Category: Madhya Pradesh

  • भीषण गर्मी का असर, आस्था पर ग्वालियर के मंदिरों में पूजा पद्धति, में बड़े बदलाव

    भीषण गर्मी का असर, आस्था पर ग्वालियर के मंदिरों में पूजा पद्धति, में बड़े बदलाव


    ग्वालियर । ग्वालियर में भीषण गर्मी का असर अब सिर्फ जनजीवन तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका प्रभाव धार्मिक स्थलों और आस्था के केंद्र मंदिरों तक भी साफ दिखाई देने लगा है जहां मौसम के अनुरूप भगवान की सेवा और पूजा पद्धति में बदलाव किए जा रहे हैं तेज धूप और लू के थपेड़ों के बीच मंदिरों के पुजारी देवताओं को राहत पहुंचाने के लिए विशेष इंतजाम कर रहे हैं ताकि श्रद्धा और परंपरा के साथ साथ मौसम का संतुलन भी बना रहे

    शहर के प्रमुख मंदिरों में अब देवी देवताओं को गर्म और भारी वस्त्रों की जगह हल्के और सूती कपड़े पहनाए जा रहे हैं जिससे उन्हें ठंडक मिल सके वहीं श्रृंगार में भी बदलाव करते हुए चंदन खस मोगरा और गुलाब जैसे प्राकृतिक ठंडक देने वाले तत्वों का उपयोग बढ़ा दिया गया है मंदिरों में फैलती इन सुगंधों के साथ वातावरण भी शीतल और शांत महसूस होने लगा है

    भोग की परंपरा में भी मौसम का असर साफ दिख रहा है जहां पहले पक्के और गरम भोजन चढ़ाए जाते थे वहीं अब उनकी जगह ठंडे और तरल पदार्थों को प्राथमिकता दी जा रही है भगवान को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद में अब मौसमी फल और शीतल पेय शामिल किए जा रहे हैं ताकि यह भोग भी मौसम के अनुकूल हो सके

    अचलेश्वर मंदिर में भगवान भोलेनाथ की सेवा में विशेष परिवर्तन किए गए हैं यहां अभिषेक के लिए ठंडे पानी का उपयोग किया जा रहा है और गर्भगृह में कूलर लगाए गए हैं जिससे अंदर का तापमान नियंत्रित रखा जा सके इसके साथ ही पिंडी के ऊपर एक छेद वाला मटका रखा गया है जिससे लगातार जलधारा गिरती रहती है और शिवलिंग को शीतल बनाए रखती है मंदिर प्रशासन का कहना है कि जल्द ही यहां एसी की सुविधा भी शुरू की जाएगी

    इसी तरह चक्रधर मंदिर में भी पूजा पद्धति में बदलाव देखने को मिल रहा है यहां भगवान को सूती वस्त्र पहनाने के साथ चंदन का लेप किया जा रहा है और भोग में खरबूजा तरबूज आम अनार जैसे रसदार फल और ठंडाई को शामिल किया गया है जो गर्मी में ठंडक पहुंचाने का काम करते हैं श्रद्धालु भी इस बदले हुए स्वरूप को देख संतोष और आस्था के साथ जुड़ रहे हैं

    मंदिरों के पुजारियों के अनुसार यह बदलाव कोई नया प्रयोग नहीं बल्कि हर साल गर्मी के मौसम में अपनाई जाने वाली परंपरा का हिस्सा है उनका मानना है कि भगवान की सेवा भी प्रकृति और मौसम के अनुसार होनी चाहिए ताकि भक्ति का भाव और अधिक सजीव बना रहे

    गौरतलब है कि ग्वालियर में इन दिनों तापमान लगातार बढ़ रहा है और गर्म हवाओं ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है बुधवार को अधिकतम तापमान 41.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जबकि गुरुवार को न्यूनतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस रहा जो सामान्य से अधिक है दिन और रात दोनों समय गर्मी का असर महसूस किया जा रहा है ऐसे में मंदिरों में किए गए ये बदलाव न सिर्फ धार्मिक परंपराओं का पालन हैं बल्कि बदलते मौसम के प्रति संवेदनशीलता का भी उदाहरण बनकर सामने आ रहे हैं

  • ग्वालियर स्मार्ट सिटी बस सेवा फेल, 11 करोड़ खर्च के बाद भी सड़कों से गायब बसें

    ग्वालियर स्मार्ट सिटी बस सेवा फेल, 11 करोड़ खर्च के बाद भी सड़कों से गायब बसें


    नई दिल्ली । ग्वालियर में स्मार्ट सिटी के नाम पर शुरू की गई बस सेवा अब पूरी तरह सवालों के घेरे में है। शहरवासियों को सस्ती, सुरक्षित और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन सुविधा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट आज ठप पड़ चुका है। जिन बसों को शहर की लाइफलाइन बनना था, वे अब सुनसान इलाकों में खड़ी-खड़ी कबाड़ में तब्दील होती नजर आ रही हैं।
    2023 में हुई थी शुरुआत, कुछ महीनों में ही ठप
    Gwalior Smart City Development Corporation ने साल 2023 में बड़े दावों के साथ इंट्रा सिटी बस सेवा शुरू की थी। इन बसों में आधुनिक सुविधाएं और जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम लगाया गया था, ताकि यात्रियों को सुरक्षित और समयबद्ध यात्रा का अनुभव मिल सके। शुरुआत में यह योजना लोगों के बीच चर्चा में भी रही, लेकिन कुछ ही महीनों में इसका संचालन लगभग बंद हो गया।
     ग्वालियर में 11 करोड़ की स्मार्ट सिटी बस सेवा कुछ महीनों में ठप, बसें कबाड़ बनीं और योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
    इस योजना के लिए करीब 11 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया था। प्रोजेक्ट के तहत 16 इंट्रा सिटी और कुल 32 बसें (इंटरसिटी सहित) चलाने की जिम्मेदारी एक निजी कंपनी को सौंपी गई थी। लेकिन जमीनी स्तर पर बसों का संचालन बेहद सीमित रहा और धीरे-धीरे बसें सड़कों से गायब हो गईं।
    आज स्थिति यह है कि ये बसें शहर के अलग-अलग इलाकों-रेस कोर्स रोड, गार्डर पुलिया और रेलवे ओवरब्रिज के नीचे खड़ी नजर आती हैं। लंबे समय से खड़ी रहने के कारण कई बसें जंग खा रही हैं, जिससे करोड़ों की संपत्ति बर्बाद होती दिख रही है।
    ऑटो-विक्रम के दबदबे में नहीं चल पाईं बसें
    सूत्रों की मानें तो शहर में पहले से चल रहे ऑटो और विक्रम का नेटवर्क इतना मजबूत है कि बस सेवा को प्रतिस्पर्धा में टिकने का मौका ही नहीं मिला। निजी कंपनी ने भी संचालन में खास रुचि नहीं दिखाई, जिससे धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गई।
    यात्रियों के लिए बनाए गए जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम का उद्देश्य बसों की हर गतिविधि पर नजर रखना था, लेकिन जब बसें ही नहीं चलीं तो यह तकनीक भी बेकार साबित हुई।
    जनता में नाराजगी, उठ रहे सवाल
    स्थानीय लोगों में इस योजना को लेकर भारी नाराजगी है। हजीरा निवासी मूलचंद का कहना है कि शहर में सरकारी बस सेवा पूरी तरह गायब है, जबकि करोड़ों की बसें यूं ही खड़ी-खड़ी खराब हो रही हैं। उन्होंने इसे जनता के पैसे की बर्बादी बताया और कहा कि “स्मार्ट सिटी के नाम पर सिर्फ दिखावा हो रहा है।”
    जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
    इस पूरे मामले में कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं-

    क्या बिना ठोस ग्राउंड सर्वे के प्रोजेक्ट शुरू कर दिया गया?
    निजी कंपनी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?
    करोड़ों खर्च होने के बावजूद सेवा टिकाऊ क्यों नहीं बन पाई?

    स्मार्ट सिटी प्लान पर उठे सवाल
    बस सेवा के फेल होने से अब पूरे स्मार्ट सिटी प्लान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। जिस योजना का उद्देश्य शहर को आधुनिक बनाना था, वही अब अव्यवस्था और लापरवाही का उदाहरण बनती दिख रही है।
    अगर समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्रोजेक्ट सरकारी योजनाओं में एक और असफल उदाहरण बनकर रह जाएगा।

  • रतलाम में प्रशासनिक दबाव ने ली जान? 4 दिन में 3 नोटिस और छुट्टी से इनकार, पटवारी रविशंकर के सुसाइड नोट ने खोली व्यवस्था की पोल

    रतलाम में प्रशासनिक दबाव ने ली जान? 4 दिन में 3 नोटिस और छुट्टी से इनकार, पटवारी रविशंकर के सुसाइड नोट ने खोली व्यवस्था की पोल


    रतलाम । मध्य प्रदेश के रतलाम जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने उत्सव के माहौल को पल भर में चीख-पुकार और मातम में बदल दिया। आलोट तहसील में पदस्थ पटवारी “रविशंकर खराड़ी” ने अपने घर की तीसरी मंजिल पर साफे से फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह घटना उस वक्त और भी मार्मिक हो गई जब पता चला कि महज एक दिन पहले ही रविशंकर अपने छोटे भाई की शादी के जश्न में डूबे थे और बारात में जमकर डांस कर रहे थे। लेकिन उस मुस्कान के पीछे “प्रशासनिक प्रताड़ना” का जो दर्द छिपा था, उसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा होगा।

    पुलिस की शुरुआती जांच में घटनास्थल से तीन मोबाइल फोन और एक “ओरिजिनल सुसाइड नोट” बरामद हुआ है, जिसने जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। सुसाइड नोट में रविशंकर ने स्पष्ट रूप से नायब तहसीलदार “सविता राठौर” पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मृतक पटवारी ने लिखा कि उन पर न केवल काम का अनुचित दबाव बनाया जा रहा था, बल्कि उन्हें “गलत काम” करने के लिए भी मजबूर किया गया। सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि छोटे भाई की शादी जैसे महत्वपूर्ण पारिवारिक आयोजन के लिए भी उन्हें छुट्टी नहीं दी गई और उन्हें बार-बार नोटिस देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

    घटना की पृष्ठभूमि को खंगालने पर पता चलता है कि अप्रैल माह के दौरान रविशंकर को महज 4 दिनों के भीतर “तीन कारण बताओ नोटिस” थमाए गए थे। ये नोटिस 6 अप्रैल, 8 अप्रैल और 9 अप्रैल को जारी किए गए थे, जिनमें जमीन नामांतरण और सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों जैसे मामलों में लापरवाही का हवाला दिया गया था। सुसाइड से कुछ घंटे पहले रविशंकर ने पटवारी संघ के व्हाट्सएप ग्रुप में एक भावुक मैसेज भी किया था, जिसमें उन्होंने पूछा था, “मेरे साथ कितने पटवारी मेरा सपोर्ट करेंगे?” इसके बाद उन्होंने तहसील अध्यक्ष को अपना सुसाइड नोट भेजा और फिर कभी किसी का फोन नहीं उठाया।

    रविशंकर के परिवार की कहानी भी कम दुखद नहीं है। उनके पिता रकमेश्वर खराड़ी भी पटवारी थे, जिनकी दिसंबर 2023 में “हार्ट अटैक” से मौत हो गई थी। पिता की मृत्यु के बाद ही रविशंकर को “अनुकंपा नियुक्ति” मिली थी। अभी उन्हें नौकरी ज्वाइन किए महज चार महीने ही हुए थे। रविशंकर की एक 4 साल की छोटी बेटी है और उनकी पत्नी वर्तमान में “प्रेग्नेंट” हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी रविशंकर के कंधों पर थी, लेकिन अधिकारियों के कथित उत्पीड़न ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया कि उन्होंने अपनी और अपने अजन्मे बच्चे की परवाह किए बिना यह आत्मघाती कदम उठा लिया।

    इस घटना के बाद आक्रोशित परिजनों और पटवारी संघ ने मेडिकल कॉलेज में करीब “7 घंटे तक धरना” दिया। सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और नायब तहसीलदार के खिलाफ “हत्या का केस” दर्ज करने की मांग की। मामले की गंभीरता और बढ़ते जन आक्रोश को देखते हुए कलेक्टर ने तत्काल कार्रवाई करते हुए नायब तहसीलदार सविता राठौर को “निलंबित” कर दिया है। फिलहाल पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और मृतक के पास से मिले डिजिटल सबूतों और रिकॉर्डिंग्स को खंगाला जा रहा है ताकि इस सुसाइड मिस्ट्री की पूरी सच्चाई सामने आ सके।

  • सीएम हाउस के पास प्रदर्शन पर सख्ती भोपाल के प्रमुख चौराहे दो महीने के लिए प्रतिबंधित

    सीएम हाउस के पास प्रदर्शन पर सख्ती भोपाल के प्रमुख चौराहे दो महीने के लिए प्रतिबंधित


    भोपाल । भोपाल शहर में कानून व्यवस्था और यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया है। पुलिस आयुक्त द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत आदेश जारी करते हुए शहर के प्रमुख और अत्यधिक व्यस्त चौराहों पर धरना प्रदर्शन और पुतला दहन जैसे आयोजनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस आदेश के तहत पॉलिटेक्निक चौराहा आकाशवाणी चौराहा और किलोल पार्क चौराहा सहित आसपास के क्षेत्रों को प्रतिबंधित घोषित किया गया है।

    यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब इन स्थानों पर लगातार बढ़ती गतिविधियों के कारण यातायात व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा था। प्रशासन का मानना है कि ये चौराहे शहर के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों से जुड़े हुए हैं जहां से एयरपोर्ट और हमीदिया अस्पताल जैसे प्रमुख स्थानों तक आवागमन होता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन या आंदोलन न केवल आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बनता है बल्कि आपातकालीन सेवाओं के संचालन में भी बाधा उत्पन्न करता है।

    पुलिस द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इन क्षेत्रों में अक्सर विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा प्रदर्शन की अनुमति मांगी जाती रही है लेकिन यहां वैकल्पिक मार्गों की कमी के चलते हर बार शहर की यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। यही वजह है कि प्रशासन को यह सख्त कदम उठाना पड़ा है ताकि शहर में अनावश्यक जाम और अव्यवस्था को रोका जा सके।

    आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है और आगामी दो महीनों तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि के दौरान इन चौराहों पर किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन हड़ताल या पुतला दहन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    इस फैसले को शहर में ट्रैफिक प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जहां एक ओर आम नागरिकों को राहत मिलने की उम्मीद है वहीं दूसरी ओर यह भी सवाल उठ रहा है कि प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थानों की व्यवस्था किस तरह की जाएगी।

    कुल मिलाकर यह आदेश प्रशासन की उस प्राथमिकता को दर्शाता है जिसमें शहर की सुचारू व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस निर्णय का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव पड़ता है और क्या इससे भोपाल की यातायात व्यवस्था में वास्तविक सुधार देखने को मिलता है।

  • नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान

    नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान


    नई दिल्ली । उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में सरकारी आवास खाली कराने की कार्रवाई ने राजनीतिक रंग ले लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंगलों पर वर्षों से काबिज लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब यह मुद्दा सीधे सत्ता और संगठन तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि नोटिस मिलते ही भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री के आवास पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ‘कब्जा पॉलिटिक्स’ और गरमा गई है।
    6 लोगों को नोटिस, एक महीने की मोहलत
    विश्वविद्यालय के कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने बताया कि हाल ही में हुई कार्यपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिन लोगों का विश्वविद्यालय से कोई सीधा संबंध नहीं है, उनसे आवास खाली कराया जाएगा। इसी के तहत आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय सहित करीब 6 लोगों को नोटिस जारी कर एक महीने के भीतर
    बंगले खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।
    जानकारी के मुताबिक, इन आवासों में पूर्व पुलिस अधिकारी, शिक्षक और अन्य लोग भी शामिल हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि इन कब्जों के कारण वास्तविक कर्मचारियों को आवास नहीं मिल पा रहा है, जबकि 50 से ज्यादा कर्मचारी लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं।
    विधायक का पलटवार: “सीएम का क्या?”
    नोटिस मिलते ही विधायक चिंतामणि मालवीय ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं कुलपति का बंगला उपयोग कर रहे हैं, तो फिर बाकी लोगों पर कार्रवाई क्यों? उन्होंने इसे “नैतिक सवाल” बताते हुए कहा कि वे भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
    मालवीय ने यह भी दावा किया कि उनका विश्वविद्यालय से वित्तीय हिसाब लंबित है। उन्होंने बताया कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने करीब 9 लाख रुपए जमा किए थे और जब तक पूरा हिसाब नहीं हो जाता, तब तक आवास खाली करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि अगर गहराई से जांच हुई तो मामला लंबा खिंच सकता है।
    प्रशासन का पक्ष: कर्मचारियों को प्राथमिकता
    कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के आवास केवल कर्मचारियों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अच्छे आवास बाहरी लोगों के कब्जे में हैं। प्रशासन ने यह भी योजना बनाई है कि 21 जर्जर भवनों को हटाकर नई व्यवस्था विकसित की जाएगी।
    सीएम आवास पर भी उठे सवाल
    विवाद का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री को आवंटित कुलपति का बंगला भी बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उज्जैन के देवास रोड स्थित यह बंगला मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के लिए तैयार कराया गया था और वे उज्जैन प्रवास के दौरान अक्सर वहीं रुकते हैं। इसी को आधार बनाकर विधायक ने सवाल उठाए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
    सियासी तापमान बढ़ा
    यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक ओर विश्वविद्यालय नियमों का हवाला देकर आवास खाली कराने पर अड़ा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि इसे चयनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विधायक नोटिस का पालन करेंगे या यह मामला और बड़े सियासी टकराव में बदलेगा।

  • गेहूं खरीदी में नया रिकॉर्ड संभव एमपी सरकार ने केंद्र से बढ़ाया कोटा मांग

    गेहूं खरीदी में नया रिकॉर्ड संभव एमपी सरकार ने केंद्र से बढ़ाया कोटा मांग


    भोपाल । भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं खरीदी को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार से निर्धारित लक्ष्य बढ़ाने की मांग की है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जानकारी देते हुए कहा कि प्रदेश में इस बार गेहूं का उत्पादन काफी अच्छा हुआ है और मौजूदा लक्ष्य से अधिक खरीदी होने की पूरी संभावना है। ऐसे में किसानों को पूरा लाभ दिलाने के लिए केंद्र से कोटा बढ़ाने को लेकर लगातार संवाद किया जा रहा है।

    रबी विपणन वर्ष 2026 27 के लिए केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन प्रदेश में बंपर पैदावार और किसानों की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए यह लक्ष्य कम पड़ता नजर आ रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि यदि लक्ष्य नहीं बढ़ाया गया तो कई किसानों को समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने का अवसर नहीं मिल पाएगा।

    मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार किसानों के हितों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और खरीदी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है। पहले छोटे किसानों से गेहूं खरीदा जा रहा है इसके बाद मध्यम और अंत में बड़े किसानों की बारी आएगी ताकि सभी वर्गों को समान अवसर मिल सके।

    इस वर्ष गेहूं उपार्जन के लिए किसानों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। करीब 19 लाख 4 हजार किसानों ने पंजीयन कराया है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 3 लाख अधिक है। अब तक 2 लाख 21 हजार 455 किसानों से 95 लाख 17 हजार 550 क्विंटल गेहूं की खरीदी की जा चुकी है। इसमें से 75 लाख 57 हजार 580 क्विंटल गेहूं का परिवहन भी किया जा चुका है जिससे भंडारण व्यवस्था पर दबाव कम हुआ है।

    सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने वाले किसानों को तेजी से भुगतान भी किया जा रहा है। अब तक 1 लाख 6 हजार 55 किसानों को 1091 करोड़ रुपये से अधिक की राशि उनके खातों में ट्रांसफर की जा चुकी है। यह पहल किसानों के विश्वास को मजबूत करने और खरीदी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भी इस प्रक्रिया पर पड़ा है। पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थितियों के कारण शुरुआती दौर में बारदानों की उपलब्धता चुनौती बनी रही लेकिन सरकार ने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था कर स्थिति को संभाल लिया। जूट के नए बारदानों के साथ साथ पीपी बैग और पुनः उपयोग योग्य बारदानों का उपयोग किया गया जिससे खरीदी प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई।

    वर्तमान में किसानों से 2585 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य के साथ 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस जोड़कर कुल 2625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं खरीदा जा रहा है। यह दर किसानों को बेहतर आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में मददगार साबित हो रही है।

    प्रदेश सरकार का यह कदम न केवल किसानों को आर्थिक मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण है बल्कि यह भी दर्शाता है कि बेहतर उत्पादन के साथ नीति स्तर पर त्वरित निर्णय कितने जरूरी होते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार राज्य की इस मांग पर क्या निर्णय लेती है और क्या वास्तव में गेहूं खरीदी का लक्ष्य बढ़ाया जाता है

  • सबूतों की कमी पर सख्ती: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा -बिना ठोस आधार नहीं चलेगा केस, असीमानंद के बयान पर उठे सवाल

    सबूतों की कमी पर सख्ती: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा -बिना ठोस आधार नहीं चलेगा केस, असीमानंद के बयान पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । 2006 मालेगांव ब्लास्ट से जुड़े बहुचर्चित मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। Bombay High Court ने बुधवार को इस केस में चल रही स्पेशल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। कोर्ट के इस फैसले से महू के लोकेश शर्मा, देपालपुर के राजेंद्र चौधरी समेत धनसिंह और मनोहर नरवरिया को राहत मिली है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बिना ठोस और पुख्ता सबूतों के किसी भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
    कमजोर साक्ष्यों पर उठे सवाल
    सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकील कौशिक म्हात्रे ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया, वह खुद विवादों में रहा है। यह बयान स्वामी असीमानंद का था, जिसे बाद में उन्होंने दबाव में दिया गया बताते हुए वापस ले लिया था। कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है।
    NIA की चार्जशीट पर भी सवाल
    इस मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) द्वारा की गई थी। एजेंसी ने लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में पेश किए गए साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि ट्रायल को जारी रखा जाए।
    6 साल जेल में रहे आरोपी
    बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि दोनों मुख्य आरोपी 2013 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 6 साल तक जेल में रहे। 2019 में उन्हें जमानत मिली थी। उस समय भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल इतने लंबे समय तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है। अब एक बार फिर कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए ट्रायल पर रोक लगा दी है।
    क्या था पूरा मामला?
    8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार चार बम धमाके हुए थे। ये धमाके बेहद संवेदनशील स्थानों हमीदिया मस्जिद और कब्रिस्तान के पास शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हुए थे। इस दर्दनाक घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
    जांच में कई मोड़
    शुरुआत में मामले की जांच एटीएस ने की और 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें 2016 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। बाद में जांच Central Bureau of Investigation (CBI) और फिर NIA को सौंप दी गई। जांच एजेंसियों ने बाद में इस मामले में अलग दिशा में जांच करते हुए दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया।
    आगे क्या?
    सितंबर 2025 में स्पेशल कोर्ट ने चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केस की दिशा बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जांच एजेंसियां नए सिरे से सबूत पेश कर पाती हैं या मामला यहीं ठहर जाता है।

  • प्रशासनिक लापरवाही पर CAT की टिप्पणी, देरी से प्रभावित पुलिस अधिकारियों को मिली राहत

    प्रशासनिक लापरवाही पर CAT की टिप्पणी, देरी से प्रभावित पुलिस अधिकारियों को मिली राहत


    जबलपुर । जबलपुर में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण CAT ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह मामला उन पुलिस अधिकारियों से जुड़ा है जिन्होंने वर्षों की सेवा के बावजूद भारतीय पुलिस सेवा में अपने चयन के अवसर से वंचित होने का आरोप लगाया है। आवेदक जितेन्द्र सिंह सत्येंद्र सिंह तोमर और मुकेश कुमार वैश्य ने अधिकरण के समक्ष याचिका दायर कर यह मांग की थी कि 56 वर्ष की आयु सीमा पार करने के बावजूद उनके अभ्यर्थित्व पर विचार किया जाए।

    याचिका में स्पष्ट रूप से बताया गया कि सरकार द्वारा हर पांच वर्ष में किया जाने वाला अनिवार्य कैडर रिव्यू समय पर नहीं किया गया। वर्ष 2018 में प्रस्तावित यह प्रक्रिया 2022 में पूरी हुई जिससे चार वर्षों की देरी हुई। इस देरी का सीधा असर उन अधिकारियों पर पड़ा जो उस दौरान आयु सीमा पार कर गए और चयन प्रक्रिया में शामिल होने के पात्र नहीं रह गए। आवेदकों का कहना है कि यदि कैडर रिव्यू समय पर हो जाता तो वे नियमों के तहत भारतीय पुलिस सेवा में चयन के लिए पात्र होते।

    इन अधिकारियों ने यह भी बताया कि वे 26 से 27 वर्षों की लंबी सेवा दे चुके हैं और अनुभव के आधार पर पूरी तरह योग्य हैं। इसके बावजूद उन्हें अब तक चयन का अवसर नहीं मिल सका। उनके अनुसार यह स्थिति न केवल उनके अधिकारों का हनन है बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करती है।

    मामले में आवेदकों की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे और अक्षय खंडेलवाल ने जोरदार पैरवी की। उन्होंने अधिकरण के समक्ष यह दलील रखी कि कैडर रिव्यू में हुई देरी पूरी तरह से सरकारी तंत्र की विफलता है और इसका खामियाजा आवेदकों को नहीं भुगतना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण योग्य अधिकारियों को अवसर से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

    दलीलों को सुनने के बाद CAT ने प्रथम दृष्टया मामला आवेदकों के पक्ष में बनता हुआ पाया और उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की। अधिकरण ने आदेश दिया कि फिलहाल यथास्थिति बनाए रखी जाए और इस संबंध में केंद्र एवं राज्य सरकार से जवाब मांगा जाए। यह आदेश आवेदकों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे उनके मामले को आगे सुनवाई में मजबूती मिलेगी।

    यह फैसला केवल तीन अधिकारियों तक सीमित नहीं है बल्कि यह उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है जहां प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं। CAT का यह रुख यह दर्शाता है कि न्यायिक संस्थाएं अब ऐसी लापरवाहियों को गंभीरता से ले रही हैं और प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

    अब सभी की नजरें केंद्र और राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और भविष्य में ऐसी देरी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

  • तेज रफ्तार बस का कहर, बाइक सवार की दर्दनाक मौत, के बाद ग्रामीणों ने किया चक्का जाम

    तेज रफ्तार बस का कहर, बाइक सवार की दर्दनाक मौत, के बाद ग्रामीणों ने किया चक्का जाम


    इंदौर । इंदौर जिले के महू क्षेत्र में स्थित किशनगंज थाना इलाके के भैंसलाए गांव में एक दर्दनाक सड़क हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। तेज रफ्तार से दौड़ रही एक फैक्ट्री बस ने बाइक सवार युवक को इतनी जोरदार टक्कर मारी कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि टक्कर के बाद युवक को संभलने का मौका तक नहीं मिला और घटनास्थल पर ही उसकी सांसें थम गईं। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई और माहौल गम और गुस्से में बदल गया।

    यह घटना केवल एक हादसा नहीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का नतीजा मानी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की सड़क से तेज रफ्तार में गुजरने वाले वाहनों को लेकर कई बार प्रशासन को चेताया गया था। विशेष रूप से फैक्ट्री की बसों की रफ्तार पर लगाम लगाने और गांव में स्पीड ब्रेकर बनाने की मांग बार बार उठाई गई थी लेकिन हर बार इसे नजरअंदाज कर दिया गया। इस अनदेखी ने आखिरकार एक युवक की जान ले ली और अब ग्रामीणों का धैर्य टूट गया।

    हादसे के बाद गुस्साए ग्रामीण बड़ी संख्या में सड़क पर उतर आए और उन्होंने चक्का जाम कर दिया। लोगों ने जोरदार नारेबाजी करते हुए प्रशासन के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया। उनका साफ कहना था कि यदि समय रहते स्पीड ब्रेकर बनाए गए होते तो शायद यह हादसा टल सकता था। प्रदर्शन के चलते इलाके में यातायात पूरी तरह ठप हो गया और सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

    ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि फैक्ट्री की बसें अक्सर लापरवाही से और तेज रफ्तार में गांव के भीतर से गुजरती हैं जिससे हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। इसके बावजूद न तो कोई गति नियंत्रण के उपाय किए गए और न ही सुरक्षा के अन्य इंतजाम किए गए। लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होता है जबकि पहले से चेतावनी देने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया जाता।

    घटना की सूचना मिलते ही किशनगंज थाना पुलिस मौके पर पहुंची और हालात को काबू में करने की कोशिश की। पुलिस ने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया और यातायात बहाल कराने की दिशा में कदम उठाए। साथ ही मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा गया और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी गई है।

    यह हादसा एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार करता है या फिर समय रहते जरूरी कदम उठाए जाएंगे। एक जान जाने के बाद अब गांव के लोग ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में ऐसी दर्दनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।

  • कांग्रेस IT सेल वर्कर्स को लेकर विवाद: Bhopal में परिजनों ने लगाया अपहरण का आरोप, जांच की मांग

    कांग्रेस IT सेल वर्कर्स को लेकर विवाद: Bhopal में परिजनों ने लगाया अपहरण का आरोप, जांच की मांग


    नई दिल्ली । राजधानी Bhopal में राजस्थान साइबर पुलिस की कार्रवाई ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने के बाद परिजनों ने गंभीर आरोप लगाते हुए इसे ‘अपहरण’ तक करार दिया है। मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर गरमा गया है, जबकि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
    परिजनों का आरोप: बिना सूचना ले गए, कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई
    शिकायतकर्ता मोहम्मद आमिर ने आरोप लगाया कि उनके भांजे बिलाल खान समेत तीन युवकों निखिल और इनाम को कुछ लोग खुद को राजस्थान पुलिस बताकर अपने साथ ले गए। परिवार का कहना है कि उन्हें यह कहकर गुमराह किया गया कि तीनों को कोर्ट में पेश किया जाएगा, लेकिन न तो उन्हें किसी स्थानीय अदालत में पेश किया गया और न ही मेडिकल कराया गया। परिजनों का आरोप है कि बिना आधिकारिक जानकारी के इस तरह ले जाना कानून के खिलाफ है।
    वायरल पत्र से जुड़ा है पूरा विवाद
    यह पूरा मामला राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री Vasundhara Raje के नाम से वायरल हुए एक कथित पत्र से जुड़ा बताया जा रहा है। सोशल मीडिया पर प्रसारित इस पत्र के तार भोपाल स्थित कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े होने की आशंका जताई गई थी। इसी सिलसिले में राजस्थान साइबर पुलिस की टीम जांच के लिए भोपाल पहुंची थी।
    राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
    कांग्रेस नेता PC Sharma ने इस मामले को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब परिवार ने शिकायत दर्ज करा दी है, तो संबंधित एजेंसियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना सूचना, बिना मेडिकल और बिना कोर्ट पेशी के कार्रवाई पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है। परिवार की मांग है कि तीनों युवकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाए।
    टाइमलाइन से बढ़ी शंका
    घटना की टाइमलाइन भी कई सवाल खड़े करती है। 19 अप्रैल: तीनों कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर रोका गया। 21 अप्रैल दोपहर: परिजनों को जानकारी मिली कि उन्हें कलेक्टर कार्यालय के पास रखा गया है। उसी दिन दोपहर 3 बजे: एक कार से उन्हें कहीं ले जाया गया, परिजनों को जमानत की बात कहकर भेज दिया गया। शाम तक कोई जानकारी नहीं मिलने पर परिजनों ने थाना कोहेफिजा में शिकायत दर्ज कराई। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर संदेह और गहरा कर दिया है।
    हाईकोर्ट सख्त, 27 अप्रैल को पेश करने के आदेश
    मामले ने जब कानूनी मोड़ लिया तो Madhya Pradesh High Court की जबलपुर बेंच ने हस्तक्षेप किया। अदालत ने राजस्थान पुलिस को 27 अप्रैल को तीनों कार्यकर्ताओं को पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही मध्य प्रदेश और राजस्थान पुलिस से पूरी कार्रवाई का विवरण मांगा गया है। कोर्ट ने 20-21 अप्रैल के सीसीटीवी फुटेज भी प्रस्तुत करने को कहा है।
    गिरफ्तारी प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल
    याचिका में गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए न्याय की मांग की गई है। सवाल यह है कि यदि कार्रवाई नियमों के तहत हुई, तो परिजनों को अंधेरे में क्यों रखा गया? यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है।
    सच्चाई सामने आना जरूरी
    भोपाल में हुई इस घटना ने पुलिस की कार्यशैली, कानूनी प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब सबकी नजर 27 अप्रैल पर टिकी है, जब अदालत में सच्चाई सामने आएगी और यह तय होगा कि कार्रवाई कानून के दायरे में थी या नहीं।