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  • एनआरआई और एफसीएनआर-बी जमा से बैंकों को मिलेगा सहारा, रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मजबूत डिपॉजिट ग्रोथ का अनुमान

    एनआरआई और एफसीएनआर-बी जमा से बैंकों को मिलेगा सहारा, रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मजबूत डिपॉजिट ग्रोथ का अनुमान

    नई दिल्ली । देश के बैंकिंग क्षेत्र के लिए वित्त वर्ष 2026-27 सकारात्मक रहने की उम्मीद जताई गई है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, गैर-निवासी भारतीयों (एनआरआई) से आने वाले निवेश और एफसीएनआर-बी जमा में बढ़ोतरी के कारण बैंकों की डिपॉजिट वृद्धि दर लगभग 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जमा राशि में सुधार के साथ-साथ ऋण वितरण की रफ्तार भी मजबूत बनी रहेगी, जिससे बैंकिंग प्रणाली की स्थिति और अधिक संतुलित हो सकती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, एफसीएनआर-बी जमा योजनाओं के माध्यम से अब तक लगभग 13 से 14 अरब डॉलर की राशि बैंकिंग प्रणाली में आई है। इस पूंजी प्रवाह ने चालू वित्त वर्ष के दौरान बैंकों के जमा आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो आगामी वित्त वर्ष में भी बैंकिंग क्षेत्र को पर्याप्त वित्तीय मजबूती मिलेगी और जमा संग्रहण में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि वित्त वर्ष 2023 से जो रुझान देखने को मिल रहा है, उसके अनुसार क्रेडिट ग्रोथ अभी भी डिपॉजिट ग्रोथ से अधिक बनी हुई है। जून के अंत तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बैंक ऋण में सालाना आधार पर 18.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि कुल जमा में 13.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इससे क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच का अंतर बढ़कर 5.3 प्रतिशत अंक तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतर अस्थायी नहीं बल्कि महामारी के बाद बैंकिंग व्यवहार और वित्तीय प्राथमिकताओं में आए संरचनात्मक बदलाव का परिणाम है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़े महानगरों में पारंपरिक जमा बाजार अब काफी हद तक संतृप्त हो चुके हैं। ऐसे में बैंक अब अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाकर जमा आधार मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं। इन क्षेत्रों में परिवारों की आय में वृद्धि, महिलाओं को केंद्र में रखकर संचालित कल्याणकारी योजनाएं और बैंकिंग सेवाओं का विस्तार जमा वृद्धि के प्रमुख कारण बताए गए हैं। इससे भविष्य में ग्रामीण और छोटे शहरों की भूमिका बैंकिंग क्षेत्र में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

    दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों में निवेशकों का रुझान बैंक जमा से हटकर म्यूचुअल फंड, इक्विटी और अन्य बाजार आधारित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। इसके कारण पारंपरिक बैंक जमा में घरेलू बचत का हिस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है। इसके बावजूद एनआरआई जमा और अन्य संस्थागत स्रोत बैंकिंग प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण सहारा बने हुए हैं।

    रिपोर्ट में ऋण वितरण के बदलते स्वरूप का भी उल्लेख किया गया है। बिना गारंटी वाले व्यक्तिगत ऋणों पर नियामकीय सख्ती के बाद बैंक अब उद्योग, बुनियादी ढांचा, कार्यशील पूंजी और स्वर्ण आभूषण के बदले दिए जाने वाले ऋण जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इससे ऋण पोर्टफोलियो में विविधता बढ़ी है और जोखिम प्रबंधन को भी मजबूती मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन भारतीय बैंक फिलहाल मजबूत पूंजी आधार, पर्याप्त कैपिटल एडिक्वेसी और कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के कारण अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। खपत में बढ़ोतरी और पूंजीगत निवेश के समर्थन से आने वाले समय में भी क्रेडिट ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद है, जबकि बैंक बैलेंस शीट अनुशासन बनाए रखते हुए वित्तीय स्थिरता को और मजबूत कर सकते हैं।

  • संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    नई दिल्ली । संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होने जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार व्यापक विधायी एजेंडे के साथ सदन में प्रवेश करेगी। इस सत्र के दौरान सरकार पांच नए विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इन प्रस्तावित विधेयकों का उद्देश्य कर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना, न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करना, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाना तथा राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनों को और सख्त करना है। सरकार का मानना है कि इन विधेयकों से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक सुधारों को गति मिलेगी।

    सरकार आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 को सदन में प्रस्तुत करेगी, जिसके माध्यम से पहले जारी अध्यादेश का स्थान लेने वाला स्थायी कानून बनाया जाएगा। इस प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना, सरकारी ऋण बाजार को अधिक मजबूत बनाना तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय बाजार में स्थिरता और तरलता बनाए रखना है। सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने में सहायक होगी।

    मानसून सत्र में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 भी पेश किया जाएगा। इस विधेयक के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के निस्तारण की गति तेज होगी और न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में मदद मिलेगी।

    सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र में कारोबार को और सरल बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य भरोसे पर आधारित नियामकीय व्यवस्था विकसित करना, भुगतान में देरी से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया को मजबूत करना तथा राज्यों को अधिक प्रशासनिक अधिकार प्रदान करना है। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार होगा।

    जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए विलंबित पंजीकरण से जुड़े नियमों को अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध होने वाले कृत्यों पर अधिक कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किए जाने की योजना है। सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य कानूनों को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी बनाना है।

    इन नए विधेयकों के अलावा सरकार संसद में पहले से लंबित कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी चर्चा आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी। साथ ही अनुपूरक अनुदानों की मांग पर भी दोनों सदनों में विचार और मतदान कराया जाएगा। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक बहस होने की संभावना है। सत्र शुरू होने से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक और विपक्षी दलों की रणनीतिक बैठकों के बाद संसद की कार्यवाही राजनीतिक और विधायी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है।

  • भारत-फिनलैंड ने 2030 तक व्यापार दोगुना करने का रखा लक्ष्य, ईयू-भारत एफटीए से बढ़ेंगी नई संभावनाएं

    भारत-फिनलैंड ने 2030 तक व्यापार दोगुना करने का रखा लक्ष्य, ईयू-भारत एफटीए से बढ़ेंगी नई संभावनाएं

    नई दिल्ली । भारत और फिनलैंड ने आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारी को नई गति देने के उद्देश्य से वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। प्रस्तावित यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौते (ईयू-भारत एफटीए) को इस लक्ष्य की प्राप्ति का प्रमुख माध्यम माना जा रहा है। दोनों देशों के वरिष्ठ नेताओं ने हेलसिंकी में हुई उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान व्यापार, निवेश, डिजिटल प्रौद्योगिकी और उभरते क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत बनाने पर व्यापक चर्चा की।

    फिनलैंड की उप प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री रिक्का पुर्रा और भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के बीच हुई बैठक में आर्थिक संबंधों को अधिक विविध, मजबूत और दीर्घकालिक बनाने पर सहमति बनी। दोनों नेताओं ने माना कि ईयू-भारत एफटीए लागू होने के बाद व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, निवेश के अवसर बढ़ेंगे और दोनों देशों की कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा स्तर से दोगुना करने का लक्ष्य भी अधिक व्यावहारिक माना गया।

    बैठक के बाद फिनलैंड की उप प्रधानमंत्री रिक्का पुर्रा ने कहा कि डिजिटलाइजेशन और सस्टेनेबिलिटी के क्षेत्र में भारत और फिनलैंड की रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देगा। उनके अनुसार डिजिटल और टिकाऊ प्रौद्योगिकी समाधान विकसित करने में फिनलैंड की विशेषज्ञता भारत की विकास यात्रा और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है, जिससे दोनों देशों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।

    रिक्का पुर्रा ने यह भी कहा कि भविष्य में स्पेस, रक्षा और अन्य महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा किया जाएगा। उन्होंने भारत को एक विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच तकनीकी नवाचार और औद्योगिक सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

    वहीं केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि उनकी बैठकों में आर्थिक और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने, व्यापार और निवेश बढ़ाने तथा डिजिटलाइजेशन और उभरती प्रौद्योगिकियों में साझेदारी का विस्तार करने पर विशेष चर्चा हुई। उन्होंने फिनलैंड के आर्थिक मामलों के मंत्री साकारी पुइस्तो से भी मुलाकात की, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 6जी संचार, क्वांटम प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक और सस्टेनेबिलिटी जैसे भविष्य के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।

    फिनलैंड के आर्थिक मामलों के मंत्री ने कहा कि भारत की तेज आर्थिक प्रगति और ईयू-भारत एफटीए की संभावनाएं फिनलैंड की कंपनियों के लिए नए अवसर लेकर आएंगी। उन्होंने कहा कि भारतीय बाजार का विशाल आकार पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ नई प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों में भी निवेश और व्यावसायिक विस्तार के पर्याप्त अवसर प्रदान करता है।

    अपनी यात्रा के दौरान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने फिनलैंड की प्रमुख प्रौद्योगिकी और औद्योगिक कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कंपनियों को भारत में विनिर्माण इकाइयों, अनुसंधान एवं विकास केंद्रों और निर्यात आधारित उत्पादन में निवेश बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया। दोनों देशों का मानना है कि प्रौद्योगिकी, नवाचार और निवेश पर आधारित यह साझेदारी आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का दम, 130 देशों की भागीदारी के बीच मिले 14,300 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव

    भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का दम, 130 देशों की भागीदारी के बीच मिले 14,300 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव

    नई दिल्ली । भारत के टेक्सटाइल और परिधान उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले भारत टेक्स 2026 ने इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और पारंपरिक भारतीय शिल्प को एक ही मंच पर जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। तीसरे संस्करण के रूप में आयोजित इस प्रदर्शनी में दुनिया के 130 से अधिक देशों से छह हजार से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खरीदार पहुंचे, जबकि करीब 1.30 लाख व्यापारिक आगंतुकों ने इसमें भाग लिया। व्यापक वैश्विक भागीदारी ने यह संकेत दिया कि भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के प्रति अंतरराष्ट्रीय बाजार का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।

    करीब 1.6 मिलियन वर्ग फुट क्षेत्र में आयोजित इस विशाल प्रदर्शनी में 20 हजार से अधिक टेक्सटाइल उत्पाद प्रदर्शित किए गए। आयोजन का उद्देश्य केवल व्यापारिक अवसर उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि भारतीय विरासत, पारंपरिक शिल्प, आधुनिक तकनीक और सतत विकास को एक साथ प्रस्तुत करना भी रहा। प्रदर्शनी में टेक्सटाइल उद्योग की पूरी वैल्यू चेन को शामिल किया गया, जिससे घरेलू और विदेशी खरीदारों को एक ही स्थान पर विविध उत्पादों और नवाचारों का व्यापक परिचय मिला।

    प्रदर्शनी में फाइबर, यार्न, फैब्रिक, रेडीमेड परिधान, होम टेक्सटाइल्स, टेक्निकल टेक्सटाइल्स, हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट्स सहित अनेक क्षेत्रों के उत्पाद प्रदर्शित किए गए। इससे भारतीय उद्योग की विविधता और उत्पादन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तथा निवेशकों के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कला और वस्त्र परंपराओं ने भी विदेशी प्रतिनिधियों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

    बिहार की प्रसिद्ध टिकुली कला इस आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रही। अपनी चमकदार रंग योजना और बारीक इनामेल कार्य के लिए प्रसिद्ध इस पारंपरिक कला ने भारतीय हस्तशिल्प की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया। इसके अलावा देशभर के अनेक पारंपरिक हस्तशिल्प और वस्त्र उत्पादों ने भी आगंतुकों का ध्यान आकर्षित किया।

    हैंडलूम क्षेत्र को भी प्रदर्शनी में विशेष स्थान दिया गया। लगभग 120 बुनकरों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक निर्यातक हैंडलूम सहकारी संस्था ने रियायती स्टॉल के माध्यम से अपने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के सामने प्रस्तुत किए। इस पहल से छोटे बुनकरों और पारंपरिक उत्पादकों को वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जिससे निर्यात की संभावनाओं को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    भारत टेक्स 2026 में 1,600 से अधिक प्रदर्शकों और 11 हजार से ज्यादा खरीदारों की भागीदारी रही। आयोजन के दौरान 28 हजार से अधिक बिजनेस-टू-बिजनेस बैठकें आयोजित की गईं, जबकि 100 से अधिक गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट और बिजनेस-टू-गवर्नमेंट संवाद भी हुए। इन बैठकों के परिणामस्वरूप 14,300 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग में बढ़ते निवेश विश्वास का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    इस आयोजन के साथ आयोजित इंडी हाट 2026 ने भी भारतीय हैंडलूम और हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें 48 कारीगरों और बुनकरों के साथ 12 डिजाइन आधारित ब्रांड्स ने भाग लेकर क्षेत्रीय कला और शिल्प परंपराओं का प्रदर्शन किया। गुलाबी मीनाकारी, डोकरा, उस्ता कला, पिचवाई, सोजनी कढ़ाई, ब्लू पॉटरी, सिल्वर फिलिग्री, चेरियाल पेंटिंग, माता नी पछेड़ी, पेपियर-माशे, बागरू ब्लॉक प्रिंटिंग, जामदानी साड़ियां, मूगा और एरी सिल्क तथा ओडिशा इकत जैसी अनेक पारंपरिक कलाओं ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की समृद्ध विविधता को वैश्विक मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

  • अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?

    अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के एक महत्वपूर्ण सर्विलांस टावर को नष्ट कर दिया है। अमेरिकी सेना ने इस कार्रवाई का वीडियो फुटेज भी जारी किया है।

    अमेरिका के अनुसार, यह हमला होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की निगरानी और सैन्य क्षमता को कमजोर करने के अभियान का हिस्सा था। अमेरिकी सेंट्रल कमान (CENTCOM) ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि अमेरिकी सेना ने चाबहार बंदरगाह शहर में स्थित ‘चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट’ सर्विलांस टावर को निशाना बनाया।

    खास बात यह है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत भी कभी ईरान का सहयोगी रह चुका है। भारत ने इस रणनीतिक बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    16 जुलाई को किया गया हमला
    CENTCOM के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने 16 जुलाई को इस ऑपरेशन को अंजाम दिया और चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट के सर्विलांस टावर को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह टावर ईरान के ओमान की खाड़ी तट पर मौजूद समुद्री निगरानी नेटवर्क का हिस्सा था। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की निगरानी और कार्रवाई के लिए किया जाता था।

    अमेरिका के अनुसार, टावर के नष्ट होने से IRGC की उस क्षमता को नुकसान पहुंचा है, जिसके जरिए वह रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखने और हमलों के समन्वय का काम करता था।

    अमेरिका ने बताई कार्रवाई की वजह
    CENTCOM ने कहा कि इस हमले से नागरिक जहाजों के क्रू सदस्यों को निशाना बनाने की IRGC की क्षमता कम होगी। अमेरिकी कमान ने यह भी दावा किया कि इस कार्रवाई से क्षेत्रीय जल क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा कि यह सुविधा उन जहाजों के लिए लागू नहीं होगी, जो ईरान के खिलाफ चल रही अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे हैं।

    होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव
    अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान लंबे समय से इस इलाके में अपनी सैन्य और निगरानी क्षमता बनाए हुए है।

    चाबहार और भारत का संबंध
    चाबहार बंदरगाह भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व रखता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इस बंदरगाह के विकास में सहयोग किया था। इसका उद्देश्य भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराना था। यही वजह है कि चाबहार का नाम किसी भी सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में आने पर भारत के लिए भी यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है।

  • भारत में पहली बार निजी कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जानिए क्या है मिशन आगमन ?

    भारत में पहली बार निजी कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जानिए क्या है मिशन आगमन ?


    नई दिल्ली। भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक पल आने वाला है। पहली बार कोई भारतीय निजी कंपनी अपने स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने का प्रयास करेगी। हैदराबाद की स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले ऑर्बिटल क्लास लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 का परीक्षण मिशन ‘मिशन आगमन’ लॉन्च करने जा रही है।

    यह मिशन इसलिए खास है क्योंकि अब तक भारत में उपग्रहों को कक्षा में भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए होता रहा है। विक्रम-1 की सफलता के साथ निजी कंपनियों के लिए व्यावसायिक अंतरिक्ष लॉन्च सेवाओं का नया रास्ता खुल सकता है।

    क्या है मिशन आगमन?
    मिशन आगमन, विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इसका प्रक्षेपण सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है। इस मिशन के जरिए स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी तरीके से विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमता, तकनीक और प्रदर्शन का परीक्षण करेगी।

    विक्रम-1 रॉकेट की खासियत
    विक्रम-1 का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।

    इस रॉकेट की प्रमुख विशेषताएं-
    – विक्रम-1 करीब 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है।
    – इसे छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
    – इसका ढांचा हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से तैयार किया गया है।
    – कार्बन फाइबर मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट की दक्षता बढ़ती है।
    – इसमें तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं।
    – रॉकेट के ऊपरी हिस्से में ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।
    – विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में करीब 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने के लिए तैयार किया गया है।

    विक्रम-1 में कौन-सी नई तकनीकें?
    विक्रम-1 में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिक्विड इंजन पूरी तरह धातु से बने 3डी-प्रिंटेड इंजन हैं। 3डी प्रिंटिंग तकनीक के जरिए ऐसे इंजन बनाए जा सकते हैं जिनके निर्माण में पहले सैकड़ों अलग-अलग पुर्जों की जरूरत पड़ती थी। इससे निर्माण प्रक्रिया तेज होती है और लागत भी कम होती है। इसके अलावा स्काईरूट ने अपना खुद का न्यूमेटिक स्टेज सेपरेशन सिस्टम विकसित किया है, जो मॉड्यूलर और परीक्षण योग्य है। कंपनी के अनुसार इन तकनीकों से रॉकेट को हल्का, अधिक भरोसेमंद और किफायती बनाया गया है।

    विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में क्या जाएगा?
    – मिशन आगमन में कई खास पेलोड भेजे जाएंगे।
    – इनमें बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा तैयार किया गया लैब-निर्मित डायमंड लोटस शामिल है।

    इसके अलावा अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी अंतरिक्ष में भेजी जाएगी। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है।

    इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी भेजा जाएगा, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा है। इसके अलावा स्काईरूट की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के समर्थकों के संदेश भी अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे।

    क्यों महत्वपूर्ण है मिशन आगमन?
    – अगर विक्रम-1 सफल होता है तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं दे सकेंगी।
    – आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार, यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत कर सकता है।
    – वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

    स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत
    स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में हुई थी। कंपनी का लक्ष्य दुनिया भर के उपग्रह संचालकों को किफायती, भरोसेमंद और जरूरत के अनुसार लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराना है। कंपनी को इसरो की परीक्षण सुविधाओं और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से विकास में तेजी मिली और लागत कम रखने में मदद मिली।

    विक्रम-एस से विक्रम-1 तक का सफर
    स्काईरूट ने 18 नवंबर 2022 को अपना पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-एस सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। ‘प्रारंभ’ नाम के इस मिशन ने भारत के पहले निजी रॉकेट लॉन्च का इतिहास बनाया। यह रॉकेट करीब 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और अपने निर्धारित मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए बंगाल की खाड़ी में उतरा। इस मिशन में सॉलिड प्रोपल्शन, कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर, एवियोनिक्स और टेलीमेट्री जैसी तकनीकों का परीक्षण किया गया था, जिनका आधार अब विक्रम-1 में इस्तेमाल किया गया है।

    भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को कैसे मिला बढ़ावा?
    सरकार ने स्पेस स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं—

    2023
    – भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 लागू की गई।
    – इन-स्पेस सीड फंड योजना शुरू की गई।

    2024
    – अंतरिक्ष क्षेत्र में एफडीआई नियमों को आसान बनाया गया।
    – एनजीपी-2024 के जरिए मंजूरी प्रक्रिया को सरल किया गया।
    – इन-स्पेस प्री-इन्क्यूबेशन उद्यमिता कार्यक्रम शुरू किया गया।
    – स्पेस स्टार्टअप्स के लिए 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड बनाया गया।

    2025
    – नई अंतरिक्ष तकनीकों के लिए 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड बनाया गया।
    – एसएसएलवी तकनीक हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को हस्तांतरित की गई।

    2026
    – पीपीपी मॉडल के तहत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह नेटवर्क विकसित करने की पहल शुरू की गई।

    भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की स्थिति
    सरकार के अनुसार, वर्ष 2014 में देश में केवल एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप था, जबकि फरवरी 2026 तक इनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है।

    भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में अब तक 50 करोड़ डॉलर (500 मिलियन डॉलर) से अधिक का निवेश हो चुका है। अकेले 2025 में करीब 15 करोड़ डॉलर (150 मिलियन डॉलर) का निवेश आया।

    पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियां भारत के नए अंतरिक्ष युग की प्रमुख कंपनियों के रूप में उभर रही हैं।

    अगर मिशन आगमन सफल रहता है, तो यह केवल स्काईरूट एयरोस्पेस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए दौर की शुरुआत साबित हो सकती है।

  • 'सेमिकॉन 2.0' से भारत के टेक सेक्टर को नई रफ्तार, अगले पांच वर्षों में 2 लाख तक रोजगार और वैश्विक चिप हब बनने की मजबूत उम्मीद

    'सेमिकॉन 2.0' से भारत के टेक सेक्टर को नई रफ्तार, अगले पांच वर्षों में 2 लाख तक रोजगार और वैश्विक चिप हब बनने की मजबूत उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग को नई दिशा देने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘सेमिकॉन 2.0’ योजना को उद्योग जगत ने रोजगार, निवेश और तकनीकी विकास के लिहाज से एक महत्वपूर्ण पहल बताया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस योजना के प्रभाव से अगले पांच वर्षों में देश में 1.5 लाख से 2 लाख तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही भारत केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली तक सीमित न रहकर वैश्विक चिप डिजाइन, इंजीनियरिंग और नवाचार के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।

    उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि सेमिकॉन 2.0 का दायरा केवल सेमीकंडक्टर निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा। इसके माध्यम से चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर वेरिफिकेशन, एम्बेडेड सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उत्पादन, एडवांस्ड पैकेजिंग और आधुनिक सप्लाई चेन जैसी उच्च तकनीक वाली गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे देश में एक व्यापक और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा।

    हाल ही में केंद्र सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ सेमिकॉन 2.0 योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर डिजाइन, निर्माण, अनुसंधान और प्रतिभा विकास को नई गति देना है, ताकि देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। सरकार का मानना है कि इस पहल से घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और आयात पर निर्भरता कम करने में भी सहायता मिलेगी।

    विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2030 तक सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से जुड़े अधिकांश पदों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग के कारण चिप डिजाइन, रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और इंजीनियरिंग से जुड़े उच्च कौशल वाले पेशेवरों की मांग तेजी से बढ़ेगी। इससे तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे और उद्योग को प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध होगा।

    उद्योग जगत का यह भी मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र से जुड़े ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे देश को इंजीनियरिंग, अनुसंधान और नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित होने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही घरेलू कंपनियों को भी उच्च मूल्य वाले उत्पादों और बौद्धिक संपदा के विकास का अवसर मिलेगा, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग मुख्य रूप से असेंबली आधारित उत्पादन पर केंद्रित रहा है, लेकिन सेमिकॉन 2.0 के माध्यम से देश चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, टेस्टिंग और एडवांस्ड पैकेजिंग जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत कर सकेगा। इससे न केवल नई तकनीकों का विकास होगा, बल्कि दीर्घकाल में भारतीय उद्योग को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त भी मिलेगी।

    सरकार ने इस योजना के तहत चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग उपकरण एवं सामग्री, फैब्रिकेशन सुविधाएं, एटीएमपी और ओसैट यूनिट्स, अनुसंधान एवं विकास तथा प्रतिभा विकास जैसे छह प्रमुख स्तंभों पर आधारित सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करने का लक्ष्य रखा है। अब तक 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ है। उद्योग जगत का मानना है कि इन पहलों से भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में भरोसेमंद भागीदार के रूप में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर सकेगा।

  • विप्रो के पहली तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में गिरावट के बीच कंपनी ने अंतरिम लाभांश का किया ऐलान

    विप्रो के पहली तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में गिरावट के बीच कंपनी ने अंतरिम लाभांश का किया ऐलान

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख आईटी कंपनी विप्रो ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में उसके शुद्ध मुनाफे में तिमाही आधार पर 4.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि कुल आय में केवल मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और आईटी सेवाओं की मांग में संतुलित वृद्धि के बीच कंपनी का प्रदर्शन बाजार की निगाहों में बना हुआ है।

    कंपनी की ओर से जारी वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में विप्रो का समेकित शुद्ध लाभ घटकर 3,352 करोड़ रुपये रहा। वहीं, कंपनी की कुल आय तिमाही आधार पर लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 24,480 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। सालाना आधार पर आय में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मुनाफा लगभग स्थिर रहा।

    परिचालन प्रदर्शन की बात करें तो आईटी सेवा कारोबार का ऑपरेटिंग मार्जिन 16 प्रतिशत रहा। यह पिछली तिमाही और पिछले वर्ष की समान अवधि दोनों की तुलना में कम रहा। मार्जिन में आई गिरावट को लागत और बाजार परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि कंपनी ने नकदी प्रवाह के मोर्चे पर सकारात्मक प्रदर्शन दर्ज किया है।

    जून तिमाही के दौरान कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो बढ़कर 3,290 करोड़ रुपये हो गया। यह तिमाही की शुद्ध आय का लगभग 98 प्रतिशत रहा, जिसे कंपनी के लिए मजबूत नकदी स्थिति का संकेत माना जा रहा है। वहीं पिछले 12 महीनों के आधार पर स्वैच्छिक कर्मचारी त्याग दर 13.9 प्रतिशत दर्ज की गई, जो आईटी उद्योग में मानव संसाधन की स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है।

    विप्रो ने आगामी तिमाही के लिए भी अपना कारोबारी अनुमान जारी किया है। कंपनी का कहना है कि आईटी सेवा कारोबार की आय में अगली तिमाही के दौरान 1.5 प्रतिशत तक गिरावट या 0.5 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी फिलहाल सतर्क कारोबारी दृष्टिकोण अपनाए हुए है और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों पर करीबी नजर बनाए हुए है।

    कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक श्रीनी पल्लिया ने कहा कि वैश्विक ग्राहक अब केवल तकनीकी आधुनिकीकरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परिचालन मॉडल को तेजी से अपना रहे हैं। उनके अनुसार, विप्रो अपनी कंसल्टिंग विशेषज्ञता और एआई आधारित समाधान के माध्यम से ग्राहकों को उनके कारोबारी बदलाव में सहयोग दे रही है। उन्होंने कहा कि कंपनी की रणनीति ग्राहकों के व्यवसाय में एआई को प्रभावी ढंग से शामिल करने पर केंद्रित है।

    तिमाही नतीजों के साथ कंपनी के निदेशक मंडल ने प्रति इक्विटी शेयर दो रुपये के अंतरिम लाभांश की भी घोषणा की है। शेयर बाजार में परिणाम जारी होने के बाद कंपनी के शेयर में बढ़त देखने को मिली। हालांकि पिछले कुछ महीनों और एक वर्ष के दौरान शेयर के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है। अब निवेशकों की नजर कंपनी की आगामी तिमाहियों की रणनीति, वैश्विक आईटी मांग और एआई आधारित सेवाओं के विस्तार पर बनी रहेगी।

  • एडीबी की रिपोर्ट में भारत-नेपाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की सिफारिश, सीमा-पार लेनदेन होंगे आसान

    एडीबी की रिपोर्ट में भारत-नेपाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की सिफारिश, सीमा-पार लेनदेन होंगे आसान

    नई दिल्ली । एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने भारत और नेपाल के बीच डिजिटल पेमेंट कॉरिडोर को दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया है। बैंक का मानना है कि सीमा-पार डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत करने से व्यापार, पर्यटन और रेमिटेंस के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। एडीबी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि दोनों देशों के बीच हर वर्ष अरबों डॉलर का आर्थिक लेनदेन होता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब भी पारंपरिक बैंकिंग माध्यमों के जरिए संचालित होता है।

    रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल भुगतान तकनीक में तेज प्रगति के बावजूद सीमा-पार भुगतान व्यवस्था का पूरा लाभ अभी तक नहीं उठाया जा सका है। एडीबी का कहना है कि यदि दोनों देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को अधिक इंटरऑपरेबल और समन्वित बनाया जाए तो व्यापारियों, पर्यटकों और आम उपभोक्ताओं के लिए भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक हो सकती है।

    रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नेपाल के डिजिटल भुगतान तंत्र को मजबूत करने के लिए क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, नियामकीय समन्वय, भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी और बाजार एकीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही घरेलू डिजिटल अवसंरचना और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने के लिए विभिन्न हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी बताई गई है।

    वर्ष 2024 में नेपाल राष्ट्र बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक ने नेपाल के नेशनल पेमेंट्स इंटरफेस को भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) से जोड़ने की दिशा में नियामकीय समझौते किए थे। इसके बाद मार्च 2024 से भारतीय नागरिक नेपाल में फोनेपे और खल्ती जैसे क्यूआर कोड के माध्यम से अपने भारतीय भुगतान ऐप का उपयोग कर भुगतान कर रहे हैं। इस सुविधा को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और डिजिटल लेनदेन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में प्रतिदिन लगभग 500 डिजिटल भुगतान दर्ज किए जाते थे, जो वर्ष 2025 की शुरुआत तक बढ़कर करीब 2,000 प्रतिदिन हो गए। इससे प्रतिदिन लाखों नेपाली रुपये का कारोबार हो रहा है और कुल सीमा-पार डिजिटल भुगतान का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा नेपालपे क्यूआर प्रणाली का उपयोग अन्य देशों के पर्यटक भी कर रहे हैं, जिससे डिजिटल भुगतान का दायरा और विस्तृत हुआ है।

    हालांकि एडीबी ने यह भी उल्लेख किया है कि अभी तक नेपाल के नागरिकों के लिए भारत में क्यूआर कोड आधारित भुगतान की समान सुविधा पूरी तरह शुरू नहीं हो सकी है। रिपोर्ट के अनुसार, कमीशन संरचना और शुल्क निर्धारण से जुड़े कुछ नियामकीय मुद्दे इस दिशा में प्रमुख बाधा बने हुए हैं। इन चुनौतियों के समाधान के बाद दोनों देशों के बीच पूरी तरह द्विपक्षीय डिजिटल भुगतान व्यवस्था लागू की जा सकती है।

    एडीबी ने सिफारिश की है कि भारत और नेपाल को सीमा-पार डिजिटल भुगतान से जुड़े लंबित मुद्दों का शीघ्र समाधान करना चाहिए। बैंक का मानना है कि आधुनिक भुगतान प्रणाली को व्यापक स्तर पर लागू करने से द्विपक्षीय व्यापार को नई गति मिलेगी, पर्यटकों को अधिक सुविधा मिलेगी और दोनों देशों के बीच रेमिटेंस भेजने की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में अधिक सरल, तेज और किफायती बन सकेगी।

  • जून में ऑटो सेक्टर ने पकड़ी तेज रफ्तार, यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत उछली; दोपहिया, तिपहिया और निर्यात में भी दर्ज हुई मजबूत बढ़त

    जून में ऑटो सेक्टर ने पकड़ी तेज रफ्तार, यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत उछली; दोपहिया, तिपहिया और निर्यात में भी दर्ज हुई मजबूत बढ़त

    नई दिल्ली । जून महीने में भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग ने मजबूत वृद्धि दर्ज करते हुए घरेलू बाजार में मांग के लगातार बढ़ने के संकेत दिए हैं। यात्री वाहनों की थोक बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ दोपहिया, तिपहिया और वाहन निर्यात के आंकड़ों में भी प्रभावशाली सुधार देखने को मिला है। उद्योग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वाहन निर्माताओं द्वारा डीलरों को भेजे जाने वाले वाहनों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक रही, जिससे बाजार में उपभोक्ता मांग और उत्पादन गतिविधियों में तेजी का संकेत मिलता है।

    जून के दौरान यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ 3,88,144 यूनिट्स तक पहुंच गई। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 3,12,851 यूनिट्स था। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि देश में निजी वाहनों की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। बेहतर आर्थिक गतिविधियों, उपभोक्ताओं के बढ़ते विश्वास और नए मॉडलों की उपलब्धता ने इस प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    यात्री वाहन श्रेणी में सबसे बड़ा योगदान यूटिलिटी व्हीकल सेगमेंट का रहा। इस वर्ग की बिक्री में 19.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और कुल 2,17,228 यूनिट्स डीलरों तक भेजी गईं। वहीं, यात्री कारों की बिक्री भी 15.7 प्रतिशत बढ़कर 98,610 यूनिट्स पर पहुंच गई। वैन श्रेणी ने भी सकारात्मक प्रदर्शन करते हुए 9.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और इसकी बिक्री 10,230 यूनिट्स रही। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि विभिन्न श्रेणियों में उपभोक्ताओं की मांग संतुलित रूप से बढ़ रही है।

    दोपहिया वाहन बाजार ने भी जून में शानदार प्रदर्शन किया। इस श्रेणी में कुल 18,51,400 यूनिट्स की थोक बिक्री दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 18.6 प्रतिशत अधिक है। विशेष रूप से स्कूटर सेगमेंट सबसे तेजी से बढ़ने वाला वर्ग रहा, जहां बिक्री में 39.1 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ और कुल 7,44,823 यूनिट्स डीलरों तक पहुंचीं। दूसरी ओर मोटरसाइकिलों की बिक्री 6.4 प्रतिशत बढ़कर 10,56,422 यूनिट्स रही, जबकि मोपेड श्रेणी में कम आधार के कारण 50.4 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई और बिक्री 50,155 यूनिट्स तक पहुंच गई।

    तिपहिया वाहनों की बिक्री में भी मजबूत विस्तार देखने को मिला। जून के दौरान इस श्रेणी की थोक बिक्री 26.1 प्रतिशत बढ़कर 77,951 यूनिट्स रही। पैसेंजर कैरियर वाहनों की बिक्री में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि गुड्स कैरियर वाहनों की बिक्री 29.4 प्रतिशत बढ़ी। इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की मांग भी लगातार मजबूत बनी रही और ई-रिक्शा की बिक्री में 52.4 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो स्वच्छ और किफायती परिवहन विकल्पों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भारतीय वाहन उद्योग का प्रदर्शन उत्साहजनक रहा। जून के दौरान कुल वाहन निर्यात 34 प्रतिशत बढ़कर 6,73,105 यूनिट्स पर पहुंच गया। इसमें दोपहिया वाहनों का निर्यात सबसे अधिक रहा, जिसमें 40.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 5,43,684 यूनिट्स विदेश भेजी गईं। तिपहिया वाहनों का निर्यात भी 39.7 प्रतिशत बढ़कर 51,950 यूनिट्स तक पहुंच गया, जबकि यात्री वाहनों का निर्यात लगभग स्थिर रहते हुए 76,601 यूनिट्स दर्ज किया गया। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू मांग में मजबूती, निर्यात बाजारों में बेहतर अवसर और विभिन्न वाहन श्रेणियों में लगातार बढ़ती बिक्री आने वाले महीनों में भी भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की विकास गति को मजबूत बनाए रख सकती है।