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  • प्रेमानंद महाराज का असली नाम और उनके जीवन की प्रेरणादायक यात्रा

    प्रेमानंद महाराज का असली नाम और उनके जीवन की प्रेरणादायक यात्रा


    नई दिल्ली । प्रेमानंद महाराज का नाम आज के समय में किसी आध्यात्मिक चमत्कार से कम नहीं माना जाता है। उनका जीवन आत्मसमर्पण, भक्ति और अडिग विश्वास का प्रतीक बन चुका है। जहां एक ओर चिकित्सकीय दृष्टिकोण से उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं और वे डायलिसिस पर हैं वहीं दूसरी ओर प्रेमानंद महाराज हर रात 2 बजे उठकर वृंदावन की परिक्रमा करते हैं और अपने भक्तों को ऊर्जा से भरपूर प्रवचन देते हैं। यह असाधारण साहस और भक्ति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

    अनिरुद्ध से प्रेमानंद महाराज तक का सफर

    प्रेमानंद महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के एक छोटे से गाँव सरसौल में हुआ था। उनका असली नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उनका पालन-पोषण एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ, जहां भक्ति के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। उनके दादा एक सन्यासी थे और माता-पिता भी धार्मिक प्रवृत्तियों के अनुयायी थे। बचपन से ही अनिरुद्ध का झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था। वह बाकी बच्चों की तरह खेल-कूद में व्यस्त नहीं रहते थे बल्कि अक्सर ध्यान और मंत्र जाप में लीन रहते थे।13 वर्ष की उम्र में, जब अन्य बच्चे अपने भविष्य के सपनों में खोए रहते हैं, अनिरुद्ध ने घर छोड़कर संन्यास की राह पकड़ ली। इस समय से उनकी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हुई और उन्होंने नैमिषारण्य में गहरी तपस्या की। यहां उन्हें आनंद स्वरूप ब्रह्मचारी के नाम से पहचाना गया।

    शिव भक्ति से कृष्ण प्रेम तक का सफर

    आध्यात्मिकता के प्रति अपनी गहरी निष्ठा के कारण अनिरुद्ध ने भगवान शिव की उपासना की और मोक्ष प्राप्ति के लिए जीवन समर्पित कर दिया। लेकिन एक दिन उन्हें किसी संत के माध्यम से वृंदावन की महिमा और भगवान कृष्ण की रासलीला के बारे में ज्ञात हुआ। इसके बाद उन्होंने महादेव की आज्ञा लेकर वृंदावन की यात्रा की और वहां पहुंचते ही उनका दिल पूरी तरह से बदल गया। वृंदावन की रज में कदम रखते ही उन्होंने राधा वल्लभ संप्रदाय को अपनाया और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति पद्धति से प्रभावित हुए। यहीं पर उनकी मुलाकात उनके गुरु गौरांगी शरण महाराज से हुई। गुरु के साथ बिताए गए समय में उन्होंने 10 वर्षों तक सेवा की, और राधा रानी के चरणों में अनन्य भक्ति के कारण उन्हें नया नाम मिला: प्रेमानंद गोविंद शरण, जिसे आज पूरी दुनिया प्रेमानंद महाराज के नाम से जानती है।

    किडनियां फेल, फिर भी भक्ति का पावर हाउस

    प्रेमानंद महाराज का जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह से फेल हो चुकी हैं और वे लंबे समय से डायलिसिस पर हैं। ऐसी स्थिति में किसी सामान्य व्यक्ति के लिए बिस्तर से उठना भी मुश्किल होता, लेकिन प्रेमानंद महाराज की भक्ति और आत्मविश्वास की कोई सीमा नहीं। हर रात 2 बजे उठकर वे वृंदावन की परिक्रमा करते हैं और घंटों तक अपने भक्तों को ऊर्जावान प्रवचन देते हैं। उनकी भक्ति की शक्ति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी किडनियों का नाम राधा और कृष्ण रखा है। वे अक्सर कहते हैं कि यह शरीर केवल राधा रानी की सेवा का एक साधन है, और जब तक उनकी इच्छा है, यह शरीर कार्य करता रहेगा। प्रेमानंद महाराज की भक्ति का ये अद्वितीय रूप उनके भक्तों के लिए एक निरंतर प्रेरणा स्रोत है। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि आत्मविश्वास, भक्ति और विश्वास के बल पर कोई भी कठिनाई अजेय नहीं होती।

  • अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम

    अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम


    नई दिल्ली । अघोरी बाबा हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और कठिन आध्यात्मिक पंथों में से एक माने जाते हैं। भगवान शिव के भैरव रूप के उपासक अघोरी अपनी कठोर साधना भूत-प्रेत से संबंधित क्रियाओं और सनातन मार्ग से अलग हटकर जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो घोर न हो यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संसार की जटिलताओं से ऊपर उठकर अत्यधिक सरल और सहज जीवन जीता हो। हालांकि इस सहजता तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत कठिन है और इसके लिए एक कठोर साधना की आवश्यकता होती है।

    अघोरी बनने के लिए 12 वर्षों की कठिन तपस्या

    अघोरी बनने के लिए सबसे पहली शर्त है 12 वर्षों की तपस्या। यह तपस्या किसी साधारण साधना से कहीं अधिक कठोर होती है। अघोरी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने गुरु के पास जाकर उनका दीक्षा ग्रहण करना होता है। इस दौरान गुरु के मार्गदर्शन में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कठिन साधनाएं की जाती हैं। अघोरी बनने के इस रास्ते में व्यक्ति को अपने शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने की अत्यधिक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। गुरु की उपस्थिति में 12 साल की साधना के दौरान, अघोरी ने अपनी चेतना को शुद्ध करने के लिए व्रत, उपवास और अन्य कठिन तपों का पालन करना होता है। यह तपस्या आत्मा को शुद्ध करने और शिव भक्ति में गहरे उतरने के लिए की जाती है।

    सांसारिक मृत्यु और नया जन्म

    अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को एक मानसिक और शारीरिक मृत्यु का अनुभव करना होता है। इसका अर्थ है कि वह अपने परिवार और समाज के लिए पूरी तरह से मृत हो चुका है और उसे एक नए जन्म की आवश्यकता होती है। यह मृत्यु एक प्रकार का ‘पिंडदान’ होती है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने अहंकार और सांसारिक आकर्षण को छोड़कर केवल शिव भक्ति की ओर अग्रसर होता है। अघोरी बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से गुरु और शिव की सेवा में समर्पित हो जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों और साधनाओं में कोई भी परंपरागत या सामाजिक बंधन नहीं होते। वे अपने मार्ग में जाने वाले हर कार्य को भैरव रूप में स्वीकार करते हैं।

    अघोरी जीवन के 5 कठिन नियम

    शरीर की तपस्या: अघोरी के लिए शरीर केवल एक माध्यम होता है, और इसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाता है। शरीर को संयमित और तपस्वी जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर रहना: अघोरी के लिए यह आवश्यक है कि वह सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहे। उन्हें अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों से कोई आकर्षण नहीं होता। मृत्यु और जीवन के बीच की सीमा को समझना: अघोरी प्राचीन परंपराओं के अनुसार मृत्यु को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और वे उसे शिव के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके कारण वे शवों के पास बैठकर साधना करते हैं और शमशान भूमि को भी अपने साधना स्थल के रूप में चुनते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से संवाद अघोरी अक्सर भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से संवाद करते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और सच्चे शिव दर्शन को प्राप्त करना होता है। निर्विकल्प समर्पण: अघोरी बाबा के लिए समर्पण सबसे बड़ा साधना है। उन्हें अपने जीवन में कोई दुराव या स्वार्थ नहीं होता वे पूर्ण रूप से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। घोरी बनने की साधना को आम तौर पर एक अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन इसके जरिए व्यक्ति अपनी आत्मा की शुद्धि और शिव के निकटता प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें शरीर, मन, और आत्मा की पूरी तपस्या और बलिदान शामिल होता है।

  • Post Office Time Deposit: ₹7 लाख निवेश पर 5 साल में ₹10.14 लाख, गारंटीड रिटर्न और जीरो रिस्क वाली सुरक्षित स्कीम

    Post Office Time Deposit: ₹7 लाख निवेश पर 5 साल में ₹10.14 लाख, गारंटीड रिटर्न और जीरो रिस्क वाली सुरक्षित स्कीम


    नई दिल्ली। पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉज़िट स्कीम (Post Office Time Deposit Scheme) उन निवेशकों के लिए फिर से आकर्षण का केंद्र बन गई है, जो सुरक्षित और गारंटीड रिटर्न की तलाश में हैं। यह योजना बैंक एफडी की तरह काम करती है और इसे पूरी तरह से भारत सरकार का समर्थन प्राप्त है, जिससे इसमें निवेश पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है। इस स्कीम के तहत निवेशक ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरीकों से अकाउंट खोल सकते हैं और जरूरत पड़ने पर इसे देश के किसी भी पोस्ट ऑफिस में आसानी से ट्रांसफर किया जा सकता है।

    पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉज़िट एक फिक्स्ड-इनकम स्मॉल सेविंग स्कीम है, जिसमें निवेशक अपनी पसंद की अवधि के लिए एकमुश्त राशि जमा कर सकते हैं और तय अवधि के बाद गारंटीड ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में इस योजना पर 1 साल से लेकर 5 साल की अवधि के लिए 6.90% से 7.50% तक की ब्याज दर मिल रही है।

    इसका मतलब यह है कि कम जोखिम चाहने वाले निवेशक इस योजना के जरिए बिना बाजार की चिंता किए मजबूत रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

    इस योजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुरक्षा और स्थिरता है। चूंकि यह वित्त मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है, इसलिए इसमें निवेश का जोखिम लगभग नगण्य है। निवेशक अपनी सुविधा अनुसार 1, 2, 3 या 5 साल की अवधि में पैसा लगा सकते हैं। न्यूनतम निवेश केवल 1,000 रुपये है और इसके बाद 1,000 रुपये के मल्टीपल में कोई भी राशि जमा की जा सकती है। अधिकतम निवेश की कोई सीमा नहीं है, जिससे बड़े निवेशक भी आसानी से इसमें पैसा लगा सकते हैं।

    लिक्विडिटी के मामले में भी यह स्कीम निवेशकों के लिए बेहद लाभकारी है।

    अकाउंट खोलने के 6 महीने बाद समय से पहले पैसा निकालने की अनुमति होती है। हालांकि, प्री-मैच्योर विदड्रॉल पर ब्याज दर थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन यह सुविधा फाइनेंशियल इमरजेंसी की स्थिति में बेहद उपयोगी साबित होती है।

    अब बात करते हैं 7 लाख रुपये के निवेश पर मिलने वाले रिटर्न की। यदि कोई निवेशक पोस्ट ऑफिस की 5 साल वाली टाइम डिपॉज़िट स्कीम में 7.50% ब्याज दर पर ₹7,00,000 एकमुश्त जमा करता है, तो 60 महीने बाद उसे लगभग ₹3,14,964 सिर्फ ब्याज के रूप में प्राप्त होंगे। मैच्योरिटी के समय कुल राशि लगभग ₹10,14,964 बन जाएगी। इस रिटर्न की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह गारंटीड है और इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का कोई असर नहीं पड़ता।

    टैक्स के नजरिए से भी यह स्कीम निवेशकों के लिए फायदेमंद है। 5 साल की टाइम डिपॉज़िट पर इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80C के तहत सालाना ₹1.5 लाख तक की टैक्स छूट का लाभ उठाया जा सकता है। हालांकि, स्कीम से मिलने वाले ब्याज पर टैक्स देना अनिवार्य है और अगर सालाना ब्याज तय सीमा से ज्यादा होता है तो TDS कट सकता है। पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉज़िट में ब्याज की गणना तिमाही आधार पर कंपाउंडिंग के साथ की जाती है और ब्याज का भुगतान सालाना होता है।

    यह व्यवस्था उन निवेशकों के लिए बेहद लाभकारी है, जो लंबी अवधि में कंपाउंडिंग से बेहतर फंड बनाना चाहते हैं और हर साल निश्चित ब्याज आय पाना चाहते हैं।

    कुल मिलाकर, पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉज़िट स्कीम उन लोगों के लिए एक बेहतरीन निवेश विकल्प है जो सुरक्षित, गारंटीड और जोखिम-रहित रिटर्न चाहते हैं। 7 लाख रुपये के निवेश पर 5 साल में 10 लाख रुपये से अधिक का फंड तैयार होना इस बात का सबूत है कि यह योजना लंबी अवधि के लिए भरोसेमंद और मजबूत निवेश विकल्प साबित हो सकती है।

  • प्रधानमंत्री मोदी का गुजरात दौरा: धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों मे

    प्रधानमंत्री मोदी का गुजरात दौरा: धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों मे


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार शाम से गुजरात दौरे की शुरुआत करेंगे। वे शाम 8 बजे सोमनाथ मंदिर में ओंकार मंत्र का जाप करने वाले भक्तों के साथ शामिल होंगे। इसके बाद मंदिर परिसर में आयोजित विशेष ड्रोन शो का अवलोकन करेंगे, जो धार्मिक और सांस्कृतिक समर्पण का प्रतीक माना जा रहा है।

    सोमनाथ स्वाभिमान पर्व और शौर्य यात्रा

    11 जनवरी को प्रधानमंत्री सुबह 9:45 बजे ‘शौर्य यात्रा’ में भाग लेंगे, जिसमें उन वीर योद्धाओं को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसके बाद सुबह 10:15 बजे मंदिर में दर्शन और पूजा होगी। सुबह 11 बजे ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित होगा।

    राजकोट में वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन

    सोमनाथ के कार्यक्रम के बाद प्रधानमंत्री राजकोट के लिए रवाना होंगे। वहां वे कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र के लिए आयोजित ‘वाइब्रेंट गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन’ में शामिल होंगे। दोपहर 1:30 बजे वे सम्मेलन के व्यापार शो और प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे, इसके बाद दोपहर 2 बजे मारवाड़ी विश्वविद्यालय में क्षेत्रीय सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन होगा और प्रतिभागियों को संबोधित करेंगे।

    अहमदाबाद मेट्रो का उद्घाटन

    राजकोट से प्रधानमंत्री अहमदाबाद जाएंगे। शाम 5:15 बजे महात्मा मंदिर मेट्रो स्टेशन पर सेक्टर 10A से महात्मा मंदिर तक अहमदाबाद मेट्रो के चरण 2 के शेष खंड का उद्घाटन करेंगे। यह परियोजना शहर की परिवहन सुविधा को और बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    अहमदाबाद में जर्मन चांसलर से द्विपक्षीय बैठक

    12 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी अहमदाबाद में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज से मुलाकात करेंगे। सुबह 9:30 बजे दोनों नेता साबरमती आश्रम का दौरा करेंगे और 10 बजे साबरमती रिवरफ्रंट पर अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में भाग लेंगे। इसके बाद 11:15 बजे महात्मा मंदिर, गांधीनगर में द्विपक्षीय वार्ता होगी। यह बैठक भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी की 25 वर्ष की प्रगति की समीक्षा करेगी।

    तीन दिवसीय दौरे का महत्व

    प्रधानमंत्री मोदी का यह तीन दिवसीय दौरा धार्मिक स्थलों, क्षेत्रीय विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को जोड़ने वाला माना जा रहा है। सोमनाथ और अहमदाबाद में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ राजकोट में वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में उद्योग और व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। यह दौरा गुजरात की सामाजिक, आर्थिक और कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं को मजबूत करने में सहायक होगा।

  • ईरान में गुस्सा: ‘ट्रंप के हाथ ईरानियों के खून से सने’, विरोध प्रदर्शन तेज

    ईरान में गुस्सा: ‘ट्रंप के हाथ ईरानियों के खून से सने’, विरोध प्रदर्शन तेज

    ईरान | ईरान में महंगाई और आर्थिक संकट के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब सीधे सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की सत्ता को चुनौती देने वाले आंदोलन में बदल गया है। विरोध प्रदर्शन में हजारों लोग सड़कों पर उतरकर ईरान के निर्वासित विपक्षी नेता रजा पहलवी के समर्थन में नारे लगा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने देश की सत्ता क्राउन प्रिंस रजा पहलवी को सौंपने की मांग की।

    सरकारी बयान और अमेरिका-इजरायल पर आरोप

    ईरान के सरकारी टीवी ने पहली बार विरोध प्रदर्शनों को दिखाया और दावा किया कि अमेरिका और इजरायल के ‘आतंकवादी एजेंटों’ ने माहौल बिगाड़ा है। आयतुल्ला अली खामेनेई ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ दंगाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए तोड़फोड़ कर रहे थे। उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान विदेशियों के भाड़े के सैनिकों को बर्दाश्त नहीं करेगा।

    खामेनेई का विरोधकारियों और अमेरिका पर बयान

    खामेनेई ने कहा, “लाखों कुर्बानियों के बाद हम सत्ता में आए हैं और इतनी आसानी से झुकने वाले नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के हाथ हजारों ईरानियों के खून से सने हैं। ईरान के युवाओं को एकता बनाए रखनी होगी।” उन्होंने जून 2025 में ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अमेरिकी हमले का भी जिक्र किया। इस दौरान भीड़ ने अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगाए।

    रजा पहलवी का आह्वान और हिंसा की झलक

    निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने सोशल मीडिया पोस्ट में ईरान के लोगों से आह्वान किया कि वे सड़कों पर उतरें, क्योंकि पूरी दुनिया की निगाहें ईरान पर हैं। सरकारी टीवी पर मेट्रो स्टेशनों और बैंकों में आग, जलती हुई बसें और कारें दिखाई गईं। ईरानी मीडिया ने पीपुल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन (एमकेओ) पर इस अशांति का आरोप लगाया, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अलग हुआ एक विपक्षी गुट है।

    इंटरनेट और संचार बाधित

    गुरुवार, 8 जनवरी 2026 की रात ईरान सरकार ने इंटरनेट और टेलीफोन लाइनें काट दीं। इंटरनेट कंपनियों क्लाउडफ्लेयर और नेटब्लॉक्स ने इसे रिपोर्ट किया और कहा कि इसका कारण ईरान सरकार का हस्तक्षेप था। इससे पूरे देश में विरोध प्रदर्शन की जानकारी और संचार बाधित हो गया।

    परिस्थितियों का अंतरराष्ट्रीय असर

    महंगाई विरोध से शुरू हुए आंदोलन का असर राजनीतिक अस्थिरता और सरकार की जवाबदेही पर पड़ रहा है। खामेनेई और अमेरिका-इजरायल के बीच आरोप-प्रत्यारोप, देश में इंटरनेट ब्लैकआउट और रजा पहलवी का आह्वान ईरान की आंतरिक स्थिति को और नाजुक बना रहे हैं। विरोध प्रदर्शन ने केवल आर्थिक मुद्दों को नहीं, बल्कि राजनीतिक और सुरक्षा के गंभीर पहलुओं को भी उजागर किया है।

  • ईरान में उबाल: बढ़ते विरोध के आगे झुकी खामेनेई सरकार, सरकारी टीवी ने मानी हिंसा

    ईरान में उबाल: बढ़ते विरोध के आगे झुकी खामेनेई सरकार, सरकारी टीवी ने मानी हिंसा

    अंतरराष्ट्रीय मध्य पूर्व के देश ईरान में हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं. बीते करीब 12 दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा खुलकर सड़कों पर नजर आ रहा है.

    गुरुवार रात हालात और बिगड़ गए, जब राजधानी तेहरान समेत 100 से ज्यादा शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए.

    प्रदर्शनों के दौरान कई जगह आगजनी की घटनाएं हुईं. सरकारी इमारतों और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की खबरें सामने आईं. इसके साथ ही, कुछ इलाकों में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की भी सूचना मिली है, जिससे हालात और तनावपूर्ण हो गए. बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती के बावजूद हालात काबू में आते नहीं दिख रहे हैं.

    अमेरिका की चेतावनी और ईरान का जवाब

    इन घटनाओं के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि अगर प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई की गई, तो इसका कड़ा जवाब दिया जाएगा. इस बयान के बाद ईरान ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है. इससे यह साफ संकेत मिलता है कि ईरान सरकार किसी भी संभावित खतरे को लेकर सतर्क है.

    सरकारी टीवी ने तोड़ी चुप्पी

    लंबे समय तक हालात पर चुप्पी साधे रखने के बाद अब ईरान के सरकारी टेलीविजन ने पहली बार हिंसा की बात स्वीकार की है. एक कार्यक्रम के दौरान यह माना गया कि प्रदर्शनों के समय हिंसक घटनाएं हुई हैं और कुछ लोगों की जान भी गई है. यह स्वीकारोक्ति बताती है कि हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब उन्हें छिपाना संभव नहीं रहा.

    हालांकि, सरकार ने जनता के गुस्से को इन घटनाओं की वजह मानने से इनकार किया है. सरकारी टीवी का दावा है कि आगजनी और हिंसा के पीछे अमेरिका और इज़रायल से जुड़े ‘आतंकी एजेंट’ हैं. ईरानी शासन का कहना है कि देश में अशांति फैलाने के लिए बाहर से साजिश रची जा रही है. यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने अंदरूनी विरोध को विदेशी हस्तक्षेप बताया हो.

    आर्थिक संकट बना बड़ा कारण

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि देश में चल रहा आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी जनता के गुस्से की बड़ी वजह हैं. आम लोगों का जीवन मुश्किल होता जा रहा है, जिससे असंतोष बढ़ता जा रहा है. ऐसे हालात में सरकार के लिए स्थिति संभालना आसान नहीं रह गया है.

  • मकर संक्रांति कब है 2026: जानें कब मनाई जाएगी और किन चीजों का करें दान

    मकर संक्रांति कब है 2026: जानें कब मनाई जाएगी और किन चीजों का करें दान


    नई दिल्ली । मकर संक्रांति हिंदू धर्म में एक बेहद महत्वपूर्ण और खास त्योहार है, जो हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से पौष माह में आता है और इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं जिसे देवताओं का दिन माना जाता है। इस दिन सूर्य की उपासना दान और विशेष रूप से गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान का महत्व होता है।

    मकर संक्रांति कब है 2026

    पंचांग के अनुसार, सूर्य देव 14 जनवरी 2026, बुधवार को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसलिए मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन का विशेष पुण्य काल दोपहर 3:13 बजे से शुरू होकर लगभग 2 घंटे 32 मिनट तक रहेगा। इस दौरान किए गए स्नान, दान, सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने और जप-तप का विशेष महत्व है।

    मकर संक्रांति पर किन चीजों का करें दान

    मकर संक्रांति का दिन विशेष रूप से दान के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दिन दान करने से न केवल पुण्य मिलता है बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि भी आती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन निम्नलिखित चीजों का दान करने से पापों का नाश होता है और व्यक्ति को खुशहाली मिलती है तिल: तिल का दान बहुत शुभ माना जाता है और यह शरीर को निरोगी बनाता है।

    गुड़: गुड़ का दान करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। खिचड़ी: खिचड़ी का दान करना और उसका सेवन करना विशेष रूप से इस दिन शुभ माना जाता है। चावल और उड़द: चावल और उड़द का दान करना भी मकर संक्रांति के दिन फलदायी होता है।हल्दी और नमक: हल्दी और नमक का दान भी पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। धान: धान का दान करने से अनर्थ और दरिद्रता का नाश होता है। इसके अलावा इस दिन दीन-हीन और गरीबों को वस्त्र, वस्तुएं, अन्न और अन्य जरूरी सामान दान करने का भी महत्व है।

    मकर संक्रांति का महत्व

    मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के उत्तरायण होने के कारण विशेष रूप से महत्व रखता है। यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इस दिन से सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अधिक शक्ति और ऊर्जा लेकर आती हैं। यही कारण है कि इस दिन को शुभ कार्यों की शुरुआत और दान-पुण्य के लिए सबसे अच्छा दिन माना जाता है।

    स्नान-दान का महत्व

    मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। साथ ही सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना और विशेष रूप से मंत्रों का जाप करना पुण्यदायी होता है। मकर संक्रांति का पर्व एक नई ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मकता लेकर आता है, जो जीवन को उज्जवल और समृद्ध बनाता है।

  • Border 2 Song: ‘इश्क़ दा चेहरा’ ने छुआ दिल, प्यार–त्याग और जज़्बातों से सजी है ‘बॉर्डर 2’ की नई पेशकश

    Border 2 Song: ‘इश्क़ दा चेहरा’ ने छुआ दिल, प्यार–त्याग और जज़्बातों से सजी है ‘बॉर्डर 2’ की नई पेशकश




    नई दिल्ली।
    देशभक्ति से ओत-प्रोत बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘बॉर्डर 2’ लगातार दर्शकों की उत्सुकता बढ़ा रही है। फिल्म का हाल ही में रिलीज़ हुआ नया गाना ‘इश्क़ दा चेहरा’ दिल को छू लेने वाली भावनाओं से भरा हुआ है, जिसे सुनकर और देखकर दर्शकों की आंखें नम हो रही हैं। यह गाना सिर्फ एक रोमांटिक ट्रैक नहीं, बल्कि सरहद पर तैनात जवानों और उनके परिवारों के प्यार, इंतज़ार और बलिदान की कहानी को बेहद खूबसूरती से बयां करता है।

    इससे पहले फिल्म का गाना ‘घर कब आओगे’ रिलीज़ हुआ था, जिसे दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला।

    सोशल मीडिया पर इस गाने पर हजारों रील्स बनीं और यह गाना जवानों के जज़्बातों की आवाज़ बन गया। अब ‘इश्क़ दा चेहरा’ उसी भावनात्मक सफर को और आगे बढ़ाता है, जहां देश की रक्षा कर रहे सैनिकों की निजी ज़िंदगी, उनके रिश्ते और परिवार के प्रति उनका प्यार सामने आता है।

    ‘इश्क़ दा चेहरा’ एक सोलफुल और रोमांटिक मेलोडी है, जो यह दिखाती है कि कैसे प्यार और परिवार का सहारा जवानों को बॉर्डर पर हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है। गाने में पत्नियों का इंतज़ार, उनका त्याग और रिश्तों की गहराई इतनी संवेदनशीलता से दिखाई गई है कि हर सीन दिल को छू जाता है। यह गाना याद दिलाता है कि वर्दी के पीछे भी एक इंसान होता है, जिसके अपने जज़्बात, सपने और रिश्ते होते हैं।

    इस गाने को संगीत की दुनिया की मशहूर जोड़ी सचेत–परंपरा ने तैयार किया है, जबकि इसके भावुक और खूबसूरत बोल कौसर मुनीर ने लिखे हैं।

    गाने में दिलजीत दोसांझ, परंपरा टंडन और सचेत टंडन की आवाज़ सुनाई देती है, जो इसकी भावनात्मक गहराई को और मजबूत बनाती है। खासतौर पर दिलजीत दोसांझ की आवाज़ गाने में एक अलग ही असर छोड़ती है।

    ‘इश्क़ दा चेहरा’ में फिल्म के कई प्रमुख किरदारों की प्रेम कहानियां भी दिखाई गई हैं। इसमें सनी देओल–मोना सिंह, वरुण धवन–मेधा राणा, दिलजीत दोसांझ–सोनम बाजवा, और अहान शेट्टी–आन्या सिंह की ऑन-स्क्रीन जोड़ियां नजर आती हैं। हर जोड़ी की कहानी प्यार के अलग-अलग रंगों को दिखाती है, जो हालात चाहे जैसे भी हों, रिश्तों की मजबूती को बनाए रखते हैं।

    ‘बॉर्डर 2’ को टी-सीरीज़ और जेपी फिल्म्स ने मिलकर प्रोड्यूस किया है, जबकि फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है।

    यह फिल्म देशभक्ति, साहस और बलिदान की भव्य कहानी को नए दौर की संवेदनाओं के साथ पेश करने वाली है।

    देश के जवानों को समर्पित यह फिल्म 23 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है। ‘इश्क़ दा चेहरा’ ने यह साफ कर दिया है कि ‘बॉर्डर 2’ सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं, बल्कि उन जज़्बातों की कहानी है, जो सरहद के उस पार और इस पार दोनों जगह बराबर महसूस किए जाते हैं।

  • गर्भावस्था में एंटीबायोटिक्स का उपयोग और नवजातों में GBS रोग का खतरा

    गर्भावस्था में एंटीबायोटिक्स का उपयोग और नवजातों में GBS रोग का खतरा

    ई दिल्ली एक अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक्स का उपयोग नवजात शिशुओं में ग्रुप बी स्ट्रेप्टोकोकस (GBS) रोग के विकास के जोखिम को बढ़ा सकता है।

    हालांकि ये बैक्टीरिया आमतौर पर आंत या जननांगों में हानिरहित रहते हैं, लेकिन ये नवजातों, बुजुर्गों और इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड व्यक्तियों में गंभीर संक्रमण का कारण बन सकते हैं, जिससे सेप्सिस, मेनिनजाइटिस और निमोनिया हो सकता है।

    स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट और बेल्जियम के एंटवर्प विश्वविद्यालय के एक अंतरराष्ट्रीय दल द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक संपर्क नवजात GBS रोग के बढ़ते जोखिम से जुड़ा था, जो जन्म के चार सप्ताह के भीतर होता है। तीसरे तिमाही में प्रारंभिक संपर्क का सबसे मजबूत संबंध देखा गया।

    शोधकर्ताओं ने कहा, “गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक संपर्क नवजातों में GBS के जोखिम को चार सप्ताह के भीतर बढ़ा सकता है, विशेष रूप से उन नवजातों में जिन्हें जोखिम-आधारित अंतःप्रसूति प्रोफिलैक्सिस से कवर नहीं किया गया है।”

    इस अध्ययन में 2006 से 2016 के बीच स्वीडन में सभी एकल जीवित जन्मों का जनसंख्या-आधारित अध्ययन किया गया।

    1,095,644 जीवित जन्मों में से 24.5 प्रतिशत नवजातों को एंटीबायोटिक्स का संपर्क हुआ।

    GBS की घटनाएं संपर्क में आए नवजातों में बिना संपर्क वाले नवजातों की तुलना में अधिक पाई गईं (0.86 बनाम 0.66 प्रति 1,000 जीवित जन्म)।

    शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन नवजात GBS रोग के जोखिम से संबंधित गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक संपर्क की जांच करने वाला पहला अध्ययन है। हालांकि, यह पिछले नॉर्डिक अध्ययनों के साथ मेल खाता है, जिन्होंने गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक संपर्क के बाद प्रारंभिक बचपन (1-5 वर्ष) में संक्रमण के 16-34 प्रतिशत बढ़ते जोखिम की रिपोर्ट की थी।

    अध्ययन में यह भी पाया गया कि जन्म के करीब (चार सप्ताह के भीतर) दिए गए GBS-गतिशील एंटीबायोटिक्स कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करते।

    गर्भावस्था के दौरान किसी भी एंटीबायोटिक के संपर्क का नवजात GBS रोग के साथ संबंध केवल उन गर्भधारणाओं में देखा गया जिनमें GBS जोखिम कारक नहीं थे।

    इससे यह संकेत मिलता है कि बिना स्थापित GBS जोखिम कारकों वाले नवजातों को गर्भावस्था के दौरान एंटीबायोटिक संपर्क को सीमित करने से अधिक लाभ हो सकता है।

    अधिक शोध की आवश्यकता पर जोर देते हुए, टीम ने उन नवजातों की निगरानी में बढ़ती सतर्कता की आवश्यकता को भी रेखांकित किया जो मौजूदा GBS रोकथाम दिशानिर्देशों के बाहर आते हैं, विशेष रूप से उन नवजातों के लिए जो प्रारंभिक तीसरी तिमाही में गर्भ में एंटीबायोटिक्स के संपर्क में आए।

  • अनुशासनहीनता की हद: स्कूल प्रबंधन सोया रहा, 8 फीट की बाउंड्री फांदकर स्कूल से बंक मारती नजर आईं छात्राएं

    अनुशासनहीनता की हद: स्कूल प्रबंधन सोया रहा, 8 फीट की बाउंड्री फांदकर स्कूल से बंक मारती नजर आईं छात्राएं


    सतना । मध्य प्रदेश के सतना जिले के शासकीय कन्या हायर सेकंडरी स्कूल नागौद में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहां की छात्राएं स्कूल की 8 फीट ऊंची बाउंड्री फांदकर बाहर जा रही थीं, लेकिन स्कूल प्रबंधन को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह मामला तब सुर्खियों में आया, जब बाउंड्री फांदते हुए छात्राओं का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। विडंबना यह है कि विद्यालय के पीछे से बाउंड्री लांघकर छात्राएं मुख्य सड़क पर कूद रही थीं, जहां दिनभर वाहनों की आवाजाही होती रहती है। इस स्थिति में किसी भी वक्त बड़ा हादसा हो सकता था। वीडियो में छात्राएं बाउंड्री फांदते समय गिरती भी नजर आ रही हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि अगर कोई गंभीर दुर्घटना हो जाती, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होती

    स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि यह मामला छात्राओं की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है, और स्कूल प्रशासन की लापरवाही बेहद चिंताजनक है। स्कूल समय के दौरान छात्राओं का इस तरह बाउंड्री फांदकर बाहर जाना न केवल अनुशासनहीनता का प्रतीक है, बल्कि उनकी जान को भी खतरे में डालने वाला है। जैसे ही यह वीडियो मीडिया में आया, जिला शिक्षा अधिकारी कंचन श्रीवास्तव ने इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हमने इस घटना के बारे में जानकारी प्राप्त की है। हम प्राचार्य से चर्चा करेंगे और इस मामले में उचित प्रबंध कराने के लिए निर्देश देंगे।

    स्कूल की प्राचार्य, विनीता श्रीवास्तव ने इस पर सफाई देते हुए कहा, मुख्य गेट पर ताला लगा हुआ था और अंदर प्री-बोर्ड परीक्षाएं चल रही थीं। अब हमें इस घटना की जानकारी मिली है और इसके लिए उचित प्रबंध किए जाएंगे। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि जब गेट पर ताला लगा था, तो स्कूल प्रबंधन ने छात्राओं के बाहर जाने पर नजर क्यों नहीं रखी। यह मामला विद्यालय प्रबंधन की घोर लापरवाही को उजागर करता है, जो छात्रों की सुरक्षा और अनुशासन की जिम्मेदारी लेने में नाकाम रहा। अगर भविष्य में कोई दुर्घटना होती है, तो यह बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो जाएगा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा।