Category: National

  • नेपाल में बाढ़ का संकट थमा नहीं, कई इलाकों में फिर भारी बारिश और आंधी का अलर्ट, बढ़ी नई आफत की आशंका

    नेपाल में बाढ़ का संकट थमा नहीं, कई इलाकों में फिर भारी बारिश और आंधी का अलर्ट, बढ़ी नई आफत की आशंका


    नई दिल्ली । नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ से पैदा हुआ संकट अभी खत्म नहीं हुआ है और इसी बीच मौसम ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। बुधवार को देश के कई हिस्सों में तेज बारिश और आंधी की चेतावनी जारी की गई है। पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में भारी बारिश की संभावना जताई गई है, जबकि ऊंचे पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी और बिजली चमकने का खतरा बताया गया है। बाढ़ से पहले ही प्रभावित लोगों के सामने मौसम की नई चुनौती खड़ी हो गई है।

    मौसम विभाग ने मधेश, कोशी, बागमती, गंडकी और लुंबिनी प्रदेश के कई इलाकों में तेज बारिश की चेतावनी दी है। पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में मौसम खराब रहने की संभावना है। कोशी, बागमती और गंडकी के ऊंचे हिस्सों में बारिश के साथ बिजली चमक सकती है और बर्फबारी भी हो सकती है। लुंबिनी और कर्णाली के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में भी बर्फ गिरने की संभावना जताई गई है।

    26 अगस्त की बाढ़ ने नेपाल में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं में अब तक 1,377 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं 5,326 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इस आपदा में 6,827 लोग घायल हुए हैं। बाढ़ के कारण 7,570 घर टूट गए या क्षतिग्रस्त हुए हैं। बड़ी संख्या में परिवारों के सामने रहने और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी मुश्किलें पैदा हुई हैं।

    प्राकृतिक आपदा का असर नेपाल के कारोबार और खासकर चीन के साथ होने वाले व्यापार पर भी पड़ा है। रसुवागढ़ी और तातोपानी सीमा मार्गों को नुकसान पहुंचने के कारण सामान से भरे करीब 500 से 600 कंटेनर अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए हैं। इसके अलावा 200 से अधिक नेपाली कंटेनर बाढ़ के पानी में बह चुके हैं। इससे सीमा के रास्ते होने वाली सामान की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है।

    फंसे हुए सामान को वैकल्पिक रास्ते से आगे भेजने की कोशिश की जा रही है। करीब 176 ट्रकों को कोराला मार्ग से भेजने की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन इस रास्ते से सामान को पहुंचने में करीब 10 से 12 दिन लग रहे हैं। इससे व्यापारिक गतिविधियों को सामान्य स्थिति में लौटने में समय लग सकता है।

    बाढ़ से नेपाल को आर्थिक रूप से भी भारी नुकसान हुआ है। शुरुआती आकलन में देश को चार लाख करोड़ नेपाली रुपये से अधिक के नुकसान की बात सामने आई है। इसमें घरों, सड़कों तथा सरकारी और निजी संपत्तियों को हुआ नुकसान शामिल है। नुकसान का विस्तृत आकलन पूरा होने के बाद यह आंकड़ा करीब 30 प्रतिशत तक और बढ़ सकता है।

    नेपाल सरकार के सामने अब प्रभावित क्षेत्रों में राहत और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती है। सरकार के अनुमान के अनुसार देश के पुनर्निर्माण और टूटे हुए ढांचे की मरम्मत के लिए चार से पांच अरब डॉलर तक की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से नेपाल दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहायता मांग रहा है। ऐसे समय में भारी बारिश, आंधी और बर्फबारी की नई चेतावनी ने पहले से प्रभावित इलाकों में चिंता और बढ़ा दी है।

  • सत्य निकेतन इमारत हादसे में बड़ा एक्शन, पीजी संचालक सुधांशु गिरफ्तार, साथी शुभम त्यागी की तलाश में जुटी पुलिस

    सत्य निकेतन इमारत हादसे में बड़ा एक्शन, पीजी संचालक सुधांशु गिरफ्तार, साथी शुभम त्यागी की तलाश में जुटी पुलिस

    नई दिल्ली । दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में इमारत गिरने के मामले में पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी है। हादसे के मामले में अब उस इमारत में संचालित पीजी के संचालक सुधांशु को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस उससे हादसे को लेकर पूछताछ कर रही है। पूछताछ के बाद उसे जल्द ही अदालत में पेश किया जाएगा। इस मामले में सुधांशु के साथी शुभम त्यागी की तलाश की जा रही है, जो फिलहाल फरार बताया जा रहा है।

    पुलिस के अनुसार, महेश ने अगस्त 2025 में यह इमारत शुभम त्यागी और सुधांशु को लीज पर दी थी। दोनों मिलकर इसी इमारत में ‘Hostel Daze’ नाम से पीजी चला रहे थे। इमारत में संचालित पीजी को लेकर जांच आगे बढ़ाई जा रही है। सुधांशु की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उससे हादसे से जुड़े घटनाक्रम और इमारत में पीजी संचालन से संबंधित सवाल पूछ रही है। वहीं, शुभम त्यागी को पकड़ने के लिए तलाश जारी है।

    मामले में आरोपी महेश की दो दिन की पुलिस कस्टडी भी आज समाप्त हो रही है। पुलिस उसे साउथ कैंपस थाने से अदालत लेकर गई है। महेश के साथ इमारत का ठेकेदार और एक राजमिस्त्री भी कोर्ट ले जाए गए हैं। तीनों को मामले में आगे की कार्रवाई के तहत अदालत में पेश किया जा रहा है। पुलिस हादसे से जुड़े लोगों से पूछताछ कर रही है और मामले में उनकी भूमिका को लेकर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

    इधर, सत्य निकेतन में कमजोर पड़ी इमारत को हटाने का काम भी शुरू कर दिया गया है। कार्रवाई से पहले इमारत के भीतर रखा सामान बाहर निकाला गया। इसके बाद कमजोर हिस्से को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई। आसपास मौजूद पांच से छह इमारतों को भी खाली कराया गया है, ताकि कमजोर ढांचे को हटाने के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो।

    कमजोर हिस्से को हटाने के लिए बड़ी मशीन या बुलडोजर का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इमारत के कमजोर हिस्से को हथौड़े और दूसरे छोटे औजारों की मदद से धीरे-धीरे तोड़ा जा रहा है। इस तरीके से कमजोर ढांचे को सावधानीपूर्वक हटाने का काम किया जा रहा है। मौके पर एमसीडी की टीम मौजूद है और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी तैनात हैं।

    सत्य निकेतन इमारत हादसे के बाद पुलिस की कार्रवाई के साथ कमजोर ढांचे को हटाने का काम भी जारी है। पीजी संचालक सुधांशु की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि उसके साथ पीजी चलाने वाला शुभम त्यागी अभी पुलिस की पकड़ से बाहर है। महेश, ठेकेदार और राजमिस्त्री को अदालत ले जाया गया है। मामले में आगे की कार्रवाई पुलिस जांच और अदालत में होने वाली प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी।

  • दिल्ली के ओखला फेज-1 में सिलेंडर फटने से जोरदार धमाका, एक व्यक्ति की मौत और कई लोग घायल, राहत-बचाव जारी

    दिल्ली के ओखला फेज-1 में सिलेंडर फटने से जोरदार धमाका, एक व्यक्ति की मौत और कई लोग घायल, राहत-बचाव जारी

    नई दिल्ली । दिल्ली के ओखला फेज-1 में बुधवार को कम्युनिटी हॉल के पास सिलेंडर फटने से जोरदार धमाका हो गया। अचानक हुए इस हादसे के बाद इलाके में हड़कंप मच गया और आसपास मौजूद लोगों में अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई। धमाके की तेज आवाज सुनकर लोग अपने घरों और दुकानों से बाहर निकल आए। हादसे में एक व्यक्ति की मौत होने की खबर है, जबकि कई अन्य लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई है। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया है।

    घटना की जानकारी मिलते ही दमकल विभाग की चार गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। इसके बाद राहत और बचाव का काम शुरू किया गया। घटनास्थल पर मौजूद टीमों ने आसपास के इलाके को भी देखा और हादसे से प्रभावित लोगों को सुरक्षित निकालने का प्रयास किया। मौके पर बचाव कार्य जारी रहने की जानकारी है।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, कई सिलेंडर एक गाड़ी में लाए गए थे और उन्हें नीचे उतारा जा रहा था। इसी दौरान अचानक एक लंबा सिलेंडर फट गया। सिलेंडर के फटते ही तेज धमाका हुआ, जिससे आसपास मौजूद लोगों में डर फैल गया। घटना के बाद इलाके में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

    धमाका इतना तेज बताया जा रहा है कि आसपास की इमारतों के शीशे तक टूट गए। तेज आवाज और धमाके के प्रभाव से लोग घबरा गए और तुरंत अपने घरों तथा दुकानों से बाहर निकल आए। हादसे के बाद आसपास के क्षेत्र में लोगों की भीड़ जुट गई और घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं।

    स्थानीय निवासी संजय कश्यप के अनुसार, धमाके में दो लोगों के बुरी तरह घायल होने की बात सामने आई है। उन्होंने करीब तीन से चार लोगों के घायल होने की जानकारी दी। घायल लोगों को उपचार के लिए अस्पताल भेजा गया है, जहां उनका इलाज कराया जा रहा है।

    हादसे में एक व्यक्ति की मौत होने की भी जानकारी सामने आई है। वहीं, कई लोगों के घायल होने के कारण राहत और बचाव दल लगातार मौके पर काम कर रहे हैं। घटनास्थल के आसपास के क्षेत्र को भी देखा जा रहा है, ताकि हादसे से प्रभावित लोगों और अन्य संभावित नुकसान की जानकारी मिल सके।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि धमाके की आवाज इतनी तेज थी कि कुछ समय के लिए स्थिति को समझना भी मुश्किल हो गया। आसपास मौजूद लोगों में घटना को लेकर भय का माहौल बन गया। धमाके के बाद पुलिस और बचाव दल मौके पर पहुंचे और घटनाक्रम की जांच शुरू की। हादसा किस परिस्थितियों में हुआ और सिलेंडर फटने की वजह क्या रही, इसकी जांच की जा रही है।

  • दिल्ली नहीं, गुजरात केवड़िया में होगा 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह, उद्धव ठाकरे ने केंद्र के फैसले पर उठाए सवाल

    दिल्ली नहीं, गुजरात केवड़िया में होगा 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह, उद्धव ठाकरे ने केंद्र के फैसले पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली ।
    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का आयोजन दिल्ली से गुजरात के केवड़िया ले जाने के फैसले को लेकर सियासत गरमा गई है। शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार के इस निर्णय की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि गुजरात और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक तरह की दीवार खड़ी करने की कोशिश की जा रही है। वहीं, पार्टी सांसद संजय राउत ने भी समारोह को लेकर सवाल उठाते हुए कलाकारों से इसके बहिष्कार की अपील की है।

    उद्धव ठाकरे ने मंगलवार को मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का स्थान बदले जाने पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल किया कि इस तरह के राष्ट्रीय कार्यक्रम मुंबई, कोलकाता, बंगलूरू और देश के दूसरे राज्यों की राजधानियों में क्यों नहीं आयोजित किए जा सकते। उन्होंने कहा कि गुजरात और देश के बाकी हिस्सों के बीच दीवार बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है, इसका जवाब भारतीय जनता पार्टी से मांगा जाना चाहिए।

    उद्धव ठाकरे के बाद सांसद संजय राउत ने भी इस फैसले पर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल गुजरात के प्रधानमंत्री हैं। राउत ने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देश का राष्ट्रीय कार्यक्रम है और ऐसे में लोगों की स्वाभाविक उम्मीद होगी कि इसका आयोजन देश की राजधानी में किया जाए।

    संजय राउत ने समारोह को गुजरात ले जाने के फैसले पर सवाल करते हुए पूछा कि क्या यह वाइब्रेंट गुजरात का कार्यक्रम है। उन्होंने इस विचार के पीछे के लोगों के लिए तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ तक कहा।

    राउत ने दावा किया कि गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का स्थान बदला जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले से देश की राजधानी और राष्ट्रीय पुरस्कारों की अहमियत कम करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कलाकारों से गुजरात नहीं जाने की अपील करते हुए कहा कि देश पर गर्व करने वाले कलाकार पुरस्कार लेने से इनकार कर दें।

    अधिकारियों के अनुसार, 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह अब दिल्ली के बजाय गुजरात के केवड़िया में आयोजित किया जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 22 सितंबर को समारोह में विजेताओं को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान करेंगी। समारोह का स्थान बदलने के फैसले ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है और विपक्षी नेताओं ने इसे लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।

    केवड़िया, जिसे अब एकता नगर के नाम से जाना जाता है, गुजरात के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। यहां सरदार वल्लभभाई पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थित है, जिसे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से जाना जाता है। प्रतिमा की ऊंचाई 597 फीट है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2018 में इसका उद्घाटन किया था।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत वर्ष 1954 में हुई थी। पहली बार पुरस्कार समारोह दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित किया गया था। इसके बाद ज्यादातर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह विज्ञान भवन में ही होते रहे हैं। हालांकि, यह परंपरा पूरी तरह दिल्ली तक सीमित नहीं रही है। कुछ मौकों पर समारोह देश के दूसरे शहरों में भी आयोजित किए गए हैं। वर्ष 1971 में 17वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह चेन्नई में आयोजित किया गया था।

  • वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद

    वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम के पूरे संस्करण के गायन को लेकर कांग्रेस और उसकी गठबंधन सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला सम्मान में खड़े रहे। इसके बाद कांग्रेस ने पूरे गीत के गायन पर आपत्ति जताते हुए एनसी से अपने रुख का समर्थन करने की अपील की। एनसी ने जवाब में कहा कि गठबंधन में होने का मतलब यह नहीं है कि कोई सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें थोपे।

    कांग्रेस महासचिव एवं संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल ने वंदे मातरम के पूरे संस्करण को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में 1937 में तय किए गए स्वरूप के अनुरूप गीत के शुरुआती दो अंतरे ही गाएगी। कांग्रेस का कहना है कि यह निर्णय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी एवं समन्वयवादी भावना को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    श्रीनगर के फिल्म महोत्सव से शुरू हुआ विवाद

    विवाद की शुरुआत श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के कार्यक्रम से हुई। कार्यक्रम में वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। मंच पर मौजूद उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इस दौरान सम्मान में खड़े रहे। कार्यक्रम का वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस की ओर से इस पर प्रतिक्रिया दी गई।

    वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन के सहयोगी दलों को भी कांग्रेस के इस फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सरोजिनी नायडू सहित स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के विचारों का भी उल्लेख किया।

    एनसी ने कहा- सहयोगी अपनी शर्तें नहीं थोप सकता

    कांग्रेस की अपील पर नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी नेता बशीर अहमद ने कहा कि गठबंधन में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि एक सहयोगी दल दूसरे दल को यह बताए कि कोई गीत कितने हिस्से में गाया जाए। उन्होंने कहा कि केसी वेणुगोपाल को सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन वह अपनी राय किसी दूसरे दल पर थोप नहीं सकते।

    एनसी नेता ने कहा कि उनकी पार्टी भी लोगों पर किसी तरह की शर्त थोपने के खिलाफ है। इस बयान के बाद कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए हैं।

    कांग्रेस ने आरएसएस पर भी साधा निशाना

    एनसी की प्रतिक्रिया के बाद कांग्रेस नेता कपिल सिंह ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेस के फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें नागपुर यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दबाव में नहीं आना चाहिए।

    भाजपा ने कांग्रेस को घेरा

    विवाद में भाजपा भी कूद पड़ी। भाजपा सांसद एवं प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पूरे वंदे मातरम के गायन को लेकर उसकी आपत्ति से उसकी राजनीतिक सोच स्पष्ट होती है। उन्होंने कांग्रेस को 21वीं सदी की नई मुस्लिम लीग तक करार दिया और आरोप लगाया कि पार्टी अलगाववादी तथा कट्टरपंथी ताकतों के सामने झुक रही है।

    भाजपा नेता आरएस पठानिया ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि घाटी में अलगाववादी ताकतों ने भी राष्ट्रगीत को लेकर ऐसी आपत्ति नहीं जताई थी।

    1937 के फैसले का हवाला दे रही कांग्रेस

    कांग्रेस ने पिछले महीने अपनी कार्यसमिति की बैठक में 1937 के प्रस्ताव के अनुरूप पार्टी के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल दो अंतरे गाने का निर्णय लिया था। पार्टी का कहना है कि यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन के समय बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी सोच को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    वहीं भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर वंदे मातरम का पूरा सम्मान नहीं करने का आरोप लगाती रही है।

    गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

    वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच वैचारिक मतभेद का मुद्दा बन गया है। दोनों दल इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रगीत को लेकर उनके रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। कांग्रेस अपने ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्णय पर कायम है, जबकि एनसी का कहना है कि कोई भी सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता।

    ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या इसका असर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ता है।

  • 21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट, आंधी और बिजली गिरने की भी चेतावनी

    21 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट, आंधी और बिजली गिरने की भी चेतावनी


    नई दिल्ली।
    देश के कई हिस्सों में मानसूनी गतिविधियां एक बार फिर सक्रिय हो गई हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने बुधवार को उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम, मेघालय समेत 21 से अधिक राज्यों में भारी से अति भारी बारिश की संभावना जताई है। कई इलाकों में बारिश के साथ तेज हवाएं चलने, गरज-चमक और बिजली गिरने की भी चेतावनी जारी की गई है।

    मौसम विभाग के अनुसार, अगले कुछ घंटों के दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के आसपास सक्रिय चक्रवाती परिसंचरण का असर कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है। इसके अलावा अन्य मौसमी प्रणालियों के प्रभाव से देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है।

    दिल्ली में बादल छाए रहने की संभावना

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बुधवार को आसमान में बादल छाए रहने की संभावना है। पिछले दिनों हुई बारिश के बाद तापमान में कुछ कमी आई है। हालांकि, आज राजधानी के लिए किसी बड़े मौसम अलर्ट की घोषणा नहीं की गई है। दिनभर बादलों की आवाजाही रहने और धूप की तीव्रता कम रहने की संभावना है।

    पूर्वी उत्तर प्रदेश में बारिश के आसार

    उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में फिलहाल दिन में धूप और रात में अपेक्षाकृत कम तापमान देखने को मिल रहा है। राज्य के ऊपर सक्रिय निम्न दबाव क्षेत्र कमजोर पड़ चुका है, लेकिन उससे जुड़ी मौसमी गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

    पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के आसपास चक्रवाती परिसंचरण सक्रिय होने के कारण राज्य के पूर्वी हिस्सों में बारिश का दौर फिर शुरू हो सकता है।

    बिहार में सबसे ज्यादा सक्रिय रहेगा मौसम

    बिहार में बुधवार को मौसम की गतिविधियां अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय रहने की संभावना है। आईएमडी ने राज्य के कई हिस्सों में भारी से अति भारी बारिश की चेतावनी दी है। कुछ स्थानों पर गरज-चमक के साथ बिजली गिरने का भी खतरा जताया गया है।

    झारखंड में भी मानसूनी गतिविधियां तेज रहने की संभावना है। राज्य के कई जिलों में तेज हवाओं के साथ बारिश हो सकती है।

    पहाड़ी राज्यों में 10 सितंबर को बढ़ेगा असर

    जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में बुधवार को बारिश, तेज हवाएं और गरज-चमक की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार, इन राज्यों में मौसम की गतिविधियां गुरुवार, 10 सितंबर को और बढ़ सकती हैं।

    उत्तराखंड के कई इलाकों में 10 सितंबर को भारी से अति भारी बारिश होने की संभावना जताई गई है। ऐसे में पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और यात्रियों को मौसम की स्थिति पर नजर रखने की सलाह दी गई है।

    दक्षिण भारत में भी बारिश और तेज हवाओं का असर

    दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी मौसम सक्रिय रहने की संभावना है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। तटीय इलाकों में जोरदार बारिश होने की संभावना जताई गई है।

    वहीं, केरल और माहे में गर्म एवं उमस भरा मौसम बना रह सकता है। समुद्र से लगे क्षेत्रों में मौसम में बदलाव को देखते हुए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

    मानसूनी सिस्टम से कई राज्यों में बारिश का दौर

    मौसम विभाग के मुताबिक, मौजूदा मौसमी प्रणालियों के कारण अगले कुछ समय तक देश के कई हिस्सों में बारिश की गतिविधियां बनी रह सकती हैं। भारी बारिश वाले क्षेत्रों में जलभराव, यातायात प्रभावित होने और निचले इलाकों में पानी भरने जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और मौसम विभाग की ओर से जारी चेतावनियों का पालन करना जरूरी होगा।

  • शहजाद पूनावाला BJP छोड़ कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच पवन खेड़ा संग वायरल तस्वीर पर खुद दी सफाई, बताया क्या है पूरा मामला

    शहजाद पूनावाला BJP छोड़ कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच पवन खेड़ा संग वायरल तस्वीर पर खुद दी सफाई, बताया क्या है पूरा मामला

    नई दिल्ली । शहजाद पूनावाला फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर हैं, लेकिन कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के साथ सामने आई उनकी तस्वीरों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर यह अटकलें लगने लगीं कि क्या पूनावाला भारतीय जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस में वापसी करने वाले हैं। हालांकि, पूनावाला ने खुद इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए कांग्रेस में शामिल होने की खबरों को खारिज कर दिया है।

    वायरल तस्वीर में शहजाद पूनावाला और पवन खेड़ा साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं और दोनों एक-दूसरे से हाथ मिला रहे हैं। तस्वीर सामने आने के बाद इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे। इन चर्चाओं के बीच पूनावाला ने सोशल मीडिया पर तस्वीर के पीछे की पूरी कहानी बताई और कहा कि इसे गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है।

    पूनावाला के मुताबिक, वह एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, जो पायल मेहता के पिता की याद में आयोजित किया गया था। उनके अनुसार, कार्यक्रम में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े कई नेता भी मौजूद थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात कई नेताओं से हुई और पवन खेड़ा भी वहां पहुंचे।

    उन्होंने बताया कि वह अपने करीबी मित्र और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के दौरान पत्रकार रिजिजू से उनकी स्विमिंग से जुड़ी तस्वीरों को लेकर सवाल कर रहे थे। इसी बीच पवन खेड़ा का जिक्र हुआ और संयोग से खेड़ा वहां से गुजरते हुए सामने आ गए। पूनावाला ने उन्हें बातचीत में शामिल किया और राज्यसभा के लिए चुने जाने पर बधाई दी। इसी दौरान दोनों की तस्वीर सामने आई।

    पूनावाला ने कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों को स्पष्ट रूप से खारिज किया। उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी से उन्हें कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस कार्यक्रम में वह मौजूद थे, वह एक शोकसभा थी और ऐसी जगह पर राजनीतिक दल बदलने जैसी बातचीत करना उचित नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि पूनावाला पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2017 में कांग्रेस से दूरी बनाई थी और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए थे। बीजेपी में रहते हुए वह पार्टी के प्रमुख प्रवक्ताओं में शामिल रहे और कांग्रेस तथा उसके नेतृत्व पर लगातार मुखर होकर हमला करते रहे।

    कांग्रेस में वापसी के सवाल पर पूनावाला पहले भी अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। अगस्त में एक बातचीत के दौरान उनसे कांग्रेस में शामिल होने को लेकर सवाल पूछा गया था। इसके जवाब में उन्होंने शर्त रखते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि यदि राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा को हटा दिया जाए तथा नेहरू के कार्यों के लिए माफी मांगी जाए, तभी वह कांग्रेस में शामिल होंगे।

    ऐसे में पवन खेड़ा के साथ उनकी तस्वीर सामने आने के बाद शुरू हुई राजनीतिक अटकलों को पूनावाला की सफाई ने फिलहाल विराम दे दिया है। तस्वीर को लेकर उठे सवालों के जवाब में उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों नेताओं की मुलाकात एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई थी और इसे राजनीतिक दल बदलने से जोड़ना सही नहीं है। फिलहाल उनके बयान से यह साफ है कि वायरल तस्वीर के आधार पर कांग्रेस में उनकी वापसी की चर्चा को उन्होंने सिरे से खारिज किया है।

  • जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई

    जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के जातिगत सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दलितों, पिछड़े समुदायों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की बात कही है। उनकी इस मांग ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

    कांग्रेस देशभर में जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है। पार्टी का तर्क है कि प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े फैसलों के लिए अलग-अलग समुदायों की वास्तविक संख्या का पता होना जरूरी है।

    लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने एक अलग ही सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में जातिगत सर्वे पहले ही हो चुका है और उसकी नई रिपोर्ट नवंबर 2025 से तैयार है। ऐसे में सिद्धारमैया अब अपनी ही पार्टी की सरकार पर इस रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बना रहे हैं।

    बेंगलुरु में 6 सितंबर को कर्नाटक स्टेट बैकवर्ड कास्ट्स फेडरेशन के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने जातिगत सर्वे लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सभी को सामाजिक न्याय देना है तो कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।

    सिद्धारमैया का कहना है कि आरक्षण अलग-अलग समुदायों की आबादी के अनुपात में होना चाहिए। उन्होंने केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात नहीं की। उनका तर्क है कि सामाजिक और राजनीतिक समानता के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी प्रतिनिधित्व जाति और आबादी के अनुरूप होना चाहिए।

    कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि विश्वसनीय जातिगत आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जुड़े दावे अनुमानों पर आधारित रहेंगे। लेकिन कर्नाटक में स्थिति अलग है। यहां कांग्रेस सरकार के पास पहले से ही जातिगत सर्वे की रिपोर्ट मौजूद है।

    यही वजह है कि सिद्धारमैया की मांग कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है। अगर जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण और प्रतिनिधित्व में बदलाव की मांग उठती है, तो राज्य में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

    कर्नाटक में जातिगत सर्वे की शुरुआत सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहते उनके पिछले कार्यकाल में हुई थी। 2015 में एच. कंठराज के नेतृत्व में यह सर्वे कराया गया और 2017 तक पूरा हो गया था। हालांकि, इसकी रिपोर्ट कभी राजनीतिक रूप से लागू नहीं हो सकी। राज्य के प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों की ओर से आपत्तियां सामने आई थीं।

    इसके बाद जेडीएस-कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने भी इसे बड़े नीतिगत फैसले के आधार के तौर पर आगे बढ़ाने से परहेज किया। 2023 में सिद्धारमैया के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। 2025 में उनकी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन इसके साथ आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनकी पुरानापन को लेकर सवाल भी उठे।

    इसके बाद सिद्धारमैया ने नए सिरे से जातिगत सर्वे का आदेश दिया। नई कवायद का उद्देश्य ज्यादा मौजूदा आंकड़े तैयार करना और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के तौर पर भी देखा गया।

    मई में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सिद्धारमैया ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। इसके बावजूद जातिगत जनगणना और समानुपातिक आरक्षण का मुद्दा उठाकर उन्होंने कर्नाटक की मौजूदा कांग्रेस सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लिए सिद्धारमैया की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर कांग्रेस पर यह सवाल उठ सकता है कि वह बीजेपी के खिलाफ जातिगत न्याय की बात तो करती है, लेकिन अपने शासन वाले राज्य में उसी सिद्धांत को लागू करने से पीछे क्यों हट रही है।

    दूसरी ओर, सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की अपनी राजनीतिक कीमत भी हो सकती है। कर्नाटक में कई प्रभावशाली समुदाय आरक्षण, प्रतिनिधित्व और राज्य के संसाधनों को लेकर अलग-अलग दावे रखते हैं। ऐसे में जातिगत आंकड़ों के आधार पर बदलाव करने से कुछ समुदायों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है।

    कांग्रेस 2027 की जनगणना में जातियों की गणना को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी ने ओबीसी की संख्या दर्ज किए जाने को लेकर भी केंद्र पर निशाना साधा है और जनगणना के प्रश्नपत्र में ओबीसी श्रेणी को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    2027 की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जातियों की भी राष्ट्रीय स्तर पर गणना की जाएगी। आजादी के बाद यह पहली बार होगा जब इस तरह जातियों की गणना राष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी। लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने 2027 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। राज्य में पहले ही जातिगत सर्वे हो चुका है और नई रिपोर्ट भी तैयार है। यही स्थिति कांग्रेस के लिए असली परीक्षा बन गई है।

  • भारत का बड़ा प्रोजेक्ट और चीन को पोर्ट का काम: मालदीव की डबल गेम से बढ़ी हलचल, मुइज्जू की रणनीति ने चौंकाया

    भारत का बड़ा प्रोजेक्ट और चीन को पोर्ट का काम: मालदीव की डबल गेम से बढ़ी हलचल, मुइज्जू की रणनीति ने चौंकाया


    नई दिल्ली। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू हाल के दिनों में भारत के साथ रिश्तों को लेकर सकारात्मक संकेत देते नजर आए हैं लेकिन इसी बीच थिलाफुशी पोर्ट प्रोजेक्ट में चीन की बड़ी भूमिका ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच मालदीव की रणनीति को चर्चा में ला दिया है। कुछ समय पहले ही मुइज्जू ने भारत की मदद से तैयार हो रहे थिलामाले ब्रिज को भारत और मालदीव के मजबूत रिश्तों का प्रतीक बताया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भारत सरकार के सहयोग के लिए आभार जताया था। लेकिन दूसरी तरफ मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के पहले चरण का काम चीन की कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC को सौंप दिया है।

    थिलाफुशी कोई सामान्य इलाका नहीं है। राजधानी माले के पश्चिम में स्थित यह कृत्रिम द्वीप आने वाले समय में मालदीव के सबसे अहम कारोबारी और औद्योगिक केंद्रों में शामिल होने वाला है। सरकार माले के मौजूदा कमर्शियल पोर्ट पर बढ़ते दबाव और ट्रैफिक को कम करने के लिए बंदरगाह की गतिविधियों को थिलाफुशी ले जाने की योजना पर काम कर रही है। मालदीव सरकार के मुताबिक यहां आधुनिक वेयरहाउस कोल्ड स्टोरेज और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं के साथ एक बड़ा कमर्शियल पोर्ट विकसित किया जा रहा है।

    योजना के पहले चरण में पोर्ट क्षेत्र को करीब 5 हेक्टेयर से बढ़ाकर 20 हेक्टेयर तक करने की बात है। इसमें 650 मीटर लंबी क्वे वॉल 125 मीटर का रोडसाइड जेट्टी बॉन्डेड वेयरहाउस और एक्स रे सुविधा जैसी व्यवस्थाएं शामिल होंगी। आधुनिक ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए माल की क्लीयरेंस प्रक्रिया को मौजूदा कई दिनों से घटाकर करीब 48 घंटे तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। यानी यह प्रोजेक्ट मालदीव की व्यापारिक व्यवस्था और सप्लाई चेन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस थिलाफुशी इलाके में चीन की कंपनी पोर्ट से जुड़ा काम करेगी वही इलाका भारत के ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का भी अहम हिस्सा है। भारत की ओर से करीब 400 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन और 100 मिलियन डॉलर की ग्रांट से तैयार हो रहे इस प्रोजेक्ट के जरिए माले को विलिमाले गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य केवल आवाजाही आसान करना नहीं बल्कि मालदीव की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी है।

    यानी एक ही रणनीतिक क्षेत्र में भारत और चीन दोनों की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं मौजूद हैं। यही वजह है कि थिलाफुशी पोर्ट को लेकर चर्चा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर में मालदीव की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है और किसी भी बड़े बंदरगाह प्रोजेक्ट में विदेशी कंपनी की भूमिका स्वाभाविक रूप से रणनीतिक सवाल खड़े करती है। हालांकि चीनी कंपनी को ठेका मिलने का मतलब यह अपने आप नहीं है कि यह बंदरगाह सैन्य इस्तेमाल के लिए होगा। लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि चीन को मालदीव के अहम समुद्री बुनियादी ढांचे में कितनी बड़ी भूमिका मिलती है।

    मुइज्जू की राजनीति को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। वह 2023 में इंडिया आउट अभियान के जरिए सत्ता में आए थे और उनके कार्यकाल की शुरुआत में मालदीव को चीन के करीब जाता हुआ देखा गया था। लेकिन आर्थिक दबाव और वित्तीय जरूरतों के बीच भारत के साथ रिश्तों में फिर सुधार हुआ। अब मुइज्जू भारत की परियोजनाओं की तारीफ कर रहे हैं और साथ ही चीन के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आगे बढ़ा रहे हैं।

    ऐसे में इसे केवल भारत की अनदेखी या चीन के सामने पूरी तरह झुकाव कहना शायद जल्दबाजी होगी। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि मालदीव दोनों बड़े देशों से अपने हित साधने की कोशिश कर रहा है। भारत उसे वित्तीय सहयोग कनेक्टिविटी और विकास परियोजनाओं में मदद दे रहा है जबकि चीन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण प्रोजेक्ट में सक्रिय है। थिलाफुशी पोर्ट का फैसला यही बताता है कि माले फिलहाल भारत और चीन के बीच किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

  • पांच राज्यों के चुनावों के दौरान BJP के खजाने में आए 1473 करोड़ रुपये, असम में हुए सबसे ज्यादा खर्च

    पांच राज्यों के चुनावों के दौरान BJP के खजाने में आए 1473 करोड़ रुपये, असम में हुए सबसे ज्यादा खर्च


    नई दिल्ली
    । भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party-BJP) के केंद्रीय पार्टी मुख्यालय को पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों (Assembly elections) के दौरान कुल 1472.8 करोड़ रुपये मिले थे। यह जानकारी पार्टी की ओर से चुनाव आयोग को सौंपे गए चुनाव खर्च के ब्योरे से सामने आई है। फिलहाल चुनाव आयोग (Election Commission) ने असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के खर्च से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक किए हैं। चुनाव पूरा होने के बाद 6 मई 2026 को बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस 7,627.2 करोड़ रुपये था। 15 मार्च 2026 को यह राशि 6,722.6 करोड़ रुपये थी।


    तीन राज्यों में बीजेपी ने 160 करोड़ रुपये खर्च किए

    बीजेपी ने केंद्रीय मुख्यालय के साथ संबंधित राज्य और जिला इकाइयों को मिलाकर असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों में कुल 160 करोड़ रुपये खर्च किए। इनमें सबसे ज्यादा खर्च असम में हुआ। आंकड़ों के मुताबिक:-
    – असम: 96.3 करोड़ रुपये
    – तमिलनाडु: 51.6 करोड़ रुपये
    – पुडुचेरी: 11.9 करोड़ रुपये

    एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने करीब 130.4 करोड़ रुपये सामान्य चुनाव प्रचार पर खर्च किए। वहीं, 29.6 करोड़ रुपये उम्मीदवारों को एकमुश्त भुगतान और उनके आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी के प्रचार पर खर्च किए गए।


    असम में प्रचार पर 76.7 करोड़ रुपये खर्च

    असम में बीजेपी ने सामान्य पार्टी प्रचार पर कुल 76.7 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें केंद्रीय इकाई की ओर से खर्च किए गए 23.1 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। उम्मीदवारों पर पार्टी ने 19.5 करोड़ रुपये खर्च किए।

    स्टार प्रचारकों की यात्रा खर्च पर 27.3 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि विज्ञापनों पर 37 करोड़ रुपये खर्च किए गए। प्रचार सामग्री पर 8.9 करोड़ रुपये और अन्य मदों में 2.3 करोड़ रुपये खर्च किए गए। उम्मीदवारों को कुल 19.4 करोड़ रुपये एकमुश्त राशि के तौर पर दिए गए। वहीं, उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी प्रकाशित करने पर 16.7 लाख रुपये खर्च हुए।


    तमिलनाडु में प्रचार के लिए 44.5 करोड़ रुपये

    तमिलनाडु में बीजेपी ने सामान्य पार्टी प्रचार के लिए 44.5 करोड़ रुपये खर्च करने को मंजूरी दी थी। इसके अलावा उम्मीदवारों पर 7 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

    कांग्रेस ने 248.6 करोड़ रुपये खर्च किए
    इसी चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से पहले जारी किए गए चुनाव खर्च के ब्योरे में कुल 248.6 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी गई थी। पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव खर्च से जुड़े बीजेपी के स्टेटमेंट अभी चुनाव आयोग की ओर से सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।