी अलग-अलग कलाकृतियों से संबंधित हैं। कुछ वीडियो एआई के माध्यम से भ्रामक रूप से बनाए गए हैं। उन्होंने बताया कि घाट पर मौजूद सभी मूर्तियां और मंदिर संस्कृति विभाग के संरक्षण में सुरक्षित हैं और उन्हें पुनर्स्थापित किया जाएगा।

    प्रशासन का उद्देश्य

    जिलाधिकारी ने कहा कि सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों की पहचान की जा रही है और आवश्यकता पड़ने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का उद्देश्य स्पष्ट है कि मणिकर्णिका घाट की पवित्रता, सांस्कृतिक विरासत और श्रद्धालुओं की आस्था को किसी भी स्थिति में आघात न पहुंचे।

    मणिकर्णिका घाट पर यह विकास परियोजना पारंपरिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक सुविधाओं के साथ श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के लिए घाट को अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

  • सीवेज प्रदूषण पर NGT सख्त, MP-UP-राजस्थान से जवाब तलब, इंदौर में मौतें और भोपाल में 'ई-कोलाई' का खतरा

    सीवेज प्रदूषण पर NGT सख्त, MP-UP-राजस्थान से जवाब तलब, इंदौर में मौतें और भोपाल में 'ई-कोलाई' का खतरा


    नई दिल्ली। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की प्रधान पीठ ने नई दिल्ली में बुधवार को इंदौर, भोपाल और राजस्थान के शहरों में पेयजल में सीवेज की मिलावट से जुड़ी गंभीर समस्याओं पर स्वतः संज्ञान लिया। NGT ने मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। ट्रिब्यूनल ने इंदौर में गंदे पानी के कारण मौतों और भोपाल में पेयजल में ‘ई-कोलाई’ बैक्टीरिया मिलने के मामलों का हवाला दिया।
    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इंदौर में गंदे पानी के सेवन से मौतें हुई हैं, जबकि भोपाल के कुछ इलाकों में ट्यूबवेल से रिसाव के कारण पेयजल में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया। वहीं, राजस्थान के उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर और अजमेर जैसे शहरों में पुरानी और जर्जर पाइपलाइन प्रणाली के चलते सीवेज के पानी का पेयजल में मिलना जारी है। ग्रेटर नोएडा में भी सीवेज मिला पानी पीने से कई लोग बीमार पड़े, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।
    एनजीटी ने इन घटनाओं को गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला माना। पीठ ने संबंधित राज्य सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से स्पष्ट जवाब तलब किया है। कहा गया है कि यह मामला पर्यावरणीय कानूनों का पालन सुनिश्चित करने, जिम्मेदारी तय करने और नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार की रक्षा के लिए विचाराधीन रहेगा।

    इसके अलावा, NGT ने मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के मामलों को भी संज्ञान में लिया। रिपोर्ट के अनुसार, सड़क, रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और कोयला खदान परियोजनाओं के लिए 50 से 100 वर्ष पुराने लगभग 15 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं या काटे जाने का प्रस्ताव है। सिंगरौली, खंडवा, विदिशा, भोपाल और इंदौर में भारी संख्या में पेड़ों की कटाई से वायु गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

    पीठ ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य वन विभागों को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब दाखिल करें। अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 को होगी।

  • चूड़ा-दही भोज से दूर रहे तेजस्वी, तेजप्रताप का सियासी वार, शायद जयचंदों ने घेर रखा है

    चूड़ा-दही भोज से दूर रहे तेजस्वी, तेजप्रताप का सियासी वार, शायद जयचंदों ने घेर रखा है


    नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में यादव परिवार के भीतर चल रही खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। जनशक्ति जनता दल के अध्यक्ष तेजप्रताप यादव ने चूड़ा-दही भोज में तेजस्वी यादव के नहीं पहुंचने पर न सिर्फ नाराजगी जताई, बल्कि तीखा सियासी तंज भी कसा। तेजप्रताप ने कहा कि उन्होंने खुद 13 जनवरी को तेजस्वी यादव को भोज का निमंत्रण देने के लिए संपर्क किया था, लेकिन वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।
    इस पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, हो सकता है उन्हें जयचंदों ने घेर रखा हो।

    तेजप्रताप यादव ने साफ शब्दों में कहा कि उनके लिए सबसे बड़ी और संतोष की बात यह रही कि उनके पिता और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कहा, “पिता जी का आना और उनका आशीर्वाद मिलना ही मेरे लिए सबसे बड़ी जीत है। उससे ऊपर कुछ नहीं।” तेजप्रताप ने बताया कि चूड़ा-दही भोज में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों खेमों के कई बड़े नेता पहुंचे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी निमंत्रण भेजा गया था और कई दलों के नेताओं ने आकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

    इस मौके पर तेजप्रताप यादव ने बड़ा राजनीतिक दावा करते हुए कहा कि लालू यादव की मूल और असली पार्टी जनशक्ति जनता दल है। उन्होंने अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव को खुली सलाह देते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का विलय जनशक्ति जनता दल में कर देना चाहिए। तेजप्रताप का यह बयान बिहार की सियासत में हलचल पैदा करने वाला माना जा रहा है।

    तेजप्रताप यादव यहीं नहीं रुके। उन्होंने दावा किया कि उन्हें बीजेपी समेत कई राजनीतिक दलों से ऑफर मिल चुके हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि आगे किसके साथ जाना है, इसका फैसला वे खुद लेंगे। उन्होंने कहा, “जो बिहार के हित में काम करेगा, जनता की बात करेगा, जनशक्ति जनता दल उसी का साथ देगा।”

    पार्टी के भविष्य को लेकर तेजप्रताप यादव ने बड़े ऐलान करते हुए कहा कि जनशक्ति जनता दल आने वाले समय में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारेगी। इसके अलावा दिल्ली नगर निगम (MCD) चुनाव और बिहार में इस साल होने वाले विधान परिषद (MLC) चुनाव में भी पार्टी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरेगी।

    गौरतलब है कि आरजेडी से बाहर होने के बाद तेजप्रताप यादव ने जनशक्ति जनता दल का गठन किया था। उन्होंने इसी पार्टी के सिंबल पर महुआ सीट से बिहार विधानसभा 2025 का चुनाव भी लड़ा, हालांकि जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बावजूद तेजप्रताप अपने बयानों और सियासी गतिविधियों के जरिए लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि वे बिहार की राजनीति में किसी भी कीमत पर अपनी अलग पहचान और मजबूत भूमिका बनाए रखने के मूड में हैं।

  • संसदीय समिति के सामने जस्टिस वर्मा का पक्ष: कैश कांड में पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल

    संसदीय समिति के सामने जस्टिस वर्मा का पक्ष: कैश कांड में पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली। कैश कांड से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसदीय समिति को अपना लिखित जवाब सौंप दिया है। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए महाभियोग की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। जस्टिस वर्मा का कहना है कि यदि प्रशासनिक एजेंसियां घटनास्थल को सुरक्षित रखने में विफल रहीं, तो इसकी जिम्मेदारी उन पर डालना न्यायसंगत नहीं है।

    “घटनास्थल पर मैं सबसे पहले नहीं पहुंचा”

    सूत्रों के मुताबिक, जस्टिस वर्मा ने समिति को दिए जवाब में स्पष्ट किया कि वह घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले व्यक्ति नहीं थे। आग लगने जैसी गंभीर घटना में पुलिस और अन्य एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है कि वे तुरंत मौके को सील करें और सुरक्षा मानकों का पालन करें। उन्होंने कहा कि पुलिस ने न तो स्थल को सुरक्षित किया और न ही मानक प्रक्रिया का पालन किया, ऐसे में बाद की किसी भी चूक के लिए उन्हें दोषी ठहराना अनुचित है।

    पुलिस और फायर ब्रिगेड की भूमिका पर सवाल

    जस्टिस वर्मा ने अपने जवाब में यह भी कहा कि आग लगने के समय मौके पर पुलिस और फायर ब्रिगेड दोनों मौजूद थीं। इसके बावजूद घटनास्थल को सील नहीं किया गया और आवश्यक सुरक्षा उपाय नहीं अपनाए गए। उन्होंने यह भी दावा किया कि उस समय किसी भी तरह की नकदी की औपचारिक बरामदगी नहीं की गई थी, जबकि बाद में नकदी मिलने की बात कही जा रही है। उनके अनुसार, जब घटनास्थल पूरी तरह से प्रशासनिक एजेंसियों के नियंत्रण में था, तो उसकी सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी उन पर कैसे डाली जा सकती है।

    महाभियोग प्रक्रिया को दी चुनौती

    इन्हीं तर्कों के आधार पर जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ शुरू की गई महाभियोग प्रक्रिया और संसदीय समिति के गठन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में शीर्ष अदालत में सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। अब पूरे घटनाक्रम पर देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा है।

    क्या है कैश कांड की पूरी कहानी

    यह मामला मार्च 2025 में उस समय चर्चा में आया, जब दिल्ली के तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में आग लग गई। 14 मार्च 2025 को लगी इस आग को बुझाने पहुंची फायर ब्रिगेड और पुलिस टीम को वहां फर्श पर 500 रुपये के नोटों के जले और आंशिक रूप से जले बंडल दिखाई दिए थे। इसी घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी।

    घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जांच के लिए तीन जजों की इन-हाउस समिति गठित की और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया। इसके बाद जुलाई 2025 में 140 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया, जिस पर अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तीन सदस्यीय संसदीय समिति का गठन किया।

    अब जस्टिस यशवंत वर्मा के जवाब और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर इस पूरे मामले की दिशा तय होगी।