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  • सीमा कालीरमन का बड़ा खुलासा, बोलीं- खेल का आनंद लिया, मेडल अपने आप मिल गया

    सीमा कालीरमन का बड़ा खुलासा, बोलीं- खेल का आनंद लिया, मेडल अपने आप मिल गया


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला डिस्कस थ्रो स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाने वाली सीमा कालीरमन ने अपनी सफलता के पीछे का राज साझा किया है। ग्लासगो में शानदार प्रदर्शन के बाद सीमा ने कहा कि प्रतियोगिता के दौरान उनका पूरा ध्यान केवल अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर था। उन्होंने बताया कि उन्होंने मेडल के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा, बल्कि खेल का आनंद लेते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की और यही सोच उनकी सफलता की सबसे बड़ी वजह बनी।

    समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में सीमा ने कहा कि पदक जीतने की खुशी शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि जब से उन्होंने परिणाम की चिंता छोड़कर खेल का आनंद लेना शुरू किया है, तभी से उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है। उनके अनुसार यदि खिलाड़ी केवल अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर ध्यान दे तो सफलता अपने आप उसके कदम चूमती है।

    सीमा ने यह भी बताया कि इस बार वह अपने चार साल के बेटे से दूर रहकर कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने आई थीं। उन्होंने स्वीकार किया कि बेटे की याद उन्हें लगातार आती रही और उसका जिक्र होते ही वह भावुक हो जाती हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए पूरे फोकस के साथ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और देश के लिए पदक जीतने में सफल रहीं।

    उन्होंने अपनी इस उपलब्धि का बड़ा श्रेय अपने पति और निजी कोच रविंदर कालीरमन को दिया। सीमा ने कहा कि पिछले वर्ष एशियन चैंपियनशिप में उनके पति साथ नहीं थे, जिसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा था। लेकिन इस बार ग्लासगो में रविंदर की मौजूदगी ने उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया। उन्होंने बताया कि उनके पति ने कभी उन पर पदक जीतने का दबाव नहीं बनाया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि खेल का आनंद लो और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करो। यही सलाह उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी।

    सीमा ने कहा कि एक खिलाड़ी की सफलता केवल मैदान पर दिखाई देने वाले प्रदर्शन तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, त्याग और कठिन मेहनत छिपी होती है। उन्होंने बताया कि खिलाड़ियों को मानसिक दबाव, आर्थिक चुनौतियों और कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि सही समय पर सहयोग और सुविधाएं मिलें तो वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम और ऊंचा कर सकते हैं।

    उन्होंने सरकार से भी अपील की कि जिन युवाओं में खेलों के प्रति जुनून और प्रतिभा है, उन्हें शुरुआती स्तर से बेहतर प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। उनका मानना है कि समय पर मिला समर्थन कई खिलाड़ियों के सपनों को साकार कर सकता है और भारत को भविष्य में और अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक दिला सकता है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में सीमा कालीरमन ने 58.65 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर कांस्य पदक अपने नाम किया। यह उपलब्धि न केवल उनके करियर की बड़ी सफलता है, बल्कि भारतीय एथलेटिक्स के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। उनके संघर्ष, समर्पण और सकारात्मक सोच ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर हर चुनौती को पार किया जा सकता है।

  • मेडल से चूकीं मार्टिना देवी, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की उम्मीदों को लगा झटका

    मेडल से चूकीं मार्टिना देवी, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की उम्मीदों को लगा झटका


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय महिला वेटलिफ्टर मार्टिना देवी मैबाम ने शानदार संघर्ष तो किया, लेकिन पदक जीतने का सपना पूरा नहीं हो सका। महिला 86+ किलोग्राम भार वर्ग में उन्होंने कुल 245 किलोग्राम वजन उठाकर पांचवां स्थान हासिल किया। कांस्य पदक उनसे महज 5 किलोग्राम दूर रह गया। उनकी इस करीबी हार ने भारतीय खेल प्रेमियों को निराश जरूर किया, लेकिन उनके जुझारू प्रदर्शन ने सभी का दिल जीत लिया।

    ग्लासगो के एसईसी आर्माडिलो एरीना में आयोजित इस मुकाबले में मार्टिना की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। स्नैच स्पर्धा में उन्होंने पहले दो प्रयासों में 103 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की, लेकिन दोनों बार असफल रहीं। लगातार दो असफल प्रयासों के बाद दबाव काफी बढ़ गया था। ऐसे में उन्होंने तीसरे प्रयास में वजन बढ़ाकर 105 किलोग्राम उठाया और सफलता हासिल की। यह लिफ्ट पूरी होते ही उनकी आंखों में खुशी और राहत के आंसू साफ दिखाई दिए।

    स्नैच के बाद क्लीन एंड जर्क में मार्टिना ने दमदार शुरुआत करते हुए पहले प्रयास में 140 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद उन्होंने 144 और 146 किलोग्राम का प्रयास किया, लेकिन दोनों कोशिशें सफल नहीं हो सकीं। इस तरह उनका कुल स्कोर 245 किलोग्राम रहा, जो उन्हें पांचवें स्थान तक ही पहुंचा सका।

    इस स्पर्धा में मेजबान इंग्लैंड की एमिली कैंपबेल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 278 किलोग्राम वजन उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उन्होंने स्नैच में 115 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 163 किलोग्राम का सफल प्रयास कर कॉमनवेल्थ गेम्स का नया रिकॉर्ड भी बनाया। मलेशिया की सिती अकीलाह फरहाना ड्रामन ने 253 किलोग्राम के साथ रजत पदक जीता, जबकि कनाडा की एटा मे लव ने कुल 250 किलोग्राम वजन उठाकर कांस्य पदक अपने नाम किया।

    मार्टिना यदि अपने दूसरे या तीसरे क्लीन एंड जर्क प्रयास में 144 किलोग्राम वजन उठाने में सफल हो जातीं तो उनका कुल स्कोर 249 किलोग्राम हो जाता और वह पदक की दौड़ में मजबूती से बनी रहतीं। वहीं 146 किलोग्राम की सफल लिफ्ट उन्हें सीधे कांस्य पदक तक पहुंचा सकती थी। हालांकि खेल में छोटे अंतर ही बड़ा फैसला करते हैं और इस बार किस्मत उनका साथ नहीं दे सकी।

    इसके बावजूद मार्टिना का प्रदर्शन भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। उन्होंने दबाव की स्थिति में वापसी करते हुए अपनी मानसिक मजबूती का परिचय दिया और अंत तक पदक की दौड़ में बनी रहीं। आने वाले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में उनसे और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का अभियान लगातार मजबूत बना हुआ है। अब तक भारतीय दल 15 पदक जीत चुका है, जिनमें 3 स्वर्ण, 9 रजत और 3 कांस्य पदक शामिल हैं। मार्टिना भले ही इस बार पदक से चूक गईं, लेकिन उनका संघर्ष और जज्बा भविष्य के लिए भारतीय वेटलिफ्टिंग को नई उम्मीद जरूर देता है।

  • राष्ट्रपति मुर्मु ने बढ़ाया भारतीय खिलाड़ियों का हौसला, लवप्रीत और सीमा को दी शानदार जीत की बधाई

    राष्ट्रपति मुर्मु ने बढ़ाया भारतीय खिलाड़ियों का हौसला, लवप्रीत और सीमा को दी शानदार जीत की बधाई


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन का सिलसिला लगातार जारी है। आठवें दिन भारत के खाते में दो अहम पदक जुड़े, जब वेटलिफ्टर लवप्रीत सिंह ने पुरुषों के 110 प्लस किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता और सीमा कालीरमन ने महिला डिस्कस थ्रो स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया। दोनों खिलाड़ियों की इस उपलब्धि पर देशभर में खुशी की लहर दौड़ गई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु समेत कई शीर्ष नेताओं ने उन्हें बधाई देते हुए उनके प्रदर्शन को देश के लिए गर्व का क्षण बताया।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लवप्रीत सिंह को बधाई देते हुए कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीतना उनकी मेहनत, दृढ़ संकल्प और शानदार प्रदर्शन का परिणाम है। उन्होंने लिखा कि लवप्रीत की इस सफलता पर हर भारतीय को गर्व है और उन्हें उम्मीद है कि वह आने वाले वर्षों में भी देश के लिए नई उपलब्धियां हासिल करेंगे।

    राष्ट्रपति ने सीमा कालीरमन की भी जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि महिला डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीतना सीमा की कड़ी मेहनत, समर्पण और संघर्ष का प्रमाण है। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि सीमा की उपलब्धि देश की युवा महिलाओं को खेलों में आगे बढ़ने और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करेगी।

    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी दोनों खिलाड़ियों को बधाई देते हुए उनके प्रदर्शन को भारतीय खेलों के लिए गौरवपूर्ण बताया। उन्होंने लवप्रीत सिंह की ताकत, मेहनत और आत्मविश्वास की सराहना करते हुए कहा कि यह पदक उनकी निरंतर मेहनत का परिणाम है। वहीं सीमा कालीरमन के लिए उन्होंने कहा कि महिलाओं के डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने साहस, दृढ़ निश्चय और संघर्ष की शानदार मिसाल पेश की है।

    केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने भी दोनों खिलाड़ियों की उपलब्धि पर खुशी जताई। उन्होंने लवप्रीत को 388 किलोग्राम कुल भार उठाकर रजत पदक जीतने पर बधाई दी और कहा कि उनका प्रदर्शन भारतीय वेटलिफ्टिंग के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। वहीं सीमा कालीरमन के लिए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (एनसीओई) पटियाला की इस एथलीट ने कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया है।

    दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी सीमा कालीरमन को विशेष रूप से बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि उनकी मेहनत, अनुशासन और मजबूत इरादों का परिणाम है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सीमा भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करती रहेंगी और देश को कई यादगार पल देंगी।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लवप्रीत सिंह और सीमा कालीरमन की सफलता केवल दो पदकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद देश के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देखते हैं। दोनों खिलाड़ियों की मेहनत और समर्पण ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति और लगातार प्रयास से अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता हासिल की जा सकती है।

  • उंगली की चोट ने बढ़ाई पाकिस्तान की मुश्किलें, वेस्टइंडीज के खिलाफ नहीं खेलेंगे शान मसूद

    उंगली की चोट ने बढ़ाई पाकिस्तान की मुश्किलें, वेस्टइंडीज के खिलाफ नहीं खेलेंगे शान मसूद


    नई दिल्ली । वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट में मिली हार के बाद पाकिस्तान क्रिकेट टीम की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। टीम के अनुभवी बल्लेबाज शान मसूद चोट के कारण दूसरे टेस्ट मैच से बाहर हो गए हैं। उनकी गैरमौजूदगी ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान पहले ही सीरीज में पिछड़ चुका है और वापसी की कोशिश में जुटा है। अब टीम को बल्लेबाजी क्रम में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है।

    पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि शान मसूद के बाएं हाथ की तर्जनी उंगली में गंभीर चोट लगी है। यह चोट उन्हें वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट की पहली पारी के दौरान तेज गेंदबाज जयडेन सील्स की गेंद लगने से हुई थी। चोट लगने के बाद मसूद दर्द से कराहते नजर आए थे, लेकिन उन्होंने दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने की कोशिश की। हालांकि वह पूरी तरह फिट नहीं थे और अपनी बल्लेबाजी से कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सके।

    चोट के बाद कराए गए स्कैन और मेडिकल जांच में उंगली को आराम देने की सलाह दी गई है। फिलहाल पाकिस्तान टीम का मेडिकल पैनल उनका इलाज कर रहा है। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि उनकी वापसी पूरी तरह रिकवरी की रफ्तार और मेडिकल रिपोर्ट पर निर्भर करेगी। ऐसे में 19 अगस्त से इंग्लैंड के खिलाफ शुरू होने वाली टेस्ट सीरीज के पहले मुकाबले में भी उनके खेलने को लेकर संशय बना हुआ है।

    पाकिस्तान के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि टीम पहले टेस्ट में बल्लेबाजी के मोर्चे पर बुरी तरह संघर्ष करती दिखाई दी थी। चौथी पारी में 211 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए पूरी टीम महज 120 रन पर सिमट गई थी। आठ बल्लेबाज दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सके। कप्तान बाबर आजम ने नाबाद 58 रन बनाकर संघर्ष जरूर किया, लेकिन दूसरे छोर से उन्हें किसी बल्लेबाज का साथ नहीं मिला और पाकिस्तान को 90 रन से हार का सामना करना पड़ा।

    अब दूसरा टेस्ट 2 अगस्त से खेला जाना है, जहां पाकिस्तान के सामने सीरीज बराबर करने की चुनौती होगी। ऐसे में शान मसूद जैसे अनुभवी बल्लेबाज की अनुपस्थिति टीम के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है। चयनकर्ताओं और टीम प्रबंधन को अब उनके विकल्प पर फैसला करना होगा ताकि बल्लेबाजी क्रम को मजबूती मिल सके।

    दूसरी ओर वेस्टइंडीज पहले टेस्ट की जीत से आत्मविश्वास से भरी हुई है और सीरीज अपने नाम करने के इरादे से मैदान पर उतरेगी। ऐसे में पाकिस्तान पर दबाव पहले से कहीं ज्यादा होगा। टीम को न केवल बल्लेबाजी में बेहतर प्रदर्शन करना होगा, बल्कि शुरुआती विकेट बचाकर बड़ी साझेदारियां भी बनानी होंगी। शान मसूद की चोट ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया है।

  • चोट, मातृत्व और पढ़ाई के बीच नहीं टूटा हौसला, सीमा कालीरमन ने भारत को दिलाया ब्रॉन्ज

    चोट, मातृत्व और पढ़ाई के बीच नहीं टूटा हौसला, सीमा कालीरमन ने भारत को दिलाया ब्रॉन्ज


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिला डिस्कस थ्रो स्पर्धा में भारत के लिए कांस्य पदक जीतने वाली सीमा कालीरमन की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि परिवार की जिम्मेदारियां, पढ़ाई और खेल तीनों को एक साथ निभाकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है।

    27 वर्षीय सीमा कालीरमन ने ग्लासगो में हुए महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के नाम कांस्य पदक दर्ज कराया। यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है, जिसने उन्हें देश की नई प्रेरणादायक खिलाड़ियों की सूची में शामिल कर दिया है।

    सीमा का सफर आसान नहीं रहा। घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें तीन साल से अधिक समय तक प्रतियोगिताओं से दूर रहना पड़ा। इसके बाद मातृत्व की जिम्मेदारी आई और चार साल के बेटे रुद्र की परवरिश के साथ खेल में वापसी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत के दम पर फिर से खुद को साबित किया।

    सीमा सिर्फ एक एथलीट ही नहीं बल्कि चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय, भिवानी से फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी भी कर रही हैं। खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। उनके इस सफर में सबसे बड़ा साथ उनके पति और कोच रविंदर कालीरमन ने दिया। रविंदर स्वयं राष्ट्रीय स्तर के डिस्कस थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं और उनकी ट्रेनिंग ने सीमा की वापसी को नई दिशा दी।

    2022 में बेटे रुद्र के जन्म के बाद लगभग 11 महीने के ब्रेक के बावजूद सीमा ने जब मैदान पर वापसी की तो पहले से अधिक मजबूत नजर आईं। जहां पहले उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 48.08 मीटर था, वहीं वापसी के बाद उन्होंने इसे लगातार बेहतर करते हुए 57.19 मीटर तक पहुंचाया। इसके बाद भुवनेश्वर में आयोजित इंडियन चैंपियनशिप 2026 में उन्होंने 59.73 मीटर का शानदार थ्रो कर अपना नया व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड बनाया।

    कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल में सीमा के छह प्रयासों में से केवल दो थ्रो ही वैध रहे, क्योंकि कई बार डिस्कस साइड नेटिंग में फंस गया। इसके बावजूद उन्होंने धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखा और शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

    पिछले दो वर्षों में सीमा ने लगातार शानदार प्रदर्शन किया है। उन्होंने 2025 के नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, राष्ट्रीय चैंपियन बनीं और 2026 दक्षिण एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल हासिल किया। इन्हीं उपलब्धियों के दम पर उन्होंने एशियाई खेल 2026 और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई।

    सीमा कालीरमन की कहानी सिर्फ एक मेडल जीतने की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की कहानी है। उन्होंने दिखा दिया कि अगर जुनून सच्चा हो तो चोट, जिम्मेदारियां और कठिन परिस्थितियां भी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। उनका कांस्य पदक भारतीय खेल जगत के लिए प्रेरणा का नया अध्याय है और आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए यह संदेश भी कि सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत और धैर्य सबसे बड़ी ताकत होते हैं।

  • आर्थिक तंगी से कॉमनवेल्थ पोडियम तक, लवप्रीत सिंह ने सिल्वर जीतकर बढ़ाया भारत का मान

    आर्थिक तंगी से कॉमनवेल्थ पोडियम तक, लवप्रीत सिंह ने सिल्वर जीतकर बढ़ाया भारत का मान


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टर लवप्रीत सिंह ने अपने शानदार प्रदर्शन से पूरे देश को गौरवान्वित कर दिया। पुरुषों के 110+ किलोग्राम भार वर्ग में उन्होंने कुल 388 किलोग्राम वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। गोल्ड मेडल उनसे केवल एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनकी मेहनत, संघर्ष और जज्बे ने करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया। लवप्रीत ने यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने आर्थिक अभाव भी कभी बड़ी बाधा नहीं बनते।

    पंजाब के अमृतसर जिले के बाल सचंदर गांव में जन्मे लवप्रीत का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता दर्जी का काम करते हैं, जबकि दादा सब्जियां बेचकर परिवार का गुजारा करते थे। सीमित आय के बावजूद परिवार ने बेटे के सपनों पर कभी समझौता नहीं किया। पिता ने सिलाई मशीन की आवाज के बीच बेटे के लिए मेडल जीतने का सपना संजोया और हर मुश्किल परिस्थिति में उसका साथ दिया। परिवार ने अपनी जरूरतों में कटौती की, लेकिन लवप्रीत की ट्रेनिंग और खानपान में कोई कमी नहीं आने दी।

    महज 13 वर्ष की उम्र में लवप्रीत ने वेटलिफ्टिंग की दुनिया में कदम रखा। स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। उनकी प्रतिभा और अनुशासन ने जल्द ही उन्हें पहचान दिलाई। वर्ष 2015 में भारतीय नौसेना में नौकरी मिलने के बाद उनके करियर को नई दिशा मिली। इसके बाद उन्हें पटियाला स्थित राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में अभ्यास का अवसर मिला, जहां उनकी प्रतिभा और अधिक निखरी।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लवप्रीत ने लगातार अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। उन्होंने कॉमनवेल्थ जूनियर चैंपियनशिप में स्वर्ण और एशियाई जूनियर चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर भारतीय वेटलिफ्टिंग में अपनी मजबूत पहचान बनाई। बाद में 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य और कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने खुद को देश के भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में शामिल कर लिया।

    ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लवप्रीत का प्रदर्शन यादगार रहा। स्नैच राउंड में उन्होंने 176 किलोग्राम वजन उठाकर नया कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड बनाया और प्रतियोगिता में बढ़त हासिल की। इसके बाद क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 212 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। अंतिम प्रयास में उन्होंने 217 किलोग्राम वजन उठाकर गोल्ड पर कब्जा जमाने की कोशिश की, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका। इसी कारण वह कुल 388 किलोग्राम के साथ सिल्वर पर रहे, जबकि न्यूजीलैंड के डेविड लिटी ने 389 किलोग्राम उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

    हालांकि गोल्ड मेडल उनसे सिर्फ एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनके संघर्ष और प्रदर्शन ने उन्हें देश का हीरो बना दिया। साधारण परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर रिकॉर्ड बनाना और भारत के लिए पदक जीतना किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं है। लवप्रीत की सफलता यह संदेश देती है कि मेहनत, अनुशासन और परिवार का विश्वास किसी भी सपने को हकीकत में बदल सकता है। उनका यह सिल्वर मेडल केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।

  • भारत की झोली में एक और मेडल, लवप्रीत सिंह ने वेटलिफ्टिंग में किया कमाल

    भारत की झोली में एक और मेडल, लवप्रीत सिंह ने वेटलिफ्टिंग में किया कमाल

    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के वेटलिफ्टर लवप्रीत सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश की झोली में एक और रजत पदक डाल दिया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित पुरुषों के 110+ किलोग्राम भार वर्ग मुकाबले में लवप्रीत ने कुल 388 किलोग्राम वजन उठाकर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। वह स्वर्ण पदक से केवल एक किलोग्राम के मामूली अंतर से चूक गए। न्यूजीलैंड के डेविड लिटी ने 389 किलोग्राम वजन उठाकर गोल्ड मेडल जीता, जबकि इंग्लैंड के एंड्रयू ग्रिफिथ्स 356 किलोग्राम के साथ कांस्य पदक हासिल करने में सफल रहे।

    मुकाबले की शुरुआत से ही लवप्रीत सिंह शानदार लय में नजर आए। स्नैच स्पर्धा में उन्होंने अपने पहले प्रयास में 168 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद दूसरे प्रयास में 173 किलोग्राम का वजन भी आसानी से उठाकर अपनी दावेदारी मजबूत कर दी। तीसरे और अंतिम प्रयास में उन्होंने 176 किलोग्राम वजन उठाकर प्रतियोगिता में बढ़त बना ली। इस प्रदर्शन के दम पर वह स्नैच में शीर्ष स्थान पर रहे और न्यूजीलैंड के डेविड लिटी पर 10 किलोग्राम की बढ़त हासिल कर चुके थे।

    हालांकि असली मुकाबला क्लीन एंड जर्क में देखने को मिला। लवप्रीत ने पहले 205 किलोग्राम और फिर 212 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद उन्होंने स्वर्ण पदक पक्का करने के इरादे से 217 किलोग्राम की चुनौती ली, लेकिन अंतिम प्रयास सफल नहीं हो सका। दूसरी ओर डेविड लिटी ने शानदार वापसी करते हुए क्लीन एंड जर्क में 223 किलोग्राम वजन उठाया और कुल 389 किलोग्राम के साथ महज एक किलोग्राम की बढ़त बनाकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। लवप्रीत का कुल स्कोर 388 किलोग्राम रहा, जिसने उन्हें रजत पदक दिलाया।

    पंजाब के अमृतसर जिले के बाल सचंदर गांव में 6 सितंबर 1997 को जन्मे लवप्रीत सिंह की सफलता संघर्ष और मेहनत की प्रेरक कहानी है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने वर्ष 2010 में महज 13 वर्ष की उम्र में वेटलिफ्टिंग शुरू की। स्थानीय कोचों के मार्गदर्शन में लगातार अभ्यास करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब का प्रतिनिधित्व किया और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

    साल 2017 में उन्हें पटियाला स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जगह मिली, जहां उनकी प्रतिभा को और निखार मिला। शुरुआत में उन्होंने 105 किलोग्राम वर्ग में खेलते हुए जूनियर कॉमनवेल्थ और एशियाई जूनियर प्रतियोगिताओं में पदक जीते। बाद में अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग महासंघ द्वारा नई भार श्रेणियां लागू होने के बाद वह 109 किलोग्राम वर्ग में पहुंचे और वहां भी शानदार प्रदर्शन जारी रखा।

    लवप्रीत इससे पहले 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीत चुके हैं। इसके अलावा 2022 कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में रजत पदक जीतकर उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह भारत के सबसे भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में शामिल हैं। भले ही इस बार गोल्ड उनसे सिर्फ एक किलोग्राम दूर रह गया, लेकिन उनका प्रदर्शन भारतीय खेल प्रेमियों के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन गया।

  • 'कैप नंबर 278 अब यहीं तक': अजिंक्य रहाणे ने लिया संन्यास, भारतीय क्रिकेट का भरोसेमंद बल्लेबाज बोला अलविदा

    'कैप नंबर 278 अब यहीं तक': अजिंक्य रहाणे ने लिया संन्यास, भारतीय क्रिकेट का भरोसेमंद बल्लेबाज बोला अलविदा


    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट के सबसे शांत, संयमित और भरोसेमंद खिलाड़ियों में गिने जाने वाले अजिंक्य रहाणे ने आखिरकार क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। 2020-21 की ऐतिहासिक बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में ऑस्ट्रेलिया की धरती पर टीम इंडिया को अविस्मरणीय जीत दिलाने वाले रहाणे ने सोशल मीडिया पर भावुक संदेश साझा करते हुए अपने दो दशक लंबे क्रिकेट सफर को विराम दिया। उनके इस फैसले के साथ भारतीय क्रिकेट का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसे साहस, धैर्य और टीम भावना के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

    संन्यास की घोषणा करते हुए रहाणे ने लिखा कि कैप नंबर 278 अब यहीं तक है। उन्होंने अपने प्रशंसकों, साथियों और भारतीय क्रिकेट से जुड़े हर व्यक्ति का आभार जताते हुए कहा कि हर शुरुआत का एक अंत होता है और उन्हें लगता है कि अब आगे बढ़ने का यही सही समय है। उन्होंने कहा कि बल्लेबाजी में हमेशा सही टाइमिंग पर भरोसा किया और अब संन्यास लेने के लिए भी यही सही समय है।

    मुंबई के डोंबिवली से निकलकर भारतीय टीम तक का सफर तय करने वाले रहाणे ने कहा कि उनका बचपन सिर्फ एक सपना लेकर बीता कि एक दिन भारत की जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन्होंने हमेशा देश और टीम को खुद से ऊपर रखा और पूरी ईमानदारी के साथ क्रिकेट खेला। उनका मानना रहा कि अगर नीयत साफ हो तो खेल हमेशा आपका साथ देता है।

    रहाणे के करियर का सबसे स्वर्णिम अध्याय 2020-21 का ऑस्ट्रेलिया दौरा माना जाता है। एडिलेड टेस्ट में भारत के 36 रन पर ऑलआउट होने और विराट कोहली के स्वदेश लौटने के बाद टीम पूरी तरह दबाव में थी। ऐसे मुश्किल समय में रहाणे ने कप्तानी संभाली और मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर शानदार शतक लगाकर टीम में नया आत्मविश्वास भरा। उनकी कप्तानी में युवा और चोटों से जूझ रही भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में 2-1 से हराकर इतिहास रच दिया। यही वजह है कि उन्हें आज भी मेलबर्न का हीरो कहा जाता है।

    रहाणे लंबे समय तक विदेशी परिस्थितियों में भारत के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज रहे। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 85 टेस्ट, 90 वनडे और 20 टी-20 मुकाबले खेले। टेस्ट क्रिकेट में उनके नाम 5077 रन, 12 शतक और 26 अर्धशतक दर्ज हैं। वनडे में उन्होंने 2962 रन बनाए, जिसमें तीन शतक और 24 अर्धशतक शामिल रहे। टी-20 अंतरराष्ट्रीय में उन्होंने 375 रन बनाए। तीनों प्रारूपों को मिलाकर रहाणे ने भारत के लिए 8414 अंतरराष्ट्रीय रन बनाए और 15 शतक जड़े।

    वह 2015 विश्व कप में सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली भारतीय टीम का अहम हिस्सा रहे। इसके अलावा 2023 विश्व टेस्ट चैंपियनशिप चक्र में भी उन्होंने भारत के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि जुलाई 2023 में वेस्टइंडीज के खिलाफ आखिरी टेस्ट खेलने के बाद उन्हें टीम में दोबारा मौका नहीं मिला। उन्होंने घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर वापसी की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रीय टीम में वापसी का सपना पूरा नहीं हो सका।

    अपने विदाई संदेश में रहाणे ने कहा कि क्रिकेट ने उन्हें जीत भी दिखाई और हार भी, लेकिन एक जगह वह कभी नहीं हारे और वह था लोगों का प्यार। उन्होंने कहा कि अब वह अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को अपने अनुभव और खेल से सीखे गए मूल्यों को देना चाहते हैं ताकि भारतीय क्रिकेट आगे भी नई ऊंचाइयों को छूता रहे।

    अजिंक्य रहाणे भले ही मैदान पर अब बल्लेबाजी करते नजर नहीं आएंगे, लेकिन उनकी शांत कप्तानी, कठिन परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभाने का जज्बा और मेलबर्न में खेली गई ऐतिहासिक पारी भारतीय क्रिकेट इतिहास में हमेशा सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगी।

  • नीली जर्सी से ऑरेंज तक भारतीय हॉकी का नया सफर हॉकी इंडिया ने बताया बदलाव का बड़ा तकनीकी कारण

    नीली जर्सी से ऑरेंज तक भारतीय हॉकी का नया सफर हॉकी इंडिया ने बताया बदलाव का बड़ा तकनीकी कारण


    नई दिल्ली। भारतीय हॉकी टीम की नई ऑरेंज जर्सी को लेकर उठे सवालों पर हॉकी इंडिया ने कहा कि नीली जर्सी और नीले टर्फ के कारण खिलाड़ियों की दृश्यता प्रभावित हो रही थी। खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ की सलाह के बाद यह फैसला लिया गया।
    भारतीय हॉकी टीम की नई ऑरेंज जर्सी को लेकर उठे सवालों पर हॉकी इंडिया ने कहा कि नीली जर्सी और नीले टर्फ के कारण खिलाड़ियों की दृश्यता प्रभावित हो रही थी। खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ की सलाह के बाद यह फैसला लिया गया।

    भारतीय हॉकी टीम की नई जर्सी को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। हॉकी इंडिया ने साफ किया है कि टीम की पारंपरिक नीली जर्सी को बदलकर ऑरेंज रंग अपनाने का फैसला किसी प्रचार या ब्रांडिंग के लिए नहीं बल्कि खिलाड़ियों की तकनीकी जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया गया है। संस्था का कहना है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी टर्फ का रंग भी नीला होता है जिससे खिलाड़ियों की जर्सी मैदान में आसानी से घुलमिल जाती थी और इससे दृश्यता के साथ खेल पर भी असर पड़ रहा था।

    दरअसल हाल ही में हॉकी इंडिया ने एफआईएच हॉकी विश्व कप से पहले भारतीय टीम की नई ऑरेंज जर्सी लॉन्च की थी। इसके बाद भारतीय टीम के पूर्व कप्तान वीरेन रस्किन्हा ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय हॉकी की पहचान हमेशा से नीली जर्सी रही है और फैंस भी टीम को उसी रंग में देखना पसंद करते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जताते हुए पूछा कि आखिर ऑरेंज रंग चुनने का क्या कारण है।

    हॉकी इंडिया ने इस पर विस्तृत जवाब देते हुए बताया कि यह निर्णय खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ के साथ कई दौर की चर्चा के बाद लिया गया। संस्था के अनुसार खिलाड़ियों ने महसूस किया कि नीले रंग की जर्सी और नीली सिंथेटिक हॉकी पिच का रंग लगभग एक जैसा होने से मैच के दौरान खिलाड़ियों की पहचान और दृश्यता प्रभावित होती है। इससे पासिंग मूवमेंट और खेल की गति पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने पीले या ऑरेंज जैसे अलग रंगों का सुझाव दिया था। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ऑरेंज रंग को अंतिम रूप दिया गया।

    हॉकी इंडिया ने यह भी कहा कि ऑरेंज रंग केवल तकनीकी दृष्टि से ही उपयुक्त नहीं है बल्कि इसका राष्ट्रीय महत्व भी है। यह रंग भारतीय तिरंगे का हिस्सा है और साहस त्याग ऊर्जा और राष्ट्र गौरव का प्रतीक माना जाता है। संस्था का मानना है कि नई जर्सी खिलाड़ियों में आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ भारतीय पहचान को भी मजबूत करेगी।

    संस्था ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय हॉकी टीम की जर्सी का रंग बदलना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के दौरान टीम की किट में बदलाव किए जा चुके हैं। वर्ष 2014 के हॉकी विश्व कप में भारतीय टीम पीले रंग की जर्सी में उतरी थी जबकि 2018 के विश्व कप में आसमानी नीले रंग की अलग डिजाइन वाली जर्सी का उपयोग किया गया था। इसलिए मौजूदा बदलाव को परंपरा से अलग नहीं बल्कि समय और आवश्यकता के अनुसार किया गया निर्णय बताया गया है।

    हॉकी इंडिया का कहना है कि खिलाड़ियों का प्रदर्शन सर्वोच्च प्राथमिकता है और यदि किसी तकनीकी बदलाव से उनकी दृश्यता और खेल बेहतर होता है तो ऐसे फैसले भविष्य में भी लिए जा सकते हैं। संस्था को उम्मीद है कि नई ऑरेंज जर्सी में भारतीय टीम विश्व मंच पर शानदार प्रदर्शन करेगी और एक नई पहचान के साथ देश का गौरव बढ़ाएगी।

  • दुनिया को परिवार की तरह स्वागत का न्योता कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 के लिए गुजरात ने दिखाई अपनी भव्य तैयारी

    दुनिया को परिवार की तरह स्वागत का न्योता कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 के लिए गुजरात ने दिखाई अपनी भव्य तैयारी


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी के लिए अहमदाबाद पूरी दुनिया का स्वागत करने की तैयारी में जुटा है। गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने कहा कि यह आयोजन केवल एक अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता नहीं बल्कि गुजरात और पूरे भारत के युवाओं का साझा सपना है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में अहमदाबाद विश्व स्तरीय खेल आयोजन की मेजबानी कर भारत की नई पहचान दुनिया के सामने पेश करेगा।

    ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के दौरान अहमदाबाद एक्सपीरियंस सेंटर के उद्घाटन अवसर पर हर्ष संघवी ने कहा कि इस पहल को खिलाड़ियों खेल अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों से शानदार प्रतिक्रिया मिली है। उन्होंने बताया कि 30 जुलाई से 2 अगस्त तक इस सेंटर में पांच हजार से अधिक पंजीकरण हुए हैं और विश्व खेल महासंघों के प्रतिनिधियों सहित कई एथलीट यहां पहुंच रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल मेजबानी हासिल करने का अभियान नहीं बल्कि भारत के भविष्य का सपना है जिसे हर युवा अपने साथ जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है।

    हर्ष संघवी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खेलों को बढ़ावा देने वाले विजन ने गुजरात में खेल अवसंरचना के विकास को नई दिशा दी है। इसी सोच का परिणाम है कि राज्य ने बेहद कम समय में राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन कर अपनी क्षमता साबित की। उनका मानना है कि यही अनुभव और मजबूत आधारभूत ढांचा वर्ष 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स के सफल आयोजन की नींव बनेगा।

    उन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय आतिथ्य परंपरा को भी आयोजन की सबसे बड़ी ताकत बताया। उनके अनुसार अहमदाबाद एक्सपीरियंस सेंटर में देश के विभिन्न राज्यों के पारंपरिक व्यंजन और संस्कृति को प्रदर्शित किया गया है जिसे विदेशी मेहमानों ने काफी पसंद किया है। मिठाइयों से लेकर पारंपरिक स्नैक्स और विभिन्न राज्यों के व्यंजनों तक हर स्टॉल पर लोगों की भारी भीड़ देखने को मिली। इससे यह संदेश गया कि भारत केवल खेलों का आयोजन ही नहीं करेगा बल्कि अपनी संस्कृति और मेहमाननवाजी से भी दुनिया का दिल जीतेगा।

    संघवी ने कहा कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। अलग अलग राज्यों की संस्कृति भोजन और परंपराएं दुनिया के सामने भारत की समृद्ध विरासत को प्रस्तुत करती हैं। यही वजह है कि एक्सपीरियंस सेंटर में आने वाले विदेशी प्रतिनिधि भारतीय संस्कृति को करीब से जानने और अनुभव करने में विशेष रुचि दिखा रहे हैं।

    उन्होंने दुनिया भर के खिलाड़ियों खेल संगठनों और खेल प्रेमियों को संदेश देते हुए कहा कि वर्ष 2030 में भारत आने वाले सभी लोग मेहमान नहीं बल्कि परिवार के सदस्य होंगे। गुजरात और भारत उनका पूरे दिल से स्वागत करेंगे और उन्हें ऐसा अनुभव देंगे जिसे वे हमेशा याद रखेंगे।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी भारत के लिए केवल एक खेल आयोजन नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी संगठन क्षमता आधुनिक खेल सुविधाओं सांस्कृतिक विरासत और युवा शक्ति को प्रदर्शित करने का सुनहरा अवसर माना जा रहा है। यदि यह आयोजन अहमदाबाद में सफलतापूर्वक संपन्न होता है तो भारत विश्व खेल मानचित्र पर अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करने में सफल होगा। साथ ही यह देश के युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए नई प्रेरणा भी देगा।