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  • कूनो में बदली चीतों की तस्वीर 4 साल पहले 8 से शुरू हुआ सफर अब भारत में 52 चीते

    कूनो में बदली चीतों की तस्वीर 4 साल पहले 8 से शुरू हुआ सफर अब भारत में 52 चीते


    नई दिल्ली।चार साल पहले जब नामीबिया से आठ चीतों को मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क लाया गया था तब भारत में इस प्रजाति की वापसी को लेकर कई सवाल थे। करीब सात दशक तक देश में चीते नहीं थे और ऐसे में अफ्रीका से लाए गए चीतों को भारतीय परिस्थितियों में बसाना बड़ी चुनौती माना जा रहा था। शुरुआती दौर में कई चीतों और शावकों की मौत ने चिंता बढ़ाई लेकिन इसके बाद चीतों के प्रजनन और उनके नए इलाकों में पहुंचने से तस्वीर धीरे धीरे बदलती गई। अब भारत में चीतों की संख्या 52 बताई जा रही है जिनमें 32 का जन्म भारत में ही हुआ है।

    17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूनो में नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को बाड़े में छोड़ा था। इसके साथ भारत में चीता पुनर्वास परियोजना की औपचारिक शुरुआत हुई। परियोजना के पहले साल में ही कई चुनौतियां सामने आईं। 2022-23 के दौरान कुल नौ चीतों की मौत हुई। इनमें वयस्क चीते और शावक दोनों शामिल थे। गर्मी और डिहाइड्रेशन जैसी परिस्थितियों को कुछ मौतों से जोड़कर देखा गया। तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने के दौरान अफ्रीका से आए चीतों के लिए भारतीय मौसम के साथ तालमेल बनाना बड़ी चुनौती रहा।

    पहले साल की मुश्किलों के बाद दूसरे साल तस्वीर में बदलाव दिखाई दिया। 2023-24 के दौरान चीतों के प्रजनन से उम्मीद बढ़ी। इस अवधि में जन्मे कई शावक जीवित रहे और 13 शावकों ने एक साल की उम्र पूरी की। इसी दौरान अफ्रीका से आए वयस्क चीतों के भारतीय परिस्थितियों के साथ अनुकूलन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी।

    तीसरे साल परियोजना का फोकस केवल कूनो तक सीमित नहीं रहा। चीतों को खुले जंगल में छोड़ा गया और कुछ चीते कूनो की सीमा से बाहर निकलकर राजस्थान के जंगलों तक पहुंचे। इसके बाद आसपास के इलाकों में उनकी निगरानी बढ़ाई गई। स्थानीय लोगों को चीतों के व्यवहार और उनसे जुड़ी सावधानियों की जानकारी देने के लिए चीता मित्रों को भी अभियान से जोड़ा गया। इसी क्रम में तीन चीतों को मंदसौर के गांधी सागर क्षेत्र में शिफ्ट किया गया।

    अब परियोजना चौथे साल में नए चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। कूनो के बाद नौरादेही नेशनल पार्क को भी चीतों के लिए संभावित नए घर के रूप में विकसित किया जा रहा है। वन विभाग के मुताबिक कूनो में मौजूद चीतों में बड़ी संख्या ऐसे जानवरों की है जिनका जन्म भारत में हुआ है। खुले जंगल में मौजूद चीते प्राकृतिक तरीके से शिकार कर रहे हैं और प्रजनन भी कर रहे हैं।

    चीतों की निगरानी के लिए तकनीक और ग्राउंड टीम दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। कई चीतों के गले में सैटेलाइट कॉलर लगाए गए हैं जिनसे उनकी लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी मिलती रहती है। इसके अलावा वन विभाग की टीमें लगातार जमीन पर निगरानी करती हैं। यदि कोई चीता कूनो की सीमा से बाहर निकलता है तो उसकी गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाती है।

    भारत में चीता पुनर्वास की कोशिश हालांकि नई नहीं है। 1970 के दशक में देश में चीते दोबारा बसाने की योजना पर विचार शुरू हुआ था। बाद में कई स्तरों पर प्रयास हुए लेकिन अलग अलग कारणों से योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अफ्रीकी चीतों को भारत लाने की अनुमति के रास्ते को आगे बढ़ाया। इसके बाद नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को भारत लाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

    कूनो की मौजूदा तस्वीर इस लंबे प्रयास के एक नए चरण को दिखाती है। शुरुआत में आठ चीतों से शुरू हुआ सफर अब 52 तक पहुंच चुका है। इनमें भारत में जन्मे चीतों की संख्या 32 है। आने वाले समय में चीतों को कूनो के अलावा दूसरे उपयुक्त क्षेत्रों में बसाने की योजना परियोजना के विस्तार का अहम हिस्सा होगी।

  • मिर्जापुर में गंगा में कूदी महिला 14 घंटे बाद 35 किलोमीटर दूर चुनार घाट पर मछुआरों को जीवित मिली

    मिर्जापुर में गंगा में कूदी महिला 14 घंटे बाद 35 किलोमीटर दूर चुनार घाट पर मछुआरों को जीवित मिली

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में गंगा में कूदी एक महिला को करीब 14 घंटे बाद जीवित बरामद कर लिया गया। महिला मंगलवार शाम शास्त्री पुल से गंगा में कूदी थी। पूरी रात तेज धारा में बहने के बाद वह शास्त्री पुल से करीब 35 किलोमीटर दूर चुनार घाट के पास पहुंच गई। बुधवार सुबह गंगा में मछली पकड़ रहे मछुआरों की नजर महिला पर पड़ी। उन्होंने उसे पानी से बाहर निकाला और पुलिस को सूचना दी। महिला की हालत खराब होने पर चिकित्सकीय उपचार कराया गया। बाद में पुलिस ने उसका बयान दर्ज करने के बाद उसे परिजनों को सौंप दिया।

    पुलिस के अनुसार कछवां के बरैनी गांव निवासी 38 वर्षीय सुनीता साहनी की शादी करीब 18 वर्ष पहले कटरा के छोटी बसही मोहल्ला निवासी सूर्यबली से हुई थी। सूर्यबली गुजरात के जामनगर में काम करता है। बताया गया कि सुनीता किसी बात को लेकर नाराज थी और मंगलवार शाम उसने शास्त्री पुल से गंगा में छलांग लगा दी। घटना की जानकारी मिलने के बाद उसकी तलाश की गई, लेकिन तत्काल उसका पता नहीं चल सका।

    इसके बाद गंगा की तेज धारा महिला को बहाकर चुनार की ओर ले गई। बुधवार सुबह करीब सात बजे चुनार घाट पर गणेश साहनी, रामबाबू साहनी और रंजीत साहनी गंगा में मछली पकड़ रहे थे। इसी दौरान उन्होंने पानी में एक महिला को बहते हुए देखा। मछुआरों ने उसे बाहर निकाला और पुलिस को घटना की सूचना दी।

    नदी से निकाले जाने के बाद महिला की हालत खराब थी। उसकी स्थिति को देखते हुए डॉक्टर को बुलाकर उपचार कराया गया। उपचार के बाद उसकी हालत में सुधार हुआ। होश में आने पर महिला ने पुलिस को घटना के संबंध में जानकारी दी और बताया कि वह पति की एक बात से आहत होकर घर से निकली थी।

    महिला के अनुसार मंगलवार शाम करीब चार बजे उसने अपने पति को फोन कर दवा खरीदने के लिए पैसे भेजने को कहा था। उसके मुताबिक पति ने पैसे भेजने से इनकार कर दिया और उससे कहा, “मेरा तुमसे कोई मतलब नहीं, जाकर मर जाओ।” महिला ने बताया कि पति की इस बात से आहत होकर वह घर से निकल गई और शास्त्री पुल पर पहुंचकर गंगा में छलांग लगा दी।

    पुलिस की पूछताछ में महिला का अपनी सास के साथ विवाद होने की बात भी सामने आई है। पुलिस के अनुसार महिला ने अपने बयान में पति की बात से आहत होकर गंगा में छलांग लगाने की जानकारी दी है। महिला के जीवित मिलने के बाद पुलिस और उसके परिजनों ने राहत की सांस ली।

    चुनार कोतवाल विजयशंकर सिंह के अनुसार मंगलवार शाम एक महिला के शास्त्री पुल से गंगा में कूदने की सूचना मिली थी। महिला अगले दिन चुनार घाट के पास मिली। उपचार के बाद उसकी हालत ठीक बताई गई और उसे परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। महिला के शास्त्री पुल से चुनार तक पहुंचने की दूरी करीब 35 किलोमीटर बताई गई है। गंगा की तेज धारा में कई घंटे बहने के बाद महिला का जीवित मिलना इस घटना का प्रमुख पहलू रहा।

  • UPSC अनुभव साझा करने वाले वीडियो पर आपत्ति के बाद IPS बुशरा बानो को SAP चौथी बटालियन में मिली नई जिम्मेदारी

    UPSC अनुभव साझा करने वाले वीडियो पर आपत्ति के बाद IPS बुशरा बानो को SAP चौथी बटालियन में मिली नई जिम्मेदारी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में एक मुस्लिम IPS अधिकारी द्वारा अपने यूट्यूब वीडियो में ‘अस्सलामु अलैकुम’ और ‘इंशाल्लाह’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने के बाद उनके खिलाफ एक्शन हो गया है। खबर है कि राज्य की भाजपा की सरकार ने IPS अधिकारी डॉ. बुशरा बानो का ट्रांसफर कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस वीडियो पर कुछ दक्षिणपंथी समूहों की आपत्ति जताई थी और कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने पब्लिक ऑर्डर का हवाला देते हुए अधिकारी का तबादला कर दिया।

    मामला सामने आने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है।

    किस वीडियो पर हुआ एक्शन?

    रिपोर्ट के मुताबिक खड़गपुर की एडिशनल एसपी के पद पर तैनात डॉ बुशरा बानो ने यूट्यूब पर एक वीडियो डालकर अभ्यर्थियों के साथ यूपीएससी की तैयारी का अनुभव शेयर किया था। उन्होंने वीडियो में बताया कि सऊदी अरब से लौटने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की ‘रेजिडेंशियल कोचिंग एकेडमी’ और वहां की लाइब्रेरी से उन्हें तैयारी में काफी मदद मिली। वो दूसरे अभ्यर्थियों को मोटिवेट भी करती नजर आ रही हैं। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है।

    क्या हुई आपत्ति?

    इस वीडियो पर ‘हिंदू लीगल फंड’ नामक संगठन ने आपत्ति जताते हुए राज्य की गृह सचिव संघमित्रा घोष को शिकायत भेजी। संगठन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि अधिकारी ने वीडियो की शुरुआत ‘अस्सलामु अलैकुम’ से की और ‘इंशाल्लाह’ और ‘जज़ाकल्लाह’ जैसे शब्द भी कहे। शिकायत की गई कि अधिकारी ने एक बार भी ‘जय हिंद’ या ‘वंदे मातरम’ नहीं बोला। संगठन ने लिखा कि एक ऑन-ड्यूटी अधिकारी को सार्वजनिक तौर पर शब्दों का इस्तेमाल करते समय निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।

    शिकायत के बाद अब बुशरा बानो का ट्रांसफर कर दिया गया है। उन्हें पश्चिम मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर की एडिशनल एसपी पद से हटाकर उन्हें अब स्टेट आर्म्ड पुलिस (SAP) की चौथी बटालियन में ‘डिप्टी कमांडेंट’ बनाया गया है। वहीं चंदननगर पुलिस कमिश्नरेट के एडिशनल डीसी पार्थ घोष को खड़गपुर में बुशरा बानो की जगह नया एडिशनल एसपी तैनात किया गया है।

    भड़क गईं महुआ मोइत्रा

    IPS अधिकारी के ट्रांसफर की खबर आते ही टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भाजपा पर तीखा हमला बोला। महुआ मोइत्रा ने एक्स पर लिखा कि देश नफरत और कट्टरता से भरता जा रहा है। महुआ मोइत्रा ने लिखा, “जिस देश के प्रधानमंत्री ने नए संसद भवन का उद्घाटन सेंगोल और साधुओं के साथ किया था, उस देश में एक मुस्लिम आईपीएस अधिकारी का सिर्फ ‘अस्सलामु अलैकुम’ और ‘इंशाअल्लाह’ कहने पर तबादला कर देना हास्यास्पद है।” उन्होंने आगे कहा, “हम एक ऐसे देश में बदलते जा रहे हैं, जो नफरत और कट्टरता से भरा हुआ है। भगवान ही भारत को बचाए।”

  • सेमीकॉन इंडिया 2026 में पीएम मोदी ने विकसित भारत, स्टार्टअप और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम की दिशा पर विस्तार से बात रखी

    सेमीकॉन इंडिया 2026 में पीएम मोदी ने विकसित भारत, स्टार्टअप और सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम की दिशा पर विस्तार से बात रखी

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार 17 सितंबर को नई दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 का उद्घाटन किया। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़े इस आयोजन का आयोजन 17 से 19 सितंबर तक किया जा रहा है। इस वर्ष कार्यक्रम की थीम ‘सिलिकॉन टू सिस्टम्स: बिल्डिंग द इकोसिस्टम’ रखी गई है। आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी बात रखी और कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों को संबोधित किया।

    सेमीकॉन इंडिया 2026 में भारत के साथ 52 अन्य देशों की कंपनियां भी भाग ले रही हैं। आयोजन में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़े कंपनियों के प्रतिनिधियों के अलावा निवेशक, वैज्ञानिक, स्टार्टअप, छात्र और सरकारी अधिकारी भी शामिल हो रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर से जुड़े काम और कारोबार को आगे बढ़ाने से संबंधित विषयों पर चर्चा के लिए विभिन्न पक्षों को एक मंच पर लाना है।

    इस आयोजन में 600 से ज्यादा प्रदर्शक शामिल हुए हैं। इनमें करीब 300 विदेशी कंपनियां हैं। प्रदर्शकों के लिए 15 हजार वर्ग मीटर का प्रदर्शनी क्षेत्र तैयार किया गया है। कार्यक्रम में 150 से ज्यादा विशेषज्ञ और वक्ता भी हिस्सा ले रहे हैं। वे सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़े नए काम, उपलब्ध अवसर और क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा करेंगे।

    सेमीकॉन इंडिया 2026 में छह देशों के विशेष पवेलियन भी बनाए गए हैं। इनमें जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, नीदरलैंड, सिंगापुर और स्वीडन शामिल हैं। इनके अलावा 12 राज्य सरकारों के पवेलियन भी प्रदर्शनी में मौजूद हैं। इससे विभिन्न देशों और राज्यों की ओर से सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र से जुड़े प्रयासों तथा गतिविधियों को सामने रखने का अवसर मिल रहा है।

    कार्यक्रम में स्टार्टअप और छात्रों के लिए भी विशेष स्थान रखा गया है। करीब 40 स्टार्टअप अपने प्रोजेक्ट और नए विचारों को प्रदर्शित कर रहे हैं। इस तरह आयोजन में उद्योग से जुड़े बड़े संस्थानों के साथ नई तकनीक और नए विचारों पर काम कर रहे स्टार्टअप और छात्रों को भी भागीदारी का अवसर मिला है।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेमीकॉन इंडिया में मौजूद सभी लोगों का स्वागत किया और विश्वकर्मा जयंती की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा को निर्माण और सृजन की शक्ति के प्रतीक के रूप में बताते हुए कहा कि संयोग है कि इसी दिन से सेमीकॉन इंडिया की शुरुआत हो रही है।

    प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के लक्ष्य का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश का प्रत्येक नागरिक एक प्रतिबद्धता के साथ विकसित भारत के निर्माण में जुटा है। उन्होंने बीते 15 दिनों के दौरान भारत में हुए विभिन्न घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए देश की विकास यात्रा की दिशा और गति पर बात रखी।

    प्रधानमंत्री ने सितंबर में मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का उल्लेख किया, जहां एजेंटिक एआई, टोकनाइजेशन और क्वांटम टेक्नोलॉजी के माध्यम से समावेशी वित्त पर चर्चा हुई। उन्होंने इसी अवधि में करीब 3,000 किलोमीटर लंबे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के पूरी तरह चालू होने का भी उल्लेख किया। इसके साथ ही उन्होंने सितंबर में जारी भारत की तिमाही जीडीपी रिपोर्ट का जिक्र करते हुए विकास से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी सामने रखी।

  • दिल्ली की वोटर लिस्ट से 47 लाख नाम हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, SIR पर 21 सितंबर को होगी अहम सुनवाई

    दिल्ली की वोटर लिस्ट से 47 लाख नाम हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, SIR पर 21 सितंबर को होगी अहम सुनवाई

    नई दिल्ली ।दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के तहत तैयार की गई ड्राफ्ट मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस मामले में दायर याचिका पर 21 सितंबर को सुनवाई होगी। याचिका में दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए नामों और इस प्रक्रिया के तहत जारी किए गए नोटिस को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

    31 अगस्त को SIR के तहत दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी। इसमें कुल करीब 1.45 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 47 लाख नाम हटा दिए गए। नामों को हटाने के पीछे अलग-अलग कारण बताए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 43.32 लाख से अधिक मतदाता ऐसे पाए गए जो या तो स्थानांतरित हो चुके थे या अपने दर्ज पते पर मौजूद नहीं मिले।

    इसके अलावा करीब 2.82 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया, जबकि 1.41 लाख से अधिक मतदाता एक से ज्यादा स्थानों पर पंजीकृत पाए गए। इन आंकड़ों के आधार पर बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए। इस प्रक्रिया को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है।

    मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष दावा किया कि दिल्ली में करीब 47 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से करीब 33 लाख लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं।

    याचिका में नोटिस से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नोटिस पाने वाले लोगों के नाम और मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इस वजह से प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।

    मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष होगी। अदालत ने इस मामले से संबंधित सुनवाई के लिए 21 सितंबर की तारीख तय की है। पीठ ने यह भी कहा कि अगले सप्ताह इस विषय से जुड़े कई मामले सूचीबद्ध हैं।

    SIR के तहत तैयार की गई ड्राफ्ट सूची में नाम शामिल नहीं होने से जुड़े मामलों पर आगे की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। ड्राफ्ट सूची अंतिम मतदाता सूची नहीं होती और इसमें नाम से संबंधित आपत्ति या दावा दर्ज कराने की प्रक्रिया का प्रावधान रहता है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावित मतदाता अपना पक्ष रख सकते हैं।

    दिल्ली की मतदाता सूची में SIR के तहत हुए इस पुनरीक्षण के बाद सामने आए आंकड़ों ने बड़ी संख्या में नामों के ड्राफ्ट सूची से बाहर होने का मुद्दा सामने रखा है। एक तरफ नाम हटाए जाने के लिए स्थानांतरण, पते पर मौजूद नहीं होना, मृत्यु और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण जैसे कारण बताए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ याचिका में नोटिस पाने वाले लोगों और नाम हटाने के आधार को सार्वजनिक करने से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।

    अब 21 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई में इस मामले से जुड़े पक्षों की दलीलें सामने आएंगी। सुनवाई के दौरान दिल्ली की SIR प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए नामों और नोटिस से जुड़े मुद्दों पर अदालत के समक्ष पक्ष रखा जाएगा।

  • केन्द्रीय मंत्रियों को दिल्ली में रहने का आदेश…. अगले हफ्ते PM मोदी करेंगे दो दिनी चिंतन बैठक

    केन्द्रीय मंत्रियों को दिल्ली में रहने का आदेश…. अगले हफ्ते PM मोदी करेंगे दो दिनी चिंतन बैठक


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) अगले हफ्ते केंद्रीय मंत्रियों (Union Ministers) के साथ दो दिवसीय ‘चिंतन बैठक’ करेंगे। 23 और 24 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली इस बैठक में सरकार के कामकाज, नीतियों और सुधारों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर मंथन होगा। सूत्रों के मुताबिक, सभी केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों को अगले हफ्ते दिल्ली में मौजूद रहने को कहा गया है। बैठक में केंद्रीय राज्य मंत्री शामिल होंगे या नहीं, इसे लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है।


    सुधारों पर मंत्रियों की होगी प्रेजेंटेशन

    बैठक में कुछ मंत्री अपने-अपने मंत्रालयों में किए गए काम और अलग-अलग क्षेत्रों में सुधारों को लेकर उठाए गए कदमों पर प्रेजेंटेशन दे सकते हैं। इस दौरान यह चर्चा भी हो सकती है कि सरकारी नीतियों को ज्यादा असरदार कैसे बनाया जाए और उनका फायदा आम लोगों तक तेजी से कैसे पहुंचाया जाए। प्रधानमंत्री मोदी पहले भी मंत्रियों से कह चुके हैं कि लोगों की समस्याओं का समाधान करना और उनका जीवन आसान बनाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।


    योजनाओं की प्रगति से लेकर सरकारी सेवाओं तक पर नजर

    ‘चिंतन बैठक’ में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं की प्रगति और उनके जमीन पर क्रियान्वयन की भी समीक्षा हो सकती है। चर्चा इस बात पर होगी कि योजनाओं का लाभ लोगों तक किस तरह और बेहतर तरीके से पहुंचाया जाए। इसके अलावा सरकारी सेवाओं को ज्यादा प्रभावी बनाने और अलग-अलग मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करने के तरीकों पर भी मंथन होने की संभावना है।


    आगे की रणनीति और सरकार के रोडमैप पर भी फोकस

    दो दिन चलने वाली इस बैठक में समय प्रबंधन, मंत्रालयों के बीच समन्वय और नीतियां बनाने की प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने जैसे मुद्दे भी उठ सकते हैं। अब तक किए गए काम की समीक्षा के साथ आगे की प्राथमिकताओं और सरकार के अगले रोडमैप पर भी चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि बैठक का बड़ा फोकस शासन व्यवस्था को और प्रभावी बनाने, सुधारों को गति देने और सरकारी योजनाओं का लाभ आम लोगों तक बेहतर तरीके से पहुंचाने पर रहेगा।


    पिछले हफ्ते राज्य मंत्रियों के साथ हुई थी लंबी बैठक

    बता दें कि पीएम मोदी ने अपनी सरकार के राज्य मंत्रियों के साथ भी लंबी बैठक की थी। इस दौरान मंत्रालयों के कामकाज और अब तक की प्रगति की समीक्षा की गई थी। इससे पहले हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में भी अलग-अलग मंत्रालयों की उपलब्धियों पर चर्चा हुई थी। काम की रफ्तार, फाइलों के निपटारे और अदालतों में लंबित सरकारी मामलों जैसे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए मंत्रालयों की रैंकिंग भी की गई थी। यह ‘चिंतन बैठक’ ऐसे वक्त हो रही है, जब मोदी मंत्रिपरिषद में फेरबदल की अटकलें तेज हैं। इसके अलावा मोदी सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर भी विचार कर रही है।

  • PM मोदी आज मना रहे अपना 76वां जन्मदिन, जानिए उनकी उपलब्धियां और कीर्तिमान…

    PM मोदी आज मना रहे अपना 76वां जन्मदिन, जानिए उनकी उपलब्धियां और कीर्तिमान…


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) आज अपना 76वां जन्मदिन (76th Birthday) मना रहे हैं। केंद्र की सत्ता में रहते हुए यह उनका 13वां जन्मदिन है। गुरुवार सुबह से ही उन्हें देश-विदेश से बधाई मिलने का सिलसिला जारी है। अगर मोदी के पीएम के तौर पर कार्यकाल को देखा जाए तो बीते 12 वर्षों के अपने शासन में प्रधानमंत्री (Prime Minister) के तौर पर उन्होंने कई उपलब्धियां (Achievements) हासिल की हैं। फिर चाहे देश की अर्थव्यवस्था को गति देने की बात हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने का विषय। इन पहलुओं के साथ पीएम मोदी ने निजी तौर पर भी कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

    उनके कीर्तिमानों मे सबसे लंबे समय तक अलग-अलग स्तरों पर सरकार चलाने वाले नेता के साथ-साथ सबसे लंबे समय तक गैर-कांग्रेसी पीएम रहने तक की उपलब्धि शामिल है। इसी साल पीएम मोदी ने भारत पर लगातार सबसे लंबा शासन करने वाले प्रधानमंत्री बनने का कीर्तिमान भी अपने नाम किया। वे लगातार शासन के मामले में पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लगातार 4398 दिन शासन (चुने हुए प्रधानमंत्री के तौर पर) करने के रिकॉर्ड को जून में तोड़ चुके हैं।

    हालांकि, यह सिर्फ कुछ रिकॉर्ड हैं, जिन्हें पीएम मोदी ने छुआ है। अभी कई और कीर्तिमान उनकी झोली में गिरना बाकी है। वहीं, कुछ और रिकॉर्ड ऐसे भी हैं, जो फिलहाल उनकी पहुंच से दूर हैं और उन्हें पार करने के लिए मोदी को कम से कम एक और कार्यकाल के लिए पीएम बनना होगा।

    ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक कौन-कौन से रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं? इनके जरिए उन्होंने किन नेताओं के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ा? अब वे कौन सा रिकॉर्ड तोड़ने के बेहद करीब आ चुके हैं? इसके अलावा वे कौन से और किन नेताओं के रिकॉर्ड हैं, जो फिलहाल पीएम मोदी की पहुंच से दूर हैं और इन्हें हासिल करने में कितना समय लग सकता है?

    पीएम मोदी ने अब तक कौन-कौन से रिकॉर्ड तोड़े?
    1. भारत में सरकार के प्रमुख के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल (राज्य और केंद्र मिलाकर)
    22 मार्च 2026 को पीएम मोदी राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों को मिलाकर भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सरकार चलाने वाले नेता बन गए थे। लगातार कार्यकारी पद पर बने रहने के मामले में उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के 8,930 दिनों के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।

    पीएम मोदी के लिए यह पूरी उपलब्धि सिर्फ किसी एक सरकार का नेतृत्व करते हुए नहीं आई है। बल्कि उनकी इस उपलब्धि में 15 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड और अब लगातार करीब 12 साल से प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड शामिल है।

    गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 12 वर्ष से अधिक (अक्तूबर 2001 – मई 2014)
    भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 12 वर्ष से अधिक (मई 2014 – वर्तमान)


    2. सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री

    पीएम मोदी कांग्रेस पार्टी से बाहर के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने इस मामले में अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल को काफी पीछे छोड़ दिया है। इसके अलावा, वह पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी नेता हैं, जिन्होंने संसद में लगातार दो बार पूर्ण बहुमत (2014 और 2019 दोनों में) की सरकार बनाई। इनमें जहां भाजपा अपनी दम पर बहुमत के आंकड़े- 272 के पार थी, वहीं एनडीए का आंकड़ा 300 के पार ही था।


    3. लगातार तीन आम चुनाव में जीत

    2024 के आम चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में लगातार तीन कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले इतिहास के दूसरे भारतीय नेता बने। उनसे पहले यह उपलब्धि केवल जवाहरलाल नेहरू के नाम थी।


    4. अजेय कार्यकारी सफर

    अक्तूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार नियुक्त होने के बाद से, वह सत्ता में रहते हुए कभी कोई चुनाव नहीं हारे हैं और उन्होंने एक भी दिन निर्वाचित कार्यकारी पद से बाहर नहीं बिताया है।

    पीएम मोदी ने अब कौन सा रिकॉर्ड तोड़ा?
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 जून 2026 को एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले चुने हुए लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री बन गए। वह देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार कार्यकाल वाले 64 साल पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार, आजादी के बाद देश के पहले आम चुनावों के बाद गठित पहली लोकसभा का गठन 17 अप्रैल 1952 को हुआ था। उसकी पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई थी और इसी दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उस लिहाज से देखा जाए तो जहां नेहरू पहला चुनाव जीतने के बाद लगातार 4398 दिन (12 साल 15 दिन) तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वहीं, पीएम मोदी ने आज (बुधवार) को कुल 4399 दिन लगातार पीएम रहने का गौरव हासिल कर लिया। यानी वे लगातार सबसे लंबे समय तक चुने हुए प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त कर चुके हैं।

    इस रिकॉर्ड की बारीक समझ भी हासिल करना जरूरी है। दरअसल, जवाहरलाल नेहरू का प्रधानमंत्री के रूप में कुल कार्यकाल कुल 6,131 दिन का था। इसकी वजह यह है कि उन्होंने भारत की कमान 1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी के बाद ही संभाल ली थी। तब पीएम पद के लिए कोई चुनाव नहीं हुआ था। देश में पहली बार आम चुनाव 1952 में ही हुए। यानी 1947 से 1952 तक नेहरू पीएम तो रहे, लेकिन उनकी सरकार चुनाव के जरिए नहीं आई थी यानी निर्वाचित नहीं थी। इस लिहाज से आम चुनाव के बाद लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित होकर लगातार प्रधानमंत्री पद पर रहने की अवधि को देखा जाए, तो पीएम मोदी अब नेहरू के रिकॉर्ड को पार कर चुके हैं।


    अभी कौन से रिकॉर्ड पीएम मोदी की पहुंच से दूर?
    1. प्रधानमंत्री के रूप में कुल सबसे लंबा कार्यकाल

    भले ही पीएम मोदी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित होकर लगातार सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर कुल दिनों के मामले में जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड अभी भी सबसे ऊपर है। जवाहरलाल नेहरू का कुल कार्यकाल (1947-1964) 16 वर्ष और 286 दिन का रहा है यानी कुल 6,131 दिन। इसी तरह इंदिरा गांधी ने भी अलग-अलग कार्यकालों में देश पर 15 साल से ज्यादा शासन किया है।

    पीएम मोदी की स्थिति: मई 2014 से अब तक उनका कार्यकाल लगभग 12 वर्ष का हुआ है। नेहरू के इस कुल कार्यकाल के रिकॉर्ड को पार करने के लिए पीएम मोदी को साल 2030 के अंत तक देश का प्रधानमंत्री बने रहना होगा। यानी भाजपा का अगला लोकसभा चुनाव जीतना जरूरी होगा। साथ ही पीएम मोदी का 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद अगले करीब दो साल तक लगातार प्रधानमंत्री बना रहना भी अनिवार्य होगा। तभी नेहरू का यह रिकॉर्ड टूटना संभव हो सकता है।


    2. सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड

    पीएम मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 12 साल से अधिक (4,610 दिन) का समय बिताया, जो एक बड़ा रिकॉर्ड है, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सर्वकालिक इतिहास में उनसे आगे कई नेता हैं। सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग (24 वर्ष, 165 दिन) और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (24 वर्ष, 99 दिन) के नाम भारत में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड है। चूंकि पीएम मोदी अब पूरी तरह राष्ट्रीय राजनीति में हैं, इसलिए मुख्यमंत्री के इस व्यक्तिगत रिकॉर्ड में अब बदलाव होने की संभावना कम ही है।


    3. लोकसभा चुनाव में किसी एक पार्टी द्वारा सर्वाधिक सीटें जीतने का रिकॉर्ड

    चुनावी सफलता के मामले में भाजपा ने पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 (282 सीटें) और 2019 (303 सीटें) में पूर्ण बहुमत हासिल किया, लेकिन भारत के संसदीय इतिहास में एक पार्टी द्वारा सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड अभी भी कांग्रेस के नाम है। यह जीत राजीव गांधी के समय में कांग्रेस को मिली थी। तब पार्टी ने 414 सीट जीत कर इतिहास रच दिया था। यह अब तक का रिकॉर्ड है, जिसे कोई भी दल या यहां तक कि गठबंधन भी नहीं तोड़ पाया है।


    4. चार या अधिक कार्यकाल का रिकॉर्ड

    पीएम मोदी इस समय अपने तीसरे कार्यकाल में हैं, जिससे उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के लगातार तीन बार प्रधानमंत्री चुने जाने के रिकॉर्ड की बराबरी की है। अगर वह 2029 में चौथे कार्यकाल के लिए निर्वाचित होते हैं, तो वह भारत के इतिहास में चार बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले नेता बनकर एक नया रिकॉर्ड कायम करेंगे और चार बार चुने जाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री होंगे।

  • UPI से भुगतान पर 0.4% एमडीआर का विरोध शुरू…. सरकार बोली- वापस नहीं होगा फैसला

    UPI से भुगतान पर 0.4% एमडीआर का विरोध शुरू…. सरकार बोली- वापस नहीं होगा फैसला


    नई दिल्ली।
    यूपीआई (UPI ) के जरिये 2000 से अधिक के भुगतान पर 0.4 फीसदी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (0.4% Merchant Discount Rate- MDR) लगाने का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है। कारोबारी संगठनों ने सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि फैसला वापस नहीं होगा।

    वहीं, बुधवार को टैक्स विशेषज्ञों ने यह खुलासा भी किया कि व्यापारियों को 0.4 फीसदी एमडीआर पर 18 फीसदी जीएसटी भी देना होगा। हालांकि, इसके बदले वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा कर पाएंगे जिससे उनका कुल टैक्स बोझ कम हो जाएगा। एनपीसीआई ने मंगलवार को यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क की घोषणा की थी जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है। यह 15 अक्तूबर से लागू होगा।


    एमडीआर को वापस नहीं लेगी केंद्र सरकार

    सरकारी सूत्रों ने कहा, एमडीआर को वापस नहीं लिया जाएगा। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से जब पूछा गया कि क्या सरकार एमडीआर को वापस लेने पर विचार कर रही है, तो उन्होंने कहा, फैसला लिया जा चुका है और इसे पलटने का सवाल नहीं है। अधिकारी ने कहा, संसद की वित्त मामलों की स्थायी समिति ने 32वीं रिपोर्ट में चेतावनी दी कि शून्य एमडीआर व्यवस्था सरकारी खजाने पर दबाव डालती है और इन्फ्रा में निवेश की क्षमता को सीमित करती है। इसलिए एक टिकाऊ राजस्व व्यवस्था बनाना जरूरी है।


    इन श्रेणियों में 5 रुपये एमडीआर

    रेलवे, टेलीकॉम सर्विस, इंश्योरेंस व फ्यूल जैसी खास श्रेणियों के कारोबारियों के लिए 2,000 रुपये से ज्यादा के भुगतान पर भी सिर्फ 5 रुपये का रियायती एमडीआर रेट लागू होगा। स्कूल फीस भुगतान भी 2000 से ज्यादा होने पर सिर्फ 5 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन एमडीआर लागू होगा।


    एमडीआर लागू करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

    यूपीआई से 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर एमडीआर लगाने के केंद्र के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता ने दाखिल की है। उन्होंने कोर्ट से कहा कि नई व्यवस्था मनमानी व भेदभावपूर्ण है और इससे देश में कारोबारियों पर आर्थिक बोझ पड़ेगा।

    पेट्रोल पंप एसोसिएशन ने वित्त मंत्रालय को भेजा पत्र
    एमडीआर के खिलाफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने मोर्चा खोल दिया है। एसोसिएशन ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर इस फैसले से पेट्रोल पंपों को बाहर रखने की मांग की है। यह स्थिति तब है जबकि पेट्रोप पंपों पर 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर प्रति ट्रांजेक्शन सिर्फ 5 रुपये शुल्क लगाए जाने का फैसला लिया गया है।


    मधुमक्खियों की तरह टैक्स जुटाए सरकार : लाहिड़ी

    नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने के फैसले का बचाव किया। उन्होंने चाणक्य का जिक्र करते हुए कहा, नागरिकों से टैक्स वैसे ही वसूलना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूल से शहद इकट्ठा करती है- धीरे-धीरे और बिना फूल की पंखुड़ियों को नुकसान पहुंचाए या तोड़े।


    फैसले के पीछे कोई विदेशी प्रभाव नहीं : वित्त मंत्रालय

    वित्त मंत्रालय ने बुधवार को कहा, यूपीआई लेन-देन पर 0.4% एमडीआर के फैसले के पीछे कोई विदेशी प्रभाव नहीं है। मंत्रालय ने एक्स पर पोस्ट में कहा, कुछ दावों में कहा गया है कि यह बदलाव विदेशी असर की वजह से हुआ है। यह बात गलत है। भारत के नीतिगत फैसले आजादी से लिए जाते हैं।

  • यूपी में सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे पर पेच, दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर नहीं बन रही सहमति

    यूपी में सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे पर पेच, दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर नहीं बन रही सहमति


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत तेज हो गई है, लेकिन दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर अभी सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है, जबकि सपा का जोर सीटों की संख्या के बजाय उम्मीदवार की मजबूती और संबंधित सीट पर जीत की संभावनाओं पर है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक सपा करीब 60 से 70 सीटों के विकल्प पर विचार कर रही है, जबकि कांग्रेस करीब 105 सीटों की मांग कर रही है।

    2017 के फॉर्मूले को आधार बना रही कांग्रेस

    कांग्रेस की दलील है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के तहत उसने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसी आधार पर पार्टी इस बार भी 100 से अधिक सीटों की हिस्सेदारी चाह रही है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी जुलाई में गठबंधन में ‘बराबरी और सम्मान’ की बात कही थी।

    हालांकि, 2017 के मुकाबले मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। 2022 में सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। यही वजह है कि सीटों के बंटवारे में पिछली बार के आंकड़े के बजाय मौजूदा संगठन और उम्मीदवारों की स्थिति को भी महत्व दिया जा रहा है।

    सपा का फोकस ‘कितनी सीटें’ नहीं, ‘कौन जीत सकता है’

    अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि गठबंधन में मुद्दा सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता है। सपा के भीतर सीटवार राजनीतिक स्थिति और संभावित उम्मीदवारों के आधार पर हिस्सेदारी तय करने की बात कही जा रही है।

    ताजा रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस से उन सीटों पर संभावित उम्मीदवारों की जानकारी भी मांगी जा रही है, जिन पर वह दावा कर रही है। इसके बाद स्थानीय राजनीतिक समीकरण, संगठन की स्थिति और उम्मीदवार की जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखकर सीटों पर फैसला किए जाने की बात सामने आई है।

    रायबरेली-अमेठी समेत कई सीटों पर खींचतान

    सीटों की कुल संख्या के अलावा कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों को लेकर भी दोनों दलों के बीच मतभेद की खबरें हैं। रिपोर्टों में रायबरेली और अमेठी का नाम प्रमुखता से सामने आया है। अंतिम फॉर्मूला तय होने से पहले सीटवार दावों पर बातचीत जारी है।

    कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की छह सीटें जीती थीं, जबकि सपा ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी। दोनों दलों ने मिलकर राज्य की 80 लोकसभा सीटों में 43 सीटें जीती थीं।

    2022 में अलग-अलग लड़े थे दोनों दल

    2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। सपा ने 111 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। सपा के साथ तब राष्ट्रीय लोक दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे दल भी गठबंधन में थे। बाद में दोनों दल सपा से अलग हो गए।

    अब 2027 के चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस फिर साथ आने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के सामने सीटों की संख्या के साथ-साथ यह सवाल भी है कि किन क्षेत्रों में किस पार्टी का संगठन और उम्मीदवार गठबंधन के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

    राजभर-निषाद को लेकर भी सपा ने रुख स्पष्ट किया

    इसी बीच सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को लेकर भी राजनीतिक अटकलें चलती रही हैं। दोनों नेता उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं और उनके दल एनडीए का हिस्सा हैं।

    आपकी मूल कॉपी में सपा के एक रणनीतिकार के हवाले से दावा किया गया है कि पार्टी ने पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को सुभासपा या निषाद पार्टी से गठजोड़ का प्रस्ताव लाने पर संगठनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती, इसलिए इसे सपा सूत्र/रणनीतिकार के दावे के रूप में ही प्रकाशित करना सुरक्षित होगा।

    फिलहाल सपा-कांग्रेस के बीच बातचीत का अंतिम नतीजा सामने नहीं आया है। सीटों की संख्या के साथ-साथ विधानसभा क्षेत्रवार दावों और संभावित उम्मीदवारों पर सहमति बनने के बाद ही गठबंधन का वास्तविक फॉर्मूला स्पष्ट होगा।

  • Gen-Z से मातृशक्ति और बुजुर्गों तक… PM मोदी का संवाद कैसे बदलता रहा, हर पीढ़ी के लिए है अलग अंदाज

    Gen-Z से मातृशक्ति और बुजुर्गों तक… PM मोदी का संवाद कैसे बदलता रहा, हर पीढ़ी के लिए है अलग अंदाज


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज 76वां जन्मदिन है। 7 सितंबर 1950 को जन्मे मोदी इस वर्ष 76 वर्ष के हो रहे हैं और 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। करीब 12 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में उनकी राजनीति के साथ उनके संवाद का तरीका भी लगातार बदलता दिखाई देता है। युवाओं के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल क्रिएटर, छात्रों के लिए ‘परीक्षा पे चर्चा’, महिलाओं के लिए ‘माताओं-बहनों-बेटियों’ का संबोधन और बुजुर्गों-परिवारों तक पहुंचने के लिए ‘मन की बात’ जैसे अलग-अलग माध्यम उनके सार्वजनिक संवाद का हिस्सा रहे हैं।

    मोदी के संचार की खासियत पर चर्चा करते समय एक बात बार-बार सामने आती है—वे अलग-अलग वर्गों से बातचीत में अलग भाषा, माध्यम और संदर्भ इस्तेमाल करते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर युवाओं से संवाद तक, उनके सार्वजनिक संचार का दायरा पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से आगे बढ़ा है।

    Gen-Z के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया
    आज की Gen-Z पीढ़ी के संवाद के तरीके को पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से अलग माना जाता है। इसी बदलाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी गेमिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप और डिजिटल क्रिएटर इकोसिस्टम जैसे विषयों पर युवाओं से बातचीत करते रहे हैं।

    2024 में पहली बार आयोजित नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड इसी डिजिटल इकोसिस्टम को औपचारिक पहचान देने वाली पहल के तौर पर सामने आया। इसमें कहानी कहने, सामाजिक बदलाव, शिक्षा, गेमिंग, तकनीक और दूसरे डिजिटल क्षेत्रों में काम करने वाले क्रिएटर्स को शामिल किया गया था।

    जुलाई 2026 में इंस्टाग्राम की एक रील पर 24 घंटे में 300 मिलियन यानी 30 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिलने का दावा भी सोशल मीडिया पर मोदी की डिजिटल मौजूदगी को लेकर चर्चा में रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री का सार्वजनिक संवाद अब केवल टीवी, अखबार और रैलियों तक सीमित नहीं है।

    ‘परीक्षा पे चर्चा’ में प्रधानमंत्री नहीं, मेंटर की भूमिका
    बोर्ड परीक्षाओं के समय प्रधानमंत्री का संवाद एक अलग रूप लेता है। ‘परीक्षा पे चर्चा’ में वे छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से परीक्षा के तनाव, आत्मविश्वास और पढ़ाई से जुड़े सवालों पर बातचीत करते हैं।

    2026 के संस्करण में 4.5 करोड़ से ज्यादा पंजीकरण हुए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री छात्रों के सवाल लेते हैं, रोजमर्रा के उदाहरणों के जरिए जवाब देते हैं और पढ़ाई के साथ खेल, आराम, कौशल तथा रुचियों के संतुलन पर बात करते हैं।

    यही वजह है कि ‘परीक्षा पे चर्चा’ की भाषा सामान्य राजनीतिक भाषणों से अलग दिखाई देती है। यहां विषय सत्ता या राजनीति नहीं, बल्कि छात्र की रोजमर्रा की जिंदगी होती है। ‘एग्जाम वारियर्स’ जैसे संबोधन के जरिए परीक्षा के दबाव को कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश की जाती है।

    महिलाओं से संवाद में योजनाओं के साथ पहचान
    महिलाओं को संबोधित करते समय प्रधानमंत्री के भाषणों में ‘माताओं, बहनों और बेटियों’ जैसे शब्द नियमित रूप से सुनाई देते हैं। लाल किले की प्राचीर से सैनिटरी पैड, पीरियड पॉवर्टी और घर में शौचालय जैसे विषयों का उल्लेख भी उनके सार्वजनिक भाषणों का हिस्सा रहा है।

    सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं को भी इसी संवाद के साथ जोड़ा गया। उज्ज्वला योजना के जरिए रसोई के धुएं से राहत, लखपति दीदी के जरिए आर्थिक मजबूती और ड्रोन दीदी के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल को भाषणों में जगह मिली।

    इन योजनाओं के नाम और उनसे जुड़े संबोधन ऐसे रखे गए हैं, जिन्हें महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन और अनुभवों से जोड़कर पेश किया जा सके।

    बुजुर्गों और परिवारों तक ‘मन की बात’
    डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने के बावजूद प्रधानमंत्री ने रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम को भी लगातार इस्तेमाल किया है। ‘मन की बात’ के जरिए वे हर महीने देशवासियों से संवाद करते हैं। इस कार्यक्रम में अक्सर गुमनाम नायकों, ग्रामीण नवाचारों, स्थानीय उपलब्धियों और सामाजिक पहलों की चर्चा होती है।

    इस माध्यम की पहुंच रेडियो सुनने वाले परिवारों और गांवों तक है। इसलिए मोदी के संचार में एक तरफ इंस्टाग्राम और डिजिटल क्रिएटर्स हैं तो दूसरी तरफ रेडियो और चौपाल जैसी पारंपरिक पहुंच भी बनी हुई है।

    स्थानीय भाषा और संस्कृति का इस्तेमाल
    मोदी के सार्वजनिक भाषणों में स्थानीय संदर्भों का इस्तेमाल भी दिखाई देता है। किसी राज्य में पहुंचने पर वहां के त्योहार, परंपरा, खान-पान, स्थानीय व्यक्तित्व और क्षेत्रीय भाषा का उल्लेख उनके संबोधन का हिस्सा रहा है।

    सांस्कृतिक विषयों को लेकर काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसे संदर्भ भी उनके भाषणों में दिखाई देते हैं। इन विषयों के जरिए वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दों को अपने संवाद में जगह देते हैं।

    ‘मित्रों’ से ‘मेरे परिवारजनों’ तक
    मोदी के संबोधन समय के साथ बदलते रहे हैं। ‘मित्रों’ और ‘भाइयों-बहनों’ जैसे संबोधनों के साथ अब ‘मेरे परिवारजनों’ जैसे शब्द भी उनके भाषणों में सुनाई देते हैं। इसके साथ ही वे कई बार जटिल नीतिगत विषयों को आंकड़ों के बजाय छोटी घटनाओं और प्रेरक कहानियों के माध्यम से समझाने की कोशिश करते हैं।

    किसी राज्य में भाषण की शुरुआत वहां की क्षेत्रीय भाषा में करना भी उनके संवाद का एक हिस्सा रहा है। इससे भाषण के शुरुआती क्षणों में ही स्थानीय संदर्भ जुड़ जाता है।

    कुल मिलाकर मोदी के सार्वजनिक संवाद में माध्यम और भाषा दोनों का विस्तार दिखाई देता है—एक ओर सोशल मीडिया पर Gen-Z और डिजिटल क्रिएटर्स हैं, तो दूसरी ओर ‘मन की बात’ के जरिए रेडियो सुनने वाले परिवार और स्थानीय भाषाओं-सांस्कृतिक संदर्भों के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों के लोग। यही बहुस्तरीय संचार शैली उनके करीब 12 वर्ष के प्रधानमंत्री कार्यकाल में लगातार दिखाई देती रही है।