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  • Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    नई दिल्ली । वैश्विक तेल बाजार में भारत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में देश इस क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी बन जाएगा। हाल ही में रूसी तेल कंपनी Rosneft के सीईओ इगोर सेचिन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि साल 2035 तक वैश्विक तेल मांग में भारत का हिस्सा लगभग आधा होगा। उनका अनुमान है कि वैश्विक तेल की बढ़ती मांग में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक रहेगी।

    इगोर सेचिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में कहा कि भारत की तेल खपत अगले दशक में करीब आठ मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच जाएगी, जो 44 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। उनका कहना था कि जबकि वैश्विक मांग में कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी, भारत अकेले वैश्विक मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा संभालेगा। इससे स्पष्ट होता है कि भारत तेल बाजार में रणनीतिक महत्व रखता है।

    रूस और भारत के आर्थिक संबंधों पर बात करते हुए सेचिन ने बताया कि अप्रैल 2022 से रूस की तेल आपूर्ति से भारत और चीन को लगभग 40 अरब डॉलर का लाभ हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और चीन के साथ रूस की साझेदारी ने स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से रूस को अलग करना संभव नहीं है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने देश को वैश्विक तेल बाजार में निर्णायक स्थिति दे दी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.7 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अनुमान से बेहतर रही। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है।

    इगोर सेचिन ने होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) की संवेदनशीलता पर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि इस स्ट्रेट के जरिए तेल और गैस की आपूर्ति में व्यवधान आने से फर्टिलाइजर्स और फूड प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं। उनका कहना था कि इस प्रभाव के प्रति भारत सबसे अधिक संवेदनशील देशों में शामिल है, जबकि अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।

    रूस और भारत के बीच ऊर्जा साझेदारी से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक तेल के खेल में भारत की भूमिका आने वाले दशक में और मजबूत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बढ़ती मांग न केवल घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक बाजार पर भी इसका असर होगा।

  • भारत-नेपाल संबंधों में नई चुनौतियां: नेपाली विदेश मंत्री ने दोहराया ‘कालापानी-लिपुलेख हमारा अधिकार’

    भारत-नेपाल संबंधों में नई चुनौतियां: नेपाली विदेश मंत्री ने दोहराया ‘कालापानी-लिपुलेख हमारा अधिकार’

    नई दिल्ली । नेपाल के विदेश मंत्री Shishir Khanal इन दिनों भारत की तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर हैं। इस दौरे के दौरान उन्होंने भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद से जुड़े कई मुद्दे फिर से चर्चा में हैं। इस दौरान उन्होंने भारत-नेपाल संबंधों को और मजबूत करने पर भी जोर दिया, लेकिन सीमा विवाद को लेकर उनका पुराना रुख एक बार फिर सामने आया है।

    यात्रा के दौरान शिशिर खनाल ने भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval से अलग-अलग मुलाकात की। इन बैठकों में द्विपक्षीय सहयोग, सीमा प्रबंधन, सांस्कृतिक संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। दोनों देशों ने आपसी रिश्तों को आगे बढ़ाने और संवाद के माध्यम से सभी संवेदनशील विषयों को सुलझाने की आवश्यकता पर बल दिया।

    हालांकि, मीडिया से बातचीत के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री ने एक बार फिर भारत-नेपाल सीमा विवाद से जुड़े Kalapani और Lipulekh क्षेत्र को नेपाल का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है और यह मुद्दा ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक संदर्भों से जुड़ा हुआ है। उनके इस बयान ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को सुर्खियों में ला दिया है।

    शिशिर खनाल ने साथ ही यह भी कहा कि नेपाल इस मुद्दे को किसी भी प्रकार की उग्र राष्ट्रवादी बयानबाजी के बजाय शांतिपूर्ण और कूटनीतिक बातचीत के माध्यम से सुलझाना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों देशों को आपसी सम्मान और समझ के आधार पर बातचीत की मेज पर बैठकर समाधान तलाशना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और रिश्तों में विश्वास और मजबूत हो सके।

    उन्होंने कैलाश मानसरोवर यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि कई श्रद्धालु नेपाल के मार्ग से इस यात्रा पर जाते हैं, इसलिए सीमा क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्होंने भारत और चीन के बीच हुए कुछ समझौतों को लेकर भी नेपाल की चिंता व्यक्त की और कहा कि इस तरह के निर्णयों में नेपाल की सहमति और भागीदारी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा विषय है।

    भारत की प्रगति और आर्थिक विकास की सराहना करते हुए शिशिर खनाल ने कहा कि भारत ने वैश्विक स्तर पर मजबूत पहचान बनाई है और यह क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। उन्होंने नेपाल में चल रहे जन-आंदोलनों और सामाजिक परिस्थितियों का भी जिक्र किया। साथ ही भारत में हाल के एक आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस विषय पर अधिक टिप्पणी नहीं करना चाहते, जिससे उनके बयान को लेकर विभिन्न राजनीतिक चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं।

    कुल मिलाकर यह यात्रा भारत-नेपाल संबंधों में संवाद और सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के रुख में अंतर एक बार फिर स्पष्ट दिखाई दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, आगे की बातचीत ही इन संवेदनशील मामलों के समाधान का रास्ता तय करेगी।

  • वित्त वर्ष 2027 में विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत, जीडीपी वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान; महंगाई और तेल कीमतें बढ़ाएंगी दबाव

    वित्त वर्ष 2027 में विकास की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेत, जीडीपी वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान; महंगाई और तेल कीमतें बढ़ाएंगी दबाव


    नई दिल्ली ।
    वित्त वर्ष 2026 में अपेक्षा से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन दर्ज करने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था अगले वित्त वर्ष में नई चुनौतियों का सामना कर सकती है। ताजा आर्थिक आकलनों के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह दर वैश्विक स्तर पर अब भी मजबूत मानी जाएगी, लेकिन पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले इसमें कुछ नरमी देखने को मिल सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर उभरती परिस्थितियां विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं।

    वित्त वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था को कई सकारात्मक कारकों का लाभ मिला। घरेलू खपत को प्रोत्साहन देने वाले उपाय, अपेक्षाकृत कम महंगाई, अनुकूल मौसम की स्थिति, ब्याज दरों में राहत और वैश्विक आर्थिक स्थिरता ने विकास को मजबूत आधार प्रदान किया। इन कारणों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी बनी रही और वृद्धि दर अनुमान से बेहतर स्तर तक पहुंच गई।

    हालांकि आगामी वित्त वर्ष के लिए तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में तेज उछाल से भारत जैसे आयात आधारित देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा लागत बढ़ने का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों पर पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।

    इसके साथ ही मानसून को लेकर भी आशंकाएं बनी हुई हैं। मौसम संबंधी पूर्वानुमानों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। यदि वर्षा अपेक्षा से कमजोर रहती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि क्षेत्र में किसी भी प्रकार की कमजोरी का असर ग्रामीण आय, उपभोग और खाद्य आपूर्ति पर पड़ता है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

    महंगाई भी आने वाले समय में एक प्रमुख चुनौती बन सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में मुद्रास्फीति का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रह सकता है। खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और परिवहन लागत में संभावित वृद्धि से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने की स्थिति में घरेलू खपत की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, जो आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

    वैश्विक परिस्थितियां भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा मांग पर पड़ सकता है। यदि वैश्विक बाजारों में सुस्ती बनी रहती है तो भारतीय निर्यात क्षेत्र को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे औद्योगिक उत्पादन और निवेश गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना रहेगी।

    इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियादी ढांचे, बढ़ते निवेश, डिजिटल विस्तार और घरेलू मांग की वजह से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बनी रहेगी। निजी उपभोग अब भी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार बना हुआ है और हालिया आंकड़े संकेत देते हैं कि उपभोक्ता मांग में मजबूती बरकरार है। यही कारण है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल माना जा रहा है।

    आने वाले महीनों में तेल कीमतों, मानसून की प्रगति, महंगाई के रुझान और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर विशेष नजर रहेगी। यही कारक तय करेंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था अनुमानित वृद्धि दर हासिल कर पाती है या विकास की गति में और बदलाव देखने को मिलता है।

  • वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय ऑटो सेक्टर चमका, मई में 4.4 लाख वाहन बिके..

    वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय ऑटो सेक्टर चमका, मई में 4.4 लाख वाहन बिके..

    नई दिल्ली । देश के ऑटोमोबाइल क्षेत्र ने एक बार फिर मजबूत प्रदर्शन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को नई मजबूती प्रदान की है। मई 2026 में यात्री वाहन बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होने के बाद केंद्र सरकार ने इसे देश की बढ़ती आर्थिक क्षमता, मजबूत उपभोक्ता विश्वास और विनिर्माण क्षेत्र की सफलता का संकेत बताया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत की विकास यात्रा निरंतर गति पकड़ रही है और विभिन्न क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं।

    मंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने संदेश में बताया कि मई 2026 के दौरान देश में लगभग 4.4 लाख यात्री वाहनों की बिक्री हुई। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 23 प्रतिशत अधिक है। उन्होंने कहा कि यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताओं और बाजार संबंधी चुनौतियों का माहौल बना हुआ है।

    पीयूष गोयल के अनुसार इस उपलब्धि में देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। विशेष रूप से मारुति सुजुकी इंडिया, टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा ने बाजार में मजबूत प्रदर्शन करते हुए बिक्री को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। इन कंपनियों की बेहतर बिक्री ने पूरे ऑटोमोबाइल उद्योग को सकारात्मक दिशा दी है।

    मंत्री ने कहा कि भारतीय उपभोक्ताओं का घरेलू स्तर पर निर्मित वाहनों पर बढ़ता भरोसा देश के विनिर्माण क्षेत्र की मजबूती को दर्शाता है। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का सकारात्मक परिणाम बताते हुए कहा कि इस पहल ने देश में औद्योगिक उत्पादन, निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भी अधिक सक्षम बनाया है।

    उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र में दिखाई दे रही यह प्रगति केवल बिक्री के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक संरचना में हो रहे व्यापक बदलावों की भी झलक प्रस्तुत करती है। तकनीकी नवाचार, उत्पादन क्षमता में विस्तार और उपभोक्ताओं की बढ़ती क्रय शक्ति जैसे कारकों ने इस क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है।

    इस बीच देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने भी मई महीने में नया रिकॉर्ड कायम किया है। कंपनी ने घरेलू बाजार में डीलरों को 1,90,337 यात्री वाहन भेजे, जो उसके इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी मासिक बिक्री मानी जा रही है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक है। इसके साथ ही कंपनी ने अप्रैल में स्थापित अपने पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती वाहन बिक्री से जुड़े आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग की मजबूती का संकेत देते हैं। यदि आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहता है तो ऑटोमोबाइल क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मजबूत मांग, बढ़ते निवेश और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार के बीच भारत का ऑटो उद्योग आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।

  • पुतिन के बाद ट्रंप का भी मोदी पर विश्वास, बोले- अच्छे दोस्त हैं पीएम, जल्द होगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील

    पुतिन के बाद ट्रंप का भी मोदी पर विश्वास, बोले- अच्छे दोस्त हैं पीएम, जल्द होगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार वार्ताओं को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर सराहना करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता जल्द ही अंतिम रूप ले सकता है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है और समझौते को लेकर उम्मीदें मजबूत हुई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा मित्र बताया और कहा कि उनके साथ उनके व्यक्तिगत तथा कूटनीतिक संबंध बेहद अच्छे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर प्रगति हो रही है और दोनों देश जल्द ही इस दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम हासिल कर सकते हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि अतीत में भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे शुल्क को लेकर अमेरिका की चिंताएं रही हैं, लेकिन वर्तमान दौर में दोनों देश व्यापारिक संबंधों को नए स्तर पर ले जाने के लिए प्रयासरत हैं।

    भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से इस सप्ताह एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत पहुंचा था। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दिनों तक विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें बाजार पहुंच, शुल्क व्यवस्था, निवेश और विभिन्न व्यापारिक बाधाओं से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। वार्ता के समापन के बाद दोनों पक्षों की ओर से सकारात्मक संकेत दिए गए हैं।

    इससे पहले केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि व्यापार समझौते को लेकर लगभग 99 प्रतिशत बातचीत पूरी हो चुकी है। इसी क्रम में भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी संकेत दिया कि अब केवल कुछ सीमित मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के अधिकारी शेष बाधाओं को दूर करने के लिए लगातार संपर्क में हैं और अगले कुछ सप्ताह के भीतर समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा दे सकता है। इससे वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में वृद्धि होने के साथ-साथ निवेश और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत और अमेरिका के बीच मजबूत व्यापारिक साझेदारी दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    उल्लेखनीय है कि ट्रंप का यह बयान रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin की टिप्पणी के तुरंत बाद सामने आया है। पुतिन ने भी प्रधानमंत्री Narendra Modi और भारत की प्रशंसा करते हुए कहा था कि भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जो अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम है। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश पर बाहरी दबाव बनाना आसान नहीं है तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।

    लगातार आ रहे इन बयानों को वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक और आर्थिक अहमियत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। भारत जहां एक ओर प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से नई साझेदारियां विकसित कर रहा है। ऐसे में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का संभावित निष्कर्ष दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

  • नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी

    नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की जमीन कब्जा करने के नेपाली पीएम बालेन शाह (Nepali PM Balen Shah) के दावे पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने सधी हुई प्रक्रिया दी है। कहा कि सीमा विवादों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच एक स्थापित तंत्र है, जिसके जरिये समाधान निकाला जाएगा। साथ ही इसमें किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज कर दिया। इस बीच उत्तराखंड (Uttarakhand) से सटे नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। बालेन शाह के बयान के खिलाफ डडेलधुरा समेत कई स्थानों पर विभिन्न छात्र और युवा संगठनों के कार्यकर्ता विरोध दर्ज करा रहे हैं। इस बीच भारत-नेपाल सीमा (India-Nepal border) पर सुरक्षा एजेंसियों ने सतर्कता बढ़ा दी है।

    सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त रूप से गश्त तेज कर दी है। सुरक्षा एजेंसियां घुसपैठ, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पगडंडी मार्गों, चेकपोस्टों और सीमावर्ती गांवों में लगातार निगरानी कर रही हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर फोकस किया जा रहा है जहां सीमा अपेक्षाकृत खुली है और लोगों का आवागमन अधिक रहता है।


    एसएसबी और स्थानीय पुलिस की संयुक्त गश्त

    मंगलवार को बलुवाकोट क्षेत्र में थानाध्यक्ष नीमा बोहरा के नेतृत्व में पुलिस और एसएसबी की टीम ने संयुक्त गश्त की। इस दौरान जवानों ने संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही स्थानीय लोगों से सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति अथवा घटना की जानकारी तुरंत पुलिस को देने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियमित गश्त और निगरानी जारी रहेगी।


    बालेन शाह के बयान पर विदेश मंत्रालय

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमने भारत-नेपाल सीमा के संबंध में नेपाल के प्रधानमंत्री की टिप्पणियों के साथ-साथ इस मामले पर नेपाली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान को भी देखा है।

    रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 फीसदी हिस्सा निर्धारित हो चुका है, फिर भी कुछ हिस्से को सुलझाना बाकी है। उन्होंने कहा कि गंडक नदी के बहाव में परिवर्तन के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। इसके अतिरिक्त सीमा के निर्धारित हिस्सों में सीमा पार कब्जे और नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण के मामले भी हैं, जिनका संयुक्त रूप से मानचित्रण किया जा रहा है। रणधीर जायसवाल ने कहा कि हमने सीमा संबंधी सभी मामलों से निपटने के लिए द्विपक्षीय तंत्र स्थापित किए हैं। सभी संबंधित पक्षों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय मामलों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।

    हाल में पाकिस्तान और यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के उल्लेख पर भी भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जायसवाल ने कहा कि हम संयुक्त प्रेस बयान में भारत के अंदरूनी मामलों पर ऐसे बेवजह जिक्र को पूरी तरह से खारिज करते हैं।

  • मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    नई दिल्ली । मई माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था में मांग और कर अनुपालन की मजबूती को दर्शाती है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बावजूद भारत का सकल जीएसटी संग्रह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
    आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 1,94,184 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1,88,172 करोड़ रुपये की तुलना में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वहीं शुद्ध जीएसटी राजस्व 1,66,904 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें 3.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई है। रिफंड को समायोजित करने के बाद राजस्व वृद्धि लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो कर संग्रह प्रणाली की मजबूती का संकेत है।

    महीने के दौरान रिफंड की राशि भी बढ़कर 27,281 करोड़ रुपये रही, हालांकि इसके बावजूद कुल राजस्व में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। घरेलू कर संग्रह में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आयात से प्राप्त कर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि ने कुल आंकड़ों को संतुलित बनाए रखा। आयात आधारित जीएसटी संग्रह 19.1 प्रतिशत बढ़कर 59,654 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वैश्विक व्यापार गतिविधियों में मजबूती और आयात मांग में सुधार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता को दर्शाती है।

    वहीं दूसरी ओर घरेलू जीएसटी संग्रह 1,34,530 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 2.6 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन सेवा क्षेत्र और वस्तु श्रेणियों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में 22.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि और वस्तु श्रेणियों में सकारात्मक रुझान यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत आधारित विकास मॉडल मजबूत स्थिति में है। सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों की व्यापकता को दर्शाता है।

    राज्यों के स्तर पर भी जीएसटी संग्रह में विविध प्रदर्शन देखने को मिला। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्यों में कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से केरल और हरियाणा जैसे राज्यों ने दोहरे अंकों में वृद्धि के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। यह संकेत देता है कि राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं में भी गतिविधियां तेज हो रही हैं और कर आधार का विस्तार हो रहा है।

    वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में कुल सकल जीएसटी संग्रह 4.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में शुद्ध राजस्व में भी 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल माह में भी रिकॉर्ड संग्रह देखने को मिला था, जो यह दर्शाता है कि लगातार दो महीनों से राजस्व वृद्धि का रुझान मजबूत बना हुआ है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वित्त वर्ष के निर्धारित कर लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करेगा।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • भारत-कनाडा व्यापारिक रिश्तों में मजबूती की दिशा में कदम, पीयूष गोयल ने बताया यात्रा को सफल

    भारत-कनाडा व्यापारिक रिश्तों में मजबूती की दिशा में कदम, पीयूष गोयल ने बताया यात्रा को सफल

    नई दिल्ली । केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने अपने हालिया कनाडा दौरे को भारत और कनाडा के द्विपक्षीय संबंधों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और सकारात्मक बताया है। उन्होंने कहा कि इस यात्रा ने दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को नई गति प्रदान की है, जिससे भविष्य में साझेदारी के और मजबूत होने की उम्मीद है।

    केंद्रीय मंत्री ने अपनी यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि कनाडा में हुई उच्च स्तरीय बैठकों ने दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग को और मजबूत किया है। इस दौरान उनकी मुलाकात कनाडा के शीर्ष नेतृत्व, व्यापार जगत के प्रतिनिधियों और निवेश से जुड़े प्रमुख हितधारकों से हुई, जहां भविष्य की आर्थिक संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

    दौरे के दौरान Piyush Goyal ने कनाडा के प्रधानमंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों के साथ बैठकें कीं, जिनमें द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और निवेश के नए अवसरों को विकसित करने पर सहमति बनी। उन्होंने कहा कि भारत और कनाडा के बीच मौजूदा आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए दोनों देशों की सरकारें साझा रूप से काम कर रही हैं।

    सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच वर्तमान व्यापार लगभग 8.5 अरब डॉलर का है, जिसे वर्ष 2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर बातचीत को गति देने पर भी जोर दिया गया है, ताकि व्यापारिक बाधाओं को कम किया जा सके और निवेश के नए रास्ते खोले जा सकें।

    कनाडा यात्रा के दौरान केंद्रीय मंत्री ने निवेश गोलमेज बैठकों में भाग लिया और विभिन्न उद्योग जगत के नेताओं के साथ संवाद किया। उन्होंने भारत के तेजी से बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम, तकनीकी नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था की मजबूती को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लीनटेक, एग्रीटेक और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

    इसके अलावा उन्होंने ओंटारियो के प्रीमियर के साथ भी बैठक की, जिसमें विनिर्माण, बुनियादी ढांचा, स्वच्छ ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी को और आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक सहयोग को केवल व्यापार तक सीमित न रखते हुए उसे दीर्घकालिक निवेश और तकनीकी साझेदारी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

    केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि भारत और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं और यदि दोनों देश मिलकर काम करें तो वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आर्थिक साझेदारी का मॉडल तैयार किया जा सकता है। उन्होंने अपनी यात्रा को सफल बताते हुए कहा कि यह दौरा दोनों देशों के संबंधों में एक नई ऊर्जा और दिशा लेकर आया है।

    कुल मिलाकर यह दौरा भारत और कनाडा के बीच आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में व्यापार और निवेश के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

  • चार दशकों की सैन्य सेवा के बाद जनरल अनिल चौहान का रिटायरमेंट, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर गार्ड ऑफ ऑनर के साथ भावुक विदाई

    चार दशकों की सैन्य सेवा के बाद जनरल अनिल चौहान का रिटायरमेंट, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर गार्ड ऑफ ऑनर के साथ भावुक विदाई

    नई दिल्ली । देश के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी पद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) से जनरल अनिल चौहान का कार्यकाल शनिवार को औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। राष्ट्रीय राजधानी में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर आयोजित एक गरिमामय समारोह में उन्होंने त्रि-सेवाओं द्वारा दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर को स्वीकार किया और शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित कर अपने सैन्य जीवन को भावनात्मक विदाई दी। चार दशक से अधिक समय तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले जनरल चौहान ने 1981 में सेना में कमीशन प्राप्त किया था और अपने लंबे करियर के दौरान कई महत्वपूर्ण कमान और स्टाफ पदों पर कार्य किया। उनके रिटायरमेंट समारोह में सैन्य परंपराओं और सम्मान की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जहां उन्होंने वर्दीधारी जीवन को अलविदा कहते हुए इसे अपने जीवन का एक अत्यंत गौरवपूर्ण अध्याय बताया।

    जनरल चौहान ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर अंतिम बार पुष्पांजलि अर्पित करना उनके लिए अत्यंत भावुक और सम्मानजनक क्षण था, क्योंकि यह उन वीर जवानों को श्रद्धांजलि देने का अवसर था जिन्होंने देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि तीनों सेनाओं द्वारा दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदाई लेना उनके लिए गर्व का विषय है और यह उनके सैन्य जीवन की सबसे यादगार क्षणों में से एक रहेगा। इस अवसर पर उन्होंने अपने सहकर्मियों, वरिष्ठ अधिकारियों और सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय सेना में बिताया गया प्रत्येक क्षण उनके लिए सीख और प्रेरणा से भरा रहा है।

    अपने कार्यकाल को याद करते हुए जनरल चौहान ने कहा कि सीडीएस के रूप में उनका समय अत्यंत संतोषजनक रहा और इस दौरान तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और एकीकरण को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास किए गए। उन्होंने संयुक्त रक्षा प्रणाली और आधुनिक रणनीतिक ढांचे को आगे बढ़ाने में सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। उनके नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव और संयुक्त अभ्यासों को बढ़ावा मिला, जिससे देश की रक्षा क्षमता को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में कदम उठाए गए।

    जनरल चौहान की सेवानिवृत्ति को भारतीय सैन्य ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान त्रि-सेवाओं के बीच तालमेल और एकीकृत रणनीति को बढ़ावा देने में केंद्रीय भूमिका निभाई। चार दशकों से अधिक की सेवा में उन्होंने देश के विभिन्न संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और अनेक प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान भी प्राप्त किए। उनके योगदान को भारतीय रक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा, जहां उन्होंने न केवल नेतृत्व किया बल्कि आधुनिक सैन्य संरचना को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई।