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  • मध्यप्रदेश में बाघों पर मंडरा रहा खतरा सबसे ज्यादा टाइगर होने के बावजूद बढ़ रही मौतें संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल

    मध्यप्रदेश में बाघों पर मंडरा रहा खतरा सबसे ज्यादा टाइगर होने के बावजूद बढ़ रही मौतें संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल


    मध्यप्रदेश । विश्व बाघ दिवस के अवसर पर जहां पूरे देश में बाघ संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है वहीं देश के सबसे बड़े टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश के सामने एक गंभीर चुनौती भी खड़ी नजर आ रही है। प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन उनके संरक्षण की राह पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। जंगलों का घटता दायरा बढ़ती मानवीय गतिविधियां और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव अब बाघों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। यही कारण है कि वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही प्रदेश में 29 बाघों की मौत दर्ज की गई है जिसने वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार एक जनवरी से 29 अप्रैल 2026 के बीच हुई 29 बाघों की मौतों में पांच मामलों में बिजली के करंट को कारण माना गया है। एक मामले में शिकार की पुष्टि हुई जबकि अन्य मौतें आपसी संघर्ष बीमारी कुएं में गिरने और अन्य प्राकृतिक कारणों से हुईं। करंट से मौत के अधिकांश मामले मंडला शहडोल उमरिया और सिवनी जैसे वन क्षेत्रों में सामने आए जहां खेतों के आसपास लगाए गए बिजली के तार वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आंकड़े भी मध्यप्रदेश के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2012 से 2025 के बीच पूरे देश में 1581 बाघों की मौत दर्ज की गई जिनमें अकेले 423 मौतें मध्यप्रदेश में हुईं। यह आंकड़ा बताता है कि देश में सबसे अधिक बाघों वाला राज्य होने के साथ साथ सबसे अधिक टाइगर मॉर्टेलिटी भी यहीं दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनके लिए सुरक्षित आवास और प्राकृतिक कॉरिडोर का विस्तार भी उतना ही जरूरी है।

    वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार बाघों की सबसे अधिक मौतें आपसी क्षेत्रीय संघर्ष के कारण होती हैं। जब किसी जंगल में बाघों की संख्या बढ़ती है तो वे नए क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर निकलने लगते हैं। ऐसे में उनका सामना खेतों गांवों और मानव बस्तियों से होता है जहां करंट वाले तार सड़क दुर्घटनाएं और अन्य खतरे उनका इंतजार कर रहे होते हैं। इसके अलावा अवैध शिकार और जहरीले पदार्थों का इस्तेमाल भी बाघों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।

    आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 मध्यप्रदेश के लिए सबसे घातक साबित हुआ जब पूरे वर्ष में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। इससे पहले वर्ष 2024 में 47 और वर्ष 2023 में 45 बाघों की मौत हुई थी। वहीं 2026 के केवल पहले चार महीनों में 29 मौतें दर्ज होना इस बात का संकेत है कि यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह संख्या और बढ़ सकती है। औसतन हर चार दिन में एक बाघ की मौत होना संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

    राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े यह भी बताते हैं कि अब बाघ केवल जंगलों के भीतर ही नहीं बल्कि उनके बाहर भी असुरक्षित हो गए हैं। लगभग आधी मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर दर्ज हुई हैं। इतना ही नहीं बाघों की खाल और अन्य अंगों की अधिकांश बरामदगी भी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि वन्यजीव अपराधियों की गतिविधियां अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी बाघ संरक्षण को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि केवल बाघों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और टाइगर कॉरिडोर को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए ताकि जंगलों और वन्यजीवों पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।

    वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे का मानना है कि बाघों की मौत रोकने के लिए वन विभाग को जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत करनी होगी। प्रशिक्षित वन अधिकारियों की संख्या बढ़ाने मुखबिर तंत्र को सक्रिय करने स्थानीय ग्रामीणों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने और वन्यजीव अपराधों में दोष सिद्धि की दर बढ़ाने की जरूरत है। उनका कहना है कि कानून का सख्ती से पालन और त्वरित कार्रवाई ही शिकारियों और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगा सकती है।

    विश्व बाघ दिवस पर मध्यप्रदेश के सामने सबसे बड़ा संदेश यही है कि केवल बाघों की संख्या बढ़ाना सफलता नहीं बल्कि उन्हें सुरक्षित जीवन देना ही वास्तविक संरक्षण है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे प्राकृतिक कॉरिडोर संरक्षित होंगे और मानव तथा वन्यजीवों के बीच संतुलन कायम रहेगा तभी टाइगर स्टेट की पहचान भविष्य में भी मजबूती के साथ कायम रह सकेगी।

  • राजस्थान में 24 हजार से अधिक सफाई कर्मचारी भर्ती, बिना परीक्षा लॉटरी से होगा चयन, 15 अगस्त से शुरू होंगे आवेदन

    राजस्थान में 24 हजार से अधिक सफाई कर्मचारी भर्ती, बिना परीक्षा लॉटरी से होगा चयन, 15 अगस्त से शुरू होंगे आवेदन


    नई दिल्ली ।
    राजस्थान सरकार ने राज्य के विभिन्न नगरीय निकायों में बड़े स्तर पर सफाई कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। इस भर्ती अभियान के तहत राज्य के 183 नगरीय निकायों में 24 हजार से अधिक संविदा सफाई कर्मचारी पदों को भरा जाएगा। भर्ती की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अभ्यर्थियों को किसी भी प्रकार की लिखित परीक्षा या साक्षात्कार से नहीं गुजरना होगा। पात्र उम्मीदवारों का चयन लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा, जिससे पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाने का प्रयास किया गया है।

    इस भर्ती के लिए किसी भी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं रखी गई है। इसका उद्देश्य उन लोगों को भी रोजगार का अवसर उपलब्ध कराना है, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है लेकिन सफाई कार्य का व्यावहारिक अनुभव रखते हैं। हालांकि, आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास कम से कम एक वर्ष का सफाई कार्य का अनुभव होना आवश्यक होगा। यह अनुभव लगातार या अलग-अलग अवधि में प्राप्त किया गया हो सकता है, लेकिन इसके समर्थन में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य रहेगा।

    भर्ती प्रक्रिया में संबंधित नगरीय निकाय में पहले से सफाई कार्य का अनुभव रखने वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जाएगी। यदि किसी निकाय में पर्याप्त पात्र उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होते हैं तो राजस्थान के अन्य नगरीय निकायों में कार्य कर चुके योग्य अभ्यर्थियों को भी चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। प्रत्येक नगरीय निकाय के लिए अलग-अलग लॉटरी आयोजित की जाएगी, जिससे स्थानीय स्तर पर रिक्त पदों के अनुसार चयन सुनिश्चित किया जा सके।

    आवेदन करने के लिए अभ्यर्थी का राजस्थान का स्थायी निवासी होना आवश्यक है। इसके साथ ही उम्मीदवार का शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी जरूरी होगा ताकि वह सफाई कार्य की जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सके। भर्ती नियमों के अनुसार प्रत्येक अभ्यर्थी केवल 183 नगरीय निकायों में से किसी एक के लिए ही आवेदन कर सकेगा। एक से अधिक निकायों के लिए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

    आयु सीमा की बात करें तो उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और अधिकतम आयु 40 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना 1 जनवरी 2027 को आधार मानकर की जाएगी। आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को राज्य सरकार के प्रचलित नियमों के अनुसार अधिकतम आयु सीमा में नियमानुसार छूट प्रदान की जाएगी।

    भर्ती के लिए आवेदन शुल्क भी श्रेणी के अनुसार तय किया गया है। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को 600 रुपये आवेदन शुल्क देना होगा, जबकि आरक्षित वर्ग और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए शुल्क 400 रुपये निर्धारित किया गया है। आवेदन शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा और आवेदन तभी पूर्ण माना जाएगा जब निर्धारित शुल्क सफलतापूर्वक जमा हो जाएगा।

    ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 15 अगस्त 2026 से शुरू होगी। इच्छुक एवं पात्र उम्मीदवार निर्धारित भर्ती पोर्टल पर जाकर आवेदन पत्र भर सकेंगे। आवेदन के दौरान आवश्यक दस्तावेज, अनुभव प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी जानकारी अपलोड करनी होगी। निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने और शुल्क जमा करने के बाद आवेदन स्वीकार किया जाएगा। इस भर्ती अभियान के माध्यम से राज्य के नगरीय निकायों में सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पात्र अभ्यर्थियों को रोजगार का अवसर मिलने की उम्मीद है।

  • सोने-चांदी में सीमित उतार-चढ़ाव, अमेरिकी फेड के फैसले से पहले निवेशकों की बढ़ी सतर्कता..

    सोने-चांदी में सीमित उतार-चढ़ाव, अमेरिकी फेड के फैसले से पहले निवेशकों की बढ़ी सतर्कता..

    नई दिल्ली । घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में बुधवार को सोने और चांदी की कीमतों में मिलाजुला रुख देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत से ही दोनों कीमती धातुएं सीमित दायरे में बनी रहीं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक फिलहाल अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, जिसके कारण बड़े दांव लगाने से बचा जा रहा है। यही वजह है कि कीमतों में केवल मामूली उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर 5 अगस्त 2026 डिलीवरी वाला सोने का वायदा अनुबंध पिछले बंद भाव 1,41,623 रुपये प्रति 10 ग्राम की तुलना में लगभग स्थिर स्तर पर 1,41,519 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। शुरुआती कारोबार के दौरान इसमें हल्की कमजोरी देखने को मिली और भाव 228 रुपये यानी 0.16 प्रतिशत गिरकर 1,41,395 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया। कारोबार के दौरान सोने ने 1,41,311 रुपये प्रति 10 ग्राम का निचला स्तर और 1,41,591 रुपये प्रति 10 ग्राम का उच्चतम स्तर भी दर्ज किया।

    वहीं चांदी के बाजार में अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाई दिया। एमसीएक्स पर 4 सितंबर 2026 डिलीवरी वाले चांदी के अनुबंध की शुरुआत पिछले बंद भाव 2,15,840 रुपये प्रति किलोग्राम के मुकाबले लगभग स्थिर स्तर पर 2,16,834 रुपये प्रति किलोग्राम पर हुई। इसके बाद चांदी में हल्की खरीदारी देखने को मिली और कीमत 608 रुपये यानी 0.28 प्रतिशत बढ़कर 2,16,448 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। कारोबार के दौरान चांदी ने 2,16,369 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम और 2,16,943 रुपये प्रति किलोग्राम का उच्चतम स्तर छुआ।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी दोनों कीमती धातुओं का प्रदर्शन अलग-अलग रहा। कॉमेक्स बाजार में सोने की कीमतों में हल्की गिरावट दर्ज की गई, जबकि चांदी में मामूली मजबूती बनी रही। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि वैश्विक निवेशक भी फिलहाल किसी बड़े रुख के बजाय प्रमुख आर्थिक घटनाक्रमों का इंतजार कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति समिति की बैठक का परिणाम फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। व्यापक अनुमान है कि इस बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि निवेशकों की वास्तविक नजर फेड की भविष्य की नीति संबंधी टिप्पणियों पर रहेगी। यदि आने वाले महीनों में ब्याज दरों के संबंध में नरम या सख्त संकेत मिलते हैं तो उसका सीधा असर सोने और चांदी सहित वैश्विक कमोडिटी बाजारों पर पड़ सकता है।

    सोने को पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता है। ऐसे में ब्याज दरों, महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ी किसी भी महत्वपूर्ण घोषणा का प्रभाव इसकी कीमतों पर तेजी से दिखाई देता है। चांदी भी औद्योगिक और निवेश दोनों मांग से जुड़ी होने के कारण वैश्विक आर्थिक संकेतकों के प्रति संवेदनशील रहती है।

    इस बीच भारतीय शेयर बाजार ने सकारात्मक शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी में लगभग एक प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। आईटी शेयरों में मजबूत खरीदारी के चलते निफ्टी आईटी सूचकांक करीब 1.5 प्रतिशत तक चढ़ गया। इक्विटी बाजार की इस मजबूती के बावजूद कीमती धातुओं में निवेशकों का रुख सतर्क बना रहा और बाजार ने फेड के फैसले से पहले सीमित दायरे में कारोबार जारी रखा।

  • दस साल बाद शुरू हुई पदोन्नति प्रक्रिया विवादों में गृह विभाग के अधिकारियों ने खोला मोर्चा नियमों के उल्लंघन का लगाया आरोप

    दस साल बाद शुरू हुई पदोन्नति प्रक्रिया विवादों में गृह विभाग के अधिकारियों ने खोला मोर्चा नियमों के उल्लंघन का लगाया आरोप


    मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में लगभग एक दशक बाद शुरू हुई शासकीय पदोन्नति प्रक्रिया अब बड़े विवाद का कारण बनती दिखाई दे रही है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी पदोन्नति नियम 2025 के क्रियान्वयन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। पहले वाणिज्यिक कर विभाग में नियमों के पालन को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं और अब गृह विभाग के अधिकारियों ने भी पदोन्नति प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अधिकारियों का कहना है कि विभागीय स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई है और उनकी मनमानी व्याख्या कर बड़ी संख्या में पात्र अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति से वंचित कर दिया गया है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो मामला न्यायालय तक ले जाने की तैयारी की जा रही है।

    शिकायत करने वाले अधिकारियों ने गृह विभाग की सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपते हुए कहा है कि पदोन्नति नियम 2025 के स्पष्ट प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। उनका आरोप है कि चयन प्रक्रिया के दौरान निर्धारित नियमों के बजाय अलग तरीके से पात्रता तय की गई जिससे सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के हजारों कर्मचारी और अधिकारी प्रभावित हुए हैं। उनका कहना है कि यदि नियमों का सही तरीके से पालन किया जाता तो कई और अधिकारी पदोन्नत होने के पात्र होते।

    सबसे अधिक विवाद पुलिस विभाग में हुई पदोन्नतियों को लेकर सामने आया है। राज्य सरकार के अनुसार पुलिस विभाग में करीब 25 हजार पदोन्नतियां की गई हैं और इसे प्रशासनिक दृष्टि से बड़ी उपलब्धि माना गया है। मुख्यमंत्री भी सार्वजनिक मंचों से इस प्रक्रिया की सराहना कर चुके हैं। लेकिन अब कई अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि विभागीय अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की और बाद में त्रुटियों की जानकारी होने के बावजूद उन्हें सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

    शिकायतकर्ताओं के अनुसार लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 की कंडिका 6 में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी चयन वर्ष की विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक समय पर नहीं हो पाती तो अगली बैठक में सबसे पहले उसी लंबित चयन वर्ष के लिए अलग चयन सूची तैयार की जानी चाहिए। इसके बाद वर्तमान और भविष्य की रिक्तियों के लिए नई चयन सूची बनाई जानी चाहिए। अधिकारियों का आरोप है कि अधिकांश विभागों ने इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया और वर्ष 2025 की रिक्तियों के लिए निर्धारित प्रक्रिया की बजाय बाद के वर्षों की गोपनीय चरित्रावली और अन्य अभिलेखों के आधार पर पदोन्नति आदेश जारी कर दिए।

    सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 जून 2025 को पदोन्नति नियम लागू किए थे और 30 जून 2025 को जारी स्पष्टीकरण में यह भी स्पष्ट किया था कि अलग अलग चयन वर्षों के लिए किस अवधि की गोपनीय चरित्रावली को आधार बनाया जाएगा। विशेष पदोन्नति समिति के लिए वर्ष 2022 से 2023 और उससे पहले की निर्धारित अवधि की सीआर पर विचार किया जाना था जबकि अन्य चयन वर्षों के लिए अलग समय सीमा तय की गई थी। अधिकारियों का कहना है कि इन दिशा निर्देशों का पालन नहीं होने से पूरी प्रक्रिया विवादों में आ गई है।

    पदोन्नति से वंचित अधिकारियों ने मांग की है कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा कर नियमों के अनुरूप संशोधित आदेश जारी किए जाएं ताकि किसी भी पात्र अधिकारी के साथ अन्याय न हो। उनका कहना है कि यदि विभाग समय रहते आवश्यक सुधार नहीं करता तो वे न्यायालय की शरण लेने को मजबूर होंगे।

    लंबे समय बाद शुरू हुई पदोन्नति प्रक्रिया से कर्मचारियों और अधिकारियों को जहां बड़ी उम्मीदें थीं वहीं अब उस पर उठ रहे सवाल प्रशासन के लिए नई चुनौती बनते जा रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकार और संबंधित विभाग इस विवाद का किस तरह समाधान निकालते हैं इस पर हजारों कर्मचारियों और अधिकारियों की नजर टिकी हुई है।

  • 31 जुलाई की समयसीमा से पहले आईटीआर फाइलिंग में तेज़ी, असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए 4.70 करोड़ रिटर्न दाखिल

    31 जुलाई की समयसीमा से पहले आईटीआर फाइलिंग में तेज़ी, असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए 4.70 करोड़ रिटर्न दाखिल

    नई दिल्ली ।31 जुलाई की अंतिम तिथि नजदीक आते ही देशभर में आयकर रिटर्न दाखिल करने की रफ्तार तेज हो गई है। असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए बुधवार सुबह 11 बजे तक लगभग 4.70 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल किए जा चुके हैं। बड़ी संख्या में करदाताओं द्वारा अंतिम दिनों में रिटर्न दाखिल किए जाने से स्पष्ट है कि समयसीमा समाप्त होने से पहले लोग अपनी कर संबंधी औपचारिकताओं को पूरा करने में जुटे हुए हैं। आयकर विभाग भी लगातार करदाताओं को समय रहते रिटर्न दाखिल करने के लिए जागरूक कर रहा है, ताकि अंतिम समय में तकनीकी या अन्य परेशानियों से बचा जा सके।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दाखिल किए गए कुल आयकर रिटर्न में से करीब 4.40 करोड़ रिटर्न का सत्यापन पूरा हो चुका है। इसके अलावा लगभग 2.34 करोड़ रिटर्न का प्रोसेसिंग कार्य भी पूरा किया जा चुका है। इससे संकेत मिलता है कि रिटर्न दाखिल करने के साथ-साथ विभाग उसकी जांच और निस्तारण की प्रक्रिया भी तेज गति से आगे बढ़ा रहा है, जिससे पात्र करदाताओं को समय पर आवश्यक लाभ मिल सके।

    आयकर विभाग ने करदाताओं से अपील की है कि वे अंतिम दिन का इंतजार करने के बजाय जल्द से जल्द अपना आयकर रिटर्न दाखिल करें। विभाग ने विशेष रूप से आईटीआर-1 और आईटीआर-2 फॉर्म भरने वाले करदाताओं को समय रहते प्रक्रिया पूरी करने की सलाह दी है। विभाग का कहना है कि अंतिम समय में पोर्टल पर अधिक ट्रैफिक या दस्तावेजों में किसी त्रुटि के कारण अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए पहले से तैयारी करना अधिक उचित रहेगा।

    रिटर्न दाखिल करने से पहले सभी आवश्यक दस्तावेजों का मिलान करना भी बेहद जरूरी माना गया है। करदाताओं को फॉर्म 16, वार्षिक सूचना विवरण, फॉर्म 26एएस, बैंक स्टेटमेंट और आय से जुड़े अन्य रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच करने की सलाह दी गई है। यदि इन दस्तावेजों और रिटर्न में दर्ज जानकारी के बीच कोई अंतर रह जाता है, तो भविष्य में सत्यापन या प्रोसेसिंग के दौरान परेशानी उत्पन्न हो सकती है। सही और पूर्ण जानकारी देने से रिटर्न का निस्तारण भी अपेक्षाकृत तेजी से होता है।

    31 जुलाई की अंतिम तिथि उन करदाताओं पर लागू होती है जिन्हें अपने खातों का टैक्स ऑडिट कराने की आवश्यकता नहीं होती। इसमें वेतनभोगी कर्मचारी, पेंशनभोगी, छात्र तथा अन्य सामान्य व्यक्तिगत करदाता शामिल हैं। ऐसे करदाताओं के लिए निर्धारित समयसीमा के भीतर रिटर्न दाखिल करना आवश्यक है, ताकि विलंब से जुड़ी संभावित जटिलताओं और नियमों के प्रभाव से बचा जा सके।

    आईटीआर-1, जिसे सहज फॉर्म भी कहा जाता है, उन व्यक्तिगत करदाताओं के लिए निर्धारित है जिनकी आय वेतन या पेंशन, एक आवासीय मकान और अन्य साधारण स्रोतों जैसे ब्याज से प्राप्त होती है तथा जिनकी कुल वार्षिक आय निर्धारित सीमा के भीतर रहती है। दूसरी ओर आईटीआर-2 उन व्यक्तियों और हिंदू अविभाजित परिवारों के लिए है जिनकी व्यवसाय या पेशे से आय नहीं होती, लेकिन उन्हें पूंजीगत लाभ, एक से अधिक मकानों, विदेशी संपत्तियों, विदेशी आय या अन्य अपेक्षाकृत जटिल स्रोतों से आय प्राप्त होती है। ऐसे करदाताओं को अपनी आय की प्रकृति के अनुसार सही फॉर्म का चयन कर समयसीमा के भीतर रिटर्न दाखिल करने की सलाह दी गई है।

  • जापान में शक्तिशाली भूकंप के बाद सोनी का कुमामोटो प्लांट बंद, उत्पादन पर असर का आकलन जारी

    जापान में शक्तिशाली भूकंप के बाद सोनी का कुमामोटो प्लांट बंद, उत्पादन पर असर का आकलन जारी

    नई दिल्ली । जापान के कुमामोटो क्षेत्र में आए शक्तिशाली भूकंप के बाद सोनी सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस ने एहतियाती कदम उठाते हुए अपने कुमामोटो टेक्नोलॉजी सेंटर का परिचालन अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। कंपनी ने बताया कि प्लांट की इमारतों, उत्पादन उपकरणों और विनिर्माण लाइनों पर भूकंप के प्रभाव का विस्तृत आकलन किया जा रहा है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उत्पादन दोबारा कब शुरू होगा।

    कंपनी के अनुसार, मंगलवार को स्थानीय समयानुसार शाम 4:27 बजे भूकंप आने के तुरंत बाद किकुयो कस्बे स्थित सोनी सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन के संयंत्र में उत्पादन रोक दिया गया था। यह निर्णय कर्मचारियों की सुरक्षा और संभावित तकनीकी नुकसान का निरीक्षण करने के उद्देश्य से लिया गया। विशेषज्ञों की टीम पूरे परिसर का निरीक्षण कर रही है ताकि परिचालन फिर से शुरू करने से पहले सभी सुरक्षा मानकों की पुष्टि की जा सके।

    सोनी ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके नागासाकी, ओइता और कागोशिमा स्थित अन्य टेक्नोलॉजी सेंटर सामान्य स्थिति में हैं। इन केंद्रों में किसी बड़े नुकसान की सूचना नहीं मिली है और भूकंप के समय वहां मौजूद किसी भी कर्मचारी के घायल होने की खबर भी सामने नहीं आई है। कंपनी लगातार सभी इकाइयों की स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

    भूकंप की तीव्रता 7.1 मापी गई, जिसके कारण कुमामोटो और आसपास के इलाकों में व्यापक असर देखने को मिला। कई इमारतों को नुकसान पहुंचा और राहत एवं बचाव अभियान तुरंत शुरू कर दिए गए। अधिकारियों के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का आकलन जारी है, जबकि बचाव दल मलबे में फंसे लोगों की तलाश और सुरक्षित निकासी में जुटे हुए हैं।

    जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने बताया कि भूकंप में कम से कम 13 लोगों की मौत हुई है और कई अन्य लोग प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए राहत एवं बचाव कार्य तेज गति से चला रही है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रभावित लोगों तक जल्द से जल्द सहायता पहुंचाने के लिए सभी संबंधित एजेंसियां समन्वय के साथ काम कर रही हैं।

    सोनी सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस वैश्विक स्तर पर इमेज सेंसर और अन्य सेमीकंडक्टर कंपोनेंट्स की प्रमुख निर्माता कंपनियों में शामिल है। कंपनी के उत्पादों का उपयोग उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, औद्योगिक उपकरणों और कई उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में किया जाता है। ऐसे में कुमामोटो प्लांट का अस्थायी रूप से बंद होना वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, हालांकि कंपनी ने अभी उत्पादन पर संभावित प्रभाव को लेकर कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की है।

    इस घटना पर भारत ने भी संवेदना व्यक्त की है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जापान में आए भूकंप पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत इस कठिन समय में जापान की सरकार और वहां के लोगों के साथ एकजुटता से खड़ा है। उन्होंने प्रभावित लोगों की सुरक्षा, शीघ्र राहत और जल्द सामान्य स्थिति बहाल होने की कामना की। फिलहाल सभी की नजरें राहत कार्यों की प्रगति और सोनी के कुमामोटो प्लांट में परिचालन दोबारा शुरू होने के निर्णय पर टिकी हुई हैं।

  • चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    चार वर्षों में न्यूनतम बैलेंस शुल्क से बैंकों ने वसूले 26,170 करोड़ रुपये, संसद में सरकार ने साझा किए आंकड़े

    नई दिल्ली । खातों में न्यूनतम औसत शेष राशि बनाए नहीं रखने पर ग्राहकों से वसूले जाने वाले शुल्क को लेकर सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। सरकार के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 से वित्त वर्ष 2026 के बीच देश के बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर ग्राहकों से कुल 26,170 करोड़ रुपये से अधिक की राशि शुल्क के रूप में वसूली है। यह जानकारी राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा दिए गए लिखित उत्तर में सामने आई।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में निजी क्षेत्र के बैंकों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में कहीं अधिक न्यूनतम बैलेंस शुल्क वसूला। केवल वित्त वर्ष 2026 की बात करें तो बैंकों ने कुल 7,086.63 करोड़ रुपये का न्यूनतम बैलेंस शुल्क एकत्र किया। इसमें निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी 4,948.71 करोड़ रुपये रही, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 2,137.92 करोड़ रुपये वसूले।

    आंकड़ों के मुताबिक, निजी क्षेत्र के बैंकों में एचडीएफसी बैंक ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान सबसे अधिक 1,798.14 करोड़ रुपये न्यूनतम बैलेंस शुल्क के रूप में वसूले। इसके बाद एक्सिस बैंक का स्थान रहा, जिसने 1,081.33 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। दोनों बैंकों की संयुक्त हिस्सेदारी निजी क्षेत्र के कुल न्यूनतम बैलेंस शुल्क का लगभग 58 प्रतिशत रही।

    अन्य निजी बैंकों में आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, यस बैंक और आईडीबीआई बैंक ने भी इस मद में उल्लेखनीय राशि वसूली। दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक सबसे आगे रहा, जिसने 477.27 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा और इंडियन बैंक का स्थान रहा।

    हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय स्टेट बैंक द्वारा बताई गई राशि केवल चालू खातों से संबंधित है। बैंक ने मार्च 2020 से बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर लगने वाली पेनाल्टी समाप्त कर दी थी। इस कारण बचत खाताधारकों पर यह शुल्क लागू नहीं होता।

    सरकार ने यह भी बताया कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंकों ने बचत खातों पर न्यूनतम औसत बैलेंस बनाए रखने की अनिवार्यता को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से 10 बैंकों ने बचत खातों पर यह शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि शेष दो बैंकों ने अपनी नीतियों के अनुरूप इसे सीमित और तर्कसंगत बनाया है।

    वित्त मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट और प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खोले गए खाते न्यूनतम बैलेंस रखने की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त हैं। ऐसे खातों पर न्यूनतम बैलेंस नहीं होने की स्थिति में किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगाया जाता। वर्तमान में देश में लगभग 73 करोड़ ऐसे खाते संचालित हैं, जिनके खाताधारकों को इस नियम से राहत प्राप्त है।

    सरकार की ओर से साझा किए गए ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब बैंकिंग सेवाओं की लागत, ग्राहकों के अधिकारों और बैंकिंग शुल्कों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। आने वाले समय में न्यूनतम बैलेंस संबंधी नियमों और शुल्क व्यवस्था पर भी नीति स्तर पर नजर बनी रह सकती है।

  • बाघों की दहाड़ से गूंजेगा मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री का बड़ा ऐलान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता को मिलेगी नई मजबूती

    बाघों की दहाड़ से गूंजेगा मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री का बड़ा ऐलान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता को मिलेगी नई मजबूती


    भोपाल । अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश ने एक बार फिर देश के टाइगर स्टेट के रूप में अपनी मजबूत पहचान दोहराई। भोपाल में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने विश्वास जताया कि प्रदेश में बाघों की संख्या जल्द ही एक हजार के करीब पहुंच जाएगी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 की बाघ गणना के अनुसार मध्यप्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए थे और जिस गति से संरक्षण कार्य चल रहे हैं उसे देखते हुए अगली गणना में यह आंकड़ा लगभग एक हजार तक पहुंच सकता है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वन्यजीव संरक्षण केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला भी है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश आज देश में बाघ संरक्षण का सबसे मजबूत केंद्र बन चुका है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पृथ्वी पर यदि कहीं बाघ इंसानों के सबसे निकट प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं तो वह भोपाल और उसके आसपास का क्षेत्र है। यह प्रदेश के समृद्ध जंगलों और सफल वन प्रबंधन की पहचान है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार ऐसे प्रयास कर रही है जिससे जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बना रहे और वन्यजीव सुरक्षित वातावरण में अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

    डॉ मोहन यादव ने बताया कि प्रदेश सरकार केवल बाघों तक सीमित नहीं है बल्कि अन्य वन्यजीवों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की नदियों में घड़ियालों का संरक्षण और पुनर्वास अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। पहले प्रदेश में छोड़े गए घड़ियालों का अधिक लाभ दूसरे राज्यों को मिलता था लेकिन अब ऐसी रणनीति बनाई जा रही है जिससे घड़ियाल मध्यप्रदेश की नदियों में ही सुरक्षित रह सकें और उनकी संख्या लगातार बढ़े।

    गुरु पूर्णिमा के अवसर का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति सदियों से प्रकृति के सम्मान और संरक्षण की शिक्षा देती आई है। महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पेड़ों में जीवन होने की अवधारणा भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा रही है और आज आधुनिक विज्ञान भी इस सत्य को स्वीकार कर चुका है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ओरछा स्थित माता महालक्ष्मी मंदिर की भव्यता की सराहना करते हुए कहा कि शासन के सभी विभाग महत्वपूर्ण हैं लेकिन वन विभाग के साथ काम करना उन्हें विशेष संतोष देता है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार अन्य राज्यों के साथ वन्यजीवों के आदान प्रदान और संरक्षण को लेकर भी सकारात्मक पहल कर रही है। हाथियों की आवाजाही और उससे होने वाली जनहानि को कम करने के लिए किए गए प्रयासों के भी अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

    इस अवसर पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभरंजन सेन ने कहा कि स्वस्थ जंगल की सबसे बड़ी पहचान वहां सुरक्षित बाघ और उनके शावक होते हैं। उनका कहना था कि बाघों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव की रक्षा नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी और स्थानीय समुदाय मिलकर इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

    कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने वन्यजीव संरक्षण के लिए उपलब्ध कराए गए नए वाहनों का लोकार्पण किया और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। साथ ही विभागीय प्रकाशनों का विमोचन किया गया और वन्यजीव प्रबंधन पर आधारित वृत्तचित्रों के टीजर जारी किए गए। वन सुरक्षा समितियों ईको विकास समितियों ग्राम वन समितियों और उत्कृष्ट कार्य करने वाले वन कर्मियों को सम्मानित भी किया गया। स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण का संदेश दिया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में भी देश में वन्यजीव संरक्षण का अग्रणी राज्य बने रहने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रहा है।

  • रणभूमि से आगे मानवीय सेवा तक भारतीय सेना की पहचान, राजनाथ सिंह ने गिनाईं सैन्य चिकित्सा की नई प्राथमिकताएं

    रणभूमि से आगे मानवीय सेवा तक भारतीय सेना की पहचान, राजनाथ सिंह ने गिनाईं सैन्य चिकित्सा की नई प्राथमिकताएं

    नई दिल्ली । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारतीय सशस्त्र बलों की पहचान केवल युद्ध के मैदान में उनके साहस और पराक्रम से नहीं होती, बल्कि मानवीय सहायता, आपदा राहत और सेवा भावना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय संकटों और कठिन परिस्थितियों में भारतीय सैनिक हमेशा लोगों की सहायता के लिए सबसे आगे रहते हैं। उनके अनुसार देश की सुरक्षा के साथ-साथ मानवता की सेवा भी भारतीय सेनाओं की मूल पहचान का हिस्सा है।

    रक्षा मंत्री ने लखनऊ स्थित कमांड हॉस्पिटल में देश के पहले समर्पित ‘डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री मेडिसिन’ की स्थापना के अवसर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण और विषम भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। सियाचिन की अत्यधिक बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर रेगिस्तानी इलाकों की भीषण गर्मी तक, जवानों को अनेक प्रकार की शारीरिक और चिकित्सीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि कठिन तैनाती के दौरान सैनिकों को संक्रामक रोगों, अत्यधिक गर्मी और ठंड से होने वाली चोटों, अधिक ऊंचाई से जुड़ी बीमारियों, थकान, पोषण संबंधी समस्याओं, निर्जलीकरण और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों से जूझना पड़ता है। उनका विश्वास है कि नया विभाग इन परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक और प्रभावी चिकित्सा प्रोटोकॉल विकसित करेगा, जिससे सैनिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा।

    उन्होंने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सुरक्षा चुनौतियां पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रह गई हैं। रासायनिक, जैविक और रेडियोलॉजिकल खतरों जैसे नए जोखिम लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह विभाग इन उभरती चुनौतियों पर अनुसंधान और विकास का प्रमुख केंद्र बनेगा तथा सैन्य चिकित्सा के क्षेत्र में नई तकनीकों और उपचार पद्धतियों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय सैन्य चिकित्सा सेवाओं की प्रतिष्ठा केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशनों में प्रमुख सैन्य योगदान देने वाले देशों में शामिल है। विदेशों में तैनात भारतीय सैन्य चिकित्सकों को भी विभिन्न प्रकार की चिकित्सा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे अनुभवों के आधार पर विकसित होने वाला यह विभाग भविष्य में वैश्विक स्तर पर भी सैन्य चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान देने में सक्षम होगा।

    उन्होंने कहा कि कमांड हॉस्पिटल, लखनऊ लंबे समय से सैन्य चिकित्सा, अनुसंधान और अनुशासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां के चिकित्सकों ने ‘ऑपरेशन विजय’ और कारगिल युद्ध जैसे महत्वपूर्ण अभियानों के दौरान उल्लेखनीय सेवाएं दी हैं। अब इसी संस्थान में स्थापित हो रहा ‘डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री मेडिसिन’ सैन्य स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने के साथ-साथ चिकित्सा अनुसंधान को भी मजबूत करेगा।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला केवल आर्थिक और सामाजिक प्रगति नहीं होती, बल्कि उसकी सैन्य शक्ति और सैनिकों का मनोबल भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि जब कोई सैनिक देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करता है, तो उसके पीछे ऐसा मजबूत स्वास्थ्य तंत्र होना चाहिए जो हर परिस्थिति में उसका साथ दे। उनके अनुसार यह नया विभाग इसी विश्वास को और मजबूत करेगा तथा सशस्त्र बलों के कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगा।

  • भोपाल में किसान आंदोलन बना संघर्ष और परिवार की कहानी बेटियों ने खिलाया खाना पत्नी ने कहा खाली हाथ मत लौटना

    भोपाल में किसान आंदोलन बना संघर्ष और परिवार की कहानी बेटियों ने खिलाया खाना पत्नी ने कहा खाली हाथ मत लौटना


    भोपाल । भोपाल में जारी किसान आंदोलन अब केवल सरकारी नीतियों के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह किसानों के संघर्ष उनके परिवारों की उम्मीदों और गांव की आर्थिक हकीकत की मार्मिक कहानी बन गया है। राजधानी के होशंगाबाद रोड पर हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। इस आंदोलन के बीच कई ऐसे दृश्य सामने आए जिन्होंने हर किसी को भावुक कर दिया। कहीं दो बेटियां अपने किसान पिता के लिए घर का बना खाना लेकर पहुंचीं तो कहीं एक पत्नी ने अपने पति को साफ शब्दों में कह दिया कि इस बार मांगें मनवाकर ही घर लौटना।

    संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में निकली किसान क्रांति पैदल यात्रा नर्मदापुरम जिले के बरखेड़ा से शुरू होकर भोपाल पहुंची है। किसान मूंग की शत प्रतिशत सरकारी खरीदी खाद वितरण व्यवस्था में सुधार और न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी जैसी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेती तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

    आंदोलन के बीच कटारा हिल्स में रहने वाली प्रगति पटेल और उनकी बहन प्रकृति पटेल अपने पिता के लिए भोजन लेकर धरना स्थल पहुंचीं। दोनों भोपाल में पढ़ाई कर रही हैं। प्रगति ने कहा कि उन्होंने बचपन से अपने पिता को खेतों में मेहनत करते देखा है लेकिन मेहनत के अनुरूप उन्हें कभी उचित मूल्य नहीं मिला। उनका कहना था कि यदि किसान खेती करना छोड़ देगा तो देश की खाद्य व्यवस्था पर संकट खड़ा हो जाएगा। दोनों बहनों ने कहा कि अपने अधिकारों की लड़ाई में डरने का सवाल ही नहीं उठता और वे अपने पिता के संघर्ष के साथ मजबूती से खड़ी हैं।

    हरदा से आए किसान अशोक गुर्जर ने बताया कि इस बार भीषण गर्मी में कड़ी मेहनत कर मूंग की फसल तैयार की लेकिन सरकार पूरी उपज खरीदने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि घर से निकलते समय उनकी पत्नी ने उन्हें सिर्फ एक बात कही कि इस बार मांगें पूरी कराकर ही वापस आना। चाहे जितना समय लगे लेकिन खाली हाथ मत लौटना। अशोक का कहना है कि गांव में किसान लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहा है और खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है।

    कई किसानों ने आंदोलन के दौरान अपनी आर्थिक परेशानियां भी साझा कीं। हरदा के किसान बृजेश जाट ने बताया कि मूंग की खेती में उन्होंने गेहूं की पूरी कमाई लगा दी लेकिन सीमित खरीदी की वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि दो महीने से बच्चों की स्कूल फीस तक जमा नहीं कर पाए। फीस नहीं भरने पर स्कूल बस संचालकों ने बच्चों को बस में बैठाने से मना कर दिया और स्कूल प्रशासन ने भी चेतावनी दे दी। उनका कहना है कि किसान परिवार आज सम्मान और अस्तित्व दोनों की लड़ाई लड़ रहा है।

    वहीं किसान दीपक पटवारे ने बताया कि आठ दिन पहले उनके पिता का घुटना बदलने का ऑपरेशन हुआ था लेकिन इसके बावजूद वे आंदोलन में शामिल होने भोपाल पहुंचे। खुद कमर दर्द की समस्या से जूझ रहे दीपक बेल्ट बांधकर पैदल यात्रा कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पास लगभग 200 क्विंटल मूंग की उपज है लेकिन सरकारी खरीदी सीमित होने से पूरी फसल बिक नहीं पा रही है। परिवार की जिम्मेदारियों और बच्चों की पढ़ाई के बावजूद उन्होंने आंदोलन को प्राथमिकता दी है।

    कई किसानों ने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी परिस्थिति में पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि यदि अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो भी वे आंदोलन जारी रखेंगे। किसानों का मानना है कि यह केवल फसल की कीमत का मुद्दा नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और खेती की सुरक्षा की लड़ाई है।

    राजधानी भोपाल में जारी यह आंदोलन अब केवल नारों तक सीमित नहीं है बल्कि परिवार के त्याग संघर्ष और उम्मीदों की ऐसी तस्वीर बन गया है जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अब सभी की नजर सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी हुई है।