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  • BRICS कृषि एजेंडे में ब्राजील सबसे आगे, 88% वादों पर अमल; भारत 85% के साथ दूसरे स्थान पर

    BRICS कृषि एजेंडे में ब्राजील सबसे आगे, 88% वादों पर अमल; भारत 85% के साथ दूसरे स्थान पर


    मध्यप्रदेश । इंदौर में संपन्न हुई BRICS कृषि मंत्रियों की बैठक के बाद जारी इंदौर घोषणा-पत्र और विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि कृषि क्षेत्र में किए गए वादों और संकल्पों को लागू करने की गति सभी सदस्य देशों में समान नहीं रही। खाद्य सुरक्षा, डिजिटल कृषि, महिला सशक्तिकरण, भूमि पुनरुद्धार और कृषि व्यापार जैसे प्रमुख मुद्दों पर बीते पांच वर्षों में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए, लेकिन उनके क्रियान्वयन में देशों के बीच उल्लेखनीय अंतर देखने को मिला।

    विश्लेषण के अनुसार कृषि प्रतिबद्धताओं को लागू करने के मामले में Brazil सबसे आगे रहा। रिपोर्ट में ब्राजील का अमल स्तर 88 प्रतिशत बताया गया है। ब्राजील ने भूमि पुनरुद्धार साझेदारी, पारिवारिक खेती को बढ़ावा देने और नए कृषि एक्शन प्लान को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई। कृषि सुधारों और सतत विकास आधारित योजनाओं को लागू करने में उसकी सक्रियता अन्य सदस्य देशों की तुलना में अधिक रही।

    दूसरे स्थान पर India रहा, जहां कृषि क्षेत्र में 85 प्रतिशत प्रतिबद्धताओं पर अमल का दावा किया गया है। भारत में डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन, ड्रोन तकनीक का उपयोग, जलवायु अनुकूल गांवों का विकास, कृषि डिजिटलीकरण और महिला आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं को BRICS एजेंडे के अनुरूप माना गया। “लखपति दीदी” जैसी पहल और तकनीक आधारित खेती के प्रयासों ने भारत की स्थिति को मजबूत किया, हालांकि कुछ क्षेत्रों में प्रगति अपेक्षाकृत धीमी बताई गई है।

    तीसरे स्थान पर China रहा, जिसने खाद्य सुरक्षा, कृषि अनुसंधान और डिजिटल कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। खाद्य सुरक्षा सहयोग रणनीति और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने में चीन की भूमिका प्रमुख रही। वहीं Russia 80 प्रतिशत अमल के साथ चौथे स्थान पर रहा। रूस ने BRICS ग्रेन एक्सचेंज और राष्ट्रीय मुद्राओं में कृषि व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की, हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण कुछ सहयोगी कार्यक्रम प्रभावित हुए।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि South Africa और BRICS के नए सदस्य देशों की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रही। दक्षिण अफ्रीका का अमल स्तर 65 प्रतिशत आंका गया, जबकि नए सदस्य देशों का औसत प्रदर्शन 45 प्रतिशत के आसपास रहा। नए सदस्य देशों में United Arab Emirates, Egypt, Iran, Ethiopia, Saudi Arabia और Indonesia शामिल हैं। इनके लिए वर्ष 2024 और 2025 की कृषि प्रतिबद्धताओं को आधार बनाकर आकलन किया गया।

    पिछले पांच वर्षों के दौरान BRICS देशों ने कई महत्वपूर्ण कृषि निर्णय लिए। वर्ष 2021 में भारत की अध्यक्षता के दौरान खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और छोटे किसानों को सशक्त बनाने पर केंद्रित एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई। 2022 में चीन की मेजबानी में खाद्य सुरक्षा सहयोग रणनीति और “डेक्कन प्रिंसिपल्स ऑन फूड सिक्योरिटी” को अपनाया गया। 2023 में दक्षिण अफ्रीका ने ग्रामीण विकास और जलवायु अनुकूल कृषि को प्राथमिकता दी। 2024 में रूस ने ग्रेन एक्सचेंज और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का प्रस्ताव रखा, जबकि 2025 में ब्राजील ने भूमि पुनरुद्धार साझेदारी और डिजिटल प्रमाणन जैसे नए प्रस्तावों को आगे बढ़ाया।

    हालांकि रिपोर्ट में BRICS की एक प्रमुख कमजोरी भी उजागर हुई है। संगठन का ढांचा पूरी तरह स्वैच्छिक है और सदस्य देशों के लिए किसी भी निर्णय को लागू करना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसके अलावा प्रगति की निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र तंत्र भी मौजूद नहीं है। अधिकांश मूल्यांकन सदस्य देशों की स्वयं प्रस्तुत रिपोर्टों, संयुक्त घोषणाओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर किए जाते हैं। यही कारण है कि कई बार घोषित लक्ष्यों और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर देखने को मिलता है।

  • वैश्विक अनिश्चितता और रुपये की कमजोरी के बीच FPI की बड़ी बिकवाली, भारतीय बाजार से रिकॉर्ड पूंजी निकासी जारी

    वैश्विक अनिश्चितता और रुपये की कमजोरी के बीच FPI की बड़ी बिकवाली, भारतीय बाजार से रिकॉर्ड पूंजी निकासी जारी

    नई दिल्ली । वर्ष 2026 में भारतीय शेयर बाजार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली के दबाव से गुजर रहा है। वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बढ़ती अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, प्रमुख केंद्रीय बैंकों की नीतियों को लेकर असमंजस और रुपये में जारी कमजोरी के कारण विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से बड़े पैमाने पर पूंजी निकाली है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जून के मध्य तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.87 लाख करोड़ रुपये की निकासी कर चुके हैं, जो पिछले पूरे वर्ष के मुकाबले भी काफी अधिक है।

    साल की शुरुआत से ही विदेशी निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है। जनवरी में उल्लेखनीय बिकवाली दर्ज की गई, जबकि फरवरी ऐसा एकमात्र महीना रहा जब विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में शुद्ध निवेश किया। इसके बाद मार्च में निकासी का आंकड़ा तेजी से बढ़ा और अप्रैल तथा मई में भी यह क्रम जारी रहा। जून के शुरुआती दिनों में भी विदेशी निवेशकों ने बाजार से बड़ी रकम निकाली, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि वैश्विक निवेशक फिलहाल जोखिम वाले निवेशों के प्रति सावधानी बरत रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी आर्थिक चुनौतियां निवेशकों की रणनीति को प्रभावित कर रही हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, वैश्विक विकास दर को लेकर चिंताएं और अमेरिका सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की मौद्रिक नीतियों से जुड़ी अनिश्चितता निवेशकों के विश्वास को प्रभावित कर रही है। ऐसे माहौल में कई वैश्विक फंड प्रबंधक अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसंपत्तियों और विकसित बाजारों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    भारतीय बाजार के मूल्यांकन को लेकर भी विदेशी निवेशकों में सतर्कता देखी जा रही है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय शेयरों का मूल्यांकन अपेक्षाकृत ऊंचा बना हुआ है। ऐसे में कई निवेशक बेहतर जोखिम-प्रतिफल अनुपात वाले विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसके अलावा रुपये में लगातार कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के वास्तविक रिटर्न को प्रभावित कर रही है, जिससे इक्विटी बाजार में निवेश का आकर्षण कम हुआ है।

    हालांकि शेयर बाजार से निकासी के बीच एक अलग रुझान भी सामने आया है। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बॉन्ड बाजार में रुचि बनाए रखी है। जून के पहले पखवाड़े में बॉन्ड प्रतिभूतियों में उल्लेखनीय निवेश दर्ज किया गया। वर्ष 2026 के दौरान भी निश्चित आय वाले निवेश साधनों में विदेशी पूंजी का प्रवाह जारी रहा है। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक भारत की अर्थव्यवस्था से पूरी तरह दूरी नहीं बना रहे हैं, बल्कि अपेक्षाकृत स्थिर और कम जोखिम वाले निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में विदेशी निवेशकों की रणनीति कई वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। अमेरिका की मौद्रिक नीति, प्रमुख केंद्रीय बैंकों के ब्याज दर संबंधी फैसले, वैश्विक मुद्रास्फीति की स्थिति और भू-राजनीतिक घटनाएं निवेश प्रवाह की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यदि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होती है और भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत वृद्धि दर बनाए रखती है, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत हो सकता है।

    फिलहाल निवेशकों और बाजार सहभागियों की नजर विदेशी निवेश प्रवाह पर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि एफपीआई की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा और निवेशकों की धारणा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेंगी। मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों के लिए सतर्कता, विविधीकरण और दीर्घकालिक निवेश दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • इस सप्ताह शेयर बाजार के लिए अहम होंगे WPI आंकड़े और फेड का फैसला, विदेशी निवेशकों की चाल पर भी रहेगी नजर

    इस सप्ताह शेयर बाजार के लिए अहम होंगे WPI आंकड़े और फेड का फैसला, विदेशी निवेशकों की चाल पर भी रहेगी नजर

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए नया कारोबारी सप्ताह कई महत्वपूर्ण घरेलू और वैश्विक घटनाक्रमों के बीच शुरू होने जा रहा है। निवेशकों की नजर इस बार केवल कंपनियों के प्रदर्शन या आर्थिक संकेतकों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि महंगाई के आंकड़ों, अमेरिकी केंद्रीय बैंक के ब्याज दर संबंधी फैसले, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर भी विशेष ध्यान रहेगा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में इन कारकों का संयुक्त प्रभाव निवेशकों की रणनीति और बाजार की दिशा तय कर सकता है।

    घरेलू स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में मई महीने के थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई के आंकड़े शामिल हैं। ये आंकड़े यह संकेत देंगे कि उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी लागतों में किस प्रकार का बदलाव देखने को मिल रहा है। महंगाई की स्थिति का असर उद्योगों की लागत, कंपनियों की लाभप्रदता और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है, इसलिए निवेशक इन आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करेंगे।

    वैश्विक स्तर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक इस सप्ताह का सबसे बड़ा घटनाक्रम मानी जा रही है। निवेशकों की नजर केवल ब्याज दरों पर नहीं होगी, बल्कि फेडरल रिजर्व की भविष्य की नीति, महंगाई को लेकर उसके दृष्टिकोण और आर्थिक वृद्धि के अनुमान पर भी रहेगी। यदि केंद्रीय बैंक आगामी महीनों में ब्याज दरों में बदलाव के संकेत देता है तो इसका प्रभाव वैश्विक पूंजी प्रवाह और उभरते बाजारों की निवेश धारणा पर पड़ सकता है।

    इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उत्सुकता बनी हुई है। यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है और क्षेत्र में स्थिरता बढ़ती है तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे सकता है। विशेष रूप से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए सकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि इससे आयात बिल और महंगाई के दबाव में कमी आ सकती है।

    विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से लगातार निकासी देखी गई है। बड़ी मात्रा में पूंजी निकासी का असर बाजार की तरलता और निवेशकों के भरोसे पर पड़ता है। ऐसे में निवेशक यह देखना चाहेंगे कि वैश्विक परिस्थितियों और फेडरल रिजर्व के निर्णय के बाद विदेशी निवेशकों का रुख बदलता है या नहीं।

    मॉनसून की प्रगति भी घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। सामान्य और संतुलित वर्षा कृषि उत्पादन को समर्थन देती है, जिससे ग्रामीण मांग मजबूत होती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। इसी कारण कृषि, उपभोक्ता और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी।

    पिछले सप्ताह घरेलू शेयर बाजार ने मजबूत प्रदर्शन किया था और प्रमुख सूचकांकों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई थी। बाजार को समर्थन देने वाले प्रमुख कारणों में वैश्विक स्तर पर तनाव कम होने की उम्मीद और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी शामिल रही। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी सप्ताह में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है क्योंकि निवेशक विभिन्न आर्थिक संकेतकों और वैश्विक घटनाओं के आधार पर अपने निवेश निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन करेंगे।

    कुल मिलाकर, यह सप्ताह भारतीय शेयर बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। घरेलू आर्थिक आंकड़े, वैश्विक मौद्रिक नीति, तेल बाजार की दिशा और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां मिलकर बाजार की आगामी चाल को निर्धारित कर सकती हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए हर प्रमुख घटनाक्रम पर सतर्क नजर बनाए रखना आवश्यक होगा।

  • सिंधु जल संधि पर भारत की सख्ती का असर, पाकिस्तान के एक तिहाई हिस्से में गहराया जल संकट, सिंध-बलूचिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा

    सिंधु जल संधि पर भारत की सख्ती का असर, पाकिस्तान के एक तिहाई हिस्से में गहराया जल संकट, सिंध-बलूचिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा

    नई दिल्ली । भारत द्वारा सिंधु जल संधि पर रोक लगाए जाने के बाद पाकिस्तान के कई हिस्सों में जल संकट गहराता दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में पानी की उपलब्धता लगातार घटने से कृषि गतिविधियों, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जल प्रबंधन व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस संकट के प्रभाव को महसूस कर रही है।

    पिछले एक वर्ष के दौरान पानी की आपूर्ति में आई कमी ने पाकिस्तान के उन क्षेत्रों की चिंताएं बढ़ा दी हैं जो लंबे समय से सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर रहे हैं। सिंध प्रांत, जिसे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। कराची सहित कई प्रमुख इलाकों में जल उपलब्धता को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है और विशेषज्ञ भविष्य में स्थिति और गंभीर होने की आशंका जता रहे हैं।

    जल संकट का सबसे बड़ा असर खेती-किसानी पर दिखाई दे रहा है। सिंध और बलूचिस्तान के विशाल कृषि क्षेत्र सिंचाई के लिए नहरों और बैराजों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। पानी की कमी के कारण फसलों की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। किसानों के सामने सिंचाई व्यवस्था बनाए रखना चुनौती बनती जा रही है, जिससे कृषि आधारित आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    सिंधु नदी पर स्थित सुक्कुर बैराज के आसपास की स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय बनी हुई है। यह बैराज लाखों एकड़ कृषि भूमि तक पानी पहुंचाने वाली प्रमुख नहर प्रणाली का आधार माना जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कई प्रमुख नहरों में जल प्रवाह सामान्य स्तर से काफी नीचे पहुंच गया है। इससे खेतों तक पानी पहुंचाने की क्षमता प्रभावित हुई है और कई इलाकों में सिंचाई कार्यक्रमों को पुनर्गठित करना पड़ रहा है।

    जल संकट के बीच पाकिस्तान के भीतर प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद भी तेज हो गया है। सिंध प्रशासन ने आरोप लगाया है कि पंजाब अपने निर्धारित हिस्से से अधिक पानी का उपयोग कर रहा है। इस मुद्दे ने पहले से मौजूद राजनीतिक और प्रशासनिक तनाव को और बढ़ा दिया है। जल वितरण को लेकर उठ रहे सवालों ने संघीय स्तर पर संसाधनों के प्रबंधन की चुनौती को भी सामने ला दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पानी की उपलब्धता में जल्द सुधार नहीं हुआ तो कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और स्थानीय रोजगार पर व्यापक असर पड़ सकता है। सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में बड़ी आबादी की आजीविका सीधे कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर आधारित है। ऐसे में जल संकट केवल प्राकृतिक संसाधन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा विषय बन चुका है।

    इस बीच भारत की ओर से यह संकेत मिले हैं कि आतंकवाद और सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उसके रुख में कोई बदलाव नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए जल प्रबंधन, संसाधनों के बेहतर उपयोग और आंतरिक वितरण व्यवस्था को प्रभावी बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल माना जा रहा है।

  • भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    भारत और केन्या ने मजबूत आर्थिक सहयोग का खाका तैयार किया, व्यापार, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र पर विशेष फोकस

    नई दिल्ली । भारत और केन्या के बीच आर्थिक, व्यापारिक और विकास सहयोग को नई दिशा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली है। दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच हालिया बैठकों में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल, ऊर्जा और निवेश जैसे प्रमुख क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाने पर व्यापक चर्चा की गई। इस दौरान भविष्य में सहयोग के नए अवसरों की पहचान करने और निवेश को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।

    भारत और केन्या के बीच लंबे समय से मजबूत राजनयिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। हाल के संवादों में दोनों देशों ने इस संबंध को और व्यापक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेष रूप से कृषि और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्र को सहयोग का प्रमुख आधार माना गया, जहां भारतीय तकनीक, विशेषज्ञता और निवेश के माध्यम से स्थानीय उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

    स्वास्थ्य क्षेत्र भी चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। दोनों पक्षों ने गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, चिकित्सा अवसंरचना के विकास और स्वास्थ्य तकनीकों के आदान-प्रदान की संभावनाओं पर विचार किया। भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र की विशेषज्ञता और दवा उद्योग की वैश्विक पहचान को देखते हुए इस क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं काफी व्यापक मानी जा रही हैं।

    शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने साझेदारी को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की। आधुनिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया। दोनों देशों का मानना है कि मानव संसाधन विकास भविष्य की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

    खेल क्षेत्र में भी सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। खेल प्रशिक्षण, खेल अवसंरचना और प्रतिभा विकास कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों के बीच अनुभवों और संसाधनों के आदान-प्रदान की संभावनाएं तलाशने पर सहमति बनी। इससे युवाओं के लिए नए अवसर तैयार हो सकते हैं और खेल संबंधों को भी मजबूती मिल सकती है।

    इस बीच, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के प्रयास भी जारी हैं। व्यापारिक बैठकों के दौरान बाजार पहुंच को बेहतर बनाने, व्यापारिक बाधाओं को कम करने और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक संबंधों को अधिक संतुलित, विविधतापूर्ण और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए।

    ऊर्जा क्षेत्र, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहा। स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं, तकनीकी सहयोग और निवेश के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इसके अलावा डिजिटल अवसंरचना, फिनटेक, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण और बुनियादी ढांचा विकास जैसे क्षेत्रों को भी भविष्य की साझेदारी के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में देखा जा रहा है।

    दोनों देशों ने व्यापार को सुगम बनाने और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी सकारात्मक कदम उठाए हैं। सीमा शुल्क और व्यापारिक सूचनाओं के आदान-प्रदान से जुड़े समझौतों को द्विपक्षीय व्यापार की पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और केन्या के बीच बढ़ता सहयोग न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि अफ्रीका और एशिया के बीच आर्थिक संपर्क को भी नई मजबूती देगा। आने वाले वर्षों में निवेश, व्यापार और विकास साझेदारी के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और अधिक गहरे होने की संभावना है।

  • Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी

    Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी


    माले।
    भारत (India) ने अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति (‘Neighbourhood First’ policy) को दोहराते हुए, मालदीव (Maldives) में फैले खसरे (Measles) के प्रकोप से निपटने के लिए उसे बड़ी मात्रा में चिकित्सा सहायता (Medical Assistance) भेजी है। भारत ने मालदीव में खसरे के बढ़ते मामलों से निपटने और वहां टीकाकरण को मजबूत करने में मदद के लिए खसरे के टीके की 20,000 खुराक और लगभग तीन टन मेडिकल आपूर्ति भेजी है।

    विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बात की पुष्टि की है कि भारत सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा और टीकाकरण को मजबूत करने के लिए मालदीव की मदद कर रही है। भेजी गई सहायता में शामिल हैं:

    – 20,000 एमआर (Measles-Rubella) वैक्सीन की खुराकें: ताकि बीमारी के प्रसार को तुरंत रोका जा सके।
    – 3 टन का मेडिकल कंसाइनमेंट: इसमें आवश्यक दवाइयां, सिरिंज, डायग्नोस्टिक किट और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री शामिल हैं।
    – विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, यह समय पर दी गई सहायता मालदीव सरकार को खसरे के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने और उनकी प्रतिक्रिया क्षमताओं को बढ़ाने में काफी मदद करेगी।


    कूटनीतिक संबंध और ‘विजन महासागर’

    मालदीव का भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और ‘विजन महासागर’ में एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों देशों के लोगों के आपसी लाभ और साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए भारत, मालदीव सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहा है। संकट के समय में सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाना भारत की इसी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है।


    मालदीव में खसरे की वापसी: एक चिंता का विषय

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2021 में इस बात की पुष्टि की थी कि मालदीव ने खसरे का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया है। एक बार बीमारी को खत्म करने के बाद, देश में इस नए प्रकोप का सामने आना एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, जिससे निपटने के लिए अब तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।


    खसरा क्या है और इसके लक्षण क्या हैं?

    खसरा एक बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से बच्चों को अपना शिकार बनाती है। यह संक्रमित व्यक्ति की नाक, मुंह या गले से निकलने वाली बूंदों के जरिए हवा में फैलता है। संक्रमण के 10-12 दिन बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इनमें तेज बुखार, नाक बहना, आंखें लाल होना और मुंह के अंदर छोटे सफेद धब्बे पड़ना शामिल हैं। कुछ दिनों के बाद शरीर पर लाल दाने उभरने लगते हैं, जो चेहरे और ऊपरी गर्दन से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे शरीर में नीचे की ओर फैल जाते हैं।


    खसरा उन्मूलन का वैश्विक महत्व

    WHO और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खसरे के उन्मूलन से व्यापक स्तर पर जीवन रक्षक प्रभाव पड़ते हैं। इस क्षेत्र में उन्मूलन रणनीतियों से हर साल खसरे के कम से कम 11 लाख मामलों को रोका जा सकता है। रोके गए हर एक मामले से व्यक्ति के लगभग 2 सप्ताह के ‘विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष’ (DALYs) को बचाया जा सकता है।


    मृत्यु दर में कमी

    2020-2023 के दौरान विभिन्न रणनीतियों के संयोजन से खसरे के कारण होने वाली लगभग 11 लाख मौतों को टाला गया है। प्रति मृत्यु को टालने के लिए औसत खर्च मात्र 1,373 अमेरिकी डॉलर आंका गया है, जो इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण को सबसे प्रभावी और जरूरी स्वास्थ्य निवेश बनाता है।

  • भारत से कारोबार समेटने का बड़ा फैसला, अमेरिकी टेक कंपनी के कदम से सैकड़ों कर्मचारियों पर रोजगार संकट

    भारत से कारोबार समेटने का बड़ा फैसला, अमेरिकी टेक कंपनी के कदम से सैकड़ों कर्मचारियों पर रोजगार संकट


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक कारोबारी माहौल में तेजी से हो रहे बदलाव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग के बीच एक प्रमुख अमेरिकी डिजिटल रियल एस्टेट कंपनी ने भारत में अपना संचालन बंद करने का फैसला किया है। कंपनी के इस निर्णय से सैकड़ों कर्मचारियों के रोजगार पर प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है। यह कदम वैश्विक कंपनियों द्वारा अपने परिचालन ढांचे को नए सिरे से व्यवस्थित करने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी दर्शाता है।

    कंपनी ने अपने कर्मचारियों को भेजे संदेश में स्पष्ट किया है कि भारत में परिचालन समाप्त करने का निर्णय किसी कर्मचारी के प्रदर्शन से जुड़ा नहीं है। इसके बजाय यह व्यापक कारोबारी पुनर्गठन और संचालन मॉडल में बदलाव की रणनीति का हिस्सा है। कंपनी का मानना है कि उसके अधिकांश ग्राहक अमेरिका में स्थित हैं, इसलिए उनसे जुड़े परिचालन कार्यों को उसी क्षेत्र में संचालित करना अधिक प्रभावी और व्यावहारिक होगा।

    पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक कंपनियों ने लागत नियंत्रण और दक्षता बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों में बड़ी परिचालन टीमें तैयार की थीं। हालांकि अब तकनीकी विकास, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग ने कई पारंपरिक प्रक्रियाओं को सरल बना दिया है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता पहले की तुलना में कम होती जा रही है। यही कारण है कि कई कंपनियां अपने वैश्विक संचालन मॉडल की समीक्षा कर रही हैं और संसाधनों का पुनर्वितरण कर रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी क्षेत्र में यह बदलाव केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में कई संगठन अपने कार्य संचालन को अधिक केंद्रीकृत और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे एक ओर उत्पादकता और लागत नियंत्रण में मदद मिल रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक परिचालन भूमिकाओं में कार्यरत कर्मचारियों के लिए नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।

    कंपनी ने प्रभावित कर्मचारियों के लिए संक्रमण सहायता उपलब्ध कराने की बात कही है। इसके तहत वित्तीय सहायता, करियर मार्गदर्शन और नई नौकरी तलाशने में सहयोग जैसी व्यवस्थाएं शामिल की जा सकती हैं। कुछ कर्मचारियों को संक्रमण प्रक्रिया पूरी होने तक सीमित अवधि के लिए कार्य जारी रखने का अवसर भी दिया जा सकता है, ताकि संचालन बंद करने की प्रक्रिया व्यवस्थित ढंग से पूरी हो सके।

    रोजगार विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में तकनीकी कौशल, डेटा विश्लेषण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल संचालन से जुड़ी विशेषज्ञताओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्रभावित कर्मचारियों के लिए नए अवसरों की संभावनाएं भी मौजूद हैं, बशर्ते वे बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुरूप अपने कौशल का विकास करें।

    भारतीय पेशेवरों की वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान को देखते हुए उद्योग जगत का मानना है कि प्रतिभाशाली कर्मचारियों के लिए नए अवसरों की कमी नहीं होगी। हालांकि इस तरह के फैसले यह संकेत जरूर देते हैं कि भविष्य का रोजगार बाजार पारंपरिक कार्यप्रणालियों की तुलना में अधिक तकनीक आधारित और परिणाम केंद्रित होने जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में कंपनियां लागत, दक्षता और तकनीकी नवाचार के संतुलन पर अधिक ध्यान देंगी। ऐसे में वैश्विक कार्यबल को भी लगातार बदलती कारोबारी जरूरतों के अनुरूप स्वयं को तैयार करना होगा। भारत जैसे बड़े प्रतिभा केंद्र के लिए यह बदलाव चुनौती के साथ-साथ नए अवसरों का संकेत भी माना जा रहा है।

  • वैश्विक वीजा कार्यक्रमों में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी, उच्च कौशल और बेहतर वेतन ने बढ़ाई पहचान

    वैश्विक वीजा कार्यक्रमों में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी, उच्च कौशल और बेहतर वेतन ने बढ़ाई पहचान


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक रोजगार बाजार में भारतीय पेशेवरों की मजबूत उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। दुनिया के प्रमुख वीजा कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय भर्ती रुझानों से जुड़े हालिया आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत अब कुशल प्रतिभाओं का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों की बढ़ती मांग ने देश की वैश्विक पहचान को और मजबूत किया है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वीजा कार्यक्रमों में शीर्ष स्थानों पर बना हुआ है। अमेरिका के उच्च कौशल वाले पेशेवरों के लिए बनाए गए वीजा कार्यक्रम में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। वहीं ब्रिटेन और यूरोप के प्रमुख कौशल आधारित वीजा कार्यक्रमों में भी भारतीय पेशेवर बड़ी संख्या में शामिल हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वैश्विक कंपनियां तकनीकी और पेशेवर दक्षता के मामले में भारतीय प्रतिभाओं पर लगातार भरोसा जता रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेजी से हो रहे डिजिटल परिवर्तन ने भारतीय पेशेवरों की मांग को नई ऊंचाई दी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, डेटा एनालिटिक्स और सॉफ्टवेयर विकास जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित कार्यबल की कमी कई विकसित देशों के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में भारत इस आवश्यकता को पूरा करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो गया है।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अब केवल कम लागत के आधार पर भर्ती नहीं कर रही हैं। इसके बजाय वे विशेष कौशल और विशेषज्ञता रखने वाले कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए अधिक वेतन देने को तैयार हैं। कई देशों में वीजा धारक पेशेवरों की औसत आय स्थानीय कर्मचारियों के बराबर या उससे अधिक दर्ज की गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजार में प्रतिभा की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

    खाड़ी देशों में भी भारतीय पेशेवरों की मजबूत मौजूदगी देखने को मिल रही है। विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात भारतीयों के लिए सबसे बड़े रोजगार और व्यवसायिक केंद्रों में शामिल है। यहां विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है और उच्च कौशल वाले पेशेवरों की मांग लगातार बनी हुई है।

    रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में भारतीय प्रतिभाओं की भर्ती में तेज वृद्धि का भी उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी बदलाव, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और वैश्विक कंपनियों की नई जरूरतों ने भारतीय पेशेवरों के लिए अवसरों के नए द्वार खोले हैं। इससे भारत की मानव संसाधन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिल रही है।

    जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों ने भी कुशल विदेशी पेशेवरों को आकर्षित करने के लिए नई नीतियां लागू की हैं। इन योजनाओं का लाभ उठाने वालों में भारतीय नागरिकों की संख्या उल्लेखनीय बताई जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय प्रतिभाएं केवल पारंपरिक गंतव्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नए और उभरते वैश्विक बाजारों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में एक नया रुझान भी देखने को मिल सकता है, जिसमें विदेशों में अनुभव हासिल करने वाले भारतीय पेशेवर देश में उपलब्ध हो रहे बेहतर अवसरों के कारण वापस लौट सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक अनुभव और उन्नत कौशल भारत की अर्थव्यवस्था, नवाचार क्षमता और तकनीकी विकास को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • सोने की चमक पड़ी फीकी! गोल्ड ETF में टूटा लगातार निवेश का सिलसिला, निवेशकों ने की मुनाफावसूली

    सोने की चमक पड़ी फीकी! गोल्ड ETF में टूटा लगातार निवेश का सिलसिला, निवेशकों ने की मुनाफावसूली

    नई दिल्ली । सोने में निवेश को लेकर निवेशकों का रुख मई महीने में बदलता दिखाई दिया है। लगातार 13 महीनों तक मजबूत निवेश आकर्षित करने वाले गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) से मई 2026 में 725 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी दर्ज की गई। इसके साथ ही एक वर्ष से अधिक समय से जारी सकारात्मक निवेश प्रवाह का सिलसिला टूट गया। वित्तीय बाजार के विशेषज्ञ इस बदलाव को निवेशकों की रणनीति में आए परिवर्तन और सोने की ऊंची कीमतों से जोड़कर देख रहे हैं।

    हाल के महीनों में वैश्विक अनिश्चितताओं और सुरक्षित निवेश विकल्पों की मांग के कारण सोने की कीमतों में उल्लेखनीय तेजी देखी गई थी। इसी वजह से गोल्ड ईटीएफ में भी निवेशकों की रुचि लगातार बनी हुई थी। हालांकि मई में पहली बार ऐसी स्थिति सामने आई जब निवेशकों ने इस श्रेणी से बड़ी मात्रा में धन निकालना शुरू किया। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक अब अपने पोर्टफोलियो में संतुलन बनाने और मुनाफा सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

    वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तरों के करीब पहुंचने के बाद कई निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी। जब किसी एसेट में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है, तब निवेशक अक्सर अपने निवेश का एक हिस्सा निकालकर लाभ सुरक्षित करते हैं। गोल्ड ईटीएफ में आई निकासी को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।

    बाजार जानकारों के अनुसार, हाल के महीनों में इक्विटी बाजारों में भी निवेश के अवसर बढ़े हैं। कई शेयरों के मूल्यांकन आकर्षक स्तर पर पहुंचने के बाद निवेशकों ने अपने धन का कुछ हिस्सा सोने से निकालकर अन्य परिसंपत्तियों की ओर स्थानांतरित करना शुरू किया है। इससे गोल्ड ईटीएफ में निवेश की रफ्तार स्वाभाविक रूप से धीमी हुई है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि निवेशकों के लिए सोने में निवेश बनाए रखने की अवसर लागत बढ़ी है। फिक्स्ड इनकम निवेश विकल्पों पर बेहतर प्रतिफल मिलने और अन्य परिसंपत्तियों में संभावित अवसर दिखाई देने के कारण कुछ निवेशकों ने गोल्ड ईटीएफ से दूरी बनानी शुरू की। इसके अलावा, बाजार में भविष्य के रिटर्न को लेकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण भी देखने को मिल रहा है।

    हालांकि मई में निकासी दर्ज की गई, लेकिन यह तस्वीर का केवल एक पक्ष है। दूसरी ओर गोल्ड ईटीएफ का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट लगातार बढ़ता रहा। इसका अर्थ यह है कि सोने की कीमतों में वृद्धि का असर फंडों की कुल परिसंपत्तियों पर सकारात्मक रूप से दिखाई दिया। इससे स्पष्ट होता है कि निवेशकों का भरोसा पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि निवेश की गति में अस्थायी बदलाव देखने को मिला है।

    वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि सोना अब भी निवेश पोर्टफोलियो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक जोखिमों के दौर में निवेशक इसे सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में देखते हैं। इसलिए अल्पकालिक निकासी को दीर्घकालिक रुझान में बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    मई के आंकड़े यह जरूर संकेत देते हैं कि निवेशक अब अधिक सतर्क और रणनीतिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं। वे केवल सुरक्षित निवेश पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न परिसंपत्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले महीनों में सोने की कीमतों, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू बाजार के रुझानों के आधार पर गोल्ड ईटीएफ में निवेश की दिशा तय होगी।

  • पीएम मोदी के रिकॉर्ड कार्यकाल पर राघव चड्ढा की टिप्पणी, बोले- आज के दौर में लगातार जनादेश हासिल करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण

    पीएम मोदी के रिकॉर्ड कार्यकाल पर राघव चड्ढा की टिप्पणी, बोले- आज के दौर में लगातार जनादेश हासिल करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने के नए रिकॉर्ड को लेकर देश की राजनीति में चर्चा तेज हो गई है। इस उपलब्धि पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी क्रम में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भी अपनी टिप्पणी देते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण क्षण बताया और प्रधानमंत्री मोदी तथा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की परिस्थितियों की तुलना की।

    राघव चड्ढा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 4,399 दिनों तक निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। उनके अनुसार यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की जटिलताओं और मतदाताओं के लगातार विश्वास का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल, बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरे देश में लगातार जनसमर्थन बनाए रखना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होता।

    उन्होंने अपने वक्तव्य में भारत की जनसंख्या, सामाजिक विविधता और चुनावी प्रणाली का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में करोड़ों मतदाता हैं, जिनकी प्राथमिकताएं, अपेक्षाएं और राजनीतिक सोच अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में एक ही नेतृत्व को लगातार कई चुनावों में समर्थन मिलना लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

    राघव चड्ढा ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ने अलग-अलग दौर में देश का नेतृत्व किया। उनके अनुसार स्वतंत्रता के बाद का राजनीतिक वातावरण और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती दशकों में राजनीतिक समीकरण अलग थे, जबकि वर्तमान समय में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, गठबंधन राजनीति और तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चुनावी परिदृश्य को अधिक जटिल बनाती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक दौर में मतदाताओं की अपेक्षाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुकी हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, सोशल मीडिया, क्षेत्रीय मुद्दों और तेज राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण किसी भी सरकार के लिए लगातार जनसमर्थन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में लगातार तीन आम चुनावों में नेतृत्व के प्रति भरोसा जताया जाना विशेष महत्व रखता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीन चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव बनाए रखना और लंबे समय तक सत्ता में बने रहना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उल्लेखनीय उपलब्धि माना जाता है। यही कारण है कि इस उपलब्धि पर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    राघव चड्ढा ने अपने बयान में भारतीय मतदाताओं की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है और लगातार जनादेश किसी भी नेतृत्व के प्रति जनता के विश्वास को दर्शाता है। उन्होंने प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हुए देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    प्रधानमंत्री मोदी के नए रिकॉर्ड ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में नेतृत्व, जनादेश और लोकतांत्रिक निरंतरता को लेकर बहस को केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में भी यह उपलब्धि राजनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से चर्चा का विषय बनी रहने की संभावना है।