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  • भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का दम, 130 देशों की भागीदारी के बीच मिले 14,300 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव

    भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का दम, 130 देशों की भागीदारी के बीच मिले 14,300 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव

    नई दिल्ली । भारत के टेक्सटाइल और परिधान उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले भारत टेक्स 2026 ने इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और पारंपरिक भारतीय शिल्प को एक ही मंच पर जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। तीसरे संस्करण के रूप में आयोजित इस प्रदर्शनी में दुनिया के 130 से अधिक देशों से छह हजार से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खरीदार पहुंचे, जबकि करीब 1.30 लाख व्यापारिक आगंतुकों ने इसमें भाग लिया। व्यापक वैश्विक भागीदारी ने यह संकेत दिया कि भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के प्रति अंतरराष्ट्रीय बाजार का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।

    करीब 1.6 मिलियन वर्ग फुट क्षेत्र में आयोजित इस विशाल प्रदर्शनी में 20 हजार से अधिक टेक्सटाइल उत्पाद प्रदर्शित किए गए। आयोजन का उद्देश्य केवल व्यापारिक अवसर उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि भारतीय विरासत, पारंपरिक शिल्प, आधुनिक तकनीक और सतत विकास को एक साथ प्रस्तुत करना भी रहा। प्रदर्शनी में टेक्सटाइल उद्योग की पूरी वैल्यू चेन को शामिल किया गया, जिससे घरेलू और विदेशी खरीदारों को एक ही स्थान पर विविध उत्पादों और नवाचारों का व्यापक परिचय मिला।

    प्रदर्शनी में फाइबर, यार्न, फैब्रिक, रेडीमेड परिधान, होम टेक्सटाइल्स, टेक्निकल टेक्सटाइल्स, हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट्स सहित अनेक क्षेत्रों के उत्पाद प्रदर्शित किए गए। इससे भारतीय उद्योग की विविधता और उत्पादन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तथा निवेशकों के सामने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर मिला। विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कला और वस्त्र परंपराओं ने भी विदेशी प्रतिनिधियों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

    बिहार की प्रसिद्ध टिकुली कला इस आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रही। अपनी चमकदार रंग योजना और बारीक इनामेल कार्य के लिए प्रसिद्ध इस पारंपरिक कला ने भारतीय हस्तशिल्प की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाया। इसके अलावा देशभर के अनेक पारंपरिक हस्तशिल्प और वस्त्र उत्पादों ने भी आगंतुकों का ध्यान आकर्षित किया।

    हैंडलूम क्षेत्र को भी प्रदर्शनी में विशेष स्थान दिया गया। लगभग 120 बुनकरों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक निर्यातक हैंडलूम सहकारी संस्था ने रियायती स्टॉल के माध्यम से अपने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के सामने प्रस्तुत किए। इस पहल से छोटे बुनकरों और पारंपरिक उत्पादकों को वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जिससे निर्यात की संभावनाओं को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    भारत टेक्स 2026 में 1,600 से अधिक प्रदर्शकों और 11 हजार से ज्यादा खरीदारों की भागीदारी रही। आयोजन के दौरान 28 हजार से अधिक बिजनेस-टू-बिजनेस बैठकें आयोजित की गईं, जबकि 100 से अधिक गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट और बिजनेस-टू-गवर्नमेंट संवाद भी हुए। इन बैठकों के परिणामस्वरूप 14,300 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग में बढ़ते निवेश विश्वास का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    इस आयोजन के साथ आयोजित इंडी हाट 2026 ने भी भारतीय हैंडलूम और हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें 48 कारीगरों और बुनकरों के साथ 12 डिजाइन आधारित ब्रांड्स ने भाग लेकर क्षेत्रीय कला और शिल्प परंपराओं का प्रदर्शन किया। गुलाबी मीनाकारी, डोकरा, उस्ता कला, पिचवाई, सोजनी कढ़ाई, ब्लू पॉटरी, सिल्वर फिलिग्री, चेरियाल पेंटिंग, माता नी पछेड़ी, पेपियर-माशे, बागरू ब्लॉक प्रिंटिंग, जामदानी साड़ियां, मूगा और एरी सिल्क तथा ओडिशा इकत जैसी अनेक पारंपरिक कलाओं ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की समृद्ध विविधता को वैश्विक मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

  • अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?

    अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के एक महत्वपूर्ण सर्विलांस टावर को नष्ट कर दिया है। अमेरिकी सेना ने इस कार्रवाई का वीडियो फुटेज भी जारी किया है।

    अमेरिका के अनुसार, यह हमला होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की निगरानी और सैन्य क्षमता को कमजोर करने के अभियान का हिस्सा था। अमेरिकी सेंट्रल कमान (CENTCOM) ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि अमेरिकी सेना ने चाबहार बंदरगाह शहर में स्थित ‘चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट’ सर्विलांस टावर को निशाना बनाया।

    खास बात यह है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत भी कभी ईरान का सहयोगी रह चुका है। भारत ने इस रणनीतिक बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    16 जुलाई को किया गया हमला
    CENTCOM के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने 16 जुलाई को इस ऑपरेशन को अंजाम दिया और चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट के सर्विलांस टावर को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह टावर ईरान के ओमान की खाड़ी तट पर मौजूद समुद्री निगरानी नेटवर्क का हिस्सा था। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की निगरानी और कार्रवाई के लिए किया जाता था।

    अमेरिका के अनुसार, टावर के नष्ट होने से IRGC की उस क्षमता को नुकसान पहुंचा है, जिसके जरिए वह रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखने और हमलों के समन्वय का काम करता था।

    अमेरिका ने बताई कार्रवाई की वजह
    CENTCOM ने कहा कि इस हमले से नागरिक जहाजों के क्रू सदस्यों को निशाना बनाने की IRGC की क्षमता कम होगी। अमेरिकी कमान ने यह भी दावा किया कि इस कार्रवाई से क्षेत्रीय जल क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा कि यह सुविधा उन जहाजों के लिए लागू नहीं होगी, जो ईरान के खिलाफ चल रही अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे हैं।

    होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव
    अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान लंबे समय से इस इलाके में अपनी सैन्य और निगरानी क्षमता बनाए हुए है।

    चाबहार और भारत का संबंध
    चाबहार बंदरगाह भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व रखता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इस बंदरगाह के विकास में सहयोग किया था। इसका उद्देश्य भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराना था। यही वजह है कि चाबहार का नाम किसी भी सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में आने पर भारत के लिए भी यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है।

  • भारत में पहली बार निजी कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जानिए क्या है मिशन आगमन ?

    भारत में पहली बार निजी कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जानिए क्या है मिशन आगमन ?


    नई दिल्ली। भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक पल आने वाला है। पहली बार कोई भारतीय निजी कंपनी अपने स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने का प्रयास करेगी। हैदराबाद की स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले ऑर्बिटल क्लास लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 का परीक्षण मिशन ‘मिशन आगमन’ लॉन्च करने जा रही है।

    यह मिशन इसलिए खास है क्योंकि अब तक भारत में उपग्रहों को कक्षा में भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए होता रहा है। विक्रम-1 की सफलता के साथ निजी कंपनियों के लिए व्यावसायिक अंतरिक्ष लॉन्च सेवाओं का नया रास्ता खुल सकता है।

    क्या है मिशन आगमन?
    मिशन आगमन, विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इसका प्रक्षेपण सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है। इस मिशन के जरिए स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी तरीके से विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमता, तकनीक और प्रदर्शन का परीक्षण करेगी।

    विक्रम-1 रॉकेट की खासियत
    विक्रम-1 का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।

    इस रॉकेट की प्रमुख विशेषताएं-
    – विक्रम-1 करीब 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है।
    – इसे छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
    – इसका ढांचा हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से तैयार किया गया है।
    – कार्बन फाइबर मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट की दक्षता बढ़ती है।
    – इसमें तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं।
    – रॉकेट के ऊपरी हिस्से में ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।
    – विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में करीब 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने के लिए तैयार किया गया है।

    विक्रम-1 में कौन-सी नई तकनीकें?
    विक्रम-1 में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिक्विड इंजन पूरी तरह धातु से बने 3डी-प्रिंटेड इंजन हैं। 3डी प्रिंटिंग तकनीक के जरिए ऐसे इंजन बनाए जा सकते हैं जिनके निर्माण में पहले सैकड़ों अलग-अलग पुर्जों की जरूरत पड़ती थी। इससे निर्माण प्रक्रिया तेज होती है और लागत भी कम होती है। इसके अलावा स्काईरूट ने अपना खुद का न्यूमेटिक स्टेज सेपरेशन सिस्टम विकसित किया है, जो मॉड्यूलर और परीक्षण योग्य है। कंपनी के अनुसार इन तकनीकों से रॉकेट को हल्का, अधिक भरोसेमंद और किफायती बनाया गया है।

    विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में क्या जाएगा?
    – मिशन आगमन में कई खास पेलोड भेजे जाएंगे।
    – इनमें बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा तैयार किया गया लैब-निर्मित डायमंड लोटस शामिल है।

    इसके अलावा अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी अंतरिक्ष में भेजी जाएगी। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है।

    इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी भेजा जाएगा, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा है। इसके अलावा स्काईरूट की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के समर्थकों के संदेश भी अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे।

    क्यों महत्वपूर्ण है मिशन आगमन?
    – अगर विक्रम-1 सफल होता है तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं दे सकेंगी।
    – आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार, यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत कर सकता है।
    – वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

    स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत
    स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में हुई थी। कंपनी का लक्ष्य दुनिया भर के उपग्रह संचालकों को किफायती, भरोसेमंद और जरूरत के अनुसार लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराना है। कंपनी को इसरो की परीक्षण सुविधाओं और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से विकास में तेजी मिली और लागत कम रखने में मदद मिली।

    विक्रम-एस से विक्रम-1 तक का सफर
    स्काईरूट ने 18 नवंबर 2022 को अपना पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-एस सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। ‘प्रारंभ’ नाम के इस मिशन ने भारत के पहले निजी रॉकेट लॉन्च का इतिहास बनाया। यह रॉकेट करीब 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और अपने निर्धारित मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए बंगाल की खाड़ी में उतरा। इस मिशन में सॉलिड प्रोपल्शन, कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर, एवियोनिक्स और टेलीमेट्री जैसी तकनीकों का परीक्षण किया गया था, जिनका आधार अब विक्रम-1 में इस्तेमाल किया गया है।

    भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को कैसे मिला बढ़ावा?
    सरकार ने स्पेस स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं—

    2023
    – भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 लागू की गई।
    – इन-स्पेस सीड फंड योजना शुरू की गई।

    2024
    – अंतरिक्ष क्षेत्र में एफडीआई नियमों को आसान बनाया गया।
    – एनजीपी-2024 के जरिए मंजूरी प्रक्रिया को सरल किया गया।
    – इन-स्पेस प्री-इन्क्यूबेशन उद्यमिता कार्यक्रम शुरू किया गया।
    – स्पेस स्टार्टअप्स के लिए 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड बनाया गया।

    2025
    – नई अंतरिक्ष तकनीकों के लिए 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड बनाया गया।
    – एसएसएलवी तकनीक हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को हस्तांतरित की गई।

    2026
    – पीपीपी मॉडल के तहत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह नेटवर्क विकसित करने की पहल शुरू की गई।

    भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की स्थिति
    सरकार के अनुसार, वर्ष 2014 में देश में केवल एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप था, जबकि फरवरी 2026 तक इनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है।

    भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में अब तक 50 करोड़ डॉलर (500 मिलियन डॉलर) से अधिक का निवेश हो चुका है। अकेले 2025 में करीब 15 करोड़ डॉलर (150 मिलियन डॉलर) का निवेश आया।

    पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियां भारत के नए अंतरिक्ष युग की प्रमुख कंपनियों के रूप में उभर रही हैं।

    अगर मिशन आगमन सफल रहता है, तो यह केवल स्काईरूट एयरोस्पेस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए दौर की शुरुआत साबित हो सकती है।

  • 'सेमिकॉन 2.0' से भारत के टेक सेक्टर को नई रफ्तार, अगले पांच वर्षों में 2 लाख तक रोजगार और वैश्विक चिप हब बनने की मजबूत उम्मीद

    'सेमिकॉन 2.0' से भारत के टेक सेक्टर को नई रफ्तार, अगले पांच वर्षों में 2 लाख तक रोजगार और वैश्विक चिप हब बनने की मजबूत उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग को नई दिशा देने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘सेमिकॉन 2.0’ योजना को उद्योग जगत ने रोजगार, निवेश और तकनीकी विकास के लिहाज से एक महत्वपूर्ण पहल बताया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस योजना के प्रभाव से अगले पांच वर्षों में देश में 1.5 लाख से 2 लाख तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही भारत केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली तक सीमित न रहकर वैश्विक चिप डिजाइन, इंजीनियरिंग और नवाचार के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।

    उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि सेमिकॉन 2.0 का दायरा केवल सेमीकंडक्टर निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा। इसके माध्यम से चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर वेरिफिकेशन, एम्बेडेड सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उत्पादन, एडवांस्ड पैकेजिंग और आधुनिक सप्लाई चेन जैसी उच्च तकनीक वाली गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे देश में एक व्यापक और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा।

    हाल ही में केंद्र सरकार ने 1.27 लाख करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ सेमिकॉन 2.0 योजना को मंजूरी दी है। इस योजना का उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर डिजाइन, निर्माण, अनुसंधान और प्रतिभा विकास को नई गति देना है, ताकि देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। सरकार का मानना है कि इस पहल से घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और आयात पर निर्भरता कम करने में भी सहायता मिलेगी।

    विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2030 तक सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से जुड़े अधिकांश पदों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग के कारण चिप डिजाइन, रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और इंजीनियरिंग से जुड़े उच्च कौशल वाले पेशेवरों की मांग तेजी से बढ़ेगी। इससे तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे और उद्योग को प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध होगा।

    उद्योग जगत का यह भी मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र से जुड़े ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे देश को इंजीनियरिंग, अनुसंधान और नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित होने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही घरेलू कंपनियों को भी उच्च मूल्य वाले उत्पादों और बौद्धिक संपदा के विकास का अवसर मिलेगा, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग मुख्य रूप से असेंबली आधारित उत्पादन पर केंद्रित रहा है, लेकिन सेमिकॉन 2.0 के माध्यम से देश चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, टेस्टिंग और एडवांस्ड पैकेजिंग जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत कर सकेगा। इससे न केवल नई तकनीकों का विकास होगा, बल्कि दीर्घकाल में भारतीय उद्योग को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त भी मिलेगी।

    सरकार ने इस योजना के तहत चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग उपकरण एवं सामग्री, फैब्रिकेशन सुविधाएं, एटीएमपी और ओसैट यूनिट्स, अनुसंधान एवं विकास तथा प्रतिभा विकास जैसे छह प्रमुख स्तंभों पर आधारित सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करने का लक्ष्य रखा है। अब तक 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ है। उद्योग जगत का मानना है कि इन पहलों से भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में भरोसेमंद भागीदार के रूप में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत कर सकेगा।

  • विप्रो के पहली तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में गिरावट के बीच कंपनी ने अंतरिम लाभांश का किया ऐलान

    विप्रो के पहली तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में गिरावट के बीच कंपनी ने अंतरिम लाभांश का किया ऐलान

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख आईटी कंपनी विप्रो ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में उसके शुद्ध मुनाफे में तिमाही आधार पर 4.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि कुल आय में केवल मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और आईटी सेवाओं की मांग में संतुलित वृद्धि के बीच कंपनी का प्रदर्शन बाजार की निगाहों में बना हुआ है।

    कंपनी की ओर से जारी वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में विप्रो का समेकित शुद्ध लाभ घटकर 3,352 करोड़ रुपये रहा। वहीं, कंपनी की कुल आय तिमाही आधार पर लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 24,480 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। सालाना आधार पर आय में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मुनाफा लगभग स्थिर रहा।

    परिचालन प्रदर्शन की बात करें तो आईटी सेवा कारोबार का ऑपरेटिंग मार्जिन 16 प्रतिशत रहा। यह पिछली तिमाही और पिछले वर्ष की समान अवधि दोनों की तुलना में कम रहा। मार्जिन में आई गिरावट को लागत और बाजार परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि कंपनी ने नकदी प्रवाह के मोर्चे पर सकारात्मक प्रदर्शन दर्ज किया है।

    जून तिमाही के दौरान कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो बढ़कर 3,290 करोड़ रुपये हो गया। यह तिमाही की शुद्ध आय का लगभग 98 प्रतिशत रहा, जिसे कंपनी के लिए मजबूत नकदी स्थिति का संकेत माना जा रहा है। वहीं पिछले 12 महीनों के आधार पर स्वैच्छिक कर्मचारी त्याग दर 13.9 प्रतिशत दर्ज की गई, जो आईटी उद्योग में मानव संसाधन की स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है।

    विप्रो ने आगामी तिमाही के लिए भी अपना कारोबारी अनुमान जारी किया है। कंपनी का कहना है कि आईटी सेवा कारोबार की आय में अगली तिमाही के दौरान 1.5 प्रतिशत तक गिरावट या 0.5 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी फिलहाल सतर्क कारोबारी दृष्टिकोण अपनाए हुए है और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों पर करीबी नजर बनाए हुए है।

    कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक श्रीनी पल्लिया ने कहा कि वैश्विक ग्राहक अब केवल तकनीकी आधुनिकीकरण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परिचालन मॉडल को तेजी से अपना रहे हैं। उनके अनुसार, विप्रो अपनी कंसल्टिंग विशेषज्ञता और एआई आधारित समाधान के माध्यम से ग्राहकों को उनके कारोबारी बदलाव में सहयोग दे रही है। उन्होंने कहा कि कंपनी की रणनीति ग्राहकों के व्यवसाय में एआई को प्रभावी ढंग से शामिल करने पर केंद्रित है।

    तिमाही नतीजों के साथ कंपनी के निदेशक मंडल ने प्रति इक्विटी शेयर दो रुपये के अंतरिम लाभांश की भी घोषणा की है। शेयर बाजार में परिणाम जारी होने के बाद कंपनी के शेयर में बढ़त देखने को मिली। हालांकि पिछले कुछ महीनों और एक वर्ष के दौरान शेयर के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है। अब निवेशकों की नजर कंपनी की आगामी तिमाहियों की रणनीति, वैश्विक आईटी मांग और एआई आधारित सेवाओं के विस्तार पर बनी रहेगी।

  • एडीबी की रिपोर्ट में भारत-नेपाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की सिफारिश, सीमा-पार लेनदेन होंगे आसान

    एडीबी की रिपोर्ट में भारत-नेपाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की सिफारिश, सीमा-पार लेनदेन होंगे आसान

    नई दिल्ली । एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने भारत और नेपाल के बीच डिजिटल पेमेंट कॉरिडोर को दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया है। बैंक का मानना है कि सीमा-पार डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत करने से व्यापार, पर्यटन और रेमिटेंस के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। एडीबी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि दोनों देशों के बीच हर वर्ष अरबों डॉलर का आर्थिक लेनदेन होता है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब भी पारंपरिक बैंकिंग माध्यमों के जरिए संचालित होता है।

    रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल भुगतान तकनीक में तेज प्रगति के बावजूद सीमा-पार भुगतान व्यवस्था का पूरा लाभ अभी तक नहीं उठाया जा सका है। एडीबी का कहना है कि यदि दोनों देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को अधिक इंटरऑपरेबल और समन्वित बनाया जाए तो व्यापारियों, पर्यटकों और आम उपभोक्ताओं के लिए भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज, सुरक्षित और सुविधाजनक हो सकती है।

    रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि नेपाल के डिजिटल भुगतान तंत्र को मजबूत करने के लिए क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर, नियामकीय समन्वय, भुगतान प्रणालियों की इंटरऑपरेबिलिटी और बाजार एकीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही घरेलू डिजिटल अवसंरचना और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने के लिए विभिन्न हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी बताई गई है।

    वर्ष 2024 में नेपाल राष्ट्र बैंक और भारतीय रिजर्व बैंक ने नेपाल के नेशनल पेमेंट्स इंटरफेस को भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) से जोड़ने की दिशा में नियामकीय समझौते किए थे। इसके बाद मार्च 2024 से भारतीय नागरिक नेपाल में फोनेपे और खल्ती जैसे क्यूआर कोड के माध्यम से अपने भारतीय भुगतान ऐप का उपयोग कर भुगतान कर रहे हैं। इस सुविधा को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और डिजिटल लेनदेन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में प्रतिदिन लगभग 500 डिजिटल भुगतान दर्ज किए जाते थे, जो वर्ष 2025 की शुरुआत तक बढ़कर करीब 2,000 प्रतिदिन हो गए। इससे प्रतिदिन लाखों नेपाली रुपये का कारोबार हो रहा है और कुल सीमा-पार डिजिटल भुगतान का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा नेपालपे क्यूआर प्रणाली का उपयोग अन्य देशों के पर्यटक भी कर रहे हैं, जिससे डिजिटल भुगतान का दायरा और विस्तृत हुआ है।

    हालांकि एडीबी ने यह भी उल्लेख किया है कि अभी तक नेपाल के नागरिकों के लिए भारत में क्यूआर कोड आधारित भुगतान की समान सुविधा पूरी तरह शुरू नहीं हो सकी है। रिपोर्ट के अनुसार, कमीशन संरचना और शुल्क निर्धारण से जुड़े कुछ नियामकीय मुद्दे इस दिशा में प्रमुख बाधा बने हुए हैं। इन चुनौतियों के समाधान के बाद दोनों देशों के बीच पूरी तरह द्विपक्षीय डिजिटल भुगतान व्यवस्था लागू की जा सकती है।

    एडीबी ने सिफारिश की है कि भारत और नेपाल को सीमा-पार डिजिटल भुगतान से जुड़े लंबित मुद्दों का शीघ्र समाधान करना चाहिए। बैंक का मानना है कि आधुनिक भुगतान प्रणाली को व्यापक स्तर पर लागू करने से द्विपक्षीय व्यापार को नई गति मिलेगी, पर्यटकों को अधिक सुविधा मिलेगी और दोनों देशों के बीच रेमिटेंस भेजने की प्रक्रिया भी पहले की तुलना में अधिक सरल, तेज और किफायती बन सकेगी।

  • जून में ऑटो सेक्टर ने पकड़ी तेज रफ्तार, यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत उछली; दोपहिया, तिपहिया और निर्यात में भी दर्ज हुई मजबूत बढ़त

    जून में ऑटो सेक्टर ने पकड़ी तेज रफ्तार, यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत उछली; दोपहिया, तिपहिया और निर्यात में भी दर्ज हुई मजबूत बढ़त

    नई दिल्ली । जून महीने में भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग ने मजबूत वृद्धि दर्ज करते हुए घरेलू बाजार में मांग के लगातार बढ़ने के संकेत दिए हैं। यात्री वाहनों की थोक बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ दोपहिया, तिपहिया और वाहन निर्यात के आंकड़ों में भी प्रभावशाली सुधार देखने को मिला है। उद्योग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वाहन निर्माताओं द्वारा डीलरों को भेजे जाने वाले वाहनों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक रही, जिससे बाजार में उपभोक्ता मांग और उत्पादन गतिविधियों में तेजी का संकेत मिलता है।

    जून के दौरान यात्री वाहनों की थोक बिक्री 24.1 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ 3,88,144 यूनिट्स तक पहुंच गई। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 3,12,851 यूनिट्स था। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि देश में निजी वाहनों की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। बेहतर आर्थिक गतिविधियों, उपभोक्ताओं के बढ़ते विश्वास और नए मॉडलों की उपलब्धता ने इस प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    यात्री वाहन श्रेणी में सबसे बड़ा योगदान यूटिलिटी व्हीकल सेगमेंट का रहा। इस वर्ग की बिक्री में 19.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और कुल 2,17,228 यूनिट्स डीलरों तक भेजी गईं। वहीं, यात्री कारों की बिक्री भी 15.7 प्रतिशत बढ़कर 98,610 यूनिट्स पर पहुंच गई। वैन श्रेणी ने भी सकारात्मक प्रदर्शन करते हुए 9.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और इसकी बिक्री 10,230 यूनिट्स रही। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि विभिन्न श्रेणियों में उपभोक्ताओं की मांग संतुलित रूप से बढ़ रही है।

    दोपहिया वाहन बाजार ने भी जून में शानदार प्रदर्शन किया। इस श्रेणी में कुल 18,51,400 यूनिट्स की थोक बिक्री दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 18.6 प्रतिशत अधिक है। विशेष रूप से स्कूटर सेगमेंट सबसे तेजी से बढ़ने वाला वर्ग रहा, जहां बिक्री में 39.1 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ और कुल 7,44,823 यूनिट्स डीलरों तक पहुंचीं। दूसरी ओर मोटरसाइकिलों की बिक्री 6.4 प्रतिशत बढ़कर 10,56,422 यूनिट्स रही, जबकि मोपेड श्रेणी में कम आधार के कारण 50.4 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई और बिक्री 50,155 यूनिट्स तक पहुंच गई।

    तिपहिया वाहनों की बिक्री में भी मजबूत विस्तार देखने को मिला। जून के दौरान इस श्रेणी की थोक बिक्री 26.1 प्रतिशत बढ़कर 77,951 यूनिट्स रही। पैसेंजर कैरियर वाहनों की बिक्री में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि गुड्स कैरियर वाहनों की बिक्री 29.4 प्रतिशत बढ़ी। इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की मांग भी लगातार मजबूत बनी रही और ई-रिक्शा की बिक्री में 52.4 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो स्वच्छ और किफायती परिवहन विकल्पों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी भारतीय वाहन उद्योग का प्रदर्शन उत्साहजनक रहा। जून के दौरान कुल वाहन निर्यात 34 प्रतिशत बढ़कर 6,73,105 यूनिट्स पर पहुंच गया। इसमें दोपहिया वाहनों का निर्यात सबसे अधिक रहा, जिसमें 40.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 5,43,684 यूनिट्स विदेश भेजी गईं। तिपहिया वाहनों का निर्यात भी 39.7 प्रतिशत बढ़कर 51,950 यूनिट्स तक पहुंच गया, जबकि यात्री वाहनों का निर्यात लगभग स्थिर रहते हुए 76,601 यूनिट्स दर्ज किया गया। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू मांग में मजबूती, निर्यात बाजारों में बेहतर अवसर और विभिन्न वाहन श्रेणियों में लगातार बढ़ती बिक्री आने वाले महीनों में भी भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग की विकास गति को मजबूत बनाए रख सकती है।

  • भारत-यूके सीईटीए लागू, भारतीय उद्योग के लिए खुले नए अवसर; फिक्की ने बताया व्यापार और निवेश को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    भारत-यूके सीईटीए लागू, भारतीय उद्योग के लिए खुले नए अवसर; फिक्की ने बताया व्यापार और निवेश को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    नई दिल्ली । भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) लागू होने के बाद भारतीय उद्योग जगत ने इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उद्योग संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) का मानना है कि यह समझौता भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए नए बाजारों के द्वार खोलेगा तथा निर्यात, निवेश और औद्योगिक विकास को नई गति देगा। संगठन ने इसे भारत की वैश्विक आर्थिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    फिक्की के महासचिव अनंत स्वरूप ने समझौते के लागू होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए कहा कि भारत-यूके सीईटीए से वस्तुओं और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में कारोबार के नए अवसर पैदा होंगे। उनके अनुसार, नवाचार, प्रौद्योगिकी सहयोग और प्रतिभा के आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में बढ़ती साझेदारी भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर देगा और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की भूमिका को और सशक्त बनाएगा।

    फिक्की का कहना है कि यह समझौता भारत की मुक्त व्यापार समझौता नीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। संगठन के अनुसार, इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे तथा उद्योगों को नई तकनीकों, निवेश और वैश्विक सहयोग का लाभ मिलेगा। इसके साथ ही भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच नवाचार आधारित विकास को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।

    फिक्की के अध्यक्ष अनंत गोयनका ने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाली आर्थिक साझेदारियां भारत के ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। उनके अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि औद्योगिक क्षमता बढ़ाने, वैश्विक निवेश आकर्षित करने और भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए अधिक सक्षम बनाने में भी सहायक होगा। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ऐसे समझौते इस यात्रा को और मजबूत करेंगे।

    उद्योग संगठन का मानना है कि सीईटीए आर्थिक सहयोग के प्रति दीर्घकालिक और दूरदर्शी सोच को दर्शाता है। इससे व्यापार, निवेश, नवाचार और रोजगार के नए अवसर विकसित होने की संभावना है। साथ ही भारतीय कंपनियों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनने और विदेशी बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने का बेहतर अवसर मिलेगा। इससे घरेलू उद्योगों की उत्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मक दक्षता में भी सुधार आने की उम्मीद जताई गई है।

    भारत-यूके व्यापार समझौता बुधवार से प्रभावी हो गया है। इसके तहत भारत के लगभग 99 प्रतिशत निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच उपलब्ध होगी, जिससे द्विपक्षीय व्यापार के लगभग पूरे मूल्य को लाभ मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से वस्त्र, इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और पेशेवर सेवाओं सहित कई क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर उत्पादन, सेवाओं और रोजगार की मांग बढ़ने की भी संभावना जताई जा रही है, जिससे भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ लागू, स्कॉच व्हिस्की से लग्जरी कारों तक सस्ता होगा सामान

    भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ लागू, स्कॉच व्हिस्की से लग्जरी कारों तक सस्ता होगा सामान


    नई दिल्ली। भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) बुधवार, 15 जुलाई 2026 से लागू हो गया है। इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार पर लगने वाले कई आयात-निर्यात शुल्क में बड़ी कटौती होगी। इसका सीधा असर भारत में आने वाले ब्रिटिश उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे स्कॉच व्हिस्की, लग्जरी कारों और ब्यूटी प्रोडक्ट्स समेत कई सामान सस्ते हो सकते हैं।

    भारत और ब्रिटेन के बीच इस ऐतिहासिक व्यापार समझौते की घोषणा जून 2026 में की गई थी। अब इसके लागू होने के बाद दोनों देशों के कारोबार को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    स्कॉच व्हिस्की की कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद
    भारत में अभी स्कॉच व्हिस्की पर करीब 150 फीसदी तक आयात शुल्क लगाया जाता है। लेकिन FTA लागू होने के बाद इस ड्यूटी को चरणबद्ध तरीके से घटाकर 40 फीसदी तक लाया जाएगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय में ब्रिटेन से आने वाली स्कॉच व्हिस्की की कीमतों में करीब 110 फीसदी तक की कमी देखने को मिल सकती है। इससे भारतीय बाजार में ब्रिटिश शराब ब्रांड्स की पहुंच बढ़ सकती है।

    लैंड रोवर, जगुआर और रोल्स रॉयस जैसी कारें होंगी सस्ती
    फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तहत ब्रिटेन से आयात होने वाली लग्जरी कारों पर भी शुल्क में बड़ी कटौती की जाएगी। ऑटोमोबाइल सेक्टर में कोटा व्यवस्था के तहत आयात शुल्क को 100 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी तक करने का प्रावधान है।

    इससे ब्रिटेन की कंपनियों की कारें जैसे लैंड रोवर, जगुआर, रोल्स रॉयस, एस्टन मार्टिन और डिफेंडर भारतीय ग्राहकों के लिए पहले के मुकाबले सस्ती हो सकती हैं।

    नोटिफिकेशन के अनुसार, पहले साल 20,000 कारों को कम ड्यूटी पर आयात किया जा सकेगा। इनमें 3000cc से ज्यादा पेट्रोल इंजन और 2500cc से ज्यादा डीजल इंजन वाली 10,000 कारें शामिल होंगी। इन पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 110 फीसदी से घटकर 30 फीसदी हो जाएगी।

    वहीं, 1500cc से 3000cc तक की 5,000 कारों के आयात पर ड्यूटी 66 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी की जाएगी। इसके बाद इसे धीरे-धीरे कम किया जाएगा और 15 साल बाद कस्टम ड्यूटी को 10 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया है।

    ब्यूटी प्रोडक्ट्स समेत कई सामानों पर कम होगा टैरिफ
    FTA के तहत ब्यूटी और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स समेत कई अन्य ब्रिटिश उत्पादों पर लगने वाला 22 फीसदी तक का टैरिफ या तो तुरंत खत्म किया जाएगा या फिर अगले 10 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। इससे ब्रिटेन से आयात होने वाले कई उत्पाद भारतीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकते हैं।

    UK में भारतीय सामानों को मिलेगा बड़ा फायदा
    भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते का फायदा सिर्फ ब्रिटिश उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगा। इस डील के तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले कई सामानों पर भी शुल्क खत्म किया जाएगा।

    कपड़े, जूते और कुछ खाद्य उत्पादों समेत कई भारतीय वस्तुओं को ब्रिटेन में ड्यूटी फ्री या कम शुल्क के दायरे में लाया जाएगा। अभी ब्रिटेन में टेक्सटाइल गारमेंट पर 12 फीसदी, केमिकल्स पर 8 फीसदी और बेस मेटल्स पर 10 फीसदी तक ड्यूटी लगती है। FTA के बाद करीब 99 फीसदी भारतीय उत्पादों को शून्य शुल्क की सुविधा मिलने की बात कही गई है।

    दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
    ब्रिटिश सरकार के अनुमान के मुताबिक, भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में करीब 4.8 अरब पाउंड का इजाफा हो सकता है। इसके अलावा वास्तविक वेतन में भी करीब 2.2 अरब पाउंड की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है।

    ब्रिटेन इस समझौते को भारत के साथ अब तक का सबसे बड़ा व्यापक व्यापार समझौता बता रहा है। दोनों देशों को उम्मीद है कि यह डील निवेश, कारोबार और रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा देगी।

  • भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

    भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया।

    यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी।


    अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

    मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है।


    टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नाम

    ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी।

    सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया।


    ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकार

    विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

    सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है।


    लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?

    सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।”

    सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

    कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।


    भारत पर क्यों गहराया संकट?

    भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

    यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इससे पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई से कहा कि ट्रंप प्रशासन इस रूस प्रतिबंध विधेयक का समर्थन करता है। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले आयात पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ कारोबार जारी रखते हैं।