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  • International Cricket Council ने दी जानकारी, West Indies cricket team और South Africa national cricket team के बचे खिलाड़ी स्वदेश रवाना

    International Cricket Council ने दी जानकारी, West Indies cricket team और South Africa national cricket team के बचे खिलाड़ी स्वदेश रवाना


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद International Cricket Council (आईसीसी) ने गुरुवार को पुष्टि की कि दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज की टीमों के बाकी खिलाड़ी भी अब अपने-अपने देशों के लिए रवाना हो गए हैं। दरअसल, ICC Men’s T20 World Cup 2026 खत्म होने के बाद दोनों टीमों के कुछ खिलाड़ी और स्टाफ सदस्य भारत में ही रुक गए थे। मिडिल ईस्ट में चल रहे भू-राजनीतिक संकट और हवाई यात्रा में आई बाधाओं के कारण उनकी वापसी में देरी हो गई थी। अब आईसीसी के समन्वय और प्रयासों के बाद सभी खिलाड़ियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित की गई है।

    पिछले 24 घंटों में रवाना हुए अंतिम ट्रैवल ग्रुप
    आईसीसी के अनुसार पिछले 24 घंटों के भीतर दक्षिण अफ्रीका के बचे हुए 29 सदस्य और वेस्टइंडीज के 16 सदस्य फ्लाइट से अपने-अपने देशों के लिए रवाना हो गए। इसके साथ ही खिलाड़ियों और स्टाफ की घर वापसी से जुड़ा एक जटिल और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन पूरा हो गया। आईसीसी ने कहा कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव की वजह से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के संचालन में कई बाधाएं आई थीं, जिससे खिलाड़ियों की यात्रा योजनाओं में लगातार बदलाव करना पड़ा।

    क्रिकेट बोर्ड और स्टाफ का जताया आभार
    आईसीसी ने इस पूरी प्रक्रिया में सहयोग के लिए Cricket South Africa और Cricket West Indies का आभार जताया। परिषद ने अपने स्टाफ की भी सराहना की, जिन्होंने खिलाड़ियों, कोचिंग स्टाफ और उनके परिवारों की सुरक्षित घर वापसी सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम किया। आईसीसी ने कहा कि इस चुनौतीपूर्ण समय में सभी संबंधित एजेंसियों और क्रिकेट बोर्डों के बीच बेहतर तालमेल के कारण ही यह ऑपरेशन सफल हो सका।

    पहले भी कुछ खिलाड़ी लौट चुके थे
    आईसीसी ने इससे पहले बुधवार को जानकारी दी थी कि दक्षिण अफ्रीका के चार खिलाड़ी और उनके परिवार के पांच सदस्य पहले ही अपने देश के लिए रवाना हो चुके थे। वहीं बाकी 29 सदस्य अगले 24 घंटों के भीतर यात्रा करने वाले थे। इसी तरह वेस्टइंडीज टीम के नौ सदस्य पहले ही कैरिबियन के लिए रवाना हो गए थे, जबकि बाकी 16 खिलाड़ियों ने भारत से उड़ान भरने के लिए अपनी फ्लाइट बुक कर ली थी।

    मिडिल ईस्ट संकट से प्रभावित हुई हवाई यात्रा
    खिलाड़ियों की घर वापसी में देरी की मुख्य वजह खाड़ी क्षेत्र में चल रहा संकट रहा। इस स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा में बड़े पैमाने पर व्यवधान पैदा हुआ। कई देशों ने सुरक्षा कारणों से अपना एयरस्पेस अस्थायी रूप से बंद कर दिया था। इसके अलावा मिसाइल अलर्ट, उड़ानों के रूट में बदलाव, और कमर्शियल तथा चार्टर फ्लाइट्स के अचानक स्थगित होने या रीशेड्यूल होने जैसी समस्याओं के कारण भी यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    कई एजेंसियों के समन्वय से संभव हुआ ऑपरेशन
    आईसीसी की ऑपरेशन और लॉजिस्टिक्स टीमों ने इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में कई एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया। परिषद ने बताया कि सरकारों, एयरलाइंस, चार्टर सेवा प्रदाताओं, एयरपोर्ट अथॉरिटीज और सदस्य क्रिकेट बोर्डों के साथ लगातार समन्वय किया गया। हालात के अनुसार यात्रा योजनाओं में बदलाव किए गए ताकि खिलाड़ियों और स्टाफ को सुरक्षित तरीके से उनके देशों तक पहुंचाया जा सके।

    आईसीसी ने बताई सीमाएं
    आईसीसी ने यह भी स्पष्ट किया कि यात्रा से जुड़ी कई समस्याएं उसके नियंत्रण से बाहर थीं। वैश्विक स्तर पर पैदा हुई सुरक्षा और लॉजिस्टिक चुनौतियों के कारण उड़ानों के संचालन में अचानक बदलाव हो रहे थे। इसके बावजूद परिषद ने सभी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर खिलाड़ियों की सुरक्षित वापसी को प्राथमिकता दी और अंततः सभी सदस्यों को सुरक्षित घर भेजने में सफलता हासिल की।

  • ईरान के हमलों के बीच कतर से सीमित उड़ानें शुरू, भारत के लिए भी विशेष विमान रवाना

    ईरान के हमलों के बीच कतर से सीमित उड़ानें शुरू, भारत के लिए भी विशेष विमान रवाना


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में ईरान की ओर से जारी हमलों के बीच नागरिक उड़ानों पर भारी असर पड़ा है। दूसरे देशों के नागरिक इस तनावपूर्ण माहौल में फंसे हुए हैं। इसी बीच कतार वायुमार्ग ने 12 मार्च से दोहा से सीमित उड़ानों का संचालन शुरू करने की घोषणा की है। एयरलाइन ने बताया कि 12 से 17 मार्च तक दोहा के लिए और दोहा से सीमित विमान चलाए जाएंगे।

    एयरलाइन के अपडेटेड शेड्यूल के अनुसार 12 मार्च को हमाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट से कुल 29 विमान उड़ान भरेंगे जिनमें 15 प्रस्थान और 14 आगमन होंगे। दोहा से उड़ानें मुंबई नई दिल्ली कोच्चि इस्लामाबाद न्यूयॉर्क फ्रैंकफर्ट बीजिंग लंदन काहिरा और जोहान्सबर्ग के लिए होंगी। वहीं दोहा आने वाली उड़ानों में सोल जेद्दा नई दिल्ली हांगकांग मस्कट मेलबर्न डलास और बैंकॉक शामिल हैं।

    भारत के लिए उड़ानों का विशेष शेड्यूल भी तैयार किया गया है। 13 मार्च को दोहा से कोच्चि के लिए उड़ान होगी। 14 मार्च को मुंबई 15 मार्च को नई दिल्ली और 16 मार्च को कोच्चि और मुंबई के लिए उड़ानें संचालित होंगी। वहीं कोच्चि से दोहा 14 मार्च को मुंबई से 15 मार्च और नई दिल्ली से 16 मार्च को विमान रवाना होंगे। 17 मार्च को दोहा से कोच्चि और मुंबई के लिए उड़ानें जारी रहेंगी।

    कतर एयरवेज ने कहा कि कतर नागरिक उड्डयन मंत्रालय से अस्थायी प्राधिकरण मिलने के बाद लिमिटेड ऑपरेटिंग कॉरिडोर का इस्तेमाल कर विमान संचालित किए जा रहे हैं। एयरलाइन ने स्पष्ट किया कि ये उड़ानें नियमित कमर्शियल ऑपरेशन की वापसी नहीं हैं। इन अस्थायी उड़ानों का उद्देश्य प्रभावित यात्रियों को उनके परिवार और प्रियजनों से मिलाना है। कतर एयरस्पेस की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित होने के बाद ही नियमित संचालन फिर से शुरू होगा।

    कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने कैबिनेट मीटिंग में कहा कि अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के संघर्ष के दौरान देश की तैयारियों और क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने नागरिक सुरक्षा और एयरलाइन संचालन की स्थिरता पर जोर दिया।

    इस बीच बहरीन के गृह मंत्रालय ने जानकारी दी कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के साथ जासूसी के आरोप में चार बहरीन नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें उम्र 22 से 36 वर्ष के लोग शामिल हैं जबकि एक 25 वर्षीय व्यक्ति विदेश में फरार है। मंत्रालय के अनुसार आरोपियों ने हाई रिजॉल्यूशन कैमरा और एन्क्रिप्टेड सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर महत्वपूर्ण स्थानों की तस्वीरें ली और उन्हें IRGC को भेजा। सुरक्षा और यात्री सुविधा को ध्यान में रखते हुए कतर एयरवेज का यह कदम संकटग्रस्त क्षेत्र में फंसे यात्रियों के लिए राहत का संकेत देता है खासकर भारत समेत अन्य देशों के नागरिकों के लिए।

  • मध्य पूर्व संघर्ष में 1100 से ज्यादा बच्चे बने निशाना, यूनिसेफ ने कूटनीति और बातचीत से हल निकालने की अपील की

    मध्य पूर्व संघर्ष में 1100 से ज्यादा बच्चे बने निशाना, यूनिसेफ ने कूटनीति और बातचीत से हल निकालने की अपील की


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में ईरान की ओर से जारी हमलों के बीच संयुक्त राष्ट्र के बाल आपातकालीन कोष ने चिंताजनक आंकड़े साझा किए हैं। 28 फरवरी से अब तक इस क्षेत्र में 1100 से अधिक बच्चे या तो घायल हो गए हैं या उनकी मौत हो चुकी है। इसमें ईरान में 200, लेबनान में 91, इजरायल में चार और कुवैत में एक बच्चा शामिल है। यूनिसेफ ने चेताया है कि जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ेगा, यह संख्या और बढ़ सकती है।

    यूनिसेफ ने बच्चों को निशाना बनाने और उनकी निर्भरता पर हमलों की कड़ी निंदा की। संगठन ने बताया कि पढ़ाई में बड़े पैमाने पर बाधा उत्पन्न होने के कारण लाखों बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जबकि लगातार बमबारी और हमलों से लाखों बच्चे बेघर हो चुके हैं। सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें हॉस्पिटल, स्कूल और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं, को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है या नष्ट कर दिया गया है। बच्चों को मारना या उनके जीवन और शिक्षा के आधारभूत साधनों को नुकसान पहुंचाना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।

    यूनिसेफ ने कहा कि हथियारों से होने वाली लड़ाई में बच्चों के खिलाफ गंभीर उल्लंघन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है। संगठन ने सभी संघर्षरत पक्षों से अपील की है कि वे लड़ाई के तरीके और साधनों का चुनाव करते समय बच्चों और आम नागरिकों को न्यूनतम जोखिम में रखें। खासकर ऐसे विस्फोटक हथियारों का इस्तेमाल करने से बचें जिनका असर बच्चों पर अधिक होता है।

    यूनिसेफ ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के नेतृत्व में सभी पक्षों से संघर्ष रोकने और कूटनीतिक बातचीत में शामिल होने की पुरजोर अपील की। संगठन ने चेताया कि इस इलाके के लगभग 20 करोड़ बच्चे दुनिया से तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं।

    यूनिसेफ का यह बयान वैश्विक समुदाय को याद दिलाता है कि युद्ध केवल सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि इसमें सबसे संवेदनशील वर्ग बच्चे भी सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। संगठन का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा और उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा के बिना इस संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

    संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों, अस्पतालों और अन्य बुनियादी सेवाओं को सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है। यूनिसेफ ने सभी पक्षों से कहा कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवता की दिशा में काम करना चाहिए, ताकि बच्चों और आम नागरिकों के जीवन को बचाया जा सके। यूनिसेफ का यह आंकड़ा और चेतावनी वैश्विक समुदाय के लिए गंभीर संदेश है कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष में मानवीय राहत और कूटनीतिक प्रयासों को सबसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 3 मई से गोरखपुर से शुरू होगी ‘गविष्ट यात्रा’, बनाएंगे ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 3 मई से गोरखपुर से शुरू होगी ‘गविष्ट यात्रा’, बनाएंगे ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’


    प्रयागराज। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) ने घोषणा की है कि वह 3 मई से गोरखपुर से ‘गविष्ट यात्रा’ की शुरुआत करेंगे। यह अभियान 81 दिनों तक चलेगा और 23 जुलाई को गोरखपुर में ही इसका समापन होगा।
    उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान टीमें उत्तर प्रदेश के गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेंगी और सनातन धर्म व गौसंरक्षण के मुद्दों पर संवाद करेंगी।

    प्रयागराज में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि इस यात्रा के माध्यम से राज्य के करीब 1.08 लाख गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने समर्थकों से टीम बनाकर गांव-गांव जाने और प्रमाण के साथ सच बात जनता तक पहुंचाने का आह्वान किया।

    अनुमति को लेकर लगाए आरोप
    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि कार्यक्रम को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई बाधाएं खड़ी की गईं। उनके अनुसार पहले काशी में कार्यक्रम रोकने की कोशिश हुई, फिर लखनऊ में प्रवेश को लेकर आपत्ति जताई गई और अंततः देर रात 16 शर्तों के साथ अनुमति दी गई, जिसके बाद 10 और शर्तें जोड़कर कुल 26 कर दी गईं।

    ‘शंकराचार्य पद सनातन धर्म का सुप्रीम कोर्ट’
    अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि शंकराचार्य पद सनातन धर्म में सर्वोच्च स्थान रखता है। उनके मुताबिक यह व्यवस्था ज्ञान और परंपरा पर आधारित है, न कि भीड़तंत्र पर। उन्होंने गौसंरक्षण और सनातन धर्म की रक्षा को समाज की जिम्मेदारी बताते हुए संत समाज से सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

    ‘कोई राजनीतिक दल नहीं बना रहे’
    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य कोई राजनीतिक दल बनाना नहीं है।

    उन्होंने कहा कि संत समाज जनता के बीच जाकर केवल यह संदेश देगा कि जो भी गौसंरक्षण और समाज के हित में काम करे, उसे ही समर्थन दिया जाना चाहिए।

    अखाड़ों को लिखा जाएगा पत्र
    उन्होंने कहा कि साधु समाज में आई कुछ विकृतियों पर भी चर्चा की जाएगी। इसके लिए विभिन्न अखाड़ों को पत्र लिखकर उनकी भूमिका स्पष्ट करने को कहा जाएगा। साथ ही उन्होंने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’ बनाने की बात भी कही, जिसमें संन्यासी, बैरागी, उदासीन और गृहस्थ शामिल होंगे।

  • मिडिल ईस्ट युद्ध में दो भारतीयों की मौत, एक अब भी लापता; विदेश मंत्रालय ने दी पहली आधिकारिक जानकारी

    मिडिल ईस्ट युद्ध में दो भारतीयों की मौत, एक अब भी लापता; विदेश मंत्रालय ने दी पहली आधिकारिक जानकारी

    नई दिल्ली/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत के दो नागरिकों की मौत हो गई है, जबकि एक भारतीय अब भी लापता बताया जा रहा है। इस बारे में पहली बार आधिकारिक जानकारी देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs (India) के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल (Randhir Jaiswal) ने बुधवार को पुष्टि की कि क्षेत्र में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    उन्होंने बताया कि खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने क
    े लिए सरकार लगातार निगरानी कर रही है।

    जहाजों पर हमले के दौरान हुई घटना

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, मृतक भारतीय उन व्यापारिक जहाजों पर सवार थे जिन पर संघर्ष प्रभावित समुद्री क्षेत्र में हमला हुआ था। इस दौरान कुछ अन्य भारतीय नागरिक घायल भी हुए हैं।

    मंत्रालय के मुताबिक एक भारतीय नागरिक Israel में घायल हुआ है, जबकि Dubai में भी एक भारतीय के घायल होने की सूचना मिली है। फिलहाल दो भारतीयों की मौत की पुष्टि हुई है और एक व्यक्ति अभी भी लापता है।

    भारतीय दूतावास लगातार संपर्क में

    प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि विदेश मंत्रालय प्रभावित परिवारों के संपर्क में है और क्षेत्र में मौजूद भारतीय दूतावास व वाणिज्य दूतावास भारतीय समुदाय को हर संभव सहायता प्रदान कर रहे हैं।

    स्थिति को देखते हुए नई दिल्ली में 24 घंटे काम करने वाला एक विशेष नियंत्रण कक्ष भी स्थापित किया गया है, जो आपातकालीन कॉल और ईमेल प्राप्त कर संबंधित देशों में भारतीय मिशनों के साथ समन्वय कर रहा है।

    पीएम मोदी और विदेश मंत्री स्थिति पर नजर रखे हुए

    विदेश मंत्रालय के अनुसार Narendra Modi पश्चिम एशिया के हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और United Arab Emirates, Qatar, Saudi Arabia, Oman, Bahrain, Jordan, Kuwait और Israel के नेताओं के संपर्क में हैं।

    वहीं विदेश मंत्री Subrahmanyam Jaishankar भी Iran समेत कई देशों के अपने समकक्षों से लगातार बातचीत कर रहे हैं।

    युद्ध से बढ़ा क्षेत्रीय तनाव

    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया।

    इस संघर्ष के कारण समुद्री मार्गों में बाधा आई है और वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता पर भी असर पड़ रहा है।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • ईरानी स्कूल पर मिसाइल हमले में 168 बच्चों की मौत, अमेरिकी जांच में चौंकाने वाला खुलासा

    ईरानी स्कूल पर मिसाइल हमले में 168 बच्चों की मौत, अमेरिकी जांच में चौंकाने वाला खुलासा



    वॉशिंगटन। ईरान के मीनाब शहर में एक स्कूल पर हुए भीषण मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी सैन्य जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। प्रारंभिक जांच के मुताबिक इस हमले के लिए खुद अमेरिका जिम्मेदार हो सकता है। इस हमले में करीब 175 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 168 मासूम बच्चे शामिल थे। यदि यह आधिकारिक रूप से पुष्टि हो जाती है, तो यह पिछले दो दशकों में अमेरिकी सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों की मौत की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक मानी जाएगी।

    पुराने खुफिया डेटा से हुई चूक

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह हमला Minab शहर के एक प्राथमिक विद्यालय पर हुआ। जांच में सामने आया कि United States Central Command ने लक्ष्य तय करने के लिए Defense Intelligence Agency (DIA) के पुराने खुफिया डेटा का इस्तेमाल किया था।

    असल में टॉमहॉक मिसाइल का निशाना स्कूल नहीं, बल्कि उसके पास स्थित एक ईरानी सैन्य ठिकाना था। यह स्कूल पहले उसी सैन्य परिसर का हिस्सा था, लेकिन बाद में इसे अलग कर दिया गया था।

    बताया जा रहा है कि Shajareh Taybeh Elementary School 2017 तक सैन्य बेस से जुड़ा हुआ था। इसके बाद वहां दीवार बनाकर परिसर अलग कर दिया गया और वॉच टावर भी हटा दिया गया। स्कूल की इमारत को चमकीले रंगों से रंगा गया था और ऑनलाइन मैप्स में भी इसे स्पष्ट रूप से “स्कूल” के रूप में दर्ज किया गया था।

    यह हमला शनिवार सुबह हुआ, जो ईरान में स्कूल सप्ताह का पहला दिन होता है और उस समय स्कूल में बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद थे।

    क्या AI सिस्टम से हुई गलती?

    इस त्रासदी के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह चूक किसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम की वजह से हुई। ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिकी सेना तकनीक और एआई आधारित टार्गेटिंग सिस्टम पर काफी निर्भर है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी सेना वॉर-टेक कंपनी Palantir Technologies के “मेवेन स्मार्ट सिस्टम” का इस्तेमाल करती है। इसमें एआई कंपनी Anthropic के मॉडल “Claude” का उपयोग किया जाता है, जो रियल-टाइम लोकेशन और टार्गेटिंग डेटा प्रदान करता है।

    प्रारंभिक आशंका है कि एआई सिस्टम स्कूल की बदली हुई लोकेशन और उपयोग को अपडेट करने में विफल रहा, जिससे यह घातक गलती हुई।

    अमेरिका का आधिकारिक रुख

    अमेरिका ने नागरिक ठिकानों पर हमला न करने की नीति दोहराते हुए कहा है कि मामले की जांच जारी है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने शुरुआत में दावा किया कि ईरान ने खुद ही स्कूल पर बमबारी की होगी क्योंकि उसके हथियार अक्सर सटीक नहीं होते। हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि वह जांच के नतीजों का इंतजार करेंगे और Pentagon की रिपोर्ट को स्वीकार करेंगे।

    इस घटना को लेकर अमेरिकी संसद में भी सवाल उठने लगे हैं।

    45 से अधिक डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने रक्षा सचिव Pete Hegseth को पत्र लिखकर जवाब मांगा है। वहीं रिपब्लिकन सीनेटर Kevin Cramer और सीनेटर Tim Kaine ने भी इस घटना की गहन जांच की मांग की है।

    ईरान का तीखा आरोप

    इस हमले के बाद ईरान ने अमेरिका पर युद्ध अपराध का आरोप लगाया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baghaei ने सोशल मीडिया पर हमले का वीडियो साझा करते हुए इसे “जघन्य युद्ध अपराध” बताया।

    वहीं ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने सामूहिक कब्रों के ड्रोन फुटेज साझा करते हुए कहा कि यह हमला निर्दोष बच्चों की हत्या है और इसे बिना सजा के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

    यह घटना पहले से ही तनावपूर्ण Iran-Israel संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है और युद्ध में एआई तकनीक के इस्तेमाल पर भी नई बहस शुरू हो गई है।

  • ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी

    ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी


    नई दिल्ली । वाशिंगटन से रवाना होते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर बेहद चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ढांचे को इतनी भयंकर क्षति पहुँचाई है कि अब वहां कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान की नौसेना की पूरी क्षमता और उसकी वायु रक्षा प्रणाली अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।

    ट्रंप के अनुसार अमेरिकी हमलों ने ईरानी एयरबेस, नौसैनिक जहाजों और रडार सिस्टम को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि ईरान के कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेता भी इस अभियान में प्रभावित हुए हैं, जिससे नेतृत्व संकट उत्पन्न हो गया है। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत और कार्यक्षमता की तारीफ करते हुए इसे विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बताया।

    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कुछ महत्वपूर्ण ईरानी ठिकानों को जानबूझकर सुरक्षित छोड़ दिया है। उनके अनुसार, यदि अमेरिका चाहे तो केवल एक घंटे में उन बचे हुए ठिकानों को भी पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई ईरान के लिए अपने देश को फिर से खड़ा करना लगभग असंभव बना देगी।

    ट्रंप ने यह साफ किया कि अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई नहीं थे, बल्कि ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से समाप्त करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थे। उनके अनुसार ईरान की नौसेना के अधिकांश जहाज अब समुद्र की गहराई में डूब चुके हैं और वायुसेना भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है। इस बयान से स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से पंगु बनाने की पूरी योजना बनाई है।

    पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिकी कार्रवाई अब रोक दी जाएगी। ट्रंप ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अभियान अभी जारी है और सेना आगे की कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश है कि अमेरिका की सुरक्षा से खिलवाड़ भारी पड़ेगा। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, जिसे अमेरिका ने पहले कभी नहीं देखा।

    विश्व के रक्षा विशेषज्ञ और राजनेता अब ट्रंप के इस दावे पर बहस कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और सैन्य पटल पर हलचल मचा दी है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर हैं कि ईरान इस विनाशकारी दावे और सैन्य क्षति के बारे में क्या प्रतिक्रिया देता है।

  • सैमसन नहीं, Jasprit Bumrah थे असली हकदार: ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ पर AB de Villiers की राय

    सैमसन नहीं, Jasprit Bumrah थे असली हकदार: ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ पर AB de Villiers की राय


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम ने ICC Men’s T20 World Cup 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब अपने नाम किया। फाइनल मुकाबले में टीम इंडिया ने New Zealand national cricket team को 96 रन से हराकर ट्रॉफी जीती। पूरे टूर्नामेंट में कई भारतीय खिलाड़ियों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया, लेकिन ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ का पुरस्कार विकेटकीपर बल्लेबाज Sanju Samson को दिया गया। हालांकि दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान AB de Villiers का मानना है कि तेज गेंदबाज Jasprit Bumrah भी इस सम्मान के उतने ही बड़े दावेदार थे।

    डिविलियर्स ने बताया क्यों बुमराह थे मजबूत दावेदार
    एबी डिविलियर्स ने अपने यूट्यूब चैनल पर टूर्नामेंट का विश्लेषण करते हुए कहा कि प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट के लिए संजू सैमसन और जसप्रीत बुमराह के बीच काफी करीबी मुकाबला था। उनके अनुसार कई ऐसे मौके आए जब बुमराह की गेंदबाजी ने मैच का रुख बदल दिया और भारत को निर्णायक बढ़त दिलाई। डिविलियर्स ने कहा कि जब उन्होंने बुमराह को दबाव भरे पलों में गेंदबाजी करते देखा तो उन्हें लगा कि यह अवॉर्ड उनके नाम भी जा सकता था। उनका मानना है कि टूर्नामेंट के कुछ अहम क्षणों में बुमराह का प्रदर्शन भारत की जीत की सबसे बड़ी वजहों में से एक रहा।

    मुश्किल हालात में भी मैच पलट देते हैं बुमराह
    डिविलियर्स ने बुमराह की तारीफ करते हुए कहा कि भारत जैसे देश में तेज गेंदबाज के तौर पर गेंदबाजी करना आसान नहीं होता, क्योंकि यहां की पिचें अक्सर बल्लेबाजों के अनुकूल होती हैं। लेकिन बुमराह ऐसे गेंदबाज हैं जो किसी भी परिस्थिति में मैच का रुख बदल सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब टीम को विकेट की जरूरत होती है, तब बुमराह एक अलग गियर में आ जाते हैं और विपक्षी बल्लेबाजों पर दबाव बना देते हैं। डिविलियर्स के मुताबिक बुमराह भारतीय टीम के लिए एक अमूल्य संपत्ति हैं और उनकी मौजूदगी गेंदबाजी आक्रमण को बेहद खतरनाक बना देती है।

    टूर्नामेंट में बुमराह का शानदार प्रदर्शन
    टी20 विश्व कप 2026 में जसप्रीत बुमराह का प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने 8 मैचों में 14 विकेट हासिल किए और टूर्नामेंट के शीर्ष विकेट लेने वाले गेंदबाजों में शामिल रहे। वह स्पिनर Varun Chakravarthy के साथ संयुक्त रूप से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज रहे, हालांकि वरुण ने बुमराह से एक मैच ज्यादा खेला था। बुमराह की इकॉनमी रेट भी काफी किफायती रही, जिसने विरोधी टीमों पर लगातार दबाव बनाए रखा। खास तौर पर सेमीफाइनल और फाइनल जैसे बड़े मुकाबलों में उनकी गेंदबाजी ने भारत को निर्णायक बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

    सैमसन के बल्ले ने दिलाया खिताब
    दूसरी ओर, विकेटकीपर बल्लेबाज संजू सैमसन का प्रदर्शन भी पूरे टूर्नामेंट में शानदार रहा। उन्होंने केवल 5 मैच खेले, लेकिन करीब 200 के स्ट्राइक रेट से 321 रन बनाकर टीम इंडिया को कई महत्वपूर्ण जीत दिलाई। सैमसन ने क्वार्टर फाइनल में West Indies national cricket team के खिलाफ नाबाद 97 रन की शानदार पारी खेली। इसके बाद सेमीफाइनल में England national cricket team के खिलाफ 89 रन बनाए और फाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ भी 89 रन की यादगार पारी खेली। उनके लगातार मैच जिताऊ प्रदर्शन के कारण उन्हें टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया।

    टीम इंडिया की सफलता में कई खिलाड़ियों का योगदान
    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इस ऐतिहासिक जीत में केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि पूरी टीम का योगदान रहा। बल्लेबाजी में संजू सैमसन और अन्य खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया, जबकि गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह और अन्य गेंदबाजों ने विपक्षी टीमों को दबाव में रखा। यही संतुलन टीम इंडिया को टी20 विश्व कप 2026 का चैंपियन बनाने में निर्णायक साबित हुआ।

  • वैश्विक तेल संकट के बीच बड़ा फैसला: IEA के 40 करोड़ बैरल आपात भंडार जारी करने के कदम का भारत ने किया स्वागत

    वैश्विक तेल संकट के बीच बड़ा फैसला: IEA के 40 करोड़ बैरल आपात भंडार जारी करने के कदम का भारत ने किया स्वागत


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और तेल की कीमतों में तेज उछाल की आशंका के बीच अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। एजेंसी ने अपने सदस्य देशों के साथ मिलकर बाजार में 40 करोड़ बैरल आपातकालीन तेल भंडार जारी करने का फैसला किया है। इस निर्णय का भारत ने खुले तौर पर स्वागत करते हुए कहा है कि यह कदम वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने और कीमतों को बेकाबू होने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    दरअसल पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव के कारण कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसी को ध्यान में रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 32 सदस्य देशों ने समन्वित रूप से यह निर्णय लिया है कि वे अपने रणनीतिक तेल भंडार का एक बड़ा हिस्सा बाजार में जारी करेंगे। भारत, जो IEA का एक महत्वपूर्ण सहयोगी सदस्य है, ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा है कि वह ऊर्जा बाजार की स्थिति और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    भारत सरकार का मानना है कि इस तरह का समन्वित अंतरराष्ट्रीय कदम मौजूदा संकट की स्थिति में बेहद आवश्यक है। सरकार ने कहा है कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाजार में अचानक आपूर्ति कम हो जाती है तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    इस संकट की सबसे बड़ी वजह रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में आई भारी बाधा है। 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद इस मार्ग से होने वाला तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और अब यह पहले की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत तक ही रह गया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा संभालता है, इसलिए यहां की स्थिति पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित करती है।

    साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता था, लेकिन युद्ध और अस्थिरता के कारण यह आपूर्ति गंभीर संकट में फंस गई है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार इस मार्ग का कोई प्रभावी वैकल्पिक रास्ता नहीं है, जिसके कारण ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

    IEA का यह कदम इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि 1974 में एजेंसी के गठन के बाद यह केवल छठा मौका है जब सदस्य देशों ने मिलकर इस तरह का समन्वित आपातकालीन तेल भंडार जारी करने का निर्णय लिया है। इससे पहले 1991 के खाड़ी युद्ध, 2005 के ऊर्जा संकट, 2011 के लीबिया संकट और 2022 के वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भी ऐसे कदम उठाए गए थे।

    फिलहाल IEA सदस्य देशों के पास कुल मिलाकर 1.2 अरब बैरल से अधिक का रणनीतिक तेल भंडार सुरक्षित है, जिसे केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही बाजार में उतारा जाता है। इसके अलावा उद्योगों के पास भी लगभग 60 करोड़ बैरल का अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है, जिसे सरकारी नियमों के तहत सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह भंडार धीरे-धीरे बाजार में उतारा जाता है तो इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि तेल की कीमतों में तेजी सीधे तौर पर महंगाई, परिवहन लागत और आम जनता की जेब पर असर डालती है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कुछ हद तक स्थिरता लौट सकेगी।