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  • वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की विकास क्षमता पर जताया भरोसा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और बाजार संभावनाएं निवेशकों को कर रहीं आकर्षित

    वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की विकास क्षमता पर जताया भरोसा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और बाजार संभावनाएं निवेशकों को कर रहीं आकर्षित


    नई दिल्ली ।
    कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में दुनियाभर से आए अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों के बीच मजबूत अर्थव्यवस्थाओं की जरूरत पर जोर दिया। सम्मेलन में भारत की विकास संभावनाओं, वैश्विक व्यापार व्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु जोखिम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक वृद्धि, बाजार क्षमता और निवेश की संभावनाओं को महत्वपूर्ण बताया।

    स्वीडिश अर्थशास्त्री एरिक बर्गलोफ ने कहा कि वह इस सम्मेलन से इसकी शुरुआत से जुड़े हुए हैं और समय के साथ इसकी गुणवत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय भागीदारी में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि इस बार पहले की तुलना में अधिक देशों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया है। उनके अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां काफी अनिश्चित हैं और ऐसे समय में ऊर्जा, व्यापार तथा आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े जोखिमों के बीच अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लचीला बनाने पर चर्चा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत की विकास संभावनाएं मजबूत हैं और कोविड-19 के बाद देश ने प्रभावशाली आर्थिक गति हासिल की है।

    बर्गलोफ ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत वृद्धि की क्षमता बनी हुई है। हालांकि, ईरान से जुड़े संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने आम लोगों और कारोबारों को राहत देने के प्रयास किए हैं, लेकिन इससे राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, वैश्विक संकटों के बीच विकास की गति बनाए रखना नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    ब्राजील स्थित क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक जुलियानो असुन्साओ ने जलवायु परिवर्तन को दुनिया के सबसे बड़े साझा जोखिमों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं है और इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। उनके अनुसार, भारत और ब्राजील जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के साथ-साथ समाधान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स जैसे मंचों के माध्यम से दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंध हैं और भारतीय कंपनियों का ब्राजील में निवेश भी बढ़ रहा है। विकास, जलवायु, कृषि और सतत आर्थिक वृद्धि जैसी समान चुनौतियां दोनों देशों के सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करती हैं।

    न्यूजीलैंड के अर्थशास्त्री प्रो. जॉन गिब्सन ने सम्मेलन को शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बताया। उन्होंने कहा कि यहां भारत के साथ एशिया-प्रशांत और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर चर्चा हो रही है। बढ़ती अनिश्चितता और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था पर दबाव के बीच उन्होंने मुक्त व्यापार समझौतों को स्थिरता देने वाला माध्यम बताया और भारत-न्यूजीलैंड के हालिया मुक्त व्यापार समझौते का उल्लेख किया।

    जापान के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोइकॉनॉमिक्स के निदेशक काजुतो सुजुकी ने कहा कि अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और जियोइकॉनॉमिक्स एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि चीन के साथ जटिल संबंधों के कारण जापानी उद्योग लंबे समय से भारत को महत्वपूर्ण बाजार मानते हैं। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में जापानी कंपनियां भारत में निवेश के अवसर तलाश रही हैं और देश को दीर्घकालिक विकास तथा विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं। भारत की बाजार क्षमता, जनसांख्यिकीय ताकत और आर्थिक विस्तार की संभावनाएं विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं।

  • शेख हसीना प्रत्यर्पण मामले में भारत का जवाब, बांग्लादेश को कहा- वापसी की समयसीमा अभी तय नहीं की जा सकती

    शेख हसीना प्रत्यर्पण मामले में भारत का जवाब, बांग्लादेश को कहा- वापसी की समयसीमा अभी तय नहीं की जा सकती

    नई दिल्ली ।शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर भारत ने स्पष्ट किया है कि उनकी बांग्लादेश वापसी के लिए फिलहाल कोई निश्चित समयसीमा नहीं बताई जा सकती। बांग्लादेश की ओर से हसीना को वापस भेजने का औपचारिक अनुरोध भारत को प्राप्त हुआ है और इस अनुरोध की कानूनी जांच की जा रही है। भारत के अनुसार, प्रत्यर्पण से जुड़ा मामला तय कानूनी, न्यायिक और कूटनीतिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। इसी वजह से उनकी वापसी की कोई डेडलाइन निर्धारित नहीं की गई है।

    ढाका में आयोजित एक निजी चर्चा के दौरान भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर बांग्लादेश की ओर से लगातार की जा रही मांगों के बारे में सवाल पूछा गया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हसीना की वापसी की समयसीमा के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि बांग्लादेश से मिले प्रत्यर्पण अनुरोध पर फिलहाल कानूनी प्रक्रिया के तहत विचार किया जा रहा है और भारत इस मामले को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार देख रहा है।

    भारत को बांग्लादेश की ओर से शेख हसीना को वापस भेजने का औपचारिक अनुरोध मिल चुका है। इस अनुरोध की कानूनी समीक्षा वर्तमान में जारी है। भारत की ओर से यह संकेत दिया गया है कि मामले में किसी तरह की समयसीमा पहले से तय नहीं की जा सकती। प्रत्यर्पण से संबंधित निर्णय कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध प्रावधानों के आधार पर लिया जाएगा। इस दौरान भारत की ओर से मामले को न्यायिक और कूटनीतिक प्रक्रिया के दायरे में रखा गया है।

    शेख हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश में पैदा हुए राजनीतिक संकट के बीच अचानक देश छोड़कर भारत आई थीं। उस समय बांग्लादेश में परिस्थितियां तेजी से बिगड़ रही थीं। हसीना उस समय देश की प्रधानमंत्री थीं और उनकी सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच उनकी सरकार गिर गई और वह भारत आ गईं। भारत की ओर से उस समय कहा गया था कि तेजी से बिगड़ते हालात के बीच हसीना को भारत में आने की अनुमति देने के अलावा बहुत कम विकल्प मौजूद थे।

    भारत का कहना है कि उस समय हसीना को भारत आने की अनुमति देना सीमा पार बढ़ते संकट के बीच स्थिरता बनाए रखने के लिहाज से जरूरी था। इसके बाद बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिति बदली और अब वहां तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार है। इस बदले राजनीतिक परिदृश्य के बीच शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग बांग्लादेश की ओर से लगातार की जा रही है।

    ढाका में बंगाल की खाड़ी संवाद 2026 के दौरान भी भारतीय उच्चायुक्त से इसी मुद्दे पर सवाल किया गया। उन्होंने दोहराया कि भारत फिलहाल हसीना की वापसी के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं बता सकता। उनका कहना था कि प्रत्यर्पण अनुरोध कानूनी प्रक्रिया से गुजर रहा है। ऐसे में आगे की कार्रवाई तय प्रक्रिया के अनुसार ही होगी और फिलहाल उनकी वापसी की कोई डेडलाइन निर्धारित नहीं है।

  • फिरोजपुर सीमा पर घुसपैठ को लेकर भारत सख्त, पाकिस्तानी उच्चायोग के चार्ज द अफेयर्स तलब

    फिरोजपुर सीमा पर घुसपैठ को लेकर भारत सख्त, पाकिस्तानी उच्चायोग के चार्ज द अफेयर्स तलब


    नई दिल्ली। पंजाब के फिरोजपुर सेक्टर में 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हुई घटना को लेकर भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा राजनयिक विरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान उच्चायोग के चार्ज द अफेयर्स को तलब कर सीमा पार से अवैध घुसपैठ को बढ़ावा दिए जाने पर आपत्ति जताई और पाकिस्तान की ओर से लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद और प्रेरित बताया।

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक, पाकिस्तानी पक्ष को घटना का भारत का पूरा पक्ष बताया गया। भारत ने कहा कि तीन लोग पाकिस्तान की ओर से भारतीय क्षेत्र में दाखिल हुए थे। बीएसएफ ने उन्हें कई बार चेतावनी देकर वापस लौटने को कहा, लेकिन वे नहीं रुके और सीमा पर लगी बाड़ की तरफ बढ़ते रहे। भारत के अनुसार, सुरक्षा के लिए तत्काल खतरा पैदा होने पर बीएसएफ को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी।

    भारत ने कहा- यह अकेली घटना नहीं
    विदेश मंत्रालय ने कहा कि फिरोजपुर की घटना को अलग-थलग मामले के तौर पर नहीं देखा जा सकता। भारत के मुताबिक, पाकिस्तान से संचालित हथियारबंद नशा तस्करी गिरोहों की सीमा पार आवाजाही का एक पैटर्न सामने आता रहा है।

    भारत ने पाकिस्तान सरकार से सीमा पार घुसपैठ और मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ी गतिविधियों की जांच करने को कहा है। इसके साथ ही पाकिस्तान के सीमा सुरक्षा बलों की कथित मिलीभगत की भी जांच कराने और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की गई है।

    अंतरराष्ट्रीय सीमा की पवित्रता का सम्मान करने को कहा
    भारत ने पाकिस्तान से कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय सीमा की पवित्रता का सम्मान करे और दोनों देशों के बीच लागू संबंधित द्विपक्षीय व्यवस्थाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे। विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान से यह भी कहा कि वह अपने सीमा सुरक्षा बलों को अपनी तरफ से होने वाली अनधिकृत आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दे। भारत ने जोर दिया कि ऐसे ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

    पाकिस्तान ने भी दर्ज कराया था विरोध
    इस घटना को लेकर दोनों देशों के पक्ष अलग-अलग हैं। पाकिस्तान ने इससे पहले भारतीय राजनयिक को तलब कर बीएसएफ की कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी। पाकिस्तानी पक्ष का कहना है कि मारे गए लोग निर्दोष नागरिक थे और उन्होंने अनजाने में सीमा पार की थी। पाकिस्तान ने घटना की पारदर्शी जांच की मांग भी की है।

    वहीं भारत का कहना है कि तीन लोग भारतीय क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे और बीएसएफ की बार-बार चेतावनी के बावजूद उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, इनमें से एक व्यक्ति वापस पाकिस्तान की ओर चला गया, जबकि दो अन्य आगे बढ़ते रहे और बीएसएफ की कार्रवाई में मारे गए।

    सीमा सुरक्षा और नशा तस्करी पर भारत का जोर
    विदेश मंत्रालय ने अपने विरोध के दौरान घुसपैठ के साथ सीमा पार मादक पदार्थों की तस्करी का मुद्दा भी उठाया। भारत ने पाकिस्तान से इस नेटवर्क और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की जांच करने को कहा है।

    फिलहाल दोनों देशों की ओर से घटना को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। भारत ने जहां इसे घुसपैठ की कोशिश और सुरक्षा खतरे के रूप में पेश किया है, वहीं पाकिस्तान ने बीएसएफ की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में घटना से जुड़े आगे के तथ्य जांच और संबंधित सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद और स्पष्ट हो सकते हैं।

  • Report: भारत के लोग भले ही लंबी उम्र जी रहे …. पर बुढ़ापे में स्वस्थ जीवन और संतुष्टि का अभाव

    Report: भारत के लोग भले ही लंबी उम्र जी रहे …. पर बुढ़ापे में स्वस्थ जीवन और संतुष्टि का अभाव


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में लोग पहले से ज्यादा लंबी उम्र (Longer lifespan) जरूर जी रहे हैं, लेकिन जीवन के आखिरी वर्षों में स्वस्थ, सक्रिय, आर्थिक रूप से सुरक्षित और संतुष्ट रहने की तस्वीर उतनी अच्छी नहीं है। खासकर ग्रामीण बुजुर्ग महिलाओं (Elderly Rural Women) के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है। 60 वर्ष की उम्र में ग्रामीण महिलाओं के पास औसतन 18.5 वर्ष की शेष जीवन प्रत्याशा है, लेकिन इनमें सिर्फ 4.6 वर्ष अच्छे जीवन के रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले शहरी पुरुषों के लिए 19.1 वर्ष की शेष जिंदगी में 10.2 वर्ष अच्छे जीवन के हैं।

    मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज, यूनिवर्सिटी ऑफ विएना और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अध्ययन में यह तस्वीर सामने आई है। अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल सोशल इंडीकेटर्स रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने भारत में बुजुर्गों की स्थिति समझने के लिए आंकड़ों का विश्लेषण किया है।


    पुरुषों में शरीर, महिलाओं में संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बड़ी चुनौती

    अध्ययन में अच्छे जीवन के वर्षों में राज्यों के बीच अंतर के कारण भी अलग-अलग दिखाई दिए। पुरुषों के मामले में करीब 45 फीसदी अंतर कार्यात्मक स्वास्थ्य से जुड़ा था, जबकि संज्ञानात्मक स्वास्थ्य का योगदान करीब 31 फीसदी रहा। महिलाओं में स्थिति उलट थी। उनके राज्यों के बीच अंतर में करीब 46 फीसदी हिस्सा संज्ञानात्मक स्वास्थ्य और 31 फीसदी कार्यात्मक स्वास्थ्य से जुड़ा था।ग्रामीण महिलाओं की स्थिति विशेष चिंता पैदा करती है। निर्धारित संज्ञानात्मक स्वास्थ्य कसौटी पर जहां 96 फीसदी शहरी पुरुष खरे उतरते हैं, वहीं ग्रामीण महिलाओं में यह हिस्सा करीब 69 फीसदी था।

    राज्यों में भी बड़ा फासला: 60 वर्ष की उम्र में पंजाब के पुरुषों के लिए अच्छे जीवन के वर्ष 12.9 रहे, जो उनकी शेष जीवन प्रत्याशा का करीब 63 फीसदी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बुजुर्ग पुरुषों के अच्छे जीवन के वर्ष करीब 6.5 से 6.8 के बीच रहे।महिलाओं में केरल की ग्रामीण महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही। वहां 60 वर्ष की उम्र के बाद 10.1 वर्ष अच्छे जीवन के रहे, जो शेष जीवन का करीब 46 फीसदी है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 3.8 वर्ष और महाराष्ट्र की ग्रामीण महिलाओं में महज 2.7 वर्ष रहा।


    नीति के लिए बड़ा संकेत:

    अध्ययन का संकेत साफ है बुजुर्गों के लिए नीति का लक्ष्य केवल जीवन प्रत्याशा बढ़ाना नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पुनर्वास, फिजियोथेरेपी, सहायक उपकरण, घरेलू देखभाल और आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं। महिलाओं के लिए जीवनभर शिक्षा और सामाजिक भागीदारी जैसे कारक भी उम्र बढ़ने के साथ महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

  • सामाजिक और आर्थिक बदलाव की राह पर भारत…. देश के 2.8 करोड़ बच्चे बने पहली शिक्षित पीढ़ी

    सामाजिक और आर्थिक बदलाव की राह पर भारत…. देश के 2.8 करोड़ बच्चे बने पहली शिक्षित पीढ़ी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में करीब 2.8 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिन्होंने अपने परिवार में छह साल की स्कूली शिक्षा (School Education) पूरी करने वाली पहली पीढ़ी बनकर पीढ़ियों से चले आ रहे अभाव के बीच बदलाव की नई शुरुआत की है। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा अब केवल बच्चों के भविष्य को बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि परिवारों में सामाजिक और आर्थिक बदलाव (Social and Economic changes) की राह भी बना रही है। हालांकि, वैश्विक आंकड़े यह भी बताते हैं कि शिक्षा की इस प्रगति को टिकाऊ बनाने के लिए बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और घर की बुनियादी सुविधाओं पर भी समान ध्यान देना होगा।

    ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) के अध्ययन में विकासशील देशों में बच्चों की गरीबी, कुपोषण और शिक्षा की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ओपीएचआई के वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें गरीबी को केवल परिवार की आय से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े कई अभावों के आधार पर देखा गया है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत में शिक्षा की पहली पीढ़ी बनने वाले 2.8 करोड़ बच्चों का आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक बच्चे का स्कूल पहुंचना केवल उसके व्यक्तिगत जीवन में बदलाव नहीं लाता। जब किसी परिवार में पहली बार कोई बच्चा छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी करता है, तो वह अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा को सामान्य और जरूरी बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाता है।

    अध्ययन के अनुसार दुनिया के 108 देशों में 10 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 7.1 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिन्होंने अपने परिवार में कम से कम छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी करने वाली पहली पीढ़ी का दर्जा हासिल किया है। इनमें करीब आधे बच्चे दक्षिण एशिया में हैं। भारत इस बदलाव में सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाले देशों में शामिल है।

    दक्षिण एशिया में भारत के अलावा बांग्लादेश में 30 लाख से अधिक, पाकिस्तान में करीब 20 लाख, नेपाल में 8.37 लाख और अफगानिस्तान में करीब 5.08 लाख बच्चे इस श्रेणी में हैं। भारत, भूटान और बांग्लादेश में इस तरह अपने परिवार की पहली शिक्षित पीढ़ी बनने वाली बच्चियों की हिस्सेदारी लड़कों की तुलना में अधिक पाई गई है। बच्चों के जीवन में शिक्षा और पोषण की चुनौतियां एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। अध्ययन में विकासशील देशों के पांच साल से कम उम्र के 51.8 करोड़ बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इनमें 25.2 करोड़ बच्चे कुपोषण, बहुआयामी गरीबी या दोनों से प्रभावित पाए गए।


    महिलाओं की शिक्षा से भी जुड़ी बच्चों की स्थिति

    बहुआयामी गरीबी में रहने वाले दो-तिहाई से अधिक बच्चे ऐसे परिवारों से हैं, जहां किसी महिला ने छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी नहीं की है। स्कूल से बाहर रहने वाले गरीब बच्चों में यह अनुपात करीब 82 फीसदी है।


    शिक्षा की राह खुली, मंजिल दूर

    अध्ययन की तस्वीर में भारत के लिए एक तरफ 2.8 करोड़ बच्चों की उपलब्धि उम्मीद पैदा करती है तो दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट करती है कि शिक्षा को गरीबी से स्थायी मुक्ति का माध्यम बनाने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी, स्वच्छता, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं के बिना केवल स्कूल तक पहुंच सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं होगा।


    13.6 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर

    108 देशों में स्कूल जाने की उम्र के करीब 104 करोड़ बच्चों के आंकड़ों में 13.6 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर पाए गए। इनमें 11 करोड़ यानी 80 फीसदी से अधिक बच्चे बहुआयामी गरीबी में भी हैं। अध्ययन के अनुसार, स्कूल से बाहर रहने वाले गरीब बच्चों को औसतन पांच अन्य प्रकार के अभावों का भी सामना करना पड़ता है।

  • US ने भारत समेत 20 देशों की खास दवाओं को 100% टैरिफ से दी छूट, भारतीय फार्मा सेक्टर को बड़ी राहत

    US ने भारत समेत 20 देशों की खास दवाओं को 100% टैरिफ से दी छूट, भारतीय फार्मा सेक्टर को बड़ी राहत


    नई दिल्ली : अमेरिका ने भारतीय फार्मा सेक्टर को बड़ी राहत देते हुए भारत समेत 20 देशों से आयात होने वाली कुछ विशेष दवाओं और उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले जरूरी घटकों पर 100 प्रतिशत एड वैलोरम टैरिफ से छूट दी है। शून्य टैरिफ का यह प्रावधान उन चुनिंदा फार्मास्युटिकल उत्पादों पर लागू होगा, जिनका इस्तेमाल दुर्लभ बीमारियों के इलाज, बांझपन के उपचार, सेल थेरेपी, जीन थेरेपी, एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स और पशु स्वास्थ्य से जुड़े उपचारों में किया जाता है। संबंधित दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले जरूरी कच्चे माल और अन्य घटक भी इस छूट के दायरे में शामिल हैं।

    यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका कुछ पेटेंट वाली दवाओं और उनसे जुड़े उत्पादों पर 100 प्रतिशत एड वैलोरम टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। यह शुल्क 29 सितंबर से लागू होने की बात कही गई है। हालांकि, विशेष श्रेणी की दवाओं को इस शुल्क से अलग रखा गया है। एड वैलोरम टैरिफ वह शुल्क होता है, जो किसी वस्तु की कीमत के एक निश्चित प्रतिशत के आधार पर लगाया जाता है। नई व्यवस्था के तहत तय श्रेणियों में आने वाली विशेष दवाओं और संबंधित सामग्री के लिए टैरिफ की दर शून्य रखी गई है।

    भारत के साथ जिन अन्य देशों को इस शून्य टैरिफ व्यवस्था का लाभ दिया गया है, उनमें अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, इक्वाडोर, अल साल्वाडोर, यूरोपीय संघ, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, जापान, जॉर्डन, मलेशिया, नॉर्थ मैसेडोनिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टीन, ताइवान, थाईलैंड, ब्रिटेन और वियतनाम शामिल हैं। यह व्यवस्था निर्धारित विशेष फार्मास्युटिकल उत्पादों और उनके संबंधित घटकों के लिए लागू होगी। इन उत्पादों में गंभीर और दुर्लभ बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के साथ अन्य विशेष चिकित्सा उपचारों से जुड़े उत्पाद शामिल हैं।

    शून्य टैरिफ की दर उन उत्पादों पर लागू होगी, जिनका इस्तेमाल गंभीर बीमारियों के इलाज, बांझपन के उपचार, सेल थेरेपी, जीन थेरेपी और एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स में होता है। इसके अलावा पशु दवाओं में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया गया है। इन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले संबंधित कच्चे माल और अन्य जरूरी घटकों को भी छूट दी गई है। अमेरिकी सरकार ने यह फैसला उन देशों से आने वाले उत्पादों के लिए किया है, जिनके साथ व्यापार समझौता है या निकट भविष्य में ऐसा समझौता होने की संभावना है।

    हालांकि, यह छूट भारत से अमेरिका भेजी जाने वाली सभी दवाओं पर लागू नहीं होगी। इसका लाभ केवल निर्धारित विशेष श्रेणियों में आने वाली दवाओं और उनसे जुड़े जरूरी घटकों को मिलेगा। इस तरह 29 सितंबर से कुछ पेटेंट वाली दवाओं और संबंधित उत्पादों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होने की तैयारी के बीच भारत समेत 20 देशों की विशेष दवाओं के लिए शुल्क में बड़ी राहत दी गई है।

  • भारत-अमेरिका के बीच निर्णायक मोड़ पर पहुंची ट्रेड डील, 90 फीसदी से ज्यादा काम पूरा

    भारत-अमेरिका के बीच निर्णायक मोड़ पर पहुंची ट्रेड डील, 90 फीसदी से ज्यादा काम पूरा


    नई दिल्‍ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के संबंधों में सालो से व्‍यापार सबसे बड़ा अड़चन बना हुआ था, लेकिन अब दोनों देश एक निर्णायक मोड़ क करीब दिख रहे हैं. अमेरिकी विदेश विभाग के सीनियर अधिकारी ने कहा है कि प्रस्‍ताव‍ित समझौता 90 फीसदी (Agreement 90% Complete) से ज्‍यादा पूरा हो चुका है, बस मसले बचे हुए हैं.।

    अधिकारी ने कहा कि यह डील दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जा सकता है। इस सवाल- कब डील पर साइन हो सकता है, के जवाब में अधिकार ने कहा कि मैं यही कहूंगा कि देखते रहिए, जैसा कि हम बार-बार कहते हैं, 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है और बस कुछ आखिरी चीजें तय की जा रही हैं. इस कारण मुझे उम्‍मीद है कि आपको इस बारे में बहुत जल्‍द कुछ जानकारी मिलेगी.।

    अधिकारी ने आगे कहा कि यह समझौता द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाएगा. अधिकारी ने यह भी कहा कि और इससे वास्तव में अमेरिका-भारत संबंधों में एक नया आयाम जुड़ेगा, जो व्यापार के मामले में दशकों से हमारे लिए संभव नहीं हो पाया है. यह हमेशा से ही संबंधों में सबसे बड़ी बाधा रही है।


    पीयूष गोयल ने कहा- बस ये काम बाकी

    इससे पहले कमर्शियल और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी संकेत दिया था कि बातचीत लगभग पूरी होने वाली है. गुरुवार को नई दिल्ली में पब्लिक अफेयर्स फोरम ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने नौ मुक्त व्यापार समझौतों को अंतिम रूप दे दिया है, जिनमें अमेरिका के साथ समझौता लगभग पूरा हो चुका है. उन्होंने आगे कहा कि हमें बस अपने लिए सही लाभ खोजना है ताकि हम समझौते को जल्‍द से लागू कर सकें।

    भारत और अमेरिका ने फरवरी में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के ढांचे का ऐलान किया था. हालांकि, अमेरिकी टैरिफ में बदलाव के कारण आगे की बातचीत की आवश्यकता पड़ी. गोयल ने कहा कि भारत के व्यापार समझौते वैश्विक जीडीपी के लगभग 75 प्रतिशत हिस्से वाले बाजारों तक तरजीही पहुंच प्रदान करेंगे।


    पीएम मोदी दिसंबर में अमेरिकी यात्रा पर

    अमेरिकी अधिकरी ने संबंधों में चल रही व्‍यस्‍तता की ओर भी इशारा किया. विदेश मंत्री मार्को रुबियो अक्‍टूबर में भारी दौरे पर आने वाले हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिसंबर में फ्लोरिडा में होने वाले G20 शिखर सम्‍मेलन के लिए अमेरिका की यात्रा करेंगे. अधिकारी ने कहा कि संबंधों में बहुत कुछ चल रहा है. अधिकारी ने कहा कि क्वाड देशों के विदेश मंत्री इस साल तीसरी बार मिलने वाले हैं।

  • UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध

    UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को रूस का खुला समर्थन मिला है। 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत के साथ ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का भी समर्थन किया। वहीं उन्होंने सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों के लिए नई स्थायी सीटें बढ़ाने का विरोध किया और कहा कि सुधार का फोकस एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भागीदारी बढ़ाने पर होना चाहिए।

    लावरोव ने जर्मनी-जापान की दावेदारी पर जताई आपत्ति

    UN महासभा में अपने संबोधन के दौरान लावरोव ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के नाम पर पश्चिमी देशों को अतिरिक्त स्थायी सीटें नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने खास तौर पर जर्मनी और जापान की दावेदारी का विरोध किया।

    रूस का कहना है कि मौजूदा UNSC संरचना में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को उनकी मौजूदा वैश्विक भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसी आधार पर मॉस्को भारत और ब्राजील को स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन कर रहा है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के दौरान अफ्रीकी महाद्वीप के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। रूस पहले भी सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक बनाने की बात कहता रहा है। सितंबर 2026 में भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के संयुक्त बयान में भी रूस ने सुधार के बाद विस्तारित UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए अपना समर्थन दोहराया था।

    भारत को कई देशों का समर्थन

    UN महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन में कई देशों ने अपनी बात रखी है।

    मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल ने G4 और L69 के रुख का समर्थन करते हुए भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी दोहराई। वहीं पुर्तगाल ने भी सुरक्षा परिषद में बदलाव की जरूरत बताई है। पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली UNSC की पैरवी की, जिसमें अफ्रीका, ब्राजील और भारत को स्थायी प्रतिनिधित्व देने का समर्थन शामिल है।

    इसके अलावा 22 सितंबर को भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान यानी G4 के विदेश मंत्रियों ने भी UNSC सुधार पर बैठक की और सुरक्षा परिषद में सुधार को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर जरूरी बताया।

    जापान और अफ्रीकी देशों की भी अलग मांग

    मार्शल आइलैंड्स की राष्ट्रपति हिल्डा हाइने ने कहा कि उनका देश जापान और उसके G4 साझेदारों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने के समर्थन पर लंबे समय से कायम है।

    वहीं जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने भी UNSC में बदलाव की मांग की। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद की संरचना मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों तरह की सीटों की संख्या बढ़ाने की पैरवी की।

    अफ्रीकी देशों की ओर से भी सुरक्षा परिषद में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है। सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने कहा कि UNSC अभी भी 1945 की दुनिया की तस्वीर पेश करता है। उन्होंने अफ्रीका की 1.6 अरब से ज्यादा आबादी का हवाला देते हुए कहा कि महाद्वीप के पास परिषद में कोई स्थायी सीट नहीं है।

    G4 में भारत के साथ कौन-कौन?

    भारत UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ G4 समूह का हिस्सा है। चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग करते हैं। G4 देशों ने सितंबर 2026 में भी सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत दोहराई है।

    भारत की ओर से भी सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में बदलाव की मांग लगातार की जाती रही है। भारत का तर्क है कि 80 साल से ज्यादा पुरानी व्यवस्था आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।

    कैसे काम करती है UNSC?

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं। इन सभी के पास वीटो का अधिकार है।

    बाकी 10 सदस्य गैर-स्थायी होते हैं, जिन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए UN चार्टर में संशोधन करना होगा।

    इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ सदस्य देशों की ओर से अनुसमर्थन जरूरी है। इसमें मौजूदा पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी शामिल है।

    यही वजह है कि UNSC में स्थायी सदस्यता का विस्तार केवल किसी एक देश के समर्थन से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति और UN चार्टर में औपचारिक बदलाव की जरूरत होगी।

  • 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    नई दिल्ली । विपक्षी दलों का INDIA ब्लॉक 30 सितंबर को नई दिल्ली में बैठक कर सकता है। इस संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल इन विषयों पर आगे की संयुक्त रणनीति तैयार करने के लिए आपसी समन्वय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

    बैठक का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली हो सकता है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां उठा रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की रणनीति पर विचार कर रहे हैं।

    इस घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का एक मुद्दे पर साथ आना भी महत्वपूर्ण है। दोनों दल राज्य में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर समन्वित कार्रवाई की जरूरत जता रहे हैं।

    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी दलों को पत्र लिखकर बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी बातचीत की। ममता बनर्जी ने इस मामले से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता जताई है।

    विपक्षी दलों में कांग्रेस और वामपंथी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने तथा SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर विपक्ष संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इसके कानूनी पहलुओं पर विशेषज्ञों से राय ली जा रही है।

    कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में पार्टी चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े विवाद पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। इसके बाद 30 सितंबर को होने वाली संभावित विपक्षी बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा हो सकती है।

    विपक्ष की मौजूदा लामबंदी के पीछे चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर कथित मतभेद की खबर भी एक वजह बताई जा रही है। सामने आई जानकारी में दावा किया गया था कि आयोग के अन्य आयुक्तों ने पुनरीक्षण से संबंधित कुछ फैसलों पर आपत्तियां जताई थीं।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने अपने आदेशों को वैधानिक बताया है। इस मुद्दे पर विपक्ष और चुनाव आयोग के रुख में अंतर बना हुआ है।

    इससे पहले 23 विपक्षी दलों और एक सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। विपक्षी दल अब संसद में प्रस्ताव लाने और आपसी समन्वय के जरिए आगे की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं।

    30 सितंबर की संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। बैठक में शामिल होने वाले दलों और अंतिम एजेंडे को लेकर आगे की जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    नई दिल्ली ।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने एक बार फिर अपनी साझा मांग दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में हुई G4 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में जल्द सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

    बैठक में चारों देशों ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार पहले की तुलना में अधिक जरूरी हो गया है। G4 का मानना है कि परिषद की मौजूदा संरचना करीब 80 साल पुरानी है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी वजह से परिषद की प्रतिनिधित्व क्षमता, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    बैठक में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, जर्मनी के विदेश मंत्री डॉ. योहान डेविड वाडेफुल और जापान के विदेश मंत्री मोतेगी तोशिमित्सु शामिल हुए। मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ताओं में हुई प्रगति और चर्चाओं की समीक्षा की।

    G4 देशों ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार को सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। चारों देशों ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने के समर्थन की व्यापक मौजूदगी है।

    अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की जरूरत पर भी बैठक में जोर दिया गया। G4 देशों ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी और प्रभावी बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता बताई, जो वर्तमान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से दर्शा सके।

    G4 की ओर से सुधार प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने और ठोस परिणाम हासिल करने की मांग की गई। देशों ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और G4 इस प्रक्रिया में लगातार सक्रिय भूमिका निभाता रहा है।

    न्यूयॉर्क में हुई चर्चा के बाद अब G4 देशों की अगली समीक्षा बैठक दिल्ली में प्रस्तावित है। इसमें सुधार प्रक्रिया में हुई प्रगति और आगे की दिशा पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक के जरिए चारों देश सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यता के विस्तार तथा सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर अपने समन्वय की समीक्षा करेंगे।

    G4 देशों की बैठक ऐसे समय हुई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की मांग लगातार उठ रही है। सुधार समर्थक देशों का जोर परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी, विश्वसनीय और प्रभावी बनाने पर है। G4 ने भी इसी दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और लंबे समय से लंबित सुधार को ठोस रूप देने की आवश्यकता पर अपना रुख दोहराया है।