Category: National

  • कंगना रनौत ने बयान पर दी सफाई, बोलीं- अशोभनीय हरकतों का किया था विरोध, मीडिया पर लगाया बयान तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप

    कंगना रनौत ने बयान पर दी सफाई, बोलीं- अशोभनीय हरकतों का किया था विरोध, मीडिया पर लगाया बयान तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप

    नई दिल्ली । अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत के छात्र विरोध प्रदर्शन को लेकर दिए गए हालिया बयान पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। बढ़ते विवाद के बीच कंगना ने एक नया वीडियो जारी कर अपने बयान पर विस्तृत सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाला गया और उनके पूरे बयान को दिखाने के बजाय केवल चुनिंदा हिस्सों को प्रचारित किया गया। उनका कहना है कि उन्होंने किसी वर्ग विशेष को निशाना नहीं बनाया, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर अशोभनीय व्यवहार का विरोध किया था।

    कंगना ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किए गए वीडियो में कहा कि उन्होंने सड़क पर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की मौजूदगी में होने वाली अभद्र भाषा और अश्लील हरकतों को सामान्य मानने से इनकार किया था। उनके अनुसार ऐसे व्यवहार को सामाजिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती और समाज को इस तरह की प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ सामाजिक वातावरण बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

    अभिनेत्री ने आरोप लगाया कि उनके बयान के बाद मीडिया के एक वर्ग ने उन्हें लगातार निशाना बनाया है। उन्होंने कहा कि उनके सकारात्मक विचारों और अन्य मुद्दों पर दिए गए बयानों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि विवादित हिस्से को बार-बार प्रसारित किया जा रहा है। उनके मुताबिक टीआरपी, लाइक्स और व्यूज की होड़ में उनके पूरे संदेश को सामने नहीं रखा गया, जिससे लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी।

    कंगना ने यह भी कहा कि उन्होंने हाल के दिनों में देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों की सराहना की है और युवाओं, विशेष रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों तथा देश को आगे बढ़ाने वाली नई पीढ़ी की प्रशंसा भी की है। उनका दावा है कि इन सकारात्मक बयानों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया और केवल विवाद से जुड़े अंशों को प्रमुखता मिली।

    वीडियो में उन्होंने अपने आलोचकों की प्रतिक्रियाओं पर भी टिप्पणी की। कंगना ने कहा कि कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गलत व्याख्या कर रहे हैं। उनके अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा व्यवहार किया जाए जिससे दूसरे लोगों की भावनाएं, आस्था या सम्मान प्रभावित हों। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है।

    उन्होंने आगे कहा कि समाज में अनुशासन और शालीनता का पालन प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक यदि कोई व्यक्ति सामाजिक या पेशेवर जीवन में मर्यादाओं का पालन नहीं करता तो उसे इसके परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन का उद्देश्य स्वयं को बेहतर बनाना और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए, न कि ऐसे आचरण को बढ़ावा देना जिससे सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो।

    वीडियो के अंत में कंगना रनौत ने सभी देशवासियों को गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने लोगों से अपने गुरुओं के बताए मार्ग पर चलने, जीवन में अनुशासन अपनाने और निरंतर बेहतर इंसान बनने का संदेश दिया। उनके इस नए वीडियो के सामने आने के बाद भी उनके बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा जारी है, जबकि समर्थक और आलोचक दोनों अपने-अपने पक्ष पर कायम दिखाई दे रहे हैं।

  • लोकसभा में राहुल गांधी के संबोधन पर हंगामा, किरेन रिजिजू ने असंसदीय भाषा के इस्तेमाल पर जताई कड़ी आपत्ति

    लोकसभा में राहुल गांधी के संबोधन पर हंगामा, किरेन रिजिजू ने असंसदीय भाषा के इस्तेमाल पर जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । लोकसभा में एंटी पेपर लीक विषय पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संबोधन पर बुधवार को सदन में जोरदार हंगामा देखने को मिला। भाषण के दौरान इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों पर सत्तापक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सदन का माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष ने अपने संबोधन में असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, जो संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुरूप नहीं है।

    राहुल गांधी अपने संबोधन के दौरान एंटी पेपर लीक से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिन पर सत्तापक्ष के सांसदों ने आपत्ति दर्ज कराई। विरोध बढ़ने के साथ ही सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया और कई सदस्य अपनी सीटों से खड़े होकर विरोध जताने लगे।

    स्थिति को देखते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि संसदीय नियमों के अनुसार किसी भी सदस्य को मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उनका कहना था कि सरकार विपक्ष की बात सुनने के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन चर्चा के दौरान असंसदीय शब्दों का प्रयोग स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष से आग्रह किया कि वे अपनी बात पूरी मजबूती से रखें, लेकिन संसदीय परंपराओं का पालन भी करें। उन्होंने कहा कि नियम सरकार ने नहीं बनाए हैं, बल्कि संसद की स्थापित प्रक्रियाओं के तहत सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। उनके अनुसार किसी भी सदस्य को ऐसे शब्दों से बचना चाहिए, जिनसे सदन की कार्यवाही प्रभावित हो।

    इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि राहुल गांधी द्वारा इस्तेमाल किए गए कथित असंसदीय शब्दों को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया जाए। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने स्थिति पर संज्ञान लिया और सदन में व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। हंगामे के शांत होने के बाद अध्यक्ष ने राहुल गांधी को अपना भाषण आगे जारी रखने का अवसर भी दिया।

    चर्चा के दौरान किरेन रिजिजू ने यह भी कहा कि पहले भी कई अवसरों पर विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के संबोधन के दौरान व्यवधान उत्पन्न किया गया था। उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के समय हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद में स्वस्थ और सार्थक बहस लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को संसदीय मर्यादाओं का सम्मान करना आवश्यक है।

    दूसरी ओर, विपक्ष एंटी पेपर लीक के मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरता रहा और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा युवाओं के हितों से जुड़े सवाल उठाता रहा। इस विषय पर सदन में पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

    लोकसभा की कार्यवाही के दौरान हुए इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संसदीय भाषा, सदन की गरिमा और बहस के स्तर को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अब आगे की कार्यवाही में अध्यक्ष के निर्णय और संसदीय नियमों के तहत उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • संत रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए चलाए जाएंगे राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम

    संत रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए चलाए जाएंगे राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम

    नई दिल्ली । संत गुरु रविदास महाराज के समता, सेवा और सामाजिक न्याय के संदेश को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने एक राष्ट्रव्यापी पहल की शुरुआत की है। जमशेदपुर में एक औपचारिक घोषणा के दौरान इस ‘समरसता संकल्प अभियान’ की विस्तृत रूपरेखा साझा की गई। यह व्यापक अभियान आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलेगा, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य, जिला, मंडल और ग्राम स्तर तक विविध सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

    इस अभियान का मुख्य ध्येय संत रविदास द्वारा प्रतिपादित ‘बेगमपुरा’ के उस दर्शन को साकार करना है, जो शोषण और भेदभाव से मुक्त समाज की परिकल्पना पर आधारित है। संगठन का मानना है कि विकसित भारत के निर्माण में समाज के सभी वर्गों की समान सहभागिता अत्यंत आवश्यक है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समाज के प्रत्येक स्तर पर सद्भाव और समरसता का वातावरण तैयार करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

    अभियान के तहत कई बड़े कार्यक्रमों की योजना तैयार की गई है। इसके शुरुआती चरण में शाम को दीप महोत्सव का आयोजन किया जाएगा, जिसके साथ ही वाराणसी स्थित पवित्र स्थल की पावन मिट्टी से भरे कलश देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में भेजे जाएंगे। इसके अलावा पंजाब के जालंधर से वाराणसी तक एक भव्य समरसता यात्रा भी निकाली जाएगी। एक महीने तक चलने वाली इस यात्रा के माध्यम से आम जनमानस को संत रविदास के विचारों से जोड़ने का प्रयास होगा।

    सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करने के लिए पूरे अभियान के दौरान संत संपर्क, छात्रावास संपर्क, समरसता संवाद, भजन-कीर्तन और विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों की श्रृंखला चलेगी। इसके तहत समाज के प्रबुद्ध जनों और संतों से सीधा संवाद स्थापित किया जाएगा। स्थानीय स्तर पर इन सभी गतिविधियों के सुचारू संचालन और समन्वय के लिए जिला और मंडल स्तर पर विशेष आयोजन समितियों का गठन भी शुरू कर दिया गया है।

  • नीट धांधली के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई न करने का पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला

    नीट धांधली के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई न करने का पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । नीट परीक्षा में कथित धांधली और अनियमितताओं को लेकर देश भर में जारी उथल-पुथल के बीच राज्य सरकारों का रुख बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि आंदोलन में भाग लेने वाले सामान्य और निर्दोष छात्रों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कठोर प्रशासनिक कदम नहीं उठाया जाएगा। हालांकि राज्य के गृह विभाग की ओर से जारी आधिकारिक रुख में यह भी साफ कर दिया गया है कि आपराधिक इतिहास रखने वाले या हिंसा में संलिप्त लोगों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

    राज्य सरकार द्वारा जारी औपचारिक बयान में स्पष्ट किया गया है कि नीट परीक्षा से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और छात्र असंतोष पर काफी गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया है। गहन समीक्षा के बाद प्रशासन ने यह तय किया है कि जो युवा या विद्यार्थी केवल अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरे थे, उनके खिलाफ कोई नई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी और न ही उन्हें बेवजह परेशान किया जाएगा। लेकिन इस सुरक्षा का दायरा केवल निर्दोष विद्यार्थियों तक ही सीमित रहेगा और पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले तत्वों पर कानून का शिकंजा कसता रहेगा।

    प्रशासनिक स्तर पर यह कदम सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दिशानिर्देशों और न्यायिक टिप्पणियों के अनुरूप उठाया गया है। शीर्ष अदालत ने भी हाल ही में विभिन्न याचिकाओं पर विचार करते हुए साफ कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए, जबकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर जांच एजेंसियां नियमानुसार कार्रवाई जारी रख सकती हैं। इसी के तहत राज्य के गृह विभाग ने अपने पुलिस बलों को निर्देश दिए हैं कि वे पुराने दर्ज मामलों की समीक्षा करें और छात्रों की पहचान सुनिश्चित करके ही आगे की प्रक्रिया बढ़ाएं।

    आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कोलकाता और राज्य के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों और अव्यवस्था के सिलसिले में पुलिस में मामला दर्ज किया गया था। इस दर्ज मुकदमे की कड़ी में जांच एजेंसियों ने व्यापक छानबीन की है और अब तक कई संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर उन लोगों की पहचान की जा रही है जिन्होंने प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़काने या पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों पर हमला करने का प्रयास किया था।

    उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल से पहले पूर्वोत्तर राज्य असम और पड़ोसी राज्य बिहार की सरकारों ने भी इसी तरह का उदार रुख अपनाया था। दोनों राज्यों ने घोषणा की थी कि परीक्षा में धांधली के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों और आम नागरिकों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। राज्य सरकारों का मानना है कि छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत किए गए प्रदर्शनों पर दंडात्मक रुख अपनाना उचित नहीं है, बशर्ते उसमें किसी असामाजिक तत्व की साजिश शामिल न हो।

    देशव्यापी स्तर पर नीट परीक्षा को लेकर मचा बवाल जुलाई के अंतिम सप्ताह में केंद्रीय स्तर पर हुए बड़े घटनाक्रमों के बाद थमता नजर आया था। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद त्यागने के बाद विभिन्न संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ सरकार के दो दौर की सकारात्मक बातचीत हुई थी। उस वार्ता के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों ने यह सहमति व्यक्त की थी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को निरस्त किया जाएगा, पुलिसिया उत्पीड़न रोका जाएगा और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त कानून लाया जाएगा। अब राज्य सरकारें उसी समझौते और न्यायिक आदेशों का क्रियान्वयन कर रही हैं।

  • सरकारी अधिकारियों द्वारा वाहनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने लागू की 'वन ऑफिसर, वन कार' नीति

    सरकारी अधिकारियों द्वारा वाहनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने लागू की 'वन ऑफिसर, वन कार' नीति

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने अपने मंत्रालयों और विभिन्न विभागों में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सरकारी वाहनों के बेजा इस्तेमाल को रोकने के लिए नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत ‘वन ऑफिसर, वन कार’ यानी एक अधिकारी को केवल एक ही सरकारी वाहन आवंटित करने की नीति को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए गए हैं। इस नए कदम से सरकारी तंत्र में अतिरिक्त गाड़ियों के अनधिकृत उपयोग पर पूरी तरह विराम लगने की उम्मीद है।

    नवीनतम सर्कुलर के अनुसार, सरकारी वाहन की पात्रता रखने वाले किसी भी अधिकारी को एक से अधिक कार आवंटित नहीं की जाएगी। यदि किसी अफसर को अपने मूल पद के साथ किसी अन्य मंत्रालय, विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या स्वायत्त निकाय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा जाता है, तब भी वह केवल एक ही आधिकारिक वाहन का उपयोग करने का हकदार होगा। अतिरिक्त दायित्व के आधार पर दूसरी गाड़ी हासिल करने की व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केंद्र के अधीन कार्यरत अधिकारी सार्वजनिक उपक्रमों या स्वायत्त संस्थाओं के बेड़े में शामिल वाहनों को अपने दैनिक या नियमित इस्तेमाल के लिए अपने पास नहीं रख सकेंगे। इस तरह की कार्यप्रणाली पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी गई है। हालांकि, अंतर-राज्यीय या विभागीय आधिकारिक दौरों के दौरान आवश्यकता पड़ने पर अधिकारियों को इन संस्थाओं के वाहनों का उपयोग करने की विशेष छूट दी जाएगी, ताकि शासकीय कार्यों में कोई बाधा न आए।

    नए परिपत्र में सभी मंत्रालयों और विभागाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि इस्तेमाल में न आ रहे या अधिशेष वाहनों को तुरंत सुरक्षित कस्टडी में लिया जाए। यह निर्देश पूर्व में जारी उन नियमों को और मजबूती प्रदान करता है, जिनमें अधिकारियों द्वारा तय शुल्क देकर सीमित दायरे में सरकारी गाड़ी के निजी उपयोग की अनुमति दी गई थी। सरकार के इस कड़े रुख से जहां एक तरफ वाहनों के दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अनावश्यक वित्तीय बोझ में भी बड़ी कमी आएगी।

  • मेकेदातु डैम विवाद: राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री के बयान से भड़के सीएम विजय, पीएम मोदी को पत्र लिख की सीधे हस्तक्षेप की मांग

    मेकेदातु डैम विवाद: राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री के बयान से भड़के सीएम विजय, पीएम मोदी को पत्र लिख की सीधे हस्तक्षेप की मांग


    नई दिल्ली ।
    कावेरी नदी पर बनने वाले प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच का अंतर-राज्यीय जल विवाद एक बार फिर गहरा गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग की है। मुख्यमंत्री ने आग्रह किया है कि जब तक यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और उच्चतम न्यायालय के फैसलों के पूरी तरह अनुरूप न हो, तब तक इसे किसी भी प्रकार की वैधानिक या प्रशासनिक स्वीकृति न दी जाए।

    तमिलनाडु सरकार की यह तीखी प्रतिक्रिया राज्यसभा में केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री द्वारा दिए गए एक हालिया बयान के बाद सामने आई है। संसद में एक सवाल के जवाब में मंत्री ने कहा था कि सर्वोच्च अदालत के फैसले में ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि नदी पर कोई ढांचा खड़ा करने से पहले ऊपरी राज्य को निचले तटीय राज्यों की पूर्व सहमति लेना अनिवार्य है। मुख्यमंत्री विजय ने केंद्रीय मंत्री के इस तर्क को बेहद निराशाजनक और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग उठाई है।

    प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कानूनी और तकनीकी पहलुओं का हवाला देते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने पूर्व के फैसलों का विशेष उल्लेख किया है। उन्होंने अलमट्टी डैम मामले में शीर्ष अदालत की संविधान पीठ के फैसले का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में निचले राज्यों की सहमति और केंद्र की मंजूरी पूरी तरह अनिवार्य है। इसके अलावा न्यायाधिकरण की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ऊपरी राज्य बिना आपसी सहमति के ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकता जिससे निचले राज्यों के तय पानी के शेड्यूल पर विपरीत प्रभाव पड़े।

    मुख्यमंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि मेकेदातु परियोजना केवल एक साधारण इंजीनियरिंग प्रस्ताव भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के लाखों किसानों की आजीविका और जीवनरेखा से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। कावेरी नदी दक्षिण भारत के बड़े भूभाग के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। यही वजह है कि केंद्रीय जल आयोग ने पूर्व में विस्तृत रिपोर्ट को न्यायाधिकरण के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बनाने के लिए वापस भेज दिया था। तमिलनाडु सरकार ने केंद्र से मांग की है कि निचले राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही आगे कोई कदम उठाया जाए।

  • सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए सीजेपी ने दिया दो दिनों में दूसरा अल्टीमेटम

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए सीजेपी ने दिया दो दिनों में दूसरा अल्टीमेटम


    नई दिल्ली ।
    देश में पेपर लीक मामले को लेकर पिछले दिनों चले बड़े जनांदोलन के बाद एक बार फिर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की आहट तेज हो गई है। जंतर-मंतर से संसद तक चले प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने केंद्र सरकार को दो दिनों के भीतर दूसरी बार कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। संगठन का साफ कहना है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज पुलिस मुकदमे तुरंत वापस नहीं लिए गए, तो वे एक बार फिर देशव्यापी आंदोलन शुरू करने के लिए मजबूर होंगे।

    इस पूरे विवाद की ताजा वजह सुप्रीम कोर्ट में हुई हालिया सुनवाई बनी है। शीर्ष अदालत की चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुए पुलिस बल प्रयोग से जुड़ी याचिकाओं पर विचार करते हुए पुलिस को मौजूदा प्राथमिकियों की जांच जारी रखने की इजाजत दी है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन युवाओं का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिन्होंने केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी और हिरासत में लिए गए ऐसे निर्दोष लोगों को रिहा किया जाए।

    अदालत के इस रुख के सामने आते ही सीजेपी ने केंद्र सरकार पर अपनी सहमति और लिखित आश्वासनों से पीछे हटने का बड़ा आरोप लगाया है। संगठन के प्रतिनिधियों का कहना है कि पच्चीस जुलाई को सरकार के साथ हुई वार्ता के दौरान यह लिखित भरोसा दिया गया था कि सभी प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामले पूरी तरह रद्द किए जाएंगे और किसी भी छात्र के खिलाफ आगे कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। इसी ठोस आश्वासन के आधार पर ही राष्ट्रव्यापी आंदोलन को स्थगित करने का फैसला लिया गया था।

    संगठन का आरोप है कि अदालत में सुनवाई के दौरान सरकारी तंत्र ने प्राथमिकियों को बनाए रखने का कड़ा विरोध नहीं किया, जिससे अब भाजपा शासित राज्यों की पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर शिकंजा कसने का रास्ता मिल गया है। अगर सरकार की मंशा साफ होती, तो वह अपने प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर सकती थी। सरकार का यह ढुलमुल रवैया लाखों युवाओं के भविष्य और सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

    उल्लेखनीय है कि जून महीने में नई दिल्ली में शुरू हुआ यह आंदोलन जुलाई के मध्य तक बेहद उग्र रूप ले चुका था। संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई भारी झड़प में कई छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए थे। स्थिति बिगड़ती देख सरकार ने दो दौर की द्विपक्षीय बातचीत की थी, जिसके बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके अलावा मृतक छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अभयदान देने का समझौता हुआ था। अब उस समझौते के टूटने की आशंका ने एक बार फिर देश के युवाओं और छात्रों को उद्वेलित कर दिया है।

  • ममता और भक्ति का अद्भुत संगम 90 वर्षीय सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पदयात्रा कर रहीं काजल चौधरी

    ममता और भक्ति का अद्भुत संगम 90 वर्षीय सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पदयात्रा कर रहीं काजल चौधरी


    नई दिल्ली । सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और कांवड़ यात्रा के लिए विशेष माना जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं और भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस बार भी श्रद्धालुओं का सैलाब सड़कों पर दिखाई दे रहा है लेकिन इन्हीं हजारों कांवड़ियों के बीच एक ऐसी कांवड़ लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गई है जिसने सेवा समर्पण और पारिवारिक संस्कार की नई मिसाल पेश कर दी है। दिल्ली के शाहदरा की रहने वाली काजल चौधरी अपनी 90 वर्षीय सास चंद्रिदेवी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पैदल यात्रा कर रही हैं। यह दृश्य जिसने भी देखा उसकी आंखें नम हो गईं और हर किसी ने उनकी सराहना की।

    काजल चौधरी पेशे से लोक गायिका हैं और अपने भजन तथा देहाती रागनी के कारण सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने इस वर्ष अपनी सास को कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा शुरू की है। खास बात यह है कि उनके साथ 71 किलो गंगाजल भी है जिसे वह भगवान शिव को अर्पित करेंगी। पूरी यात्रा के दौरान उनका परिवार भी उनके साथ चल रहा है और सभी मिलकर सेवा और श्रद्धा का संदेश दे रहे हैं।

    यह पहली बार नहीं है जब काजल चौधरी ने ऐसा किया हो। पिछले वर्ष भी उन्होंने अपनी सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक की यात्रा पूरी की थी। इसके अलावा इसी वर्ष उन्होंने अपनी सास के साथ 84 कोस की परिक्रमा भी की थी। लगातार दूसरी बार इस तरह की यात्रा कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बुजुर्गों की सेवा केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि सबसे बड़ा धर्म भी है।

    काजल चौधरी का कहना है कि माता पिता और सास ससुर की सेवा से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता। उनका मानना है कि जब तक बुजुर्ग हमारे साथ हैं तब तक उनकी हर इच्छा का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने लोगों से भी अपील की कि अपने माता पिता और बुजुर्गों की सेवा पूरे मन से करें ताकि उनका आशीर्वाद जीवनभर साथ बना रहे।

    इस यात्रा के दौरान काजल चौधरी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी भावुक अपील की है। उन्होंने बताया कि उनकी सास की इच्छा मुख्यमंत्री से मिलने की है और वे उन्हें अपने हाथों से एक भेंट देना चाहती हैं। काजल ने उम्मीद जताई कि उनकी सास की यह इच्छा भी जल्द पूरी होगी।

    मुजफ्फरनगर से गुजर रही यह अनोखी कांवड़ अब लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। रास्ते में जहां भी यह कांवड़ पहुंचती है लोग रुककर काजल और उनकी सास का अभिवादन करते हैं। कई श्रद्धालु उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं तो कई लोग उन्हें आधुनिक समय का श्रवण कुमार कहकर सम्मान दे रहे हैं। हालांकि काजल कहती हैं कि उन्होंने केवल अपना पारिवारिक कर्तव्य निभाया है और हर बेटे बहू को अपने बुजुर्गों के प्रति यही भावना रखनी चाहिए।

    आज जब भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवारों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं तब काजल चौधरी की यह यात्रा समाज को यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा करने से नहीं बल्कि अपने बुजुर्गों की सेवा और सम्मान करने से भी पूरी होती है। यही संस्कार भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान हैं और यही भाव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं।

  • राम मंदिर चढ़ावा मामला: इस्तीफे में चंपत राय का बड़ा खुलासा, 81 लाख रुपये लौटाने की बात स्वीकारी

    राम मंदिर चढ़ावा मामला: इस्तीफे में चंपत राय का बड़ा खुलासा, 81 लाख रुपये लौटाने की बात स्वीकारी


    अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के संयुक्त इस्तीफा पत्र से चढ़ावा चोरी मामले में अहम जानकारी सामने आई है। पहली बार सार्वजनिक हुए इस पत्र में दोनों ने स्वीकार किया है कि चोरी की घटना के बाद संबंधित लोगों से 81 लाख रुपये ट्रस्ट को वापस मिले थे। साथ ही, उन्होंने एसआईटी जांच की सिफारिश करने और निष्पक्ष जांच पूरी होने तक ट्रस्ट के कामकाज से स्वयं को अलग करने का भी उल्लेख किया है।

    इस्तीफा पत्र के मुताबिक, 8 जून से दानपात्र की राशि को लेकर मीडिया में लगातार खबरें प्रकाशित होने लगीं, जिससे श्रद्धालुओं में भ्रम और असंतोष की स्थिति पैदा हो गई। पत्र में कहा गया है कि 4 जून की रात दानराशि की गणना के दौरान कुछ युवकों द्वारा कथित चोरी किए जाने की जानकारी एक ट्रस्टी को मिली थी।

    सीसीटीवी फुटेज से हुई पहचान
    पत्र के अनुसार, 5 जून की सुबह सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई, जिसमें कुछ युवकों की पहचान हुई। ट्रस्ट ने तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बजाय पहले संबंधित युवकों से पूछताछ करने का फैसला किया। इस्तीफा पत्र में दावा किया गया है कि 5 जून की रात से 8 जून के बीच संबंधित युवकों और उनके परिजनों ने कुल 81 लाख रुपये ट्रस्ट को लौटा दिए। साथ ही उन्होंने लिखित रूप में चोरी स्वीकार करते हुए स्वीकृति पत्र भी सौंपे।

    विवाद बढ़ने पर कराई गई एसआईटी जांच
    चंपत राय और अनिल मिश्रा ने पत्र में बताया कि जब यह मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बनने लगा, तब ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से विशेष जांच दल (SIT) गठित कर निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके और संबंधित सभी लोगों की प्रतिष्ठा बनी रहे। पत्र के अनुसार, राज्य सरकार ने ट्रस्ट के अनुरोध को स्वीकार करते हुए 15 जून से एसआईटी जांच शुरू करा दी।

    जांच पूरी होने तक खुद को किया अलग
    इस्तीफे के अंतिम हिस्से में दोनों पदाधिकारियों ने लिखा कि जब तक पूरे मामले में सत्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक वे ट्रस्ट के सभी दायित्वों से स्वयं को अलग रखना उचित समझते हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपना त्यागपत्र सौंपा, जिसे ट्रस्ट की 6 जुलाई को आयोजित बैठक में स्वीकार कर लिया गया।

  • विकसित भारत के लिए मंत्रालयों में बेहतर तालमेल, स्वदेशी तकनीक और साइबर सुरक्षा पर जोर: प्रधानमंत्री मोदी

    विकसित भारत के लिए मंत्रालयों में बेहतर तालमेल, स्वदेशी तकनीक और साइबर सुरक्षा पर जोर: प्रधानमंत्री मोदी


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को केंद्र सरकार के सचिवों के साथ दूसरी उच्चस्तरीय बैठक में विकसित भारत के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने के लिए मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल, महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्वदेशी तकनीक के विकास, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, साइबर सुरक्षा को मजबूत करने और रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़ी गलत सूचनाओं का प्रभावी जवाब देने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार को हमेशा युवा सोच, गतिशील और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप काम करना चाहिए।

    प्रधानमंत्री ने अपने आवास पर बैठक में वित्त एवं अर्थव्यवस्था, वाणिज्य एवं उद्योग तथा प्रौद्योगिकी से जुड़े मंत्रालयों के कामकाज और विकसित भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा की।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि सभी मंत्रालयों और विभागों को टीम भावना के साथ काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विभागों के बीच बेहतर तालमेल होगा तो योजनाओं का लाभ लोगों तक तेजी और प्रभावी ढंग से पहुंचेगा।

    उन्होंने कहा कि सरकार की हर नीति और फैसला आम नागरिक को ध्यान में रखकर होना चाहिए। लोगों का हित और उनकी अपेक्षाएं ही शासन का आधार होना चाहिए।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देना भी जरूरी है। उन्होंने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में देश की अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।

    उन्होंने कहा कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और लोगों के हित के लिए जरूरी है। इसके लिए नवाचार, नए ऊर्जा स्रोतों और क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि अच्छी व्यवस्था के लिए समय-समय पर सुधार जरूरी हैं। कार्यप्रणाली, कामकाज की संस्कृति और संस्थागत क्षमता में लगातार सुधार किया जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर सुरक्षा को भी मजबूत करना होगा। उन्होंने युवाओं, स्टार्टअप और नवाचार करने वाले उद्यमियों को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान किया।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की बड़ी पहलों के बारे में सही जानकारी लोगों तक समय पर पहुंचनी चाहिए, ताकि गलत सूचनाओं और अफवाहों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।

    उन्होंने कहा कि भविष्य के उद्योगों की जरूरतों के अनुसार उद्योग जगत के सहयोग से नए शैक्षणिक पाठ्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को हमेशा नई सोच के साथ काम करना चाहिए और बदलती चुनौतियों के अनुसार खुद को लगातार तैयार रखना चाहिए।

    बैठक में विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों ने अपने-अपने क्षेत्रों की प्रगति, प्राथमिकताओं, नई संभावनाओं और कामकाज में आने वाली चुनौतियों पर अपने विचार रखे। बैठक में कैबिनेट सचिव, विभिन्न मंत्रालयों के सचिव, प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।

    बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि बैठक में वित्त एवं अर्थव्यवस्था, वाणिज्य एवं उद्योग तथा प्रौद्योगिकी जैसे अहम क्षेत्रों पर चर्चा हुई। उन्होंने नागरिक-केंद्रित शासन, बेहतर बुनियादी ढांचे, स्वदेशी तकनीक के विकास और युवाओं की अधिक भागीदारी पर जोर देने की बात कही।