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  • पीएम मोदी के जन्मदिन पर अन्नपूर्णा दिवस, बंगाल में महिलाओं के खातों में पहुंच रही 3000 रुपये की वित्तीय सहायता

    पीएम मोदी के जन्मदिन पर अन्नपूर्णा दिवस, बंगाल में महिलाओं के खातों में पहुंच रही 3000 रुपये की वित्तीय सहायता

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर अन्नपूर्णा दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर अन्नपूर्णा योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं के बैंक खातों में 3000 रुपये की वित्तीय सहायता भेजी जा रही है। इस महीने करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को योजना का लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर पश्चिम बंगाल में इस दिन को अन्नपूर्णा दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। योजना के तहत लाभार्थी महिलाओं को सीधे उनके बैंक खातों में राशि भेजी जा रही है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की माताओं और बहनों के प्रति अपने लगाव का भी उल्लेख किया।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें हमेशा पश्चिम बंगाल की माताओं और बहनों से बहुत प्यार मिला है। उन्होंने विश्वकर्मा पूजा की शुभकामनाएं देते हुए अन्नपूर्णा योजना का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस योजना के जरिए बंगाल की महिलाओं को नई ताकत मिली है। उन्होंने योजना का लाभ उठाने वाली प्रत्येक महिला को बधाई भी दी।

    प्रधानमंत्री ने बंगाल में हुए राजनीतिक बदलाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस साल 4 मई को बंगाल ने बदलाव का एक नया रास्ता चुना और उन्हें पता है कि इस बदलाव में बंगाल की माताओं और बहनों ने सबसे अहम भूमिका निभाई।

    अन्नपूर्णा योजना के तहत सितंबर महीने में करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को सीधे उनके बैंक खातों में 3000 रुपये की राशि मिलने की जानकारी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से दी गई है। इस योजना के लाभार्थियों की संख्या पिछले कुछ महीनों के दौरान बढ़ी है।

    जानकारी के अनुसार जून महीने में अन्नपूर्णा योजना के तहत 28 लाख महिलाओं को राशि मिली थी। इसके बाद जुलाई में लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 1.19 करोड़ हो गई। सितंबर महीने में करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को सहायता पहुंचाने की बात कही गई है।

    इस भुगतान की खास बात यह बताई गई है कि राशि सीधे महिलाओं के बैंक खातों में भेजी जा रही है। इसके साथ ही किसी तरह के बिचौलिये या कट-मनी की व्यवस्था नहीं होने की बात भी कही गई है। योजना के माध्यम से पात्र महिलाओं तक वित्तीय सहायता सीधे पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

    प्रधानमंत्री के जन्मदिन के मौके पर राज्य में अन्नपूर्णा दिवस मनाए जाने के साथ महिलाओं के खातों में सहायता राशि भेजी जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी को देशभर से जन्मदिन की शुभकामनाएं भी दी जा रही हैं।

    अन्नपूर्णा योजना से जुड़ी इस पहल के तहत सितंबर महीने की राशि बड़ी संख्या में महिलाओं तक पहुंचाई जा रही है। 1.58 करोड़ लाभार्थियों का आंकड़ा जून और जुलाई की तुलना में अधिक है। इस तरह 17 सितंबर का दिन योजना के लाभार्थियों के लिए वित्तीय सहायता मिलने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

    पश्चिम बंगाल में अन्नपूर्णा दिवस के रूप में मनाए जा रहे इस दिन के दौरान योजना के लाभार्थियों को 3000 रुपये की राशि सीधे बैंक खातों में भेजने की प्रक्रिया जारी है। योजना के तहत लाभ पाने वाली महिलाओं को इस वित्तीय सहायता का लाभ मिल रहा है।

  • यूपी में मिशन-2027 से पहले गोरखपुर पर भाजपा का फोकस, तावड़े परखेंगे संगठन की जमीनी ताकत

    यूपी में मिशन-2027 से पहले गोरखपुर पर भाजपा का फोकस, तावड़े परखेंगे संगठन की जमीनी ताकत

    गोरखपुर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच भाजपा ने गोरखपुर क्षेत्र में संगठन को नए सिरे से कसने की कवायद शुरू कर दी है। प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े 17 और 18 सितंबर को गोरखपुर क्षेत्र के दौरे पर रहेंगे। संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र की 62 विधानसभा सीटों में पार्टी की जमीनी स्थिति के साथ बदलते राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों का भी फीडबैक लिया जाएगा। तावड़े विधायकों और संभावित प्रत्याशियों की स्थिति, संगठन की सक्रियता और सहयोगी दलों के प्रभाव से जुड़े पहलुओं की भी जानकारी जुटाएंगे।

    2024 के प्रदर्शन के बाद संगठन पर फोकस
    भाजपा के लिए तावड़े का यह दौरा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में कमजोर रहा था। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को दोबारा सक्रिय और मजबूत करने पर जोर है।

    प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने के बाद तावड़े का यह पहला गोरखपुर क्षेत्र दौरा है। संगठनात्मक नजरिए से इसे भाजपा के लिए अहम क्षेत्र माना जाता है। इसकी एक वजह यह भी है कि भाजपा के सहयोगी दल निषाद पार्टी, अपना दल और सुभासपा का यहां खासा प्रभाव है। पिछले चुनाव में इन दलों के प्रत्याशी भी जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।

    सहयोगी दलों की दावेदारी भी अहम
    2027 के चुनाव में सहयोगी दल अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में तावड़े के दो दिन के प्रवास में भाजपा की तैयारियों के साथ सहयोगी दलों की स्थिति और उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों का भी फीडबैक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीटों के तालमेल और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर संगठन स्तर पर जानकारी जुटाई जाएगी।

    इस बार पार्टी में महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से भी टिकट की दावेदारी सामने आ रही है। वहीं जेनजी आंदोलन के बाद युवाओं की भूमिका और उनकी राजनीतिक सक्रियता भी चर्चा में है। संगठन के हालिया विस्तार में इसका असर देखने को मिला है। पार्टी इन तमाम बदलावों को ध्यान में रखते हुए आगामी चुनाव की रणनीति तैयार करने में जुटी है।

    तावड़े के दौरे में केवल संगठन की रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय विधायकों और संभावित प्रत्याशियों के बारे में जमीनी फीडबैक को भी अहम माना जा रहा है। यही वजह है कि उनके दौरे को लेकर पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ी है।

    2022 में 62 में से 42 सीटें जीती थीं भाजपा
    संगठनात्मक दृष्टि से गोरखपुर क्षेत्र में कुल 62 विधानसभा सीटें आती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इनमें से 42 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गोरखपुर मंडल में पार्टी की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत रही। मंडल की 28 सीटों में से 27 पर भाजपा और उसके सहयोगियों को जीत मिली थी। इसके मुकाबले बस्ती मंडल की 13 विधानसभा सीटों में भाजपा को छह सीटों पर जीत मिली थी। आजमगढ़ मंडल की 21 सीटों में पार्टी के पास केवल तीन सीटें हैं। इनमें दो बलिया और एक मऊ की सीट शामिल है।

    लोकसभा चुनाव में भी क्षेत्रवार तस्वीर अलग रही
    2024 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर-बस्ती मंडल की नौ लोकसभा सीटों में भाजपा ने छह पर जीत दर्ज की थी। वहीं आजमगढ़ मंडल की आजमगढ़ और लालगंज दोनों सीटों पर भाजपा को जीत नहीं मिली। दोनों सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में गई थीं। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए इस क्षेत्र में संगठनात्मक स्थिति और चुनावी समीकरणों को नए सिरे से परखने का मौका भी माना जा रहा है।

    सहयोगियों की राजनीतिक नजदीकी से बढ़ी चिंता
    भाजपा के लिए अपना दल, निषाद पार्टी और अन्य सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे तथा स्थानीय समीकरणों का तालमेल महत्वपूर्ण रहेगा। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी की ओर से सहयोगी दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिशें भी भाजपा के लिए रणनीतिक चुनौती का विषय हो सकती हैं।

    पिछले दिनों निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के घर पहुंचे थे। दोनों नेताओं की इस मुलाकात के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। ऐसे में तावड़े के दौरे के दौरान संगठन के साथ सहयोगी दलों से जुड़े समीकरणों पर भी भाजपा की नजर रहने की संभावना है।

  • मणिपुर हिंसा के बाद राहत कैंपों में असामान्य मौतों की जांच पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, FIR और सुरक्षा पर जोर

    मणिपुर हिंसा के बाद राहत कैंपों में असामान्य मौतों की जांच पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, FIR और सुरक्षा पर जोर

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसा के दौरान विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए राहत कैंपों में हुई मौतों के मामले पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को इन मौतों की जांच, आपराधिक कार्रवाई और राहत कैंपों में रह रहे लोगों की सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदमों की जानकारी हलफनामे के माध्यम से देने का निर्देश दिया है।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान मणिपुर सरकार से कई सवाल किए। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने जस्टिस गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली कमेटी की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर राज्य सरकार से पूछा कि सामने आए मामलों पर अब तक कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण यानी MSLSA को भी मामले पर अलग स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि राहत कैंपों में हुई असामान्य मौतों के मामलों में तेजी से एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। इसके साथ ही विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी सामने रखनी होगी।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश जस्टिस गीता मित्तल कमेटी और एक आईएएस अधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद आए। इन रिपोर्टों में मणिपुर के राहत कैंपों में 30 से अधिक मौतों का उल्लेख किया गया था। इनमें एक मौत कथित यौन उत्पीड़न के बाद होने की बात भी सामने आई थी।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने राहत कैंपों में हुई कुल 34 मौतों में से केवल 20 मामलों में पोस्टमार्टम कराए जाने पर भी सवाल उठाया। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि सभी मामलों में पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया। मौतों की परिस्थितियों और उनके कारणों की जांच को लेकर भी राज्य से जवाब मांगा गया।

    पीठ ने राहत कैंपों में रहने वाले विस्थापित लोगों की असामान्य मौतों के बाद दिए गए मुआवजे पर भी सवाल उठाया। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि ऐसे मामलों में प्रभावित परिवारों को केवल 20 से 30 हजार रुपये का मुआवजा क्यों दिया गया। इस मुद्दे पर भी राज्य को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

    अदालत ने यह भी कहा कि राहत कैंपों में रहने वाले विस्थापित लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। असामान्य मौतों के मामलों में कानूनी कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। MSLSA को भी अपनी रिपोर्ट के जरिए संबंधित मामलों में की गई कार्रवाई और स्थिति की जानकारी देने को कहा गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में वर्ष 2023 की हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर भी उम्मीद जताई कि केंद्रीय जांच एजेंसियों से जुड़े मामलों के लिए गठित दो विशेष अदालतें मुकदमों को तेजी से पूरा करेंगी। अदालत के निर्देशों के बाद अब मुख्य सचिव और MSLSA की स्टेटस रिपोर्ट में राहत कैंपों में हुई मौतों, जांच, एफआईआर, सुरक्षा और मुआवजे से जुड़े पहलुओं की जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

  • यूपी में भाजपा की कमजोर सीटों पर सहयोगियों की नजर, लगातार हार वाली सीटों पर बढ़ाई सक्रियता

    यूपी में भाजपा की कमजोर सीटों पर सहयोगियों की नजर, लगातार हार वाली सीटों पर बढ़ाई सक्रियता

    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा के सहयोगी दल उन सीटों पर अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं, जहां भाजपा लंबे समय से जीत के लिए संघर्ष करती रही है या उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। सीटों के बंटवारे की तस्वीर साफ होने से पहले राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले), अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने ऐसे क्षेत्रों में सम्मेलन और दूसरे कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं। मुरादाबाद समेत मंडल की उन सीटों पर भी सहयोगी दलों की नजर है, जहां भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा है या जीत का अंतर बेहद कम रहा है।

    मुरादाबाद में भाजपा का रिकॉर्ड कमजोर
    मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों में 2022 के चुनाव में भाजपा को केवल मुरादाबाद नगर सीट पर जीत मिली थी। इससे पहले 2017 में पार्टी मुरादाबाद नगर और कांठ सीट जीतने में कामयाब रही थी। 2012 के चुनाव में भाजपा के खाते में सिर्फ ठाकुरद्वारा सीट आई थी।

    उपचुनावों को अलग रखकर देखें तो मुरादाबाद देहात और बिलारी ऐसी सीटें हैं, जहां भाजपा को इन तीन विधानसभा चुनावों में जीत नहीं मिली। वहीं 2014 में हुए उपचुनाव के बाद ठाकुरद्वारा सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई।

    सहयोगी दलों ने शुरू की चुनावी तैयारियां
    उत्तर प्रदेश में एनडीए गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी प्रमुख सहयोगी दल हैं। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) केंद्र में भाजपा की सहयोगी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए ये दल सीटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में सक्रिय हो गए हैं।

    मंडल की उन सीटों पर खास फोकस किया जा रहा है, जहां भाजपा लंबे समय से जीत हासिल नहीं कर सकी है। सहयोगी दलों ने मुरादाबाद जिले में अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए संगठन और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। कार्यकर्ता सम्मेलन, क्षेत्रीय सम्मेलन और अति पिछड़ा सम्मेलन के जरिए ये दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ सहयोगी दल इन सीटों पर अपनी दावेदारी भी जता रहे हैं।
    मंडल की उन सीटों पर खास फोकस किया जा रहा है, जहां भाजपा लंबे समय से जीत हासिल नहीं कर सकी है। सहयोगी दलों ने मुरादाबाद जिले में अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए संगठन और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। कार्यकर्ता सम्मेलन, क्षेत्रीय सम्मेलन और अति पिछड़ा सम्मेलन के जरिए ये दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ सहयोगी दल इन सीटों पर अपनी दावेदारी भी जता रहे हैं।

    भाजपा महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला ने कहा, “सहयोगी दलों की सक्रियता बढ़ी है। इसमें कुछ दल सीटों पर दावेदारी भी कर रहे हैं। सीटों का बंटवारा भाजपा और सहयोगी दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेता मिलकर तय करेंगे। फिलहाल सभी सीटों पर पार्टी की तैयारी है।”

    मुरादाबाद में सहयोगी दलों के कार्यक्रम
    13 सितंबर: मुरादाबाद में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) का सम्मेलन।
    8 सितंबर: मुरादाबाद में निषाद पार्टी का मंडलीय कार्यकर्ता सम्मेलन।
    2 अगस्त: मुरादाबाद में अपना दल (एस) का क्षेत्रीय सम्मेलन।
    4 जून: ठाकुरद्वारा में रालोद की विजय संकल्प महारैली।
    29 अप्रैल: कैलासा बाईपास पर सुभासपा का अति पिछड़ा सम्मेलन।

    इन विधानसभा सीटों पर लंबे समय से भाजपा को जीत का इंतजार
    विधानसभा सीट – भाजपा की आखिरी जीत
    मुरादाबाद देहात – 1993
    बिलारी – जीत ही नहीं मिली
    ठाकुरद्वारा – 2012
    कुंदरकी – 1993

    मंडल की इन सीटों पर भी भाजपा को संघर्ष
    मुरादाबाद के अलावा मंडल के दूसरे जिलों में भी भाजपा को कुछ विधानसभा सीटों पर लंबे समय से जीत का इंतजार है। इनमें अमरोहा, संभल, नगीना, नजीबाबाद और रामपुर विधानसभा सीट शामिल हैं। अमरोहा में भाजपा को आखिरी बार 1996 में जीत मिली थी, जबकि संभल में 1993, नगीना में 1991 और नजीबाबाद में 1991 में पार्टी विजयी रही थी। रामपुर विधानसभा सीट पर 2022 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की थी।

    रामपुर में स्थापना दिवस पर अपना दल (एस) का बड़ा कार्यक्रम
    अपना दल (एस) ने भी रामपुर में अपनी गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी कर ली है। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव संजीव यादव के मुताबिक, 4 नवंबर को पार्टी का स्थापना दिवस है। इस मौके पर रामपुर में बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसमें पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल शामिल होंगी।

  • एन. चंद्रशेखरन 2032 तक संभालेंगे टाटा संस की कमान, बोर्ड ने पांच साल बढ़ाया कार्यकाल

    एन. चंद्रशेखरन 2032 तक संभालेंगे टाटा संस की कमान, बोर्ड ने पांच साल बढ़ाया कार्यकाल


    नई दिल्ली।
    टाटा समूह के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस की कमान संभालते हुए अभी और पांच साल हो गए हैं। टाटा संस लिमिटेड के बोर्ड ने गुरुवार को उनके कार्यकाल को पांच साल के लिए बढ़ाने की मंजूरी दे दी। इसके साथ ही चंद्रशेखरन फरवरी 2032 तक समूह के चेयरमैन बने रहेंगे। उनका मौजूदा दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था।

    चंद्रशेखरन के कार्यकाल में विस्तार का फैसला ऐसे समय में आया है, जब टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबारों के साथ-साथ विमानन, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे नए क्षेत्रों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। बोर्ड के फैसले के बाद अब अगले पांच वर्षों के लिए समूह के नेतृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है।

    65 साल की उम्र में रिटायरमेंट की नीति, 70 तक जारी रह सकता है कार्यकाल

    टाटा समूह की आंतरिक नीति के अनुसार, कार्यकारी पदों पर नियुक्त अधिकारियों के लिए आमतौर पर 65 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति का प्रावधान है। हालांकि, गैर-कार्यकारी भूमिका में अधिकारी 70 वर्ष की उम्र तक पद पर बने रह सकते हैं।

    एन. चंद्रशेखरन की उम्र फिलहाल 63 वर्ष बताई गई है। उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में पूरा होना था, जब वे 65 वर्ष के हो जाएंगे। अब पांच साल का नया कार्यकाल मिलने के बाद वे फरवरी 2032 तक टाटा संस के चेयरमैन बने रह सकते हैं। उस समय उनकी उम्र 70 वर्ष होगी।

    चंद्रशेखरन के कार्यकाल को बढ़ाने का फैसला टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, नए कार्यकाल के दौरान समूह की रणनीति और कारोबार के विस्तार को लेकर आगे के फैसले बोर्ड और प्रबंधन की योजनाओं के अनुसार होंगे।

    अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे

    एन. चंद्रशेखरन का टाटा समूह से जुड़ाव काफी पुराना है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1987 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में इंटर्न के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने कंपनी में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं और आगे चलकर समूह के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे।

    अक्टूबर 2016 में वे पहली बार टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए थे। इसके करीब चार महीने बाद जनवरी 2017 में उन्हें टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया। तब से वे समूह के रणनीतिक फैसलों और कारोबार के विस्तार में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

    चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक उद्योगों के साथ नए कारोबारी क्षेत्रों में निवेश और विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाए। विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और डिजिटल कारोबार को समूह की आगे की विकास रणनीति का हिस्सा बनाया गया।

    नौ साल में समूह का कारोबार और मुनाफा बढ़ा

    एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह के वित्तीय प्रदर्शन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 2026 के बीच समूह के राजस्व और मुनाफे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

    राजस्व में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी

    वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का राजस्व 7.89 लाख करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2026 में यह बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस तरह छह वित्त वर्षों के दौरान समूह के राजस्व में काफी विस्तार हुआ।

    मुनाफा 32 हजार करोड़ से बढ़कर 1.71 लाख करोड़

    समूह के मुनाफे में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का मुनाफा करीब 32 हजार करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 1.71 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि समूह के विभिन्न कारोबारों के प्रदर्शन और विस्तार से जुड़ी हुई है।


    सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण बढ़ा

    टाटा समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में भी वृद्धि हुई। वर्ष 2020 में इन कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 9.31 लाख करोड़ रुपये था। वर्ष 2026 में यह बढ़कर 24.39 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

    इन आंकड़ों के अनुसार, चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह के कारोबार का आकार, मुनाफा और सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार मूल्य बढ़ा है। हालांकि, अलग-अलग कंपनियों के प्रदर्शन और बाजार परिस्थितियों का प्रभाव इन आंकड़ों पर पड़ता है।

    टाटा समूह ने नए क्षेत्रों में बढ़ाया दायरा

    एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने अपने कारोबार को पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़ाने पर जोर दिया। विमानन क्षेत्र में समूह की गतिविधियों का विस्तार हुआ। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे क्षेत्रों में भी समूह ने कदम बढ़ाए।

    टाटा समूह के लिए इन नए क्षेत्रों में प्रवेश का उद्देश्य भविष्य की औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप कारोबार का विस्तार करना है। इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान दिया गया है।

    समूह की प्रमुख कंपनियों में टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और एयर इंडिया शामिल हैं। इन कंपनियों के अलग-अलग कारोबार हैं, लेकिन टाटा संस समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    टाटा समूह, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में क्या अंतर है?

    टाटा समूह से जुड़े तीन नाम अक्सर चर्चा में रहते हैं—टाटा समूह, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स। इन तीनों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं।


    टाटा समूह

    टाटा समूह उन अलग-अलग कंपनियों और कारोबारों का समूह है, जो टाटा नाम के तहत संचालित होते हैं। इसमें टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और एयर इंडिया जैसी कंपनियां शामिल हैं। समूह के कारोबार आईटी, वाहन, इस्पात, ऊर्जा, विमानन और अन्य क्षेत्रों में फैले हुए हैं।

    टाटा संस

    टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। यह समूह की प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है और समूह के बड़े कारोबारी फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन समूह के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा हैं।

    टाटा ट्रस्ट्स

    टाटा ट्रस्ट्स सामाजिक और परोपकारी कार्यों से जुड़े ट्रस्टों का समूह है। ये शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और अन्य जनहितकारी गतिविधियों में योगदान करते हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई जाती है।

    इस तरह टाटा समूह कारोबारों का व्यापक नेटवर्क है, टाटा संस उसकी प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और टाटा ट्रस्ट्स सामाजिक एवं परोपकारी गतिविधियों से जुड़े ट्रस्टों का समूह है।

    आगे भी समूह की रणनीति पर रहेगी नजर

    टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल पांच साल बढ़ाए जाने के बाद अब वे फरवरी 2032 तक चेयरमैन बने रहेंगे। उनके नेतृत्व में समूह ने पिछले वर्षों में कारोबार के विस्तार और नए क्षेत्रों में प्रवेश पर जोर दिया है।

    आने वाले वर्षों में टाटा समूह की रणनीति में विमानन, तकनीक, विनिर्माण, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे क्षेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। बोर्ड के फैसले से समूह के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता बनी रहेगी और आगे की कारोबारी योजनाओं को उसी दिशा में आगे बढ़ाया जा सकेगा।

  • दिशा सालियान मामले में पिता सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अनिल देशमुख से 500 करोड़ रुपये हर्जाना मांगा

    दिशा सालियान मामले में पिता सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अनिल देशमुख से 500 करोड़ रुपये हर्जाना मांगा

    नई दिल्ली । दिशा सालियन मामले में उनके पिता सतीश सालियन की ओर से शिवसेना यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे और एनसीपी नेता अनिल देशमुख को 500 करोड़ रुपये के हर्जाने का कानूनी नोटिस भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। नोटिस में दोनों नेताओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग भी की गई है। यह मामला दिशा सालियन की मौत से जुड़ा है, जिनकी 8 जून 2020 को मुंबई में एक ऊंची इमारत से गिरने के बाद मौत हुई थी। दिशा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर थीं।

    सतीश सालियन ने नोटिस में आरोप लगाया है कि उनकी बेटी की मौत की सच्चाई जानने और न्याय की मांग को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई। उनके अनुसार, उनके बारे में ऐसी बातें कही गईं जिनसे उनकी छवि प्रभावित हुई और उनके इरादों पर सवाल उठे। उन्होंने इन बातों को गलत और बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि उनकी मांग का उद्देश्य केवल अपनी बेटी की मौत की सच्चाई सामने लाना है और इसे किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

    नोटिस में आदित्य ठाकरे पर भी सतीश सालियन के न्याय के लिए चल रहे संघर्ष को राजनीति से जोड़कर पेश करने का आरोप लगाया गया है। नोटिस के मुताबिक, इस तरह उनके संघर्ष और उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़े हुए। सतीश सालियन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए न्याय की मांग की है और उनकी इस लड़ाई को राजनीतिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    कानूनी नोटिस में दिशा सालियन मामले की सीबीआई जांच को लेकर दिए गए एक बयान का भी उल्लेख किया गया है। इसमें आदित्य ठाकरे के उस कथित बयान का जिक्र है, जिसमें कहा गया था कि सीबीआई ने मामले की जांच की और उन्हें क्लीन चिट दी। नोटिस भेजने वाले पक्ष ने इस दावे को गलत बताया है। इसी क्रम में अनिल देशमुख के 23 मार्च 2025 के कथित बयान का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें दिशा सालियन मामले को आदित्य ठाकरे को बदनाम करने की साजिश बताया गया था।

    सतीश सालियन ने 500 करोड़ रुपये के हर्जाने के अलावा दोनों नेताओं से बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग की है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि माफी सार्वजनिक रूप से दी जाए और उसे टीवी, अखबार तथा डिजिटल मीडिया में प्रसारित किया जाए। इसके साथ ही वीडियो के माध्यम से माफी देने और उसे दोनों नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी करने की मांग भी रखी गई है।

    इस बीच आदित्य ठाकरे ने दिशा सालियन से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि वह दिशा से कभी नहीं मिले और उन्हें जानते भी नहीं थे। उनके मुताबिक, करीब छह वर्षों से कुछ लोग उनका नाम इस मामले से जोड़ रहे हैं। उन्होंने इसे अपनी छवि खराब करने की कोशिश बताया और कहा कि मामले की आधिकारिक दोबारा जांच को राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।

    मामले में सोमवार को सीबीआई की ओर से एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसमें हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं। दिशा सालियन की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड में एक ऊंची रिहायशी इमारत से गिरने के बाद हुई थी। उनकी मौत को लेकर पहले भी अलग-अलग दावे और आरोप सामने आते रहे हैं।

  • ट्रॉय की खोज: जहां इतिहास, प्रेम और युद्ध की सदियों पुरानी कहानियां आज भी जिंदा हैं

    ट्रॉय की खोज: जहां इतिहास, प्रेम और युद्ध की सदियों पुरानी कहानियां आज भी जिंदा हैं


    इंदौर!
    दुनिया के इतिहास में कुछ शहर ऐसे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके खंडहरों से नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी कहानियों से होती है। तुर्किये का प्राचीन शहर ट्रॉय भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है। होमर के महाकाव्य इलियड और ओडिसी से लेकर आधुनिक सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों तक, ट्रॉय की कहानी आज भी लोगों की कल्पना को आकर्षित करती है। उत्तरी एजियन क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन नगरी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।

    ट्रॉय की विरासत को दुनिया के सामने नए रूप में प्रस्तुत करने के लिए हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इनमें रोम के ऐतिहासिक कोलोसियम में शुरू हुई पुरातात्विक प्रदर्शनी विशेष महत्व रखती है। यह आयोजन ट्रॉय के इतिहास, कला और संस्कृति को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने का एक बड़ा माध्यम बना है।

    रोम के कोलोसियम में सजी ट्रॉय की ऐतिहासिक धरोहर

    11 जून को रोम के कोलोसियम में ट्रॉय की पुरातात्विक विरासत पर आधारित एक भव्य प्रदर्शनी शुरू हुई। इस प्रदर्शनी में तुर्किये के 19 संग्रहालयों से चुनी गईं 221 ऐतिहासिक कलाकृतियां शामिल की गई हैं। इनमें चानक्कले स्थित ट्रॉय संग्रहालय की महत्वपूर्ण वस्तुएं भी रखी गई हैं।

    प्रदर्शनी की खास बात यह है कि इसमें शामिल 50 कलाकृतियां पहली बार इटली में प्रदर्शित की जा रही हैं। इसके अलावा इतालवी संग्रहालयों के संग्रह से 80 अन्य कलाकृतियां भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। इस तरह यह आयोजन ट्रॉय की पुरातात्विक संपदा को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करता है।

    रोम जैसे ऐतिहासिक शहर में ट्रॉय की धरोहर का प्रदर्शन केवल पुरानी वस्तुओं को देखने का अवसर नहीं है। यह उस सभ्यता की कहानी को समझने का माध्यम भी है, जिसने साहित्य, कला और इतिहास पर गहरा प्रभाव छोड़ा। प्रदर्शनी के जरिए ट्रॉय की पहचान को वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के रूप में और मजबूती मिल रही है।

    दुनिया के अलग-अलग देशों में ट्रॉय की कहानी

    ट्रॉय की विरासत को लेकर अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और अकादमिक कार्यक्रमों की श्रृंखला भी जारी है। न्यूयॉर्क स्थित तुर्किश हाउस में सम्मेलन और फोटोग्राफी प्रदर्शनी के बाद नीदरलैंड्स में भी ट्रॉय से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है।

    28 जून को एम्स्टर्डम स्थित यूनुस एमरे इंस्टीट्यूट में ट्रॉय पर विशेष फोटोग्राफी प्रदर्शनी शुरू होने की जानकारी दी गई है। इसके अगले दिन 29 जून को लीडेन यूनिवर्सिटी में ट्रॉय उत्खनन के प्रमुख पुरातत्वविद् प्रोफेसर रुस्तेम असलान सम्मेलन को संबोधित करेंगे।

    इन आयोजनों का उद्देश्य ट्रॉय के इतिहास और पुरातात्विक महत्व को नए दर्शकों तक पहुंचाना है। हालांकि, किसी प्रदर्शनी या सम्मेलन में ट्रॉय की कहानी जानना एक बात है और स्वयं उस प्राचीन शहर की गलियों में घूमकर उसकी परतों को महसूस करना दूसरी।

    इसीलिए तुर्किये यात्रियों को ट्रॉय की वास्तविक यात्रा का निमंत्रण देता है। यह प्राचीन शहर चानक्कले के केंद्र से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

    चानक्कले: समुद्र, पहाड़ और इतिहास का संगम

    ट्रॉय की यात्रा को यादगार बनाने के लिए चानक्कले क्षेत्र अपने आप में कई अनुभव समेटे हुए है। उत्तरी एजियन सागर के प्रवेश द्वार पर बसा चानक्कले, डार्डानेल्स जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है। यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।

    यहां आने वाले पर्यटकों को समुद्र तटों, जल क्रीड़ाओं, कैंपिंग स्थलों और साइकिलिंग मार्गों का आनंद लेने का अवसर मिलता है। क्षेत्र में बुटीक वाइन रूट्स भी यात्रियों को आकर्षित करते हैं।

    इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए चानक्कले प्रथम विश्व युद्ध के गैलीपोली या डार्डानेल्स अभियान से जुड़े स्थलों की यात्रा का अवसर देता है। समुद्र की गहराइयों में युद्धकालीन जहाजों के मलबे को देखने के लिए डाइविंग गतिविधियां भी उपलब्ध हैं।

    प्रकृति प्रेमी माउंट इडा की हरी-भरी ढलानों का आनंद ले सकते हैं। वहीं असोस के साफ पानी और बोज़जाआडा तथा गोक्चेआडा द्वीपों की खूबसूरती इस यात्रा को और खास बना देती है।

    लेकिन इन तमाम आकर्षणों के बीच चानक्कले की यात्रा का सबसे बड़ा केंद्र ट्रॉय ही है। शहर के मध्य में खड़ा विशाल लकड़ी का घोड़ा पर्यटकों को उस प्राचीन नगरी की याद दिलाता है, जिसकी कहानी सदियों से लोगों के बीच सुनाई जाती रही है।

    ट्रॉय की जमीन में छिपी हैं सभ्यताओं की कई परतें

    तेवफिकिये गांव में स्थित ट्रॉय को आमतौर पर होमर के महाकाव्य इलियड से जोड़ा जाता है। ट्रोजन युद्ध की कथा ने इस शहर को दुनिया भर में प्रसिद्ध किया। लेकिन ट्रॉय का इतिहास केवल युद्ध और पौराणिक पात्रों तक सीमित नहीं है।

    यहां करीब 5,000 वर्षों से मानव बसावट के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन शहर में प्रारंभिक कांस्य युग से लेकर पूर्वी रोमन काल तक की दस और उससे अधिक विशिष्ट सभ्यतागत परतें मौजूद हैं।

    इसका अर्थ है कि ट्रॉय में अलग-अलग समय में विभिन्न संस्कृतियों ने निवास किया और अपने पीछे स्थापत्य, किलेबंदी तथा जीवनशैली के निशान छोड़े। आज जब पर्यटक इन अवशेषों के बीच चलते हैं, तो उन्हें एक ही शहर में इतिहास के कई दौर दिखाई देते हैं।

    ट्रॉय के प्रवेश द्वार पर बना विशाल लकड़ी का ट्रोजन हॉर्स पर्यटकों का स्वागत करता है। इसके बाद यात्रा प्राचीन पत्थर की दीवारों और गलियों के बीच आगे बढ़ती है। कभी इन रास्तों पर जिन लोगों का जीवन बसा होगा, उनके निशान आज खंडहरों के रूप में दिखाई देते हैं।

    एनीयस की कथा से रोम तक जुड़ा ट्रॉय

    ट्रॉय की कहानी का संबंध केवल यूनानी महाकाव्यों से नहीं है। रोमन साहित्य में भी इस प्राचीन शहर का उल्लेख महत्वपूर्ण रूप से मिलता है।

    वर्जिल की प्रसिद्ध रचना एनीड के अनुसार, ट्रॉय के पतन के बाद राजकुमार एनीयस ने एक नए ट्रॉय की तलाश में लंबी यात्रा शुरू की। माना जाता है कि उनकी यात्रा आगे चलकर इटली के लैटियम क्षेत्र तक पहुंची।

    एनीयस से जुड़ा यह मार्ग आज एनीयस रूट के नाम से जाना जाता है। यूरोप की परिषद ने भी इसे सांस्कृतिक मार्ग के रूप में मान्यता दी है। रोमन परंपरा के अनुसार, एनीयस के वंशजों ने आगे चलकर 753 ईसा पूर्व में रोम की स्थापना की।

    हालांकि यह कथा पौराणिक और साहित्यिक परंपराओं का हिस्सा है, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि ट्रॉय की कहानी का प्रभाव अनातोलिया से निकलकर यूरोप की सांस्कृतिक स्मृति तक पहुंचा।

    खंडहरों से आगे ट्रॉय संग्रहालय का अनुभव

    ट्रॉय की यात्रा सिर्फ खुले पुरातात्विक स्थल तक सीमित नहीं रहती। यहां स्थित ट्रॉय संग्रहालय पर्यटकों को प्राचीन शहर की धरोहर को आधुनिक तरीके से समझने का अवसर देता है।

    पुरस्कार विजेता ट्रॉय संग्रहालय अपनी सादगीपूर्ण और प्रभावशाली वास्तुकला के लिए जाना जाता है। संग्रहालय में ट्रॉय से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री को तीन स्तरों पर प्रस्तुत किया गया है।

    यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन शहर के इतिहास, वहां रहने वाली सभ्यताओं और खुदाई में मिली वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। संग्रहालय का उद्देश्य केवल कलाकृतियां दिखाना नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सभ्यता और जीवन की कहानी को समझाना भी है।

    प्राचीन अवशेषों और आधुनिक संग्रहालय का यह मेल ट्रॉय को एक अलग अनुभव प्रदान करता है। यहां इतिहास को केवल किताबों में पढ़ने के बजाय उसके प्रमाणों के साथ समझने का अवसर मिलता है।

    इतिहास से जुड़ने का निमंत्रण

    ट्रॉय की कहानी ने साहित्य, कला, सिनेमा और अकादमिक शोध को लंबे समय से प्रेरित किया है। रोम में आयोजित प्रदर्शनी और विभिन्न देशों में होने वाले सम्मेलन इस विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

    लेकिन ट्रॉय की असली पहचान उसके खंडहरों, प्राचीन दीवारों, सभ्यताओं की परतों और संग्रहालय में सुरक्षित धरोहरों के बीच जाकर महसूस की जा सकती है। चानक्कले की प्राकृतिक सुंदरता के साथ ट्रॉय की यात्रा इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए एक खास अनुभव बन सकती है।

    तुर्किये का यह प्राचीन शहर आज भी एक सवाल की तरह सामने खड़ा है—कितनी सभ्यताएं यहां बसीं, कितनी कहानियां यहां जन्मीं और कितनी पीढ़ियां इस धरती से होकर गुजरीं? शायद यही ट्रॉय का सबसे बड़ा आकर्षण है कि इसके खंडहर अतीत की कहानी सुनाते हुए आज के यात्रियों को भी अपने करीब बुलाते हैं।

  • महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रावासों में छात्राओं की शिकायतें सामने आईं, दीपके ने 17 सितंबर से स्कूल सुधार अभियान शुरू किया

    महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रावासों में छात्राओं की शिकायतें सामने आईं, दीपके ने 17 सितंबर से स्कूल सुधार अभियान शुरू किया

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र के नागपुर में आदिवासी छात्राओं ने छात्रावासों से जुड़ी कई समस्याएं सामने रखीं। अभिजीत दीपके के साथ हुई बातचीत के दौरान छात्राओं ने हॉस्टल में रहने की परिस्थितियों, बुनियादी सुविधाओं, छात्रवृत्ति, वॉशरूम और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। कुछ छात्राओं ने आश्रम स्कूलों में कथित यौन शोषण और प्रेग्नेंसी टेस्ट कराए जाने को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए।

    बातचीत में विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र से आई कई छात्राओं ने अपने अनुभव साझा किए। छात्राओं का कहना था कि आदिवासी आवासीय स्कूलों और हॉस्टलों में उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ छात्राओं ने आरोप लगाया कि हॉस्टल से जुड़ी व्यवस्थाओं में उनकी निजता और सुविधा का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाता।

    भंडारा के एक आदिवासी हॉस्टल का मुद्दा भी बातचीत के दौरान सामने आया। एक छात्रा ने बताया कि वहां करीब 15 लड़कियों को एक ही कमरे में रखा जाता है। छात्राओं ने हॉस्टल में जगह की कमी के अलावा वॉशरूम से जुड़ी परेशानियों की भी जानकारी दी। उनके अनुसार, रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने से उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

    छात्राओं ने आश्रम स्कूलों में कथित तौर पर प्रेग्नेंसी टेस्ट कराए जाने का आरोप भी लगाया। उनका कहना था कि कुछ छात्राओं को ऐसी जांच से गुजरना पड़ता है। इस मुद्दे को लेकर छात्राओं ने अपनी नाराजगी और असहजता व्यक्त की। हालांकि, सामने रखे गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस जानकारी में नहीं हुई है।

    छात्राओं ने कथित यौन शोषण से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया। उनका आरोप था कि कुछ मामलों में मुख्य आरोपियों को बचाने के लिए आदिवासी समुदाय के बच्चों को ही आरोपी बनाया जा रहा है। छात्राओं ने ऐसी परिस्थितियों में निष्पक्ष जांच और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया।

    हॉस्टल की समस्याओं में केवल सुरक्षा और जांच से जुड़े मुद्दे ही शामिल नहीं थे। छात्राओं ने छात्रवृत्ति, वॉशरूम और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत भी की। उनका कहना था कि सरकारी आदिवासी स्कूलों और आवासीय संस्थानों में विद्यार्थियों को पर्याप्त सुविधाएं मिलनी चाहिए, ताकि पढ़ाई और रहने के दौरान उन्हें अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

    इन शिकायतों के बीच अभिजीत दीपके ने आदिवासी छात्रों के आंदोलन को समर्थन देने की बात कही। नागपुर स्थित आदिवासी विकास भवन में छात्र अपनी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों से उनकी परेशानियों और हॉस्टल की स्थिति से जुड़ी जानकारी साझा करने को कहा गया है। इसके लिए आपसी संपर्क और जानकारी जुटाने की व्यवस्था बनाने की बात भी कही गई।

    अभिजीत दीपके ने 17 सितंबर से ‘आदिवासी स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू करने की घोषणा की है। अभियान की शुरुआत महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से करने की बात कही गई है। इसके तहत आदिवासी क्षेत्रों में संचालित स्कूलों और आवासीय विद्यालयों की स्थिति को सामने लाने का प्रयास किया जाएगा।

    उन्होंने आदिवासी विद्यार्थियों की समस्याओं और स्कूलों की स्थिति को लेकर सरकार की जिम्मेदारी का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों को पर्याप्त संसाधन और सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने आदिवासी विद्यार्थियों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई।

    आदिवासी छात्राओं की ओर से सामने आई शिकायतों के बाद हॉस्टल की व्यवस्थाओं, बुनियादी सुविधाओं, छात्राओं की सुरक्षा और कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट से जुड़े आरोपों पर ध्यान केंद्रित हुआ है। इन आरोपों की जांच और संबंधित व्यवस्थाओं में सुधार को लेकर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

  • UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    नई दिल्ली ।UPI यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट भुगतान पर लागू होने वाले 0.4 प्रतिशत MDR को ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए इसका विरोध किया है। इसी बीच संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 12 अगस्त को पेश रिपोर्ट चर्चा में आ गई है। इस रिपोर्ट में UPI के लिए टिकाऊ और स्तर आधारित राजस्व व्यवस्था की जरूरत बताई गई थी।

    समिति में कांग्रेस के पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल थे। रिपोर्ट को भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनाया था। प्रकाशित कार्यवाही में रिपोर्ट को लेकर किसी तरह की असहमति दर्ज नहीं की गई थी। समिति ने UPI के लिए टियर आधारित MDR या राजस्व व्यवस्था को जल्द अधिसूचित कर लागू करने की जरूरत बताई थी।

    रिपोर्ट में UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता का मुद्दा उठाया गया था। समिति के अनुसार, डिजिटल भुगतान का विस्तार होने के साथ उसके बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी व्यवस्था पर खर्च भी बढ़ता है। ऐसे में केवल सरकारी प्रोत्साहन राशि के सहारे लंबे समय तक UPI व्यवस्था को संचालित करना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी वजह से एक व्यवहारिक और टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत बताई गई थी।

    समिति ने 2026-27 के बजट में UPI और RuPay पर जीरो-MDR नीति से जुड़ी लागत की भरपाई के लिए 2,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का भी उल्लेख किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि UPI पर लेनदेन की संख्या लगातार बढ़ रही है और बड़ी संख्या में नए उपयोगकर्ता डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ रहे हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकारी प्रोत्साहन राशि उद्योग की वास्तविक लागत का सीमित हिस्सा ही पूरा करती है।

    वर्तमान विवाद प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत MDR को लेकर है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट लेनदेन पर लागू होनी है। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान पर कोई MDR नहीं लगेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P UPI लेनदेन भी पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। छोटे कारोबारियों के लिए जीरो-MDR व्यवस्था के तहत आने वाले लेनदेन पर भी शुल्क नहीं लगेगा।

    MDR को लेकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसे सरकार की ओर से लगाया गया टैक्स नहीं माना गया है। यह भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के बीच निर्धारित ढांचे के तहत लागू होने वाला शुल्क है। इससे प्राप्त राशि बैंकों और भुगतान सेवा से जुड़े अन्य हिस्सेदारों के बीच वितरित की जाएगी।

    राहुल गांधी ने नए MDR ढांचे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इसे ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए व्यवस्था वापस लेने की मांग की। उन्होंने सरकार पर बाहरी दबाव में निर्णय लेने का आरोप भी लगाया। दूसरी ओर, सरकार की ओर से कहा गया है कि MDR को टैक्स के रूप में देखना सही नहीं है और नई व्यवस्था UPI भुगतान इकोसिस्टम की वित्तीय जरूरतों से जुड़ी है।

    ऐसे में वर्तमान राजनीतिक बहस में एक तरफ प्रस्तावित MDR का विरोध है, जबकि दूसरी तरफ UPI के लिए टिकाऊ राजस्व व्यवस्था की जरूरत से जुड़ा तर्क है। वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में इसी तरह के राजस्व मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। UPI शुल्क व्यवस्था में बदलाव के बाद डिजिटल भुगतान की लागत, कारोबारियों पर प्रभाव और भुगतान व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता को लेकर चर्चा जारी है।

  • मद्रास हाईकोर्ट ने मदुरंतकम और धारापुरम उपचुनाव पर रोक से किया इनकार, इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने पर उठाए सवाल

    मद्रास हाईकोर्ट ने मदुरंतकम और धारापुरम उपचुनाव पर रोक से किया इनकार, इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली ।
    मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम विधानसभा सीटों पर छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव जीतने के कुछ समय बाद विधायक पद से इस्तीफा देकर उसी सीट से दूसरी पार्टी के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ने की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की।

    न्यायालय ने ऐसी स्थिति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के जनादेश से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। अदालत ने कहा कि निर्वाचित विधायक का जल्द इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी के टिकट पर उसी सीट से फिर चुनाव लड़ना मतदाताओं के दिए जनादेश का अनादर है।

    चेन्नई के अधिवक्ता के सुथन की ओर से दायर जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति एसएम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के गोविंदराजन की पीठ ने बुधवार को सुनवाई की। याचिका में मांग की गई थी कि जिन नेताओं ने दल बदलकर दोबारा चुनाव लड़ने के लिए अपनी विधायक सीट छोड़ी है, उनसे उपचुनाव कराने का खर्च वसूला जाए।

    पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उपलब्ध शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए जाने चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि इस्तीफा देकर ऐसी स्थिति पैदा करने वाले विधायकों पर उपचुनाव के वित्तीय बोझ को डालने की व्यवस्था पर विचार होना चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि एस जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी सत्यभामा, इसाक्की सुबैया, सी विजयभास्कर और एमआर विजय भास्कर ने इस्तीफा देकर तमिझगा वेत्री कषगम यानी टीवीके का रुख किया था। इनमें से मदुरंतकम और धारापुरम सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की गई है, जबकि बाकी पांच सीटों पर कानूनी याचिकाएं लंबित होने के कारण चुनाव नहीं कराया गया है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि मरगथम कुमारवेल और पी सत्यभामा को टीवीके ने उन्हीं सीटों से दोबारा उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा देकर खाली किया था। याचिका में आशंका जताई गई कि यदि ऐसी स्थिति के लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तीफे हो सकते हैं और इसका अतिरिक्त वित्तीय भार सरकारी खजाने पर पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम ने कहा कि किसी विधायक को इस्तीफा देने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इस्तीफा देने वाला वही व्यक्ति अपनी छोड़ी हुई सीट से फिर चुनाव लड़ता है। अदालत ने कहा कि इस असाधारण स्थिति के समाधान के लिए संसद या चुनाव आयोग को व्यवस्था पर विचार करना चाहिए।

    महाधिवक्ता विजय नारायण ने अदालत को बताया कि मौजूदा कानून पूर्व विधायकों को दोबारा चुनाव लड़ने से नहीं रोकता। इसलिए उपचुनाव रोकने की मांग वाली याचिका स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि छह विधायकों के इस्तीफे की स्वीकृति से संबंधित याचिका पर पहली पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा है। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई शुक्रवार तक स्थगित कर दी।

    याचिका 12 सितंबर को दायर की गई थी। इसमें मदुरंतकम और धारापुरम उपचुनावों पर रोक लगाने के साथ दोनों टीवीके उम्मीदवारों के नामांकन रद्द करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने असामयिक इस्तीफों से चुनाव आयोग और सरकार पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ का मुद्दा भी उठाया था।

    मूल मामले के अनुसार, अन्नाद्रमुक के बागी विधायक मरगथम कुमारवेल और सत्यभामा ने 13 मई को विधानसभा में टीवीके सरकार के पक्ष में मतदान किया था। इसके बाद दोनों ने अपनी विधानसभा सीटों से इस्तीफा दे दिया और सीटें रिक्त घोषित की गईं। बाद में टीवीके ने उन्हें अपने गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में इन्हीं सीटों से मैदान में उतारा।

    मदुरंतकम और धारापुरम सीटों के लिए द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने भी उम्मीदवार घोषित किए हैं। नाम तमिलर काची और वामपंथी दलों के चुनाव मैदान में उतरने के कारण इन सीटों पर कई दलों के बीच मुकाबला होने की स्थिति बनी है।