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  • IRIS Dena के डूबने से पूर्व भारत ने दूसरे ईरानी जहाज को दी शरण… कोच्चि में 183 क्रू मेंबर्स के ठहरने की व्यवस्था की

    IRIS Dena के डूबने से पूर्व भारत ने दूसरे ईरानी जहाज को दी शरण… कोच्चि में 183 क्रू मेंबर्स के ठहरने की व्यवस्था की


    कोच्चि।
    हिंद महासागर (Indian Ocean) में बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. श्रीलंका के पास एक ईरानी जंगी जहाज (Iranian Warship) के डूबने से कुछ दिन पहले ईरान ने भारत से अपने दूसरे नौसेना के जहाज (Naval Ships) को कोच्चि में तुरंत डॉकिंग (Immediate Docking ) की अनुमति देने का अनुरोध किया था. सूत्रों के अनुसार भारत ने इस अनुरोध को मंजूरी दे दी और जहाज के 183 क्रू मेंबर्स के ठहरने की व्यवस्था भी की है।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, ईरानी जहाज IRIS लवन में गंभीर तकनीकी दिक्कतें आ गई थीं. ईरान की ओर से किए गए अनुरोध के बाद 1 मार्च को उसे इमरजेंसी डॉकिंग की अनुमति दे दी गई. बताया जाता है कि ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को श्रीलंका के तट के पास एक अमेरिकी सबमरीन द्वारा टॉरपीडो से डुबोए जाने से कुछ दिन पहले ही ईरान ने भारत से संपर्क किया था।

    IRIS डेना भारत द्वारा आयोजित मिलान मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज में हिस्सा लेने के बाद अपने देश लौट रहा था. इस हमले में कम से कम 87 ईरानी नाविकों के मारे जाने की सूचना है. फिलहाल दक्षिण भारत के कोच्चि में नौसेना की सुविधाओं में ईरानी नौसेना के क्रू मेंबर्स ठहराए गए हैं. उनके जहाज की तकनीकी जांच की जा रही है. जहाज को समय रहते सुरक्षित ठिकाना मिल गया।

    हालांकि, उसका सिस्टर शिप इतनी किस्मत वाला नहीं रहा. IRIS डेना हिंद महासागर में अमेरिकी सबमरीन द्वारा दागे गए टॉरपीडो की चपेट में आकर डूब गया. इस घटना ने क्षेत्र में पहले से बढ़े तनाव को और तेज कर दिया है. यह टकराव ऐसे समय में हुआ है जब ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है और दोनों पक्षों की ओर से हमले जारी हैं.

    सूत्रों के मुताबिक, यह घटना 4 मार्च को श्रीलंका के गाले बंदरगाह के दक्षिण में करीब 40 नॉटिकल मील दूर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई. बताया गया कि जंगी जहाज ने सुबह एक डिस्ट्रेस कॉल जारी कर धमाके की सूचना दी थी. हालांकि, जब तक श्रीलंका के बचाव दल मौके पर पहुंचे, तब तक ईरान का जंगी जहाज समुद्र में डूब चुका था और कई क्रू मेंबर्स की मौत हो चुकी थी।

    हिंद महासागर में हुई इस घटना ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ ईरान का एक जंगी जहाज भारत के बंदरगाह में तकनीकी वजहों से शरण लिए हुए है, तो दूसरी ओर उसका सिस्टर शिप समुद्र की गहराइयों में समा चुका है. यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया में चल रहा तनाव अब हिंद महासागर क्षेत्र तक असर दिखाने लगा है।

  • UN: भारत की नई शिक्षा नीति के समावेशी शिक्षा मॉडल की वैश्विक स्तर पर सराहना

    UN: भारत की नई शिक्षा नीति के समावेशी शिक्षा मॉडल की वैश्विक स्तर पर सराहना


    जिनेवा।
    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) (United Nations Human Rights Council (UNHRC) के 61वें सत्र में भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 (National Education Policy (NEP) 2020 के समावेशी शिक्षा मॉडल की वैश्विक स्तर पर सराहना की गई है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) के शोधार्थी जैन ह्यूबल ने जेनेवा में परिषद को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की यह नीति दिव्यांग बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में एक सशक्त कदम है।

    ह्यूबल ने रेखांकित किया कि पारंपरिक परीक्षा-केंद्रित प्रणाली के बजाय भारत अब कौशल और योग्यता आधारित शिक्षा पर जोर दे रहा है। उन्होंने विशेष रूप से अक्षर फाउंडेशन जैसे संगठनों के कार्यों का उल्लेख किया, जो सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर दिव्यांग छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ रहे हैं।

    21 लाख विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को बनाया जा रहा सशक्त
    ह्यूबल के अनुसार सहायक तकनीकों और लचीले शिक्षण रास्तों के माध्यम से भारत के लगभग 21 लाख विशेष आवश्यकता वाले छात्रों को सशक्त बनाया जा रहा है। उन्होंने वैश्विक समुदाय से भारत के इस होलिस्टिक (समग्र) शिक्षा मॉडल को समर्थन देने की अपील की, जो न केवल साक्षरता बल्कि रोजगार और सामाजिक भागीदारी पर भी केंद्रित है।

    अब समझिए क्या है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020?
    बता दें कि भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा प्रणाली में बड़ा बदलाव लेकर आई है। यह नीति पारंपरिक परीक्षा-केंद्रित मॉडल से हटकर कौशल और योग्यता आधारित शिक्षा पर जोर देती है। एनईपी 2020 का लक्ष्य बच्चों के समान अवसर, समावेशी शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देना है। दिव्यांग छात्रों और पिछड़े क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान इसके मुख्य हिस्से हैं।

  • देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर

    देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया संकट के बीच स्वर्ण भंडार में तेज उछाल से देश का विदेशी मुद्रा भंडार 27 फरवरी को समाप्त हफ्ते में 4.885 अरब डॉलर बढ़कर 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।

    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने शुक्रवार को जारी आंकड़ों में बताया कि इससे पिछले हफ्ते में कुल विदेशी मुद्रा भंडार 2.11 अरब डॉलर घटकर 723.60 अरब डॉलर रहा था। इससे पहले इस वर्ष 13 फरवरी को समाप्त हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार 725.72 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था।

    आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, 27 फरवरी को समाप्त हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार का अहम घटक माने जाने वाली विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 56.1 करोड़ डॉलर बढ़कर 573.12 अरब डॉलर हो गईं। आंकड़ों के अनुसार इस दौरान स्वर्ण भंडार का मूल्य 4.14 अरब डॉलर बढ़कर 131.63 अरब डॉलर हो गया।

    केंद्रीय बैंक के अनुसार इस अवधि में विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 2.6 करोड़ डॉलर बढ़कर 18.87 अरब डॉलर हो गया। आंकड़ों के अनुसार इस दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास भारत का आरक्षित भंडार भी 15.8 करोड़ डॉलर बढ़कर 4.87 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

  • US-Iran संघर्ष के बीच PM मोदी ने की फ्रांस के राष्ट्रपति से चर्चा, जानें किन मुद्दों पर हुई बात

    US-Iran संघर्ष के बीच PM मोदी ने की फ्रांस के राष्ट्रपति से चर्चा, जानें किन मुद्दों पर हुई बात


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में तेजी से बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष (US-Iran conflict) के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने गुरुवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (French President Emmanuel Macron) से टेलीफोन पर बातचीत की। इस बातचीत में पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति पर भारत और फ्रांस की साझा चिंताओं पर विस्तार से चर्चा हुई, साथ ही संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांति बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक पश्चिम एशिया के कई नेताओं से बात की है। भारत क्षेत्र में शांति और स्थिरता की बहाली के लिए कूटनीतिक प्रयासों को मजबूती से समर्थन दे रहा है, ताकि यह संघर्ष और व्यापक न हो सके।

    प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि आज मैंने अपने मित्र राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बात की। हमने पश्चिम एशिया में बदलती स्थिति पर अपनी साझा चिंताओं और संवाद एवं कूटनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा की। हम क्षेत्र में शांति और स्थिरता की शीघ्र बहाली के लिए घनिष्ठ रूप से जुड़े रहेंगे और प्रयासों का समन्वय करेंगे।

    दरअसल, यह फोन कॉल ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व का संघर्ष तेजी से फैल रहा है और अब यह भारत के निकटवर्ती क्षेत्रों तक पहुंच गया है। बुधवार को श्रीलंका के तट से कुछ दूर अंतरराष्ट्रीय जल में अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना को टॉरपीडो से नष्ट कर दिया। इस हमले में कम से कम 80 से अधिक नाविकों की मौत हो गई, जबकि श्रीलंका की नौसेना ने 32 लोगों को बचाया। जहाज में कुल 180 लोग सवार थे। बता दें कि यह ईरानी फ्रिगेट कुछ दिन पहले ही भारत में हुए अंतरराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था।

    बता दें कि ईरान इजरायल और अमेरिका संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त सैन्य हमलों से हुई, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके बाद ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर जवाबी हमलों की शुरूआत की, जिससे स्थिति और भयावह हो गई। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का दौर जारी है। इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने श्रीलंका तट पर हुए हमले की कड़ी निंदा की और इसे ‘बिना किसी चेतावनी के अत्याचार’ करार दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका को इस मिसाल पर गहरा अफसोस होगा।

  • T20 World Cup: भारत लगातार दूसरी बार फाइनल में… इससे पहले सिर्फ 2 टीमें ही कर पाई ये कमाल

    T20 World Cup: भारत लगातार दूसरी बार फाइनल में… इससे पहले सिर्फ 2 टीमें ही कर पाई ये कमाल


    नई दिल्ली।
    सूर्यकुमार यादव (Suryakumar Yadav) की अगुवाई वाली टीम इंडिया (Team India) ने इंग्लैंड (England) को हराकर टी20 वर्ल्ड कप 2026 (T20 World Cup: 2026) फाइनल में अपनी जगह बना ली है। भारत का यह टी20 वर्ल्ड कप में बैक टू बैक दूसरा फाइनल है। इससे पहले रोहित शर्मा की अगुवाई में भारत ने 2024 टी20 वर्ल्ड कप का खिताब साउथ अफ्रीका को हराकर जीता था। टीम इंडिया बैक टू बैक दो टी20 वर्ल्ड कप फाइनल खेलने वाली तीसरी टीम बन गई है। इस लिस्ट में पाकिस्तान भी मौजूद है। बता दें, सेमीफाइनल में भारत ने इंग्लैंड के सामने जीत के लिए 254 रनों का टारगेट रखा था, इस स्कोर का पीछा करते हुए इंग्लिश टीम 246 रन बना पाई। टीम इंडिया ने 7 रनों से यह मैच जीता। फाइनल में भारत का सामना न्यूजीलैंड से है, जो साउथ अफ्रीका को हराकर पहले ही खिताबी मुकाबले में अपनी जगह बना चुका है।

    भारत का यह टी20 वर्ल्ड कप में बैक टू बैक दूसरा फाइनल है। टीम इंडिया से पहले पाकिस्तान और श्रीलंका यह कारनामा कर चुके हैं। पाकिस्तान ने 2007 और 2009 में बैक टू बैक दो टी20 वर्ल्ड कप फाइनल खेले थे। 2007 में उन्हें भारत के हाथों हार का सामना करना पड़ा था, वहीं 2009 में पाकिस्तान ट्रॉफी उठाने में कामयाब रहा था।

    श्रीलंका ने 2012 और 2014 में लगातार दो टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल खेले थे। 2012 में उन्हें हार मिली थी, वहीं 2014 में भारत को हराकर श्रीलंका ने खिताब जीता था।


    भारत के पास इतिहास रचने का मौका

    टीम इंडिया के पास न्यूजीलैंड के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में इतिहास रचने का मौका है। भारत अगर 8 मार्च को होने वाले फाइनल में न्यूजीलैंड को हराता है तो उनका नाम इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में जुड़ जाएगा। अगर भारत जीतता है तो वह बैक टू बैक दो टी20 वर्ल्ड कप जीतने वाला पहला देश बनेगा। अगर भारत जीतता है तो वह घर पर टी20 वर्ल्ड कप जीतने वाला पहला देश बनेगा।

  • क्या अमेरिका भारतीय सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकता है? LEMOA समझौते को लेकर उठे सवाल

    क्या अमेरिका भारतीय सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकता है? LEMOA समझौते को लेकर उठे सवाल



    नई दिल्ली। हिंद महासागर में IRIS डेना युद्धपोत के डूबने के बाद ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि अमेरिका सैन्य अभियानों के लिए भारतीय बेस पर निर्भर हो सकता है। हालांकि इन दावों को खारिज कर दिया गया है। दरअसल भारत और अमेरिका के बीच वर्ष 2016 में एक अहम समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की कुछ सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस समझौते के आधार पर अमेरिका भारत के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किसी हमले के लिए कर सकता है।

    सैन्य सुविधाओं के सीमित इस्तेमाल की अनुमति

    इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं जैसे नौसैनिक बेस, एयरफील्ड और मिलिट्री बेस का सीमित उपयोग कर सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस और जरूरी साजो-सामान की आपूर्ति जैसी लॉजिस्टिक सेवाएं शामिल हैं। हालांकि समझौते में यह स्पष्ट किया गया है कि हर मामले में संबंधित देश से पहले अनुमति लेना जरूरी होगा। यानी यह पूरी तरह संबंधित सरकार के निर्णय पर निर्भर करता है कि वह किस स्थिति में अनुमति देती है और किस मामले में नहीं।

    क्या है LEMOA समझौता

    भारत और अमेरिका के बीच Logistics Exchange Memorandum of Agreement यानी LEMOA पर 29 अगस्त 2016 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में हुआ था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट, सप्लाई और सेवाओं के आदान-प्रदान के लिए नियम और शर्तें तय करना है। माना जाता है कि यह अमेरिका के लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) का भारतीय संस्करण है, जैसा कि अमेरिका ने कई अन्य देशों के साथ भी किया हुआ है।

    किन गतिविधियों को कवर करता है समझौता

    यह समझौता मुख्य रूप से चार प्रमुख क्षेत्रों को कवर करता है, जिनमें बंदरगाहों पर जहाजों का रुकना यानी पोर्ट कॉल्स, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण गतिविधियां तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) शामिल हैं। इसके अलावा किसी अन्य जरूरत के लिए दोनों देशों के बीच अलग से आपसी सहमति जरूरी होती है। समझौते के तहत दी जाने वाली सेवाओं के बदले संबंधित देश को या तो नकद भुगतान करना होता है या फिर समान लॉजिस्टिक सेवाएं उपलब्ध करानी होती हैं।

    लॉजिस्टिक सपोर्ट में क्या-क्या शामिल

    LEMOA के तहत मिलने वाली लॉजिस्टिक सेवाओं में भोजन, पानी, रहने की व्यवस्था, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल और लुब्रिकेंट्स, कपड़े, संचार सेवाएं, चिकित्सा सुविधाएं, स्टोरेज, प्रशिक्षण सेवाएं, स्पेयर पार्ट्स, मरम्मत और रखरखाव, कैलिब्रेशन सेवाएं और पोर्ट सेवाएं शामिल हैं। खास बात यह है कि यह समझौता किसी भी देश को संयुक्त सैन्य गतिविधि करने के लिए बाध्य नहीं करता। साथ ही इसमें किसी भी प्रकार का सैन्य बेस स्थापित करने या स्थायी बेसिंग की व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है। इसे पूरी तरह से लॉजिस्टिक सहयोग का समझौता माना जाता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है यह घटना

    IRIS डेना पोत के डूबने की घटना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जिस क्षेत्र में यह घटना हुई वह भारत के समुद्री पड़ोस में आता है। हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिण का इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों में गिना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य टकराव समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

    भारत में नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ था पोत

    बताया जा रहा है कि IRIS डेना युद्धपोत भारत में आयोजित ‘मिलन’ नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने आया था। यह अभ्यास 18 से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था, जिसमें दुनिया के कई देशों की नौसेनाओं ने भाग लिया। इस दौरान 80 से अधिक युद्धपोत समुद्र में एक साथ दिखाई दिए थे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री सहयोग और नौसैनिक कूटनीति को मजबूत करना था। नौसैनिक परेड की समीक्षा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने की थी।

    हमले को लेकर भारत की क्या है नीति

    रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डेना पोत भारत के निमंत्रण पर अभ्यास में शामिल होने जरूर आया था, लेकिन घटना के समय वह भारत की समुद्री सीमा से बाहर जा चुका था। ऐसे में इस घटना के लिए सीधे तौर पर भारत की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार भारत अपनी स्पष्ट नीति पर कायम है कि वह किसी भी देश को हमले के लिए अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर यह भी देखा जाएगा कि ईरान इसे किस नजर से देखता है।

  • अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भारत में ईरानी सुप्रीम लीडर के विशेष प्रतिनिधि Abdul Majid Hakim Elahi ने कहा कि अमेरिका अपने वैश्विक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए दुनिया में जानबूझकर युद्ध जैसी स्थितियां पैदा करता है। उनका दावा है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष के पीछे भी अमेरिका की यही रणनीति है, ताकि भारत और चीन जैसे देशों को उभरने से रोका जा सके।

    खास बातचीत में इलाही ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत या चीन जैसे देश वैश्विक ताकत के रूप में सामने आएं। उनके मुताबिक, अमेरिका की कोशिश रहती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी ताकत को कोई चुनौती न दे और इसी वजह से वह विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध की स्थितियां पैदा करता है।

    भविष्य में भारत भी होगा बड़ी ताकत

    इलाही ने कहा कि आने वाले समय में भारत, चीन, रूस और अमेरिका दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों में शामिल होंगे। हालांकि, उनका आरोप है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अपनी ताकत को साझा नहीं करना चाहता और इसी कारण वह वैश्विक स्तर पर टकराव की स्थितियां बनाए रखता है।

    ईरान ने नहीं, अमेरिका ने शुरू किया संघर्ष

    ईरानी अधिकारी ने यह भी कहा कि मौजूदा युद्ध की शुरुआत ईरान ने नहीं की, बल्कि अमेरिका और इजरायल ने सैन्य कार्रवाई कर इसे शुरू किया। इससे पहले ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी Ali Larijani ने भी कहा था कि ईरान केवल अपनी रक्षा कर रहा है। उनके अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरानी नागरिकों और ठिकानों को निशाना बनाया गया है, जिसके जवाब में ईरान प्रतिक्रिया दे रहा है।

    लारिजानी ने यह भी कहा कि चूंकि संघर्ष की शुरुआत अमेरिका की ओर से हुई है, इसलिए इसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी उसी की है।

    लंबा खिंच सकता है संघर्ष

    इस बीच विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य ढांचे और नौसैनिक अड्डों पर किए गए हमलों के बाद यह संघर्ष लंबा चल सकता है। इन हमलों में ईरान के कुछ वरिष्ठ नेताओं के मारे जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

    जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन हमलों में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत होने और कई अन्य के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

  • भारत में गहराया गैस संकट… गुजरात गैस लिमिटेड ने की फोर्स मेज्योर लागू करने की घोषणा

    भारत में गहराया गैस संकट… गुजरात गैस लिमिटेड ने की फोर्स मेज्योर लागू करने की घोषणा


    नई दिल्ली।
    पेट्रोनेट एलएनजी (Petronet LNG) के बाद अब भारतीय गैस वितरण कंपनी (Indian gas Distribution Company) गुजरात गैस लिमिटेड (Gujarat Gas Limited) ने भी फोर्स मेज्योर लागू करने की घोषणा की है। कंपनी ने बुधवार को घोषणा की कि वह अपने आपूर्ति अनुबंधों में फोर्स मेज्योर लागू करेगी, क्योंकि आरएलएनजी की उपलब्धता “गंभीर रूप से सीमित” हो गई है। शेयर बाजार को दी गई जानकारी में कंपनी ने बताया कि वह 6 मार्च से गैस की मात्रा में प्रतिबंध लगाएगी।


    कतर के संयंत्र बंद होने से भारत पर संकट गहराया

    सोमवार को, एक ईरानी ड्रोन हमले के बाद कतर ने अपने प्रमुख रास लफ्फान संयंत्र में परिचालन रोक दिया। यह संयंत्र दुनिया की लगभग पांचवें हिस्से की तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। पिछले साल अपने कुल एलएनजी आयात का लगभग आधा हिस्सा कतर से प्राप्त करने वाला भारत इस व्यवधान की चपेट में विशेष रूप से आ गया है।


    गुजरात गैस के ग्राहक और बीमा कवरेज

    जनवरी की एक निवेशक प्रस्तुति के अनुसार, गुजरात गैस भारत के छह राज्यों में ग्राहकों को सेवा प्रदान करती है, जिनमें लगभग 4,430 औद्योगिक ग्राहक, 15,600 से अधिक वाणिज्यिक ग्राहक और 2.27 मिलियन घरेलू उपभोक्ता शामिल हैं। कंपनी ने अपने बयान में कहा, “गुजरात गैस द्वारा लिए गए बीमा के तहत युद्ध जैसी घटनाएं कवर नहीं होती हैं। फोर्स मेजेयर का संभावित प्रभाव, जो वर्तमान में एक जारी घटना है, का इस समय अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।”


    पेट्रोनेट एलएनजी ने भी किया है ऐलान

    भारत की सबसे बड़ी गैस आयातक कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी ने बुधवार को शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसने अपने सप्लॉयर कतर एनर्जी और घरेलू खरीदारों को फोर्स मेज्योर की सूचना जारी कर दी है। इसकी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट के कारण कंपनी के जहाजों का रास लफ्फान के लोडिंग पोर्ट तक न पहुंच पाना है। अमेरिका-ईरान संघर्ष ने इस क्षेत्र में ईंधन की खेप को बाधित कर दिया है।


    क्या है फोर्स मेज्योर

    अगर कोई काम किसी समझौते के अनुसार होना था, लेकिन प्राकृतिक आपदा या बड़ी अप्रत्याशित घटना की वजह से वह काम नहीं हो पाया, तो उसे Force Majeure कहा जाता है। बता दें ईरान और ओमान के बीच स्थित हॉर्मुज स्ट्रेट, जहां से होकर वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले तेल का लगभग एक-पांचवां हिस्सा और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का ट्रांसपोटेशन होता है, वहां से गुजरना लगभग ठप हो गया है। इस क्षेत्र में कुछ जहाजों के हिट होने की घटनाओं के बाद यह स्थिति बनी है।


    कंपनी ने किन्हें भेजा नोटिस?

    कंपनी ने मंगलवार रात जारी नोटिस में कहा कि सुरक्षा स्थिति और समुद्री नेविगेशन के लिए पैदा हुए गंभीर खतरों को देखते हुए, पेट्रोनेट ने अपने एलएनजी टैंकरों दिशा, राही और असीम के लिए कतर एनर्जी को फोर्स मेज्योर नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही पेट्रोनेट ने अपने ग्राहकों गेल (इंडिया), इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम को भी फोर्स मेज्योर की सूचना दी है। पेट्रोनेट के अनुसार, कतरएनर्जी ने भी उसे “क्षेत्र में व्याप्त शत्रुता के कारण फोर्स मेज्योर की संभावित घटना” की सूचना दी है।


    बाजार और उद्योग पर क्या पड़ा असर?

    इस खबर के बाद बुधवार को बीएसई पर पेट्रोनेट के शेयर 9.3% गिरकर 281 रुपये पर बंद हुए। कारोबार के दौरान यह 11.7% तक लुढ़ककर 273 रुपये तक चला गया था। भारतीय गैस सप्लॉयर गेल और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन पहले ही फर्टिलाइजर्स प्लांट्स सहित उद्योगों को गैस आपूर्ति में कटौती कर चुके हैं।

    मामले से वाकिब सूत्रों ने बताया कि कम गैस आपूर्ति का असर पहले से ही कुछ फर्टिलाइजर कंपनियों के उत्पादन पर पड़ा है, जिनमें इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव (इफ्को) और कृभको फर्टिलाइजर्स शामिल हैं। हालांकि, अब तक कंपनियों ने घरेलू इस्तेमाल या ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए गैस आपूर्ति में किसी कटौती की घोषणा नहीं की है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में 2.7 करोड़ टन एलएनजी का आयात किया, जो देश की कुल गैस खपत का लगभग आधा है। इस आयात का बड़ा हिस्सा कतर से होता है।

  • ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो भारत में खाद और उर्वरक की हो सकती है किल्लत

    ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो भारत में खाद और उर्वरक की हो सकती है किल्लत


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब सिर्फ तेल और गैस पर ही नहीं, बल्कि भारत के कृषि और व्यापार क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच जंग लंबी खिंचती है और खाड़ी देशों में तनाव बढ़ता है, तो भारत को पेट्रोलियम उत्पादों के साथ-साथ उर्वरक, खाद्य सामग्री और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की सप्लाई में भी समस्या हो सकती है।
    उर्वरक की आपूर्ति हो सकती है प्रभावित
    भारत यूरिया और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के बड़े हिस्से के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। विशेष रूप से डीएपी और यूरिया का करीब 46 प्रतिशत आयात अकेले ओमान से होता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है, तो उर्वरक की कमी के कारण कृषि क्षेत्र पर सीधे असर पड़ेगा और कीमतों में तेजी आएगी।

    सोना और अन्य आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं
    संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से भारत में सोने का आयात होता है। शिपिंग लागत बढ़ने से सोने की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके अलावा खजूर और कुछ प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पादों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी कुल खजूर का लगभग 80-90 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है, खासकर यूएई और ओमान से। तनाव बढ़ने और समुद्री मार्ग बंद होने की स्थिति में इन उत्पादों की कीमतों में उछाल आ सकता है।

    निर्यात क्षेत्र भी होगा प्रभावित
    भारत के निर्यात पर भी खाड़ी देशों में तनाव का असर पड़ेगा। प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं:-

    खाद्यान्न और चावल: सऊदी अरब, ईराक, यूएई और ओमान भारत के बड़े खरीदार हैं। समुद्री मार्ग बंद होने पर शिपमेंट में देरी होगी, नई आपूर्ति रूट लंबा होगा और ढुलाई लागत बढ़ेगी। भारत का लगभग 50 प्रतिशत बासमती निर्यात खाड़ी देशों और ईरान को जाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 60 लाख टन बासमती निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 50,312 करोड़ रुपये थी।

    मांस और समुद्री उत्पाद: जमी हुई मछली और झींगा जैसी वस्तुएं खाड़ी देशों में बड़ी मांग में हैं। लॉजिस्टिक बाधाओं से निर्यात घट सकता है।

    फार्मास्यूटिकल्स: भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा सप्लायर है। आपूर्ति बाधित होने पर निर्यात राजस्व प्रभावित होगा और कंपनियों को सामान पहुंचाने में मुश्किलें आएंगी।

    इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स: मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और निर्माण सामग्री की खेप में देरी से विशेषकर एमएसएमई प्रभावित होंगे। जनवरी में खाड़ी देशों को मशीनरी निर्यात में 16 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई थी।

    कपड़ा और परिधान: खाड़ी देशों का बाजार रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल निर्यात के लिए अहम है। भारत का खाड़ी देशों को कुल परिधान निर्यात लगभग 1.79 बिलियन डॉलर का है। शिपिंग लागत बढ़ने से प्रतिस्पर्धा घट सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चलता है और हॉर्मुज स्ट्रेट पर तनाव जारी रहता है, तो किसानों और निर्यातक दोनों के लिए चुनौतियां गंभीर रूप से बढ़ सकती हैं।

  • ईरान जंग का असर: कतर ने भारत को LNG सप्लाई में 40% तक कटौती की, ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल

    ईरान जंग का असर: कतर ने भारत को LNG सप्लाई में 40% तक कटौती की, ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव का सीधा असर अब भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर दिखाई देने लगा है। भारत को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश कतर ने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात में 10 से 40 प्रतिशत तक की कटौती कर दी है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच संघर्ष तेज हो चुका है और खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा हालात बिगड़ गए हैं।
    हमलों के बाद प्लांट बंद, सप्लाई प्रभावित
    ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। साथ ही दुनिया के सबसे बड़े LNG हब में से एक रास लफ़्फ़ान इंडस्ट्रियल सिटी और मेसाईद इंडस्ट्रियल सिटी पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए गए। इन हमलों के बाद कतर को एहतियातन LNG उत्पादन रोकना पड़ा। नतीजतन वैश्विक गैस आपूर्ति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

    भारत कतर से LNG खरीदने वाले सबसे बड़े ग्राहकों में शामिल है। देश हर साल करीब 27 मिलियन टन LNG आयात करता है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कतर से आता है। इस गैस का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, CNG वितरण और पाइप्ड कुकिंग गैस नेटवर्क जैसे अहम क्षेत्रों में होता है।

    पेट्रोनेट ने दी सप्लाई रुकने की सूचना
    भारत की प्रमुख गैस आयातक कंपनी पेट्रोनेट LNG लिमिटेड ने गैस मार्केटर्स को सूचित किया है कि कतर ने उत्पादन रोक दिया है। इसके बाद GAIL लिमिटेड और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को भी सप्लाई बाधित होने की जानकारी दी गई। बताया जा रहा है कि CNG रिटेलिंग के लिए फ्लो रेट बनाए रखते हुए औद्योगिक इकाइयों को गैस आपूर्ति में कटौती की गई है।

    सूत्रों के अनुसार यह कटौती 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक हो सकती है। पेट्रोनेट का कतर से हर साल 8.5 मिलियन टन LNG खरीदने का दीर्घकालिक अनुबंध है, जबकि कुछ मात्रा स्पॉट मार्केट से भी ली जाती है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़
    तनाव का बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट है, जिस पर ईरान का नियंत्रण है। यह समुद्री मार्ग भारत के लिए बेहद अहम है, क्योंकि लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल और 54 प्रतिशत LNG आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है। यही मार्ग कतर और UAE से आने वाली गैस के लिए मुख्य ट्रांजिट रूट है। हमलों के बाद इस मार्ग से तेल और LNG शिपमेंट लगभग ठप पड़ गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल आ गया है और युद्ध जोखिम बीमा व शिपिंग लागत भी बढ़ गई है।

    स्पॉट मार्केट में कीमतें दोगुनी
    GAIL और IOC कमी की भरपाई के लिए स्पॉट मार्केट से LNG खरीदने पर विचार कर रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। स्पॉट मार्केट में LNG की कीमत अब 25 अमेरिकी डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई है, जो दीर्घकालिक अनुबंध दर से लगभग दोगुनी है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो भारत समेत कई आयातक देशों के लिए गैस आपूर्ति और कीमतों का संकट और गहरा सकता है।