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  • PM मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन पर BJP का बड़ा अभियान: भारत रत्न के सवाल पर नड्डा ने दिया जवाब

    PM मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन पर BJP का बड़ा अभियान: भारत रत्न के सवाल पर नड्डा ने दिया जवाब


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत रत्न दिए जाने की चर्चाओं के बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का बयान सामने आया है। भाजपा की ओर से 17 सितंबर से सेवा संकल्प अभियान शुरू किया जा रहा है। इसी अभियान को लेकर यह सवाल उठाया गया कि क्या अभियान के समापन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का कोई प्रस्ताव लाया जा सकता है। इस सवाल पर जेपी नड्डा ने कहा कि इस संबंध में अभी तक पार्टी के भीतर कोई चर्चा नहीं हुई है।

    बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान नड्डा से प्रधानमंत्री मोदी को भारत रत्न दिए जाने की संभावनाओं को लेकर सवाल किया गया। जवाब में उन्होंने कहा कि सर्वोच्च नागरिक सम्मान से जुड़े मामलों पर पार्टी उचित समय पर फैसला करती है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई है। हालांकि पूछे गए सुझाव को उन्होंने अच्छा बताया। नड्डा के इस बयान के बाद भारत रत्न को लेकर चल रही अटकलों को लेकर स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट हुई है।

    दरअसल भाजपा 17 सितंबर से सेवा संकल्प अभियान शुरू करने जा रही है। यह अभियान 17 अक्टूबर तक चलेगा। पार्टी के अनुसार अभियान का उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विभिन्न सेवा गतिविधियों का आयोजन करना है। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से देशभर में सफाई अभियान रक्तदान शिविर मेडिकल कैंप और अन्य सामाजिक सेवा से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने का यह पड़ाव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद उन्होंने गुजरात की राजनीति में लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया। वर्ष 2014 में भाजपा की लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वह लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद पर बने रहे।

    प्रधानमंत्री मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था। ऐसे में 17 सितंबर को उनका जन्मदिन भी है और इसी दिन भाजपा अपने सेवा संकल्प अभियान की शुरुआत करने जा रही है। पार्टी की ओर से इस दौरान अलग अलग राज्यों और शहरों में सेवा से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है।

    नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुई थी। वर्ष 1970 के दशक में वह संघ से जुड़े और बाद में प्रचारक की भूमिका में काम किया। इसके बाद वर्ष 1987 में वह भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और गुजरात संगठन में जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2001 में उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद उन्होंने कई चुनावों में पार्टी का नेतृत्व किया।

    अब भारत रत्न को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच जेपी नड्डा के बयान से इतना स्पष्ट है कि फिलहाल भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री मोदी को यह सम्मान देने को लेकर किसी चर्चा की पुष्टि नहीं की गई है। वहीं सेवा संकल्प अभियान के जरिए भाजपा प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों को अलग अलग सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से चिह्नित करने जा रही है।

  • दिल्ली एयरपोर्ट पर बड़ी सुरक्षा चूक, बिना इमिग्रेशन क्लीयरेंस तीन इटालियन नागरिक म्यूनिख रवाना, एयर इंडिया को नोटिस

    दिल्ली एयरपोर्ट पर बड़ी सुरक्षा चूक, बिना इमिग्रेशन क्लीयरेंस तीन इटालियन नागरिक म्यूनिख रवाना, एयर इंडिया को नोटिस

    नई दिल्ली ।दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सुरक्षा और इमिग्रेशन व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चूक का मामला सामने आया है। तीन इटालियन नागरिक बिना दिल्ली में अनिवार्य डिपार्चर इमिग्रेशन कराए ही विदेश रवाना हो गए। तीनों यात्री दिल्ली से म्यूनिख जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ान में सवार हुए। मामले के सामने आने के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और संबंधित व्यवस्थाओं की जांच शुरू कर दी गई है।

    मामला 3 और 4 सितंबर की दरमियानी रात का बताया गया है। तीनों इटालियन नागरिक अमृतसर से एयर इंडिया की हब-एंड-स्पोक उड़ान AI-1115 से दिल्ली पहुंचे थे। यह विमान रात करीब 12:50 बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा। दिल्ली पहुंचने के बाद तीनों यात्रियों को डोमेस्टिक बोर्डिंग पास जारी किया गया था।

    इसके बावजूद यात्रियों को गलत तरीके से इंटरनेशनल ट्रांसफर क्षेत्र में पहुंचा दिया गया। वहां से वे सीधे अंतरराष्ट्रीय डिपार्चर जोन तक पहुंच गए। इसके बाद 4 सितंबर की तड़के करीब 1:45 बजे तीनों लुफ्थांसा की उड़ान LH-763 से म्यूनिख के लिए रवाना हो गए। खास बात यह रही कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्होंने दिल्ली में डिपार्चर इमिग्रेशन क्लीयरेंस नहीं कराया।

    मामले में सबसे बड़ा सवाल एयरपोर्ट पर लागू मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP को लेकर उठ रहा है। यात्रियों के पास डोमेस्टिक बोर्डिंग पास होने के बावजूद वे इंटरनेशनल डिपार्चर क्षेत्र तक कैसे पहुंच गए और उन्हें वहां जाने से रोकने वाली व्यवस्था ने काम क्यों नहीं किया, इसकी जांच की जा रही है।

    नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिचालन से संबंधित SOP में पांच व्यवस्थाओं के कथित उल्लंघन को चिन्हित किया है। इनमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को अलग रखना, केवल ‘I’ बोर्डिंग पास वाले यात्रियों को इंटरनेशनल-टू-इंटरनेशनल ट्रांसफर डेस्क तक जाने की अनुमति देना और हब तथा स्पोक एयरपोर्ट पर चौबीसों घंटे नोडल अधिकारी एवं मॉनिटरिंग टीम की व्यवस्था शामिल है।

    मंत्रालय के अनुसार इस मामले में यात्रियों की निगरानी और उन्हें निर्धारित मार्ग से भेजने की व्यवस्था प्रभावी तरीके से काम नहीं कर सकी। इसी वजह से तीन यात्री उस प्रक्रिया को पार कर अंतरराष्ट्रीय उड़ान तक पहुंच गए, जिसे उनके लिए लागू नहीं होना चाहिए था।

    घटना को गंभीरता से लेते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया से जवाब मांगा है। एयरलाइन को कारण बताओ नोटिस जारी कर मामले में स्पष्टीकरण देने को कहा गया है। जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यात्रियों के गलत मार्ग से इंटरनेशनल डिपार्चर तक पहुंचने के पीछे किस स्तर पर चूक हुई।

    मामले में गृह मंत्रालय ने भी गंभीरता दिखाई है। गृह मंत्रालय, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और अन्य संबंधित एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों की मंगलवार शाम एक आपात बैठक बुलाई गई। बैठक में घटना से जुड़े सुरक्षा और इमिग्रेशन पहलुओं पर चर्चा किए जाने की बात सामने आई है।

    फिलहाल जांच का मुख्य फोकस यह पता लगाने पर है कि तीनों यात्रियों को घरेलू बोर्डिंग पास के बावजूद अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र तक पहुंचने की अनुमति कैसे मिली। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया में एयरलाइन स्टाफ की लापरवाही थी या एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षा और संबंधित एजेंसियों की व्यवस्था में कमी रही।

    मामला सामने आने के बाद एयरपोर्ट पर यात्रियों की आवाजाही, बोर्डिंग पास की जांच और घरेलू से अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में प्रवेश की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है और आगे ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

  • ममता बनर्जी ने कांग्रेस से मांगी चुनावी मदद, नंदीग्राम छोड़ने की पेशकश के बावजूद दोनों सीटों पर गठबंधन से इनकार

    ममता बनर्जी ने कांग्रेस से मांगी चुनावी मदद, नंदीग्राम छोड़ने की पेशकश के बावजूद दोनों सीटों पर गठबंधन से इनकार

    नई दिल्ली । ममता बनर्जी के सामने पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा उपचुनावों को लेकर चुनौती बढ़ती दिखाई दे रही है। खबरों के अनुसार, उन्होंने नंदीग्राम और रेजीनगर सीट पर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। इसके तहत नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने और रेजीनगर में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, टीएमसी या कांग्रेस की ओर से इस बातचीत को लेकर अब तक आधिकारिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार शाम ममता बनर्जी ने कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से बातचीत की थी। बताया गया है कि बातचीत के दौरान उन्होंने उपचुनाव में साथ आने का प्रस्ताव रखा। ममता बनर्जी की ओर से नंदीग्राम में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने और रेजीनगर सीट पर टीएमसी उम्मीदवार के लिए कांग्रेस का समर्थन मांगे जाने की बात कही गई है। इसके साथ ही नंदीग्राम से टीएमसी उम्मीदवार का नाम वापस लेने की पेशकश किए जाने का भी दावा किया गया है।

    हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। सामने आई जानकारी के मुताबिक, पार्टी ने टीएमसी के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। कांग्रेस की ओर से कथित तौर पर कहा गया है कि यदि टीएमसी गठबंधन चाहती है तो उसे नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर कांग्रेस का समर्थन करना होगा। टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कथित अत्याचारों को भी इस फैसले की वजह बताया गया है।

    ममता बनर्जी की ओर से कांग्रेस से संपर्क किए जाने की खबर ऐसे समय आई है, जब दोनों दल उपचुनाव में अलग-अलग मैदान में उतर रहे हैं। कांग्रेस ने नंदीग्राम से मिलन प्रधान और रेजीनगर से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल कफी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, टीएमसी ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को टिकट दिया है।

    नंदीग्राम सीट ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में वह इसी सीट से चुनाव हार गई थीं। आगामी उपचुनाव को लेकर ऐसी अटकलें भी थीं कि ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से मैदान में उतर सकती हैं, लेकिन टीएमसी ने यहां संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं और उनके नाम को वर्ष 2014 के शिक्षक भर्ती घोटाले से जोड़कर चर्चा की जा रही है।

    इस बीच टीएमसी के भीतर बगावत का असर भी दोनों सीटों पर दिखाई दे रहा है। ऋताब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले बागी गुट ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। नंदीग्राम से मोहम्मद एतेशामुल हक और रेजीनगर से सफीउज्जमां शेख को उम्मीदवार बनाया गया है। यह गुट टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि 9 अक्टूबर को मतगणना होगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के कारण उपचुनाव की स्थिति बनी है। इसी बीच टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी निर्वाचन आयोग में मामला चल रहा है। बताया जा रहा है कि आयोग 17 सितंबर से पहले इस पर फैसला ले सकता है।

    विधानसभा चुनाव में अविभाजित टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं। बाद में 60 से अधिक विधायकों के ऋताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चले जाने का दावा किया गया। ऐसे में उपचुनाव से पहले कांग्रेस से गठबंधन की कथित कोशिश और बागी गुट की सक्रियता ने ममता बनर्जी के सामने राजनीतिक चुनौती को और बढ़ा दिया है।

  • टीएमसी के 17 सांसद भाजपा में जा सकते हैं, यूसुफ पठान समेत तीन ने NDA को बाहर से समर्थन देने का किया ऐलान

    टीएमसी के 17 सांसद भाजपा में जा सकते हैं, यूसुफ पठान समेत तीन ने NDA को बाहर से समर्थन देने का किया ऐलान

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। टीएमसी छोड़कर नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में शामिल हुए बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि गुट के 17 सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो सकते हैं। उनके इस दावे के बाद यूसुफ पठान, सायोनी घोष समेत कई नेताओं को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, बागी गुट के एक अन्य नेता ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि भाजपा में शामिल होने की कोई योजना नहीं है।

    बसुनिया के अनुसार, 17 सांसद भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं और इस संबंध में प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा चुका है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दल बदल की प्रक्रिया दुर्गा पूजा के बाद हो सकती है। इससे पहले टीएमसी के 20 सांसद अलग होकर NCPI में शामिल हुए थे और उन्होंने NDA को समर्थन देने की घोषणा की थी।

    बागी गुट में शामिल अबू ताहेर खान ने बसुनिया के दावे पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि बसुनिया को पूरे गुट की ओर से बयान देने का अधिकार नहीं है। खान ने स्पष्ट किया कि वे भाजपा में नहीं जाएंगे और न ही NDA में शामिल होंगे। उन्होंने जंगीपुर के सांसद खलीलुर रहमान और बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान का भी नाम लिया। उनके मुताबिक तीनों सांसद NDA को बाहर से समर्थन देंगे, लेकिन भाजपा या NDA का हिस्सा नहीं बनेंगे।

    अबू ताहेर खान ने यह भी स्पष्ट किया कि यूसुफ पठान, खलीलुर रहमान और उनके जैसे नेता भाजपा या NDA की बैठकों में शामिल नहीं होंगे। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से विकास से जुड़े मुद्दों पर बुलाई जाने वाली बैठकों में शामिल होने पर उन्होंने सहमति जताई है।

    सायोनी घोष को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। बसुनिया ने 17 सांसदों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। ऐसे में यह तय नहीं है कि घोष उन सांसदों में शामिल हैं या नहीं। कुल 20 सांसदों के टीएमसी से अलग होने की बात सामने आई है, जिनमें से तीन ने भाजपा में शामिल नहीं होने और NDA को बाहर से समर्थन देने की बात कही है। इसलिए बाकी सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे और अटकलें जारी हैं।

    यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम बंगाल में कोलकाता नगर निगम और हावड़ा नगर निगम समेत स्थानीय चुनावों की तैयारियां चल रही हैं। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वह इन चुनावों में अपने दम पर मैदान में उतरेगी। पार्टी के सत्ता में आने के बाद राज्य में पहली बार होने वाले इन चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हुई हैं।

    भाजपा की ओर से भी फिलहाल बागी सांसदों को पार्टी में शामिल करने की किसी तत्काल योजना से इनकार किया गया है। पार्टी प्रवक्ता देबजीत सरकार ने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार टीएमसी या NCPI से कोई भी व्यक्ति भाजपा में शामिल नहीं हो रहा है। उन्होंने टीएमसी शासन के दौरान इन नेताओं और सांसदों की भूमिका पर भी सवाल उठाया।

    इसी बीच आगामी नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों के उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। टीएमसी में सांसदों के अलावा विधायक स्तर पर भी टूट की चर्चा है। ऋताब्रत बनर्जी गुट के साथ 60 से अधिक विधायकों के होने का दावा किया जा रहा है। पार्टी ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में सांसदों के संभावित दल बदल को लेकर चल रही अटकलों के बीच आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • राष्ट्रपति का ADC बनने की राह कितनी कठिन? 14 दिन चलता है इंटरव्यू, ऐसे होता है अधिकारियों का चयन

    राष्ट्रपति का ADC बनने की राह कितनी कठिन? 14 दिन चलता है इंटरव्यू, ऐसे होता है अधिकारियों का चयन


    नई दिल्ली।
    राष्ट्रपति भवन में महामहिम के साथ साए की तरह नजर आने वाले सैन्य अधिकारियों को देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर ये अधिकारी कौन होते हैं और राष्ट्रपति के एडीसी यानी Aide-de-Camp तक कैसे पहुंचते हैं। यह पद भारतीय सेना के सबसे प्रतिष्ठित और जिम्मेदारी वाले पदों में शामिल है। ‘नेशनल क्रश’ के नाम से चर्चित रहे मेजर ऋषभ सिंह संब्याल के एडीसी पद से अचानक इस्तीफे के बाद एक बार फिर लोगों की दिलचस्पी इस पद की चयन प्रक्रिया को लेकर बढ़ गई है।

    राज शमानी के साथ बातचीत में मेजर ऋषभ सिंह संब्याल ने राष्ट्रपति के एडीसी से जुड़ी चयन प्रक्रिया और इस पद की जिम्मेदारियों के बारे में कई अहम बातें बताई हैं। उन्होंने बताया कि एक सामान्य सैन्य अधिकारी से राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का सफर बेहद कठिन, अनुशासित और कड़े परीक्षणों से होकर गुजरता है।

    कौन बन सकता है राष्ट्रपति का ADC?

    राष्ट्रपति का एडीसी पद किसी सामान्य भर्ती प्रक्रिया के तहत नहीं भरा जाता। आम नागरिक इस पद के लिए सीधे आवेदन नहीं कर सकते। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के कमिशंड अधिकारी ही इसके लिए पात्र होते हैं।

    सेना में कमिशंड अधिकारी बनने के लिए युवाओं को यूपीएससी की NDA या CDS जैसी कठिन परीक्षाओं को पास करना पड़ता है। सैन्य अधिकारी के रूप में करीब 5 से 7 साल की सेवा पूरी करने के बाद उनके सेवा रिकॉर्ड, शारीरिक क्षमता और गोपनीय रिपोर्ट यानी ACR जैसे मानकों के आधार पर एडीसी पद के लिए अधिकारियों के नाम शॉर्टलिस्ट किए जाते हैं।

    तीनों सेनाओं से कुल मिलाकर करीब 20 से 30 बेहतरीन अधिकारियों को चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण के लिए चुना जाता है। यानी एडीसी बनने की दौड़ में शामिल होने से पहले ही अधिकारी का अपनी यूनिट में बेहतर प्रदर्शन करना जरूरी होता है।

    पहले सर्विस हेडक्वॉर्टर में इंटरव्यू, फिर राष्ट्रपति भवन की परीक्षा

    एडीसी के चयन की प्रक्रिया बेहद कठिन मानी जाती है। शुरुआती स्क्रीनिंग में चुने गए अधिकारियों को संबंधित सर्विस हेडक्वॉर्टर के इंटरव्यू से गुजरना होता है। इस दौरान करेंट अफेयर्स और सिचुएशनल अवेयरनेस समेत कई विषयों पर उनकी क्षमता परखी जाती है।

    इसके बाद केवल 5 अधिकारियों को दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन बुलाया जाता है। यहां चयन प्रक्रिया का सबसे कठिन चरण शुरू होता है, जिसमें लगातार 14 दिनों तक मैराथन इंटरव्यू चलता है।

    14 दिन तक उम्मीदवारों की कमजोरियां तलाशता है पैनल

    मेजर ऋषभ सिंह संब्याल के मुताबिक राष्ट्रपति भवन में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और राष्ट्रपति के सचिव उम्मीदवारों को काफी मानसिक दबाव में परखते हैं। मकसद यह पता लगाना होता है कि दबाव और आपात स्थिति में अधिकारी किस तरह प्रतिक्रिया देगा।

    उन्होंने बताया कि अगर किसी उम्मीदवार की जियोपॉलिटिक्स या किसी अन्य विषय में कमजोरी नजर आती है तो पैनल उसी विषय से जुड़े सवाल बार-बार पूछ सकता है। खास बात यह होती है कि 14 दिनों के दौरान उम्मीदवारों को उनकी कमियों के बारे में सीधे नहीं बताया जाता।

    इसके बजाय यह देखा जाता है कि उम्मीदवार रात में अपनी कमी को समझकर तैयारी करता है या नहीं और अगले दिन उसी विषय पर बेहतर प्रदर्शन कर पाता है या नहीं। इस तरह केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता और दबाव में खुद को सुधारने की योग्यता भी जांची जाती है।

    ADC बनने के बाद निजी जिंदगी से भी करना पड़ता है समझौता

    मेजर ऋषभ के अनुसार राष्ट्रपति का एडीसी होना जितना प्रतिष्ठित है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। इस पद पर रहते हुए अधिकारी को अपने परिवार और निजी जीवन से काफी हद तक दूरी बनानी पड़ती है।

    राष्ट्रपति के साथ लगातार मौजूद रहने के कारण सामान्य दिनचर्या और निजी जीवन के लिए समय बेहद सीमित हो जाता है। अधिकारी को हर समय सतर्क रहना होता है और देश-दुनिया की घटनाओं से लगातार अपडेट रहना उनकी जिम्मेदारियों का हिस्सा होता है।

    शान के पीछे छिपा है कड़ा अनुशासन

    राष्ट्रपति का एडीसी होना सैन्य अधिकारी के लिए बेहद सम्मान और गौरव की बात मानी जाती है। हालांकि इस प्रतिष्ठित जिम्मेदारी तक पहुंचने के लिए कठोर चयन प्रक्रिया, मानसिक दबाव, निरंतर सतर्कता और निजी जीवन से समझौता करना पड़ता है।

    यही वजह है कि राष्ट्रपति के एडीसी का पद केवल प्रोटोकॉल निभाने या राष्ट्रपति के साथ चलने तक सीमित नहीं है। यह ऐसी जिम्मेदारी है, जिसमें अधिकारी को हर पल राष्ट्रपति की सुरक्षा, जरूरतों और परिस्थितियों के प्रति पूरी तरह सजग रहना होता है।

  • प्याज, अदरक और लहसुन ने बिगाड़ा किचन का बजट, जानें अगस्त में क्या हुआ महंगा, महंगाई दर 4.82 फीसदी

    प्याज, अदरक और लहसुन ने बिगाड़ा किचन का बजट, जानें अगस्त में क्या हुआ महंगा, महंगाई दर 4.82 फीसदी


    नई दिल्ली।
    सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतों में बदलाव का असर अब आम लोगों की जेब पर दिखाई देने लगा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश की खुदरा महंगाई दर अगस्त 2026 में बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 फीसदी थी। खास तौर पर अदरक, प्याज और लहसुन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने रसोई का बजट प्रभावित किया है।

    हालांकि, महंगाई बढ़ने के बीच कुछ जरूरी सामान और सब्जियां ऐसी भी रहीं, जिनकी कीमतों में कमी दर्ज की गई। टमाटर और आलू सस्ते हुए, जबकि कुछ अन्य वस्तुओं के दाम भी नीचे आए। आइए जानते हैं अगस्त में किन चीजों की कीमत बढ़ी और किन सामानों ने राहत दी।

    ये चीजें हुईं सबसे ज्यादा महंगी

    अगस्त के दौरान अदरक, प्याज और लहसुन की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली।

    • अदरक: कीमत में 73.82 फीसदी की बढ़ोतरी
    • प्याज: दाम 48.27 फीसदी बढ़े
    • लहसुन: कीमत 43.60 फीसदी बढ़ी
    • सोना, हीरा और प्लेटिनम के आभूषण: 35.53 फीसदी महंगे हुए

    अदरक की कीमतों में हाल के हफ्तों में भी तेजी देखी गई है। कई बाजारों में इसका भाव करीब 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। लहसुन भी करीब 200 से 400 रुपये किलो के स्तर पर बिक रहा है। वहीं कई खुदरा बाजारों में प्याज की कीमत करीब 50 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।

    इन चीजों ने दी महंगाई में राहत

    महंगाई के बीच कुछ जरूरी सामान और सब्जियों के दाम कम होने से उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत भी मिली।

    • टमाटर: 31.09 फीसदी सस्ता हुआ
    • आलू: कीमत में 13.14 फीसदी की कमी
    • मोटर कार और जीप: 6.72 फीसदी सस्ती हुईं
    • भिंडी: दाम 5.41 फीसदी घटे
    • परवल और कुंदरू: कीमतों में 3.60 फीसदी की गिरावट

    जनवरी से अगस्त तक लगातार बढ़ी महंगाई

    साल 2026 में खुदरा महंगाई दर में लगातार बढ़ोतरी का रुझान देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महीनेवार खुदरा महंगाई दर इस प्रकार रही:

    महीना खुदरा महंगाई दर
    जनवरी 2.75%
    फरवरी 3.21%
    मार्च 3.40%
    अप्रैल 3.48%
    मई 3.93%
    जून 4.38%
    जुलाई 4.45%
    अगस्त 4.82%

    इन आंकड़ों से साफ है कि जनवरी 2026 में 2.75 फीसदी रही खुदरा महंगाई अगस्त तक बढ़कर 4.82 फीसदी पर पहुंच गई। यानी साल की शुरुआत के मुकाबले अगस्त में महंगाई दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। प्याज, अदरक और लहसुन जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है, हालांकि टमाटर और आलू जैसी सब्जियों में आई गिरावट कुछ राहत दे रही है।

  • किशाऊ बांध परियोजना को लेकर आज अमित शाह की मौजूदगी में 6 राज्यों के बीच होगा बड़ा समझौता

    किशाऊ बांध परियोजना को लेकर आज अमित शाह की मौजूदगी में 6 राज्यों के बीच होगा बड़ा समझौता


    चंडीगढ़/शिमला।
    किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना (Kishau Multipurpose Dam Project) को लेकर मंगलवार को छह राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन (Memorandum) पर हस्ताक्षर होंगे। इससे हरियाणा (Haryana) को सिंचाई के लिए 836.39 क्यूसेक पानी मिलेगा। इस परियोजना के लिए हरियाणा को करीब 579 करोड़ रुपये का खर्च उठाना होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) की मौजूदगी में यह समझौता होगा, जिसमें मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी शामिल होंगे। इंजीनियर इन चीफ वीरेंद्र सिंह ने बताया कि यह समझौता हरियाणा को सिंचाई के क्षेत्र में दूरगामी लाभ देगा।

    किशाऊ बांध हिमाचल के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिले की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। परियोजना की कुल प्रस्तावित लागत करीब 15,624 करोड़ रुपये है। इसमें 12,096 करोड़ रुपये जल घटक पर खर्च होंगे, जिसका 90 फीसदी केंद्र सरकार वहन करेगी।


    हिमाचल की शर्तों पर समझौता

    मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश बिजली उत्पादन की लागत का वित्तीय बोझ नहीं उठाएगा। जून में हुई उच्चस्तरीय बैठक में इस पर सहमति बनी थी। दिल्ली और राजस्थान हिमाचल के बिजली घटक की लागत में हिस्सा देंगे। इसके बदले हिमाचल के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को मिलेगा। नई व्यवस्था के तहत हिमाचल को परियोजना से 211 मेगावाट बिजली मिलेगी और करीब 600 करोड़ रुपये का वार्षिक लाभ होने का अनुमान है।

  • राजस्थान निकाय चुनाव में BJP को बड़ा झटका, भजनलाल शर्मा, वसुंधरा राजे और भूपेंद्र यादव के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदले समीकरण

    राजस्थान निकाय चुनाव में BJP को बड़ा झटका, भजनलाल शर्मा, वसुंधरा राजे और भूपेंद्र यादव के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदले समीकरण

    नई दिल्ली ।राजस्थान में हुए निकाय चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को कई प्रमुख क्षेत्रों में झटका लगा है। चुनाव परिणामों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल और प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से जुड़े क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन चर्चा में रहा। कई निकायों में BJP स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सकी और कुछ जगहों पर निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

    मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में BJP 65 वार्ड वाले नगर निगम में केवल 20 सीटें जीत सकी। यहां निर्दलीय प्रत्याशियों ने 36 वार्डों में जीत दर्ज की। कांग्रेस को सात सीटें मिलीं, जबकि BSP और RLP के खाते में एक-एक सीट गई। इस परिणाम के बाद निर्दलीय पार्षद नगर निगम के समीकरण में महत्वपूर्ण स्थिति में पहुंच गए।

    निकाय चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने रोड शो भी किया था। इसके बावजूद भरतपुर में पार्टी बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। परिणामों में निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी संख्या में जीत ने नगर निगम के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया।

    केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के संसदीय क्षेत्र अलवर में भी BJP स्पष्ट बहुमत से दूर रही। यहां पार्टी ने 28 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं। निर्दलीय प्रत्याशियों ने 13 वार्डों में जीत हासिल की और एक सीट BSP के खाते में गई।

    जोधपुर नगर निगम के 100 वार्डों में BJP और कांग्रेस दोनों को 44-44 सीटें मिलीं। वहीं 11 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। इस तरह किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। यहां भी निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

    प्रदेश BJP अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर सकी। 65 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीतीं, जबकि BJP को 21 सीटों पर जीत मिली। निर्दलीय प्रत्याशियों ने 15 वार्डों में सफलता हासिल की। बहुमत के लिए 34 सीटों की जरूरत थी, इसलिए पाली में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों का समर्थन महत्वपूर्ण रहेगा।

    पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक प्रभाव वाले झालावाड़ में BJP को बड़ा नुकसान हुआ। झालावाड़ नगर परिषद की 45 सीटों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इसके चलते BJP को यहां सत्ता से बाहर होना पड़ा।

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल से जुड़े बीकानेर में भी BJP को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 80 वार्ड वाले नगर निगम में कांग्रेस ने 42 सीटों पर जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया, जबकि BJP 27 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए किसी अन्य दल या निर्दलीय के समर्थन की आवश्यकता नहीं रही।

    भरतपुर, पाली, झालावाड़, जोधपुर, अलवर, उदयपुर और बीकानेर जैसे शहरों के नतीजों में BJP कई जगह बहुमत हासिल करने से दूर रही। निकाय चुनाव में पार्टी के प्रमुख नेताओं से जुड़े क्षेत्रों में आए इन परिणामों ने स्थानीय स्तर पर BJP के सामने चुनौती की स्थिति दिखाई है। राजस्थान में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में निकाय चुनाव के परिणाम पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को मिला सिर्फ एक-एक वोट, अपने ही वार्डों में नतीजे बने चर्चा का विषय

    राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को मिला सिर्फ एक-एक वोट, अपने ही वार्डों में नतीजे बने चर्चा का विषय

    नई दिल्ली ।राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव के नतीजों में दो वार्डों के परिणाम खास तौर पर चर्चा में हैं। राज्य के अलग-अलग निकायों में भारतीय जनता पार्टी के दो उम्मीदवारों को सिर्फ एक-एक वोट मिला। इनमें डीडवाना-कुचामन जिले की परबतसर नगरपालिका के वार्ड 13 से चुनाव लड़ने वाले कैलाशचंद और धौलपुर जिले की सैपऊ नगरपालिका के वार्ड 19 के उम्मीदवार लक्ष्मण कोली शामिल हैं।

    कैलाशचंद ने परबतसर नगरपालिका के वार्ड 13 से चुनाव लड़ा था। इस वार्ड में कांग्रेस उम्मीदवार हीना खानम ने 376 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। निर्दलीय उम्मीदवार राशिद खान को 195 वोट मिले। बीजेपी उम्मीदवार कैलाशचंद के खाते में केवल एक वोट आया।

    कैलाशचंद ने बताया कि वह परबतसर नगरपालिका के वार्ड 12 के मतदाता हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें वार्ड 13 से उम्मीदवार बनाया था। उनके मुताबिक उन्हें सिर्फ एक वोट मिला और वह भी संभवतः वार्ड 13 के किसी मतदाता ने दिया। कैलाशचंद ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका अपना वोट वार्ड 12 में है, जहां वह मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं।

    दूसरी ओर, धौलपुर जिले की सैपऊ नगरपालिका के वार्ड 19 में बीजेपी उम्मीदवार लक्ष्मण कोली को भी सिर्फ एक वोट मिला। इस वार्ड में निर्दलीय उम्मीदवार अजय कुमार ने 108 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। निर्दलीय उम्मीदवार राजेश कुमार 69 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

    लक्ष्मण कोली के नतीजे को लेकर यह बात भी सामने आई कि उनके परिवार के कुछ सदस्य, जिनमें पत्नी, बेटा और बहू शामिल हैं, वार्ड 19 के मतदाता हैं। इसके बावजूद उनके खाते में सिर्फ एक वोट आया। हालांकि, मतदान की गोपनीयता के कारण यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि परिवार के किसी सदस्य ने उन्हें वोट नहीं दिया। मतदाता ने किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती।

    राजस्थान में इस बार 309 शहरी निकायों में चुनाव हुए थे। सोमवार को इनके नतीजे सामने आए। इन चुनावों में पार्षद के 10 हजार से अधिक पदों के लिए मतदान हुआ था। ऐसे में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को केवल एक-एक वोट मिलने का मामला खास तौर पर चर्चा में आ गया।

    परबतसर नगरपालिका का परिणाम भी इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। यहां कुल 25 वार्ड हैं। कांग्रेस ने 13 वार्डों में जीत दर्ज कर साधारण बहुमत हासिल किया, जबकि बीजेपी 12 वार्डों में विजयी रही। कैलाशचंद का एक वोट वाला परिणाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि राजस्थान में बीजेपी की सरकार है और इसके बावजूद पार्टी के उम्मीदवार को अपने चुनावी वार्ड में बेहद कम समर्थन मिला।

    दोनों मामलों में उपलब्ध नतीजे यह बताते हैं कि अलग-अलग वार्डों में उम्मीदवारों के बीच मतों का अंतर काफी बड़ा रहा। परबतसर में कांग्रेस की हीना खानम ने 376 वोट के साथ जीत हासिल की, जबकि सैपऊ में निर्दलीय अजय कुमार 108 वोट लेकर विजयी हुए। वहीं बीजेपी उम्मीदवारों के खाते में केवल एक-एक वोट दर्ज हुआ।

  • गोवा में भी उत्तराखंड जैसा UCC लागू करके दिखाएं, असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह पर साधा निशाना

    गोवा में भी उत्तराखंड जैसा UCC लागू करके दिखाएं, असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह पर साधा निशाना

    नई दिल्ली ।AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा है। ओवैसी ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि अगर वह समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है तो गोवा में भी उत्तराखंड, गुजरात और असम जैसा कानून लागू करके दिखाए।

    ओवैसी ने अमित शाह के उस संदर्भ पर सवाल उठाया, जिसमें वह लोगों से ‘क्रोनोलॉजी समझने’ की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार UCC को लेकर अपनी बात स्पष्ट करना चाहती है तो उसे गोवा जाकर यह ऐलान करना चाहिए कि वहां भी वही कानून लागू किया जाएगा, जो उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू किया गया है।

    उन्होंने दावा किया कि सरकार ऐसा नहीं करेगी। ओवैसी ने आरोप लगाया कि गुजरात में UCC की बात करके लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने गोवा के मौजूदा कानूनों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

    ओवैसी के मुताबिक, गोवा में कुछ परिस्थितियों में हिंदू दंपति के बच्चों से जुड़ी स्थिति के आधार पर पति को दूसरी शादी की अनुमति देने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कैथोलिक समुदाय को कुछ विशेष छूट मिली हुई है।

    उन्होंने कहा कि गोवा में कैथोलिक विवाहों के पंजीकरण की व्यवस्था भी अलग है। ओवैसी के अनुसार, कुछ मामलों में कैथोलिक विवाह का पंजीकरण सरकार के बजाय चर्च के पादरी कर सकते हैं। उन्होंने इस व्यवस्था का उल्लेख करते हुए गोवा में मौजूद वैवाहिक कानूनों में समुदाय आधारित अंतर की ओर ध्यान दिलाया।

    ओवैसी ने यह भी कहा कि चर्च की धार्मिक संस्थाएं ईसाइयों से जुड़े वैवाहिक मामलों में कुछ फैसले ले सकती हैं। इसके विपरीत, उनके मुताबिक दूसरे समुदायों के लोगों को तलाक या वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में अदालत का सहारा लेना पड़ता है।

    उन्होंने आगे दावा किया कि गोवा के कानून में कुछ परिस्थितियों में चर्च ट्रिब्यूनल को विवाह को अमान्य घोषित करने से जुड़े अधिकार भी हासिल हैं। ओवैसी ने इसकी तुलना गैर-ईसाइयों की व्यवस्था से करते हुए कहा कि उन्हें ऐसे मामलों में अदालत जाना पड़ता है।

    AIMIM प्रमुख ने इन्हीं प्रावधानों के आधार पर गोवा को पूरी तरह समान नागरिक संहिता का मॉडल बताए जाने पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि जब अलग-अलग समुदायों के लिए अलग व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो गोवा को UCC का पूरी तरह समान मॉडल बताना उचित नहीं है।

    ओवैसी ने सरकार से गोवा में भी उत्तराखंड, गुजरात और असम जैसा UCC लागू करने की चुनौती दोहराई। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में ऐसा कर सकती है तो उसे इसे करके दिखाना चाहिए। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि गोवा के UCC का उदाहरण बार-बार देकर जनता को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है।