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  • G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    नई दिल्ली ।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने एक बार फिर अपनी साझा मांग दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में हुई G4 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में जल्द सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

    बैठक में चारों देशों ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार पहले की तुलना में अधिक जरूरी हो गया है। G4 का मानना है कि परिषद की मौजूदा संरचना करीब 80 साल पुरानी है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी वजह से परिषद की प्रतिनिधित्व क्षमता, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    बैठक में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, जर्मनी के विदेश मंत्री डॉ. योहान डेविड वाडेफुल और जापान के विदेश मंत्री मोतेगी तोशिमित्सु शामिल हुए। मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ताओं में हुई प्रगति और चर्चाओं की समीक्षा की।

    G4 देशों ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार को सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। चारों देशों ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने के समर्थन की व्यापक मौजूदगी है।

    अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की जरूरत पर भी बैठक में जोर दिया गया। G4 देशों ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी और प्रभावी बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता बताई, जो वर्तमान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से दर्शा सके।

    G4 की ओर से सुधार प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने और ठोस परिणाम हासिल करने की मांग की गई। देशों ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और G4 इस प्रक्रिया में लगातार सक्रिय भूमिका निभाता रहा है।

    न्यूयॉर्क में हुई चर्चा के बाद अब G4 देशों की अगली समीक्षा बैठक दिल्ली में प्रस्तावित है। इसमें सुधार प्रक्रिया में हुई प्रगति और आगे की दिशा पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक के जरिए चारों देश सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यता के विस्तार तथा सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर अपने समन्वय की समीक्षा करेंगे।

    G4 देशों की बैठक ऐसे समय हुई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की मांग लगातार उठ रही है। सुधार समर्थक देशों का जोर परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी, विश्वसनीय और प्रभावी बनाने पर है। G4 ने भी इसी दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और लंबे समय से लंबित सुधार को ठोस रूप देने की आवश्यकता पर अपना रुख दोहराया है।

  • भारत के UPI ने रचा वैश्विक रिकॉर्ड, हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर बना डिजिटल भुगतान का बेंचमार्क

    भारत के UPI ने रचा वैश्विक रिकॉर्ड, हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर बना डिजिटल भुगतान का बेंचमार्क


    नई दिल्ली ।
    भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI रियल-टाइम डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में लगातार बड़े स्तर पर विस्तार कर रहा है। वर्तमान में यह डिजिटल पेमेंट नेटवर्क हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर रहा है। इसके साथ ही भारत ने बड़े पैमाने पर डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन को एक साथ आगे बढ़ाने का उदाहरण पेश किया है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का रियल-टाइम पेमेंट इकोसिस्टम डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की प्रमुख सफलताओं में शामिल है। UPI के विस्तार ने बड़ी संख्या में लोगों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ने में भूमिका निभाई है। इसके बावजूद डिजिटल लेनदेन की वृद्धि मजबूत बनी हुई है।

    रिपोर्ट में वैश्विक भुगतान उद्योग को लेकर भी अनुमान सामने रखा गया है। इसके अनुसार, वर्ष 2030 तक वैश्विक भुगतान उद्योग का राजस्व 2.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि आने वाले वर्षों में इसकी वृद्धि दर पिछले पांच वर्षों की तुलना में कुछ धीमी रहने का अनुमान है। पिछले पांच वर्षों में यह वृद्धि करीब 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही, जबकि आगे लगभग 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का अनुमान जताया गया है।

    भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल को वित्तीय समावेशन और बड़े पैमाने पर उपयोग के बीच संतुलन बनाने वाले उदाहरण के तौर पर बताया गया है। UPI के जरिए करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जोड़े जाने के साथ लेनदेन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    डिजिटल भुगतान के साथ क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। खास तौर पर ऑनलाइन भुगतान के क्षेत्र में क्रेडिट कार्ड उपयोग में तेजी देखी जा रही है। इससे बैंकों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए नई मूल्यवर्धित सेवाएं विकसित करने के अवसर बन रहे हैं।

    डिजिटल भुगतान क्षेत्र का अगला चरण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एजेंटिक कॉमर्स से जुड़ा हुआ बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में एआई आधारित सिस्टम भुगतान प्रक्रिया को अधिक सहज, सुरक्षित और स्वचालित बनाने में मदद कर सकते हैं।

    एआई के बढ़ते इस्तेमाल का असर भुगतान और ट्रांजैक्शन बैंकिंग क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। इससे कंपनियों को परिचालन लागत कम करने, उत्पादों में सुधार करने और पारंपरिक प्रक्रियाओं को स्वचालित करने में मदद मिल सकती है। ट्रेड फाइनेंस और भुगतान संचालन जैसी कागजी प्रक्रियाओं में भी तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

    एजेंटिक कॉमर्स को लेकर बड़े व्यापारियों के रुख से भी इसकी बढ़ती अहमियत का संकेत मिलता है। सर्वेक्षण में शामिल 73 प्रतिशत बड़े व्यापारियों ने कहा कि बेहतर एजेंट-आधारित लेनदेन की सुविधा और समर्थन मिलने पर वे अपने भुगतान सेवा प्रदाता को बदलने पर विचार कर सकते हैं। इससे भुगतान कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा में एजेंटिक कॉमर्स की भूमिका बढ़ने के संकेत मिलते हैं।

    रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर भुगतान संप्रभुता के बढ़ते महत्व का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, दुनिया के 137 देशों में फिलहाल चौबीसों घंटे इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम उपलब्ध हैं। इससे वैश्विक भुगतान व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक विविध और व्यापक हो रही है।

    भारत का UPI इसी बदलते वैश्विक डिजिटल भुगतान परिदृश्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले रियल-टाइम भुगतान नेटवर्क के रूप में सामने आया है। हर महीने 20 अरब से अधिक ट्रांजैक्शन की प्रोसेसिंग इसके विस्तार और डिजिटल भुगतान के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है।

  • भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत

    भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत


    नई दिल्ली ।भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की अनुमानित GDP वृद्धि के साथ दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में बना हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सितंबर 2026 की चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे घरेलू मांग को प्रमुख आधार बताया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, भारत समेत दुनिया के 10 प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया गया है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों की राय ली गई।

    भारत को लेकर विशेषज्ञों का भरोसा मई की तुलना में बढ़ा है। सितंबर की रिपोर्ट में 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई है। मई में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। वहीं 98 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि कम से कम मध्यम स्तर या उससे बेहतर रह सकती है।

    रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति को लेकर अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को अगले एक वर्ष में बेरोजगारी दर में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि 17 प्रतिशत विशेषज्ञ बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत इसमें कमी आने का अनुमान लगा रहे हैं।

    आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच श्रम बाजार के अपेक्षाकृत स्थिर रहने का संकेत देते हैं। हालांकि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की गति बनाए रखना अभी भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी विशेषज्ञों की चिंता मई के मुकाबले कम हुई है। अगले 12 महीनों को लेकर 55 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मध्यम महंगाई की संभावना जताई है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की आशंका व्यक्त की है। मई में 61 प्रतिशत विशेषज्ञ उच्च या बहुत उच्च महंगाई को लेकर चिंतित थे।

    अगस्त में CPI आधारित खुदरा महंगाई 4.8 प्रतिशत रही। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित दायरे में बनी हुई है।

    मौद्रिक नीति को लेकर 67 प्रतिशत विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत विशेषज्ञों ने नीति के और सख्त होने की संभावना जताई है। अगस्त में RBI ने नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखते हुए तटस्थ रुख कायम रखा था।

    राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत विशेषज्ञों ने बड़े बदलाव की संभावना नहीं जताई। करीब 22 प्रतिशत ने कुछ नरम रुख अपनाए जाने की संभावना व्यक्त की।

    रिपोर्ट का सर्वेक्षण 20 अगस्त को पूरा हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त को जारी पहली तिमाही के GDP आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इस प्रदर्शन के बाद कई वैश्विक संस्थानों ने भारत के विकास अनुमान में बदलाव किया है।

    मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है।

  • 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं के जरिए भारत 2047 तक विकसित देश बनने का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों को मजबूत आधार के रूप में विकसित करने पर सरकार का विशेष जोर है।

    गोयल ने एक आर्थिक सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में देश मजबूत आधार तैयार कर रहा है। उन्होंने इसके लिए आर्थिक स्थिरता, बुनियादी ढांचे के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं को प्रमुख एजेंडा बताया।

    केंद्रीय मंत्री के अनुसार व्यापार, विनिर्माण और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के विस्तार से भारत वैश्विक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।

    गोयल ने वैश्विक स्तर पर साझेदारियों के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य उन्हीं देशों और लोगों का है, जो साझेदारी बनाने की क्षमता रखते हैं। उनके मुताबिक भारत ने विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है और विकसित तथा विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं के साथ सहयोग बढ़ाया है।

    इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निवेश को लेकर गोयल ने कहा कि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर हर साल करीब 12 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। इस निवेश में बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, जलमार्ग और रेलवे जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं।

    उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचा देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ कारोबार और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।

    व्यापार समझौतों का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले वर्षों में कई देशों के साथ द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इन समझौतों से भारतीय घरेलू उद्योग और कारोबारियों के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच के अवसर बढ़े हैं।

    गोयल के अनुसार 2014 से अब तक हुए व्यापार समझौतों के जरिए भारत को कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच मिली है। उन्होंने बताया कि पिछले चार वर्षों में हुए नौ मुक्त व्यापार समझौतों के परिणामस्वरूप भारतीय कारोबारियों को 38 देशों के बाजारों में तरजीही पहुंच मिली है।

    इन देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था का आकार करीब 60 ट्रिलियन डॉलर बताया गया है। इससे भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए निर्यात तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए अवसर उपलब्ध होने की बात कही गई है।

    गोयल ने बताया कि सरकार फिलहाल आठ और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रही है। इन समझौतों के पूरा होने पर भारतीय कारोबारियों को लगभग 15 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त बाजारों में तरजीही पहुंच मिलने की संभावना है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश, व्यापार विस्तार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को साथ लेकर भारत 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • ओडिशा तट से 43 किमी दूर समुद्र में मिली प्राकृतिक गैस, ‘समुद्र मंथन’ अभियान की पहली बड़ी खोज

    ओडिशा तट से 43 किमी दूर समुद्र में मिली प्राकृतिक गैस, ‘समुद्र मंथन’ अभियान की पहली बड़ी खोज


    नई दिल्ली। भारत के अपतटीय ऊर्जा अभियान को बड़ी सफलता मिली है। ओएनजीसी ने ओडिशा तट से करीब 43 किलोमीटर दूर समुद्र में गहरे कुएं से प्राकृतिक गैस की खोज की है। महानदी बेसिन में 18 सितंबर को करीब 1450 मीटर की गहराई पर हुई इस खोज को ‘समुद्र मंथन’ पहल के तहत पहली बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कंपनी के मुताबिक कुएं से पिछले तीन दिनों से लगातार अच्छे प्रवाह और दबाव के साथ गैस निकल रही है।

    इस खोज से भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए घरेलू स्रोत मजबूत होने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कुएं में कुल कितनी गैस उपलब्ध है और यहां से व्यावसायिक स्तर पर कितना उत्पादन संभव होगा। आगे की जांच और मूल्यांकन के बाद ही भंडार की वास्तविक क्षमता तथा व्यावसायिक उपयोगिता का पता चलेगा।

    चार कुओं में सबसे पहले एमडीडब्ल्यू-28 की खुदाई

    गैस की खोज जिस कुएं में हुई है, उसका नाम एमडीडब्ल्यू-28 है। इसकी खुदाई 25 जुलाई को शुरू हुई थी। यह कुआं समुद्र में करीब 770 मीटर गहरे पानी में स्थित है और ओएनजीसी के मौजूदा अभियान के तहत खोदे जाने वाले चार कुओं में पहला है।

    एमडीडब्ल्यू-28 महानदी बेसिन के उस क्षेत्र में आता है, जहां पहले भी गैस की खोज हो चुकी है। यह कुआं ओएनजीसी की 2024 में की गई उत्कल और कोणार्क गैस खोजों से करीब 23 नॉटिकल मील की दूरी पर है।

    आगे जांच के बाद सामने आएगी उत्पादन क्षमता

    ओएनजीसी के सामने अब अगली चुनौती इस खोज की वास्तविक क्षमता का आकलन करना है। इसके लिए आगे तकनीकी जांच की जाएगी, जिससे पता चलेगा कि कुएं से कितनी गैस निकाली जा सकती है और व्यावसायिक उत्पादन आर्थिक रूप से कितना फायदेमंद रहेगा।

    कंपनी ने सोशल मीडिया पर कहा है कि वह गहरे और अत्यंत गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज का अभियान जारी रखेगी। इससे संकेत मिलता है कि महानदी बेसिन में अपतटीय खोज गतिविधियां आगे भी जारी रहने वाली हैं।

    पेट्रोलियम मंत्री ने बताया बड़ी उपलब्धि

    पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस खोज को भारत के अपतटीय खोज कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में पहले मिली अन्य खोजों के साथ इस नए संसाधन को जोड़कर साझा सुविधाओं के माध्यम से विकास की संभावनाएं बन सकती हैं। इससे परियोजनाओं में लागत और समय दोनों कम करने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि, उत्कल और कोणार्क खोजों के कुल भंडार तथा उनकी व्यावसायिक उपयोगिता से जुड़ी विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    महानदी बेसिन में बड़े संसाधन का अनुमान

    ‘समुद्र मंथन’ पहल का उद्देश्य महानदी बेसिन के उन गहरे समुद्री क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की तलाश करना है, जिनकी अभी तक पर्याप्त खोज नहीं हुई है। सरकारी एजेंसी के अनुमान के अनुसार महानदी बेसिन में जमीन पर करीब 45 मिलियन टन और उथले पानी वाले क्षेत्र में करीब 100 मिलियन टन संसाधन मौजूद हो सकते हैं। वहीं, गहरे पानी वाले हिस्से के संसाधनों का अभी आकलन नहीं हुआ है।

    केंद्र सरकार ने जुलाई में ‘समुद्र मंथन’ अभियान को मंजूरी दी थी। इसके लिए 84,084 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया है और यह कार्यक्रम 2030-31 तक चलेगा। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल के जरिए देश के हाइड्रोकार्बन संसाधनों में 600 मिलियन टन से ज्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है।

    महानदी बेसिन में एमडीडब्ल्यू-28 से गैस की खोज ऐसे समय हुई है, जब भारत घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, इस खोज का वास्तविक आर्थिक और ऊर्जा प्रभाव गैस भंडार की मात्रा तथा व्यावसायिक उत्पादन की पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • इंग्लैंड फिर बना नंबर-1, भारत से छीना ICC T20I रैंकिंग का ताज, दोनों के बराबर 269 रेटिंग

    इंग्लैंड फिर बना नंबर-1, भारत से छीना ICC T20I रैंकिंग का ताज, दोनों के बराबर 269 रेटिंग


    नई दिल्ली। इंग्लैंड ने श्रीलंका के खिलाफ तीसरे टी20 में 8 विकेट से शानदार जीत दर्ज कर सीरीज 3-0 से अपने नाम कर ली। इस जीत के साथ ही इंग्लैंड ने ICC T20I टीम रैंकिंग में भी भारत को पीछे छोड़ते हुए नंबर-1 की कुर्सी हासिल कर ली। हालांकि भारत और इंग्लैंड दोनों के खाते में 269-269 रेटिंग हैं, लेकिन ताजा रैंकिंग में इंग्लैंड पहले और भारत दूसरे स्थान पर है। खास बात यह है कि इंग्लैंड के कप्तान हैरी ब्रूक ने दो दिन पहले ही नंबर-1 बनने की इच्छा जताई थी और श्रीलंका के खिलाफ जीत के साथ उनकी टीम ने यह उपलब्धि हासिल कर ली।

    कुछ महीनों में दूसरी बार भारत से छीना पहला स्थान

    इंग्लैंड ने पिछले कुछ महीनों में दूसरी बार ICC T20I रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया है। भारतीय टीम के यूके दौरे के दौरान उसे आयरलैंड के खिलाफ 0-2 और इंग्लैंड के खिलाफ 0-4 से हार का सामना करना पड़ा था। लगातार छह मुकाबलों में मिली इन हार का असर टीम इंडिया की रैंकिंग पर भी पड़ा और इंग्लैंड ने भारत को सीरीज में क्लीन स्वीप करने के बाद पहली बार नंबर-1 की पोजिशन हासिल की थी।

    इसके बाद भारतीय टीम ने जिम्बाब्वे का दौरा किया और वहां प्रदर्शन के दम पर दोबारा रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। अब श्रीलंका के खिलाफ इंग्लैंड की 3-0 से सीरीज जीत ने एक बार फिर समीकरण बदल दिया है और भारत को दूसरे स्थान पर जाना पड़ा है।

    भारत के पास फिर नंबर-1 बनने का मौका

    टीम इंडिया के पास जल्द ही रैंकिंग में वापसी का मौका होगा। भारत का अगला टी20 मुकाबला 22 सितंबर को जापान के खिलाफ होना है। इस मैच में जीत के साथ भारतीय टीम एक बार फिर नंबर-1 की स्थिति हासिल करने की कोशिश करेगी।

    इसके अलावा टीम इंडिया को एशियन गेम्स में भी हिस्सा लेना है। श्रेयस अय्यर की अगुवाई वाली भारतीय टीम की नजरें इस टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतने के साथ अपनी T20I रैंकिंग की स्थिति मजबूत करने पर भी रहेंगी।

    श्रीलंका को 124 रन पर समेटा

    तीसरे टी20 में टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी श्रीलंका की टीम इंग्लैंड के गेंदबाजों के सामने बड़ा स्कोर खड़ा नहीं कर सकी। पूरी टीम 18.5 ओवर में 124 रन पर ऑलआउट हो गई। पथुम निसंका ने 36 और कमिंदु मेंडिस ने 35 रन बनाए। इनके अलावा श्रीलंकाई कप्तान चरिथ असलंका ही 15 रन का आंकड़ा पार कर सके।

    इंग्लैंड की ओर से जोफ्रा आर्चर, सोनी बेकर और विल जैक्स ने 2-2 विकेट चटकाए। इंग्लैंड के गेंदबाजी आक्रमण के सामने श्रीलंकाई बल्लेबाज लगातार दबाव में रहे और टीम 20 ओवर भी पूरा नहीं खेल सकी।

    बटलर ने 32 गेंदों में ठोके 62 रन

    125 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम ने मुकाबले को एकतरफा बना दिया। जोस बटलर ने सिर्फ 32 गेंदों पर 7 चौकों और 2 छक्कों की मदद से 62 रन की तूफानी पारी खेली। कप्तान हैरी ब्रूक ने 33 रन बनाकर उनका अच्छा साथ दिया।

    इंग्लैंड ने महज 9.4 ओवर में 2 विकेट खोकर 125 रन का लक्ष्य हासिल कर लिया। इस जीत के साथ उसने श्रीलंका के खिलाफ तीन मैचों की सीरीज में 3-0 से क्लीन स्वीप किया और इसके साथ ही ICC T20I टीम रैंकिंग में भी भारत को पीछे छोड़कर नंबर-1 स्थान पर कब्जा कर लिया।

  • US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित

    US में ब्याज दरें बढ़ने का भारत में भी दिखेगा असर… रुपया, सोना और शेयर बाजार होगा प्रभावित


    नई दिल्ली।
    करीब तीन साल के अंतराल के बाद अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (American Central bank Federal Reserve) ने ब्याज दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है, जिससे ब्याज दरें (Interest rates) 3.75 से 4% तक पहुंच गई हैं। फेडरल रिजर्व के इस रुख के बाद दुनियाभर के बाजारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। इसका सबसे तगड़ा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत (India) पर बिल्कुल साफ दिखेगा।

    अमेरिकी दरें बढ़ने से डॉलर इंडेक्स मजबूत होकर एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसके दबाव में रुपया कमजोर होकर 95 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। रुपये की इस कमजोरी से आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा है।


    विदेशी निवेशकों की निकासी

    अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से वैश्विक निवेशक सुरक्षित अमेरिकी संपत्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली और तेज हो सकती है। इस साल अब तक एफपीआई भारतीय बाजार से 2.41 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाल चुके हैं। इस फैसले से सोने की चमक पर भी अल्पकालिक दबाव के आसार हैं। 


    आपकी जेब पर क्या होगा असर?

    बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाएगा, जिसके चलते वे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे। जिन लोगों के लोन फ्लोटिंग रेट पर हैं, उनकी मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी, जिससे आम जनता के पास खर्च करने योग्य आय कम हो जाएगी। कर्ज लेने वालों के लिए जहां यह बुरी खबर होगी, वहीं बचत करने वाले सीनियर सिटीजन और निवेशकों को बैंक एफडी पर पहले से बेहतर ब्याज मिलना शुरू हो जाएगा।


    क्या आरबीआई बढ़ाएगा ब्याज दरें?

    जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी नीतिगत दरों में बदलाव करता है, तो आरबीआई ब्याज दर के अंतर, पूंजी प्रवाह और मुद्रा बाजारों पर पड़ने वाले प्रभाव पर करीब से नजर रखता है। हालांकि, आरबीआई के नीतिगत फैसले घरेलू महंगाई, विकास और अन्य आर्थिक स्थितियों से भी तय होते हैं। घरेलू मुद्रास्फीति का दबाव बना हुआ है, ऐसे में आरबीआई को पूंजी की निकासी और मुद्रा की स्थिरता को लेकर अतिरिक्त बातों पर विचार करना पड़ सकता है।

    एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेस का मानना है कि देश में महंगाई के दबाव को देखते हुए अक्तूबर में होने वाली समीक्षा बैठक में आरबीआई 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। एचडीएफसी बैंक का मानना है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार कर सकता है ताकि यह पूरी तरह स्पष्ट हो सके कि महंगाई का दबाव कितना व्यापक और टिकाऊ है।

  • रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    नई दिल्ली । अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।

  • अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    नई दिल्ली ।अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।

  • भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उप-प्रबंध निदेशक नाइजेल क्लार्क ने कहा है कि भारत के पास दुनिया की आर्थिक वृद्धि की अगली बड़ी लहर का नेतृत्व करने की क्षमता है। पांच दिवसीय भारत यात्रा पूरी करने के बाद जारी उनके बयान में देश की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र की प्रगति और बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को इसकी प्रमुख वजह बताया गया।

    क्लार्क ने अपनी यात्रा के दौरान नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। आईएमएफ में उप-प्रबंध निदेशक का पद संभालने के बाद यह उनकी भारत की पहली यात्रा थी। इस दौरान उन्होंने वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी से मुलाकात की।

    क्लार्क ने कहा कि भारत दुनिया की अगली आर्थिक वृद्धि को गति देने की क्षमता रखता है और आईएमएफ इस यात्रा में देश का करीबी साझेदार बना रहेगा। उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताया और वैश्विक आर्थिक विकास में देश की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

    उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक आधार और अच्छी नीतियों के कारण भारत वैश्विक विकास के प्रमुख इंजनों में बना हुआ है। भारतीय नीति-निर्माताओं के साथ हुई बातचीत में देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और टिकाऊ तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा हुई।

    क्लार्क के मुताबिक, दुनिया में बढ़ती अनिश्चितताओं और बदलते जोखिमों के बीच आर्थिक स्थिरता और मजबूती बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नीतियों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाए रखने, महंगाई को नियंत्रण में रखने तथा ऐसे सुधार आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई, जो उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर सकें।

    उन्होंने मध्यम अवधि में तेज आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया। साथ ही क्लार्क ने भारत सरकार को बहुपक्षीय सहयोग का समर्थन करने और क्षेत्र के अन्य देशों की मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।

    भारत यात्रा के दौरान आईएमएफ के उप-प्रबंध निदेशक ने उद्योग जगत के कई नेताओं और कारोबारियों से भी मुलाकात की। इन बैठकों का उद्देश्य यह समझना था कि देश का निजी क्षेत्र आर्थिक प्रगति में किस तरह योगदान दे रहा है।

    क्लार्क ने भारतीय निजी क्षेत्र की ऊर्जा और देश में मौजूद प्रतिभाओं की सराहना की। उन्होंने तेजी से विकसित हो रही तकनीकी और विनिर्माण क्षमताओं को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, भारत में निजी क्षेत्र की गतिविधियां आर्थिक विकास की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    उन्होंने नवाचार, डिजिटल बदलाव, उन्नत विनिर्माण और नई तकनीकों को अपनाने को उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों के रूप में रेखांकित किया। क्लार्क के मुताबिक इन क्षेत्रों में प्रगति से प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है और अधिक मूल्य वाले आर्थिक कार्यों को बढ़ावा मिल सकता है।

    उनकी यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं में भारत की आर्थिक मजबूती के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों के बीच विकास को टिकाऊ बनाए रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया गया। क्लार्क ने कहा कि आईएमएफ भारत के साथ साझेदारी जारी रखेगा और देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े प्रयासों में करीबी सहयोगी बना रहेगा।