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  • 15 अगस्त तक 100 नए शहरों में पहुंचेगा 10 किलो एलपीजी सिलेंडर, छोटे परिवारों और कम खपत वाले उपभोक्ताओं को बड़ी राहत

    15 अगस्त तक 100 नए शहरों में पहुंचेगा 10 किलो एलपीजी सिलेंडर, छोटे परिवारों और कम खपत वाले उपभोक्ताओं को बड़ी राहत

    नई दिल्ली । घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत के अनुसार अधिक सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने बड़ा विस्तार कार्यक्रम शुरू किया है। कंपनी ने घोषणा की है कि 15 अगस्त तक देश के 24 राज्यों के 100 नए शहरों में 10 किलो वाले एलपीजी सिलेंडर की सुविधा उपलब्ध करा दी जाएगी। इस पहल का उद्देश्य उन उपभोक्ताओं को राहत देना है, जिनकी गैस खपत अपेक्षाकृत कम होती है और जिन्हें 14.2 किलो के पारंपरिक घरेलू सिलेंडर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

    कंपनी का मानना है कि छोटे आकार का सिलेंडर विशेष रूप से छोटे परिवारों, अकेले रहने वाले लोगों, किराए के मकानों में रहने वाले उपभोक्ताओं तथा सीमित गैस उपयोग करने वाले परिवारों के लिए अधिक उपयोगी साबित होगा। ऐसे उपभोक्ताओं को अब अपनी आवश्यकता के अनुसार सिलेंडर चुनने का विकल्प मिलेगा, जिससे घरेलू खर्च और उपयोग दोनों में बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा। साथ ही छोटे सिलेंडर का वजन कम होने से उसे उठाने और उपयोग करने में भी आसानी होगी।

    एलपीजी वितरण नेटवर्क के विस्तार के साथ कंपनी ऊर्जा सेवाओं को अधिक उपभोक्ता-केंद्रित बनाने की दिशा में काम कर रही है। 100 नए शहरों में सुविधा शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में ऐसे परिवारों को लाभ मिलने की संभावना है, जो अब तक केवल बड़े घरेलू सिलेंडर पर निर्भर थे। इससे उपभोक्ताओं के पास अपनी जरूरत और खपत के अनुरूप विकल्प उपलब्ध होंगे, जिससे सुविधा और उपयोगिता दोनों में वृद्धि होगी।

    कंपनी ने अपने परिचालन से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां भी साझा की हैं। जून तिमाही के दौरान कच्चे तेल की खरीद में विविधता लाने पर विशेष ध्यान दिया गया। रूस के अलावा वेनेजुएला और अंगोला जैसे देशों से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई गई है। कंपनी के अनुसार, स्पॉट मार्केट से खरीद का हिस्सा भी बढ़ा है, जिससे वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप खरीद रणनीति को अधिक लचीला बनाया जा सका है।

    ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से कंपनी ने पर्याप्त कच्चे तेल का भंडार भी बनाए रखा है। उपलब्ध भंडार लगभग 35 दिनों की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त बताया गया है। इससे वैश्विक बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव या आपूर्ति संबंधी चुनौतियों की स्थिति में परिचालन को स्थिर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। कंपनी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का असर भविष्य के वित्तीय प्रदर्शन पर पड़ सकता है, इसलिए खरीद और भंडारण रणनीति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि 10 किलो एलपीजी सिलेंडर का विस्तार उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया व्यावहारिक कदम है। इससे ऐसे परिवारों को आर्थिक और उपयोग संबंधी सुविधा मिलेगी, जिनकी मासिक गैस खपत कम रहती है। साथ ही यह पहल घरेलू एलपीजी वितरण व्यवस्था को अधिक लचीला और उपभोक्ता-अनुकूल बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    15 अगस्त तक विस्तार योजना पूरी होने के बाद जिन शहरों में यह सुविधा शुरू होगी, वहां के उपभोक्ताओं को पारंपरिक बड़े सिलेंडर के साथ एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होगा। इससे घरेलू एलपीजी सेवाओं का दायरा बढ़ने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को अपनी जरूरत के अनुसार बेहतर और अधिक सुविधाजनक चयन करने का अवसर मिलेगा।

  • फार्मा सेक्टर के लिए नए नियम लागू, मार्केटिंग खर्च का खुलासा अनिवार्य; अनैतिक प्रचार पर कड़ी निगरानी

    फार्मा सेक्टर के लिए नए नियम लागू, मार्केटिंग खर्च का खुलासा अनिवार्य; अनैतिक प्रचार पर कड़ी निगरानी

    नई दिल्ली । दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता और नैतिक मानकों को मजबूत करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने नए सख्त नियम लागू किए हैं। इन प्रावधानों के तहत दवा कंपनियों के प्रचार-प्रसार के तरीकों पर निगरानी बढ़ाई गई है और डॉक्टरों को गिफ्ट, नकद लाभ या अन्य प्रकार के व्यक्तिगत प्रलोभन देने पर स्पष्ट रोक लगा दी गई है। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य दवाओं के प्रचार को जिम्मेदार, पारदर्शी और जनहित के अनुरूप बनाना है।

    सरकार के अनुसार, यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (यूसीपीएमपी) 2024 के तहत सभी दवा कंपनियों को अपनी आंतरिक नैतिक व्यवस्था को मजबूत करना होगा। इसके लिए प्रत्येक कंपनी को एथिक्स कमेटी का गठन करना, एथिक्स ऑफिसर नियुक्त करना और शिकायतों के निपटारे के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करना अनिवार्य किया गया है। साथ ही नियमों के पालन से संबंधित स्व-घोषणा भी देनी होगी, जिससे कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

    नए नियमों में यह भी प्रावधान किया गया है कि दवा कंपनियां अपने वार्षिक मार्केटिंग खर्च का विस्तृत विवरण निर्धारित पोर्टल पर उपलब्ध कराएं। विशेष रूप से डॉक्टरों और स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़ी प्रचार गतिविधियों, कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, कार्यशालाओं तथा कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन और कंटीन्यूइंग प्रोफेशनल डेवलपमेंट कार्यक्रमों पर किए गए खर्च का भी खुलासा करना होगा। सरकार का मानना है कि इससे फार्मा उद्योग में वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी और अनावश्यक प्रभाव की संभावनाएं कम होंगी।

    नियमों के तहत मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और अन्य मार्केटिंग कर्मचारियों की गतिविधियों की जिम्मेदारी संबंधित दवा कंपनी की होगी। यदि किसी कर्मचारी द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो उसकी जवाबदेही कंपनी पर भी तय की जाएगी। इसके अलावा स्वतंत्र, रैंडम अथवा जोखिम आधारित ऑडिट का भी प्रावधान रखा गया है, ताकि नियमों के अनुपालन की नियमित समीक्षा की जा सके।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी दवा कंपनी को डॉक्टरों या उनके परिवार के सदस्यों को उपहार, नकद लाभ, महंगे आतिथ्य या अन्य व्यक्तिगत सुविधाएं उपलब्ध कराने की अनुमति नहीं होगी। इस कदम का उद्देश्य चिकित्सकीय निर्णयों को व्यावसायिक प्रभाव से मुक्त रखना और मरीजों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। इसके साथ ही डॉक्टरों और दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच होने वाले संपर्क और प्रचार गतिविधियों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं।

    शिकायतों के निपटारे के लिए दो-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है, जबकि अपीलों का अंतिम निपटारा संबंधित विभाग द्वारा किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इन व्यवस्थाओं से शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनेगी। साथ ही कंपनियों को नियमों के पालन के लिए नियमित निगरानी और उत्तरदायित्व की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

    स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्रावधानों का प्रभावी ढंग से पालन कराया जाता है तो फार्मास्युटिकल उद्योग में पारदर्शिता बढ़ेगी, चिकित्सकीय निर्णयों की निष्पक्षता मजबूत होगी और मरीजों का स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा भी और सुदृढ़ होगा। सरकार का यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं में नैतिक आचरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • NEET विवाद पर दीया मिर्जा ने उठाए सवाल, प्रधानमंत्री के बयान में छात्रों के दर्द और परिवारों की पीड़ा का जिक्र न होने पर जताई नाराजगी

    NEET विवाद पर दीया मिर्जा ने उठाए सवाल, प्रधानमंत्री के बयान में छात्रों के दर्द और परिवारों की पीड़ा का जिक्र न होने पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । NEET पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में जारी बहस के बीच बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया वीडियो संदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए छात्रों और उनके परिवारों की पीड़ा को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस पूरे विवाद में प्रभावित छात्रों और उनके परिजनों के दर्द के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाई जानी चाहिए थी। सोशल मीडिया पर साझा की गई उनकी टिप्पणी के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

    दीया मिर्जा ने अपनी पोस्ट में कहा कि प्रधानमंत्री के संबोधन में उन परिवारों के लिए पर्याप्त सहानुभूति दिखाई नहीं दी, जिन्होंने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि लंबे समय से आंदोलन कर रहे छात्रों और उनके समर्थन में आवाज उठाने वाले लोगों की भावनाओं का भी उल्लेख होना चाहिए था। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ मानवीय संवेदना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

    अभिनेत्री ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार की ओर से प्रतिक्रिया आने में काफी समय लगा। उनका कहना था कि इतने दिनों बाद जारी संदेश में ऐसी बातें अपेक्षित थीं, जो छात्रों और अभिभावकों के मन में पैदा हुई चिंता और निराशा को कुछ हद तक कम कर सकें। उन्होंने इस मुद्दे को केवल परीक्षा प्रणाली का संकट नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य और विश्वास से जुड़ा विषय बताया।

    दीया मिर्जा की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई लोगों ने उनके विचारों का समर्थन करते हुए कहा कि छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों का समर्थन करते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है। इस तरह सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के विचार सामने आए।

    इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम अपने वीडियो संदेश में कहा था कि पेपर लीक जैसी घटनाएं लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार इस तरह के मामलों में दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रही है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाएगा। उन्होंने फास्ट ट्रैक कोर्ट और कड़े कानूनी प्रावधानों की दिशा में कदम उठाने की भी जानकारी दी थी।

    इसी बीच शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चले अपने अनशन को समाप्त करने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि विभिन्न पक्षों के साथ बातचीत और व्यापक अपील के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया। उनके अनशन की समाप्ति के बावजूद परीक्षा सुधार, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और छात्रों के हितों की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक बहस जारी है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्ध जांच, कठोर कानूनी कार्रवाई और छात्रों का विश्वास बनाए रखना भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी। वहीं सार्वजनिक जीवन से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं यह भी दर्शाती हैं कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।

  • पश्चिम एशिया संकट से शेयर बाजार पर दबाव, लगातार पांचवें दिन टूटा सेंसेक्स-निफ्टी, निवेशकों की चिंता बढ़ी

    पश्चिम एशिया संकट से शेयर बाजार पर दबाव, लगातार पांचवें दिन टूटा सेंसेक्स-निफ्टी, निवेशकों की चिंता बढ़ी


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन शुक्रवार को घरेलू बाजार लगातार पांचवें सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। निवेशकों के बीच बढ़ती सतर्कता और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में कारोबार समाप्त करने पर मजबूर रहे। लगातार पांच दिनों की गिरावट ने बाजार की धारणा को कमजोर किया है और निवेशकों की चिंता भी बढ़ा दी है।

    कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 331.62 अंक यानी 0.43 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,059.77 अंक पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 भी 102 अंक यानी 0.43 प्रतिशत टूटकर 23,767.45 अंक पर आ गया। कारोबार की शुरुआत से ही बाजार दबाव में रहा और दिन के दौरान दोनों प्रमुख सूचकांक अपने निचले स्तर तक फिसल गए। हालांकि अंतिम घंटे में कुछ खरीदारी देखने को मिली, लेकिन इससे शुरुआती नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो सकी।

    व्यापक बाजार में भी कमजोरी का माहौल बना रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। निवेशकों ने जोखिम वाले शेयरों में नई खरीदारी से दूरी बनाए रखी और सुरक्षित निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दी।

    सेक्टरवार प्रदर्शन मिश्रित रहा। सूचना प्रौद्योगिकी, मीडिया, बैंकिंग और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से जुड़े शेयरों में सीमित मजबूती देखने को मिली, जबकि ऑटो, धातु, ऊर्जा, रियल्टी, ऑयल एंड गैस, फार्मा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के शेयरों पर दबाव बना रहा। ऑटो सेक्टर में सबसे अधिक कमजोरी दर्ज की गई, जबकि आईटी कंपनियों ने बाजार को कुछ हद तक सहारा देने का प्रयास किया।

    विश्लेषकों का मानना है कि बाजार पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का रहा। ब्रेंट क्रूड का दाम लगातार छठे कारोबारी सत्र में बढ़ते हुए 101 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। जुलाई महीने में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर हैं। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत बढ़ाने का कारण बन सकता है, जिसका सीधा असर शेयर बाजार की धारणा पर पड़ता है।

    साप्ताहिक आधार पर भी बाजार का प्रदर्शन कमजोर रहा। पूरे सप्ताह में सेंसेक्स करीब 2,100 अंक नीचे आया, जबकि निफ्टी में भी दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। लगातार बिकवाली यह संकेत देती है कि वैश्विक घटनाक्रमों के बीच निवेशक फिलहाल सतर्क रणनीति अपना रहे हैं और नए निवेश से पहले स्पष्ट संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 23,650 से 23,600 अंक का स्तर महत्वपूर्ण समर्थन माना जाएगा। यदि यह स्तर टूटता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। वहीं 23,950 से 24,000 अंक का दायरा निकटतम प्रतिरोध रहेगा। यदि बाजार इस स्तर को पार करने में सफल होता है तो निवेशकों का भरोसा लौट सकता है और सीमित अवधि के लिए राहत भरी तेजी देखने को मिल सकती है। फिलहाल वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां ही बाजार की अगली दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

  • यरुशलम में भारतीय प्रवासी की हत्या से सनसनी, इजराइली संदिग्ध गिरफ्तार; दुनिया भर में कई अहम घटनाक्रमों पर नजर

    यरुशलम में भारतीय प्रवासी की हत्या से सनसनी, इजराइली संदिग्ध गिरफ्तार; दुनिया भर में कई अहम घटनाक्रमों पर नजर

    नई दिल्ली । इजराइल के यरुशलम शहर में एक भारतीय प्रवासी की हत्या का मामला सामने आने के बाद स्थानीय पुलिस ने एक इजराइली नागरिक को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में घटना को आपराधिक प्रकृति का माना जा रहा है। इस बीच यूरोप और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनमें सऊदी शाही परिवार से जुड़ा मामला, ऑस्ट्रिया में ऐतिहासिक इमारत का नया उपयोग, स्विट्जरलैंड में एक वरिष्ठ नेता पर गंभीर आरोप और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय से जुड़ा अहम फैसला शामिल है।

    यरुशलम के कटामोन इलाके में गुरुवार को 40 वर्षीय भारतीय प्रवासी कामगार का शव एक मकान के भीतर मिला। पुलिस के अनुसार शव फर्श पर पड़ा था और घटनास्थल पर बड़ी मात्रा में खून मिला। मामले की सूचना मिलने के बाद जांच एजेंसियां तुरंत मौके पर पहुंचीं और साक्ष्य जुटाने का काम शुरू किया गया। पुलिस ने हत्या के संदेह में 31 वर्षीय एक इजराइली नागरिक को हिरासत में लिया है। फिलहाल मृतक और आरोपी की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण कर विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।

    उधर ब्रिटेन की राजधानी लंदन में सऊदी शाही परिवार के 29 वर्षीय राजकुमार अब्दुल्ला बिन फहद बिन अब्दुल्ला बिन अब्दुलअजीज बिन जलावी अल सऊद की मौत की जांच पूरी हो गई है। अदालत में पेश रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु अत्यधिक शराब, पार्टी ड्रग और प्रिस्क्रिप्शन दवाओं के संयुक्त प्रभाव से कार्डियक अरेस्ट होने के कारण हुई। जांच में इस घटना को ‘मिसएडवेंचर’ यानी अनजाने में हुई घातक दुर्घटना माना गया और आत्महत्या के कोई प्रमाण नहीं मिले। टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट में शरीर में अल्कोहल की मात्रा सामान्य कानूनी सीमा से कई गुना अधिक पाई गई।

    ऑस्ट्रिया में एडॉल्फ हिटलर के जन्मस्थान के रूप में पहचानी जाने वाली ऐतिहासिक इमारत को अब पुलिस स्टेशन में बदल दिया गया है। सरकार का उद्देश्य इस स्थान को नव-नाजी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने से रोकना है। वर्षों तक विवादों में रहने वाली इस इमारत को सरकार ने अपने नियंत्रण में लेकर इसका नया उपयोग तय किया। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम इतिहास के नकारात्मक प्रतीकों को महिमामंडित होने से रोकने की दिशा में उठाया गया है।

    स्विट्जरलैंड में बाल सुरक्षा कानूनों के समर्थक रहे पूर्व दक्षिणपंथी नेता पैट्रिक फ्राई गंभीर कानूनी संकट में घिर गए हैं। उन पर नाबालिग से दुष्कर्म, महिलाओं को नशीली दवा देकर यौन शोषण करने और हत्या के प्रयास जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अभियोजन पक्ष ने अदालत से उनके लिए उम्रकैद की मांग की है। जांच एजेंसियों का दावा है कि मामले से जुड़े कई डिजिटल और अन्य साक्ष्य बरामद किए गए हैं। आरोपी वर्ष 2023 से हिरासत में है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

    वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के मुख्य अभियोजक करीम खान को पद से हटाने के प्रस्ताव पर सदस्य देशों के बीच मतदान होना है। उन पर लगाए गए यौन दुराचार के आरोपों के बाद यह प्रक्रिया शुरू हुई है, हालांकि उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया है। सदस्य देशों के मतदान के बाद उनके भविष्य पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। इस मुद्दे पर कई प्रमुख देशों ने उन्हें पद से हटाने के समर्थन का संकेत दिया है।

  • अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    अमेरिका ने भारत से आयात पर 10% नया टैरिफ लागू किया, फोर्स्ड लेबर नियमों के बीच कई निर्यात क्षेत्रों पर बढ़ेगा दबाव

    नई दिल्ली । अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया है। यह निर्णय अमेरिकी ट्रेड एक्ट-1974 की धारा 301 के तहत लिया गया है, जिसके माध्यम से उन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई की जाती है जिनकी सप्लाई चेन में जबरन मजदूरी या श्रम मानकों से जुड़े गंभीर सवाल उठते हैं। यह नया टैरिफ ऐसे समय लागू हुआ है जब पहले से लागू 15 प्रतिशत अस्थायी वैश्विक टैरिफ की अवधि समाप्त हो गई। इसके साथ ही भारत के लिए नई शुल्क व्यवस्था प्रभावी हो गई है, जिससे कई निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।

    अमेरिका ने इस नई व्यवस्था के तहत कुल 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इनमें भारत सहित कुछ देशों को 10 प्रतिशत वाले समूह में रखा गया है, जबकि अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लागू किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जिन देशों ने फोर्स्ड लेबर से जुड़े उत्पादों पर रोक लगाने या श्रम मानकों में सुधार के लिए कदम उठाए हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम टैरिफ श्रेणी में रखा गया है।

    भारत के लिए राहत की बात यह रही कि प्रारंभिक प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की बात कही गई थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि भारत ने श्रम मानकों, सप्लाई चेन की निगरानी और विदेशी व्यापार नीति में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। इन कदमों के आधार पर प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क में 2.5 प्रतिशत की कमी की गई। हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका भविष्य में भी इन सुधारों की निगरानी जारी रखेगा।

    अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार माना जाता है। ऐसे में नया टैरिफ उन उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है जिनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अधिक है। टेक्सटाइल और गारमेंट्स, रत्न एवं आभूषण, चमड़ा उद्योग, कृषि एवं खाद्य उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और विभिन्न विनिर्माण उत्पादों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अतिरिक्त शुल्क लागू होने से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ने और निर्यातकों पर कीमत कम करने का दबाव बनने की संभावना है।

    फोर्स्ड लेबर का अर्थ ऐसी मजदूरी से है जिसमें किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम कराया जाता है। इसमें धमकी देना, वेतन रोकना, कर्ज के बदले काम कराने की मजबूरी, पहचान संबंधी दस्तावेज जब्त करना या नौकरी छोड़ने की स्वतंत्रता न देना जैसी स्थितियां शामिल होती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है और कई देश इस प्रकार के उत्पादों के आयात पर कड़ी निगरानी रखते हैं।

    अमेरिकी कानून के सेक्शन 301 के तहत सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि किसी देश की व्यापारिक नीतियां या उत्पादन प्रणाली अमेरिकी उद्योगों के लिए अनुचित या नुकसानदायक मानी जाती हैं, तो उसके खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ, आयात प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक कदम उठाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में जांच के बाद संबंधित देश से बातचीत भी की जाती है और उसके बाद अंतिम निर्णय लागू होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है। यदि भारतीय उद्योग अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों, पारदर्शी सप्लाई चेन और गुणवत्ता मानकों को और मजबूत करते हैं, तो भविष्य में शुल्क संबंधी दबाव कम करने के साथ वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी बेहतर बना सकते हैं।

  • आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    आईपीओ, फिर भी मजबूत निवेश, एसएमई कंपनियों ने छह महीने में 3,752 करोड़ रुपये जुटाकर दिखाया भरोसा

    नई दिल्ली । देश के लघु एवं मध्यम उद्यम (एसएमई) पूंजी बाजार के माध्यम से निवेश जुटाने में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही के दौरान 78 एसएमई कंपनियों ने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के जरिए कुल 3,752 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई। आईपीओ की संख्या पिछले दो वर्षों की समान अवधि की तुलना में कम रही, लेकिन निवेश जुटाने का स्तर मजबूत बना रहा। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक अब गुणवत्ता आधारित कंपनियों में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं और मजबूत कारोबारी मॉडल वाली कंपनियों को बाजार से पर्याप्त समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार जुटाई गई कुल राशि में सबसे बड़ा योगदान फ्रेश इश्यू का रहा। नई इक्विटी जारी कर कंपनियों ने लगभग 3,555 करोड़ रुपये जुटाए, जो कुल इश्यू आकार का करीब 95 प्रतिशत है। दूसरी ओर, ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के जरिए केवल 197 करोड़ रुपये जुटाए गए। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियां मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचने के बजाय अपने विस्तार, नई परियोजनाओं और कारोबार को बढ़ाने के लिए ताजा पूंजी जुटाने पर अधिक जोर दे रही हैं।

    हालांकि आईपीओ की संख्या में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में 88 और वर्ष 2024 की पहली छमाही में 116 एसएमई आईपीओ आए थे, जबकि इस वर्ष यह संख्या घटकर 78 रह गई। इसके बावजूद कुल जुटाई गई राशि में केवल मामूली गिरावट आई है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में एसएमई कंपनियों ने 4,004 करोड़ रुपये जुटाए थे। यह अंतर दर्शाता है कि बाजार में कम लेकिन अपेक्षाकृत बड़े और मजबूत आईपीओ आ रहे हैं, जिन्हें निवेशकों का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही, यानी अप्रैल से जून के बीच 38 एसएमई कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुईं। इन कंपनियों ने लगभग 1,891 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में जुटाई गई 1,644 करोड़ रुपये की राशि से अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार में निवेशकों की रुचि अभी भी बनी हुई है और विकास की संभावनाओं वाली कंपनियों को पूंजी जुटाने में अपेक्षाकृत आसानी हो रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्ष की तीसरी और चौथी तिमाही में एसएमई आईपीओ गतिविधियों में असाधारण तेजी देखने को मिली थी, जबकि मौजूदा वर्ष में बाजार अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति में पहुंच गया है। अब निवेशकों का ध्यान केवल बड़ी संख्या में आने वाले आईपीओ पर नहीं, बल्कि उन कंपनियों पर है जिनकी वित्तीय स्थिति, विकास की योजना और कारोबारी संभावनाएं मजबूत हैं। यही कारण है कि कम लिस्टिंग के बावजूद पूंजी जुटाने की क्षमता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।

    विश्लेषकों के अनुसार एसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और पूंजी बाजार तक इसकी आसान पहुंच आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। मजबूत आईपीओ बाजार से इन कंपनियों को विस्तार, तकनीकी उन्नयन और रोजगार सृजन के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध होते हैं। मौजूदा आंकड़े संकेत देते हैं कि निवेशकों का भरोसा गुणवत्ता वाली एसएमई कंपनियों पर कायम है और आने वाले महीनों में भी यह रुझान जारी रहने की संभावना है।

  • एआई और इनोवेशन से बढ़ेगी ऑफिस स्पेस की मांग, भारत में जीसीसी की हिस्सेदारी 50% के करीब पहुंचने के संकेत

    एआई और इनोवेशन से बढ़ेगी ऑफिस स्पेस की मांग, भारत में जीसीसी की हिस्सेदारी 50% के करीब पहुंचने के संकेत

    नई दिल्ली । भारत वैश्विक कंपनियों के लिए केवल लागत आधारित संचालन का केंद्र नहीं रह गया है, बल्कि अब नवाचार, अनुसंधान और अत्याधुनिक तकनीकों के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। इसी बदलाव का असर देश के कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर में भी साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले दो वर्षों में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) भारत में ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस की मांग का सबसे बड़ा आधार बनने की ओर बढ़ रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2026 और 2027 के दौरान देश में होने वाली कुल ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस लीजिंग का लगभग 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा अकेले जीसीसी के खाते में जाएगा। इससे भारत की वैश्विक कारोबारी और तकनीकी क्षमता को नई मजबूती मिलने की संभावना है।

    बीते कुछ वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपने परिचालन और रणनीतिक केंद्रों का लगातार विस्तार किया है। वर्ष 2021 से अब तक देश के सात प्रमुख शहरों में जीसीसी ने लगभग 11.8 करोड़ वर्ग फुट ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस लीज पर लिया है। यह इसी अवधि के दौरान हुई कुल ऑफिस स्पेस मांग का करीब 37 प्रतिशत हिस्सा है। केवल वर्ष 2026 की पहली छमाही में ही जीसीसी द्वारा 1.66 करोड़ वर्ग फुट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया गया, जो कुल ग्रेड-ए लीजिंग का लगभग 46 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत में वैश्विक कंपनियों का भरोसा लगातार मजबूत हो रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अब जीसीसी की भूमिका पारंपरिक बैक-ऑफिस सेवाओं तक सीमित नहीं रह गई है। वर्तमान समय में ये केंद्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंजीनियरिंग, डेटा एनालिटिक्स, रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे उच्च मूल्य वाले कार्यों का संचालन कर रहे हैं। कुशल मानव संसाधन, प्रतिस्पर्धी परिचालन लागत, मजबूत तकनीकी क्षमता, अनुकूल कारोबारी माहौल और नीतिगत समर्थन ने भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित नवाचार और तकनीकी निवेश ऑफिस स्पेस की मांग को और अधिक गति देने की उम्मीद है।

    क्षेत्रवार आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 से अब तक जीसीसी लीजिंग में टेक्नोलॉजी सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे अधिक करीब 39 प्रतिशत रही है। हालांकि अब अन्य क्षेत्रों की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा क्षेत्र ने कुल लीजिंग में लगभग 22 प्रतिशत योगदान दिया है, जबकि इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत रही। वर्ष 2021 से 2025 के बीच बीएफएसआई क्षेत्र की लीजिंग लगभग तीन गुना बढ़ी, वहीं इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मांग 2.5 गुना से अधिक बढ़ने का अनुमान दर्ज किया गया। इससे स्पष्ट है कि जीसीसी मॉडल अब विभिन्न उद्योगों में तेजी से अपनाया जा रहा है।

    शहरों की बात करें तो बेंगलुरु और हैदराबाद अभी भी जीसीसी गतिविधियों के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं। वर्ष 2021 से अब तक कुल लीजिंग में इन दोनों शहरों की संयुक्त हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक रही है। इसके बावजूद अब चेन्नई, पुणे, मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियां नए कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित करने में तेजी से रुचि दिखा रही हैं। इसके साथ ही ‘हब-प्लस-वन’ रणनीति के तहत टियर-2 और टियर-3 शहरों की ओर भी विस्तार की संभावनाएं बढ़ रही हैं। एआई-आधारित जीसीसी, नैनो और मिड-साइज कैपेबिलिटी सेंटर तथा नए कारोबारी मॉडल आने वाले वर्षों में भारत के ऑफिस स्पेस बाजार और वैश्विक निवेश परिदृश्य को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • पेटीएम की ग्रोथ को मिला एआई का सहारा, लागत दक्षता बढ़ने के साथ ब्रोकरेज ने बढ़ाया लक्ष्य मूल्य

    पेटीएम की ग्रोथ को मिला एआई का सहारा, लागत दक्षता बढ़ने के साथ ब्रोकरेज ने बढ़ाया लक्ष्य मूल्य

    नई दिल्ली । डिजिटल वित्तीय सेवा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी पेटीएम ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में परिचालन प्रदर्शन के साथ लागत नियंत्रण के मोर्चे पर भी मजबूत प्रगति दर्ज की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऑटोमेशन को अपनाने से कंपनी की लागत दक्षता लगातार बेहतर हुई है, जिससे बढ़ते कारोबार के बावजूद खर्चों पर प्रभावी नियंत्रण बना हुआ है। यही कारण है कि कंपनी का मुनाफा बाजार के कई अनुमानों से बेहतर रहा और भविष्य की विकास संभावनाओं को लेकर भी सकारात्मक संकेत मिले हैं।

    कंपनी ने कारोबार के विस्तार के साथ मर्चेंट और उपभोक्ता आधार बढ़ाने में निवेश जारी रखा है, लेकिन इसके बावजूद गैर-बिक्री संबंधी खर्च लगभग स्थिर बने हुए हैं। ग्राहक सेवा, कलेक्शन और मर्चेंट अधिग्रहण जैसी प्रक्रियाओं में एआई आधारित तकनीक के इस्तेमाल ने परिचालन को अधिक कुशल बनाया है। इससे कंपनी को बड़े पैमाने पर लागत बचत के साथ तेज गति से कारोबार बढ़ाने में मदद मिल रही है।

    पेटीएम के लिए वित्तीय सेवाओं का कारोबार सबसे तेजी से उभरता हुआ ग्रोथ इंजन बनकर सामने आया है। इस खंड में राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें मर्चेंट लेंडिंग और कंज्यूमर लेंडिंग की मजबूत मांग का अहम योगदान रहा। कंपनी के साथ काम करने वाले लेंडिंग पार्टनर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है और दोबारा ऋण लेने वाले व्यापारियों की हिस्सेदारी भी काफी मजबूत बनी हुई है। इससे इस कारोबार की गुणवत्ता और स्थिरता दोनों को बल मिला है।

    कंपनी के पास उपलब्ध लेंडिंग कैपिटल उसकी मौजूदा ऋण वितरण क्षमता से कई गुना अधिक बताई जा रही है। इससे स्पष्ट है कि भविष्य में ऋण वितरण बढ़ाने के लिए फंडिंग किसी प्रकार की बाधा नहीं बनेगी। साथ ही कंपनी केवल डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल पर काम कर रही है, जिसके कारण वह स्वयं ऋण जोखिम नहीं उठाती और अपने पास लोन बुक भी नहीं रखती। इससे जोखिम सीमित रहने के साथ कारोबार का विस्तार अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा रहा है।

    कंज्यूमर लेंडिंग कारोबार में भी तेज वृद्धि देखने को मिली है। वित्तीय सेवाओं का उपयोग करने वाले ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पेटीएम पोस्टपेड की मांग पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यही कारोबार कंपनी के राजस्व और परिचालन लाभ में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसके साथ ही मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी, ब्रोकिंग और म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूशन जैसे वेल्थ मैनेजमेंट कारोबार भी कंपनी की नई विकास रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।

    भुगतान कारोबार में भी कंपनी का प्रदर्शन मजबूत बना हुआ है। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों में लेनदेन बढ़ने से कुल भुगतान मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। कार्ड-ऑन-यूपीआई और पोस्टपेड भुगतान की हिस्सेदारी बढ़ने से पेमेंट प्रोसेसिंग मार्जिन में भी संरचनात्मक सुधार देखने को मिला है। इससे कंपनी की आय की गुणवत्ता पहले की तुलना में और मजबूत हुई है।

    परिचालन स्तर पर कंपनी का ईबीआईटीडीए मार्जिन भी पिछली तिमाही की तुलना में बेहतर हुआ है। मजबूत ऑपरेटिंग लीवरेज और राजस्व की तुलना में खर्चों की नियंत्रित वृद्धि के कारण लाभ में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। इसी आधार पर कंपनी के लिए निर्धारित दीर्घकालिक मार्जिन लक्ष्य को तय समय से पहले हासिल करने की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित ऑटोमेशन, भुगतान कारोबार का विस्तार और तेजी से बढ़ती वित्तीय सेवाएं आने वाले वर्षों में पेटीएम की आय और लाभप्रदता को नई ऊंचाई तक पहुंचा सकती हैं। इसी सकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुए कंपनी के भविष्य के लाभ अनुमान में बढ़ोतरी की गई है और निवेश के प्रति भरोसा भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है।

  • फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    नई दिल्ली । अमेरिका ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात को लेकर अपनी नई व्यापारिक कार्रवाई के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि यह दर उन कई देशों की तुलना में कम है, जिन पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत ने जांच प्रक्रिया के दौरान फोर्स लेबर से निर्मित उत्पादों के आयात पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए, जिसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया।

    यह निर्णय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा सेक्शन 301 के तहत की गई व्यापक जांच के बाद लिया गया है। जांच में 60 प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। अमेरिकी प्रशासन का आरोप था कि इन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने या उसके पालन को सुनिश्चित करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इसी आधार पर विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय की गई हैं।

    यूएसटीआर के अनुसार, भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें 10 प्रतिशत टैरिफ की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में बांग्लादेश, कनाडा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया जाएगा। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून में प्रस्तावित कार्रवाई सार्वजनिक किए जाने के बाद भारत ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसी पहल को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक अनुकूल श्रेणी में रखा गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जबरन श्रम को समाप्त करने और व्यापारिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    इस जांच प्रक्रिया के दौरान दो चरणों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई, 45 से अधिक सरकारों से परामर्श किया गया और दो हजार से अधिक सार्वजनिक टिप्पणियां प्राप्त हुईं। इसके आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा के दायरे में शामिल सभी अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कार्रवाई का निर्णय लिया गया।

    हालांकि अमेरिका ने कुछ आवश्यक उत्पादों को इस कार्रवाई से बाहर भी रखा है। इनमें दवाएं, सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चुनिंदा कच्चा माल और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, हालांकि आगे इसका प्रभाव दोनों देशों के व्यापार और निर्यात पर नजर रखने के बाद ही स्पष्ट होगा।